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| Rajnish BaBa Mehta |
तारीखों ने बदलना छोड़ दिया है, क्या कहूं अब? ... अचानक आ गई हो वक्त को मौत जैसे, मुझे जिंदगी से हमेशा झूठ ही क्यों मिला? क्या मैं किसी सच के काबिल नहीं थी! कितनी निराशा थी इन लफ्जों में, उनके मन में। अकेली थी, भीड़ में होते हुए भी...बेहद सिमटी, डरी हुई, ज़मीन पर लुढ़कने के मानिंद कातर।
कोई भी कारण सांसों की डोर काट देने के लिए पर्याप्त नहीं होता।
एकांत दिमाग की नसें चाक कर देता देता है। धीरे-धीरे, रग़ों में पैबस्त होता है तनहाई का चाकू... और जब नाकामयाबी का अंधेरा हो तो नश्तर और गहरा हो जाता है, लेकिन इसका हल खुदकुशी तो नहीं..काश....काश...काश आज ये काश कहना भारी ना लग रहा होता।
दुनिया में कोई रिश्तों के उलझाव का शिकार हो जाता है तो किसी को निराशा के दलदल में डुबा देती है नाकामयाबी। यकीन नहीं होता – रास्तों पर बिछे रेड कॉरपेट, शोहरत, दौलत, कैमरों की चमक के बाद कैसे जेहन में घर कर लेती है इतनी निराशा ...कि मन दुनिया को अलविदा कह देता है।
वो न पहली थीं, और न आखिरी। सितारों की इस दुनिया के कई स्टार्स बेवक्त धुंधले हो गए। असुरक्षा, खोखले होते जाने का अहसास। दिल टूटता है तो उसकी धमक अनसुनी करना मुश्किल होता है, लेकिन जान से बड़ा तो कुछ भी नहीं, हां... इश्क भी नहीं, पर इन्हें कौन समझाए ।
उस रात बहुतों को फोन किया था। आखिरी सांस से ऐन पहले, इसलिए, ताकि कोई उनकी तड़प सुन ले, पर किसी के पास वक्त न था। आखिरकार, दर्द के मसीहा ने तड़पते हुए जान दे दी। जिन्होंने प्रेम विवाह किया, पर रिश्ते में प्रेम बाकी नहीं बचा था। फिर भी जीने की ज़िद में ज़िंदा रही। लेकिन कब तक....कब तक.....एक शाम, ज़िद डगमगा गई। कहीं गहरे दबी निराशा उभर आई ...और जब सुबह हुआ तो फिर उसकी जिंदगी की शाम ढल चुकी थी ..।
देख ले भगवान ....वो संसार को छोड़कर भाग गए... अपनी ज़िंदगी की उलझनों से तंग आकर।
तूने ये क्यों नहीं सिखाया कि... ज़िंदगी लड़ने के लिए है, खुद को तोड़ देने के लिए नहीं।
ऐसे भी क्या ख्वाब देखने, जो पूरे न हों, तो उनकी किरचें सीने में धंस जाएं।
ख्वाब ऊंचे होने चाहिए, लेकिन इतने बड़े नहीं कि उनके पीछे भागते-भागते दम फूलने लग जाए।
रजनीश बाबा मेहता
