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| यार बना बडी...रजनीश बाबा मेहता |
यार बना बडी नाटक
देखने के बाद मेरे मन में दोस्ती के लिए नई विचार जो पनपी उसे मैं अपने शब्दों के
जरिए बांधने की कोशिश की है।
समाज रिश्तों में
बँधे इंसानों का समूह मात्र नहीं है। सुख:दुख, खान:पान, अच्छाई:बुराई और मानवीय संवेदनाओं के बगैर इसकी
कल्पना भी नहीं की जा सकती। इंसानों को छोड़कर अन्य जीव-जंतु इसके प्रत्यक्ष
प्रमाण हैं। पूर्व में इंसान जीने के लिए भोजन और रहने के लिए एक छत से ही संतुष्ट
रहता था। धीरे-धीरे उसे रिश्तों और संगठनात्मक फायदों का आभास हुआ। पहले खून के
रिश्तों का फिर सामाजिक रिश्तों। हमारे समाज में रिश्ते भी कई तरह के होते हैं।
कुछ स्वार्थ के लिए तो कुछ श्रद्धा के लिए। कुछ लाभ के लिए बनाए जाते हैं तो कुछ
बदले की भावना से। इसी तरह कुछ रिश्ते विरासत में मिलते हैं। कुछ संतति के लिए और कुछ
स्वयं ही बन जाते हैं। रिश्तों की मित्रता और वैमनस्यता दोनों ही होती है। यदि
मित्रता का रिश्ता है तो वह निश्चल और परस्पर समर्पण भाव लिए होना चाहिए।
मित्रता तो आज की
जरूरत और शग़ल होता जा रहा है मित्रता को संजीदगी से निभाना आज सबसे अधिक घाटे का
रिश्ता बन गया है। आज के परिवेश में मित्रता के मायने बदल गए हैं। हम अपने
पूर्वजों और ग्रंथों द्वारा बतलाई कृष्ण-सुदामा, कर्ण-दुर्योधन, राम-सुग्रीव आदि
की मित्रता से ही सहमत नजर नहीं आते । बात केवल लाभ या हानि का नहीं है। बात है
मैत्रीवत रिश्तों के निर्वहन की। हम जानते हैं कि समय, काल और परिवेश के अनुरूप
मानवीय एवं भौतिक मूल्यों में परिवर्तन होता है। अथाह भंडारों के बाद भी दो घूँट
पानी और कुछ पल प्राणवायु के अभाव में लोगों के मरने के किस्से सबने सुने होंगे।
स्थान और आवश्यकता के अनुसार मूल्य बदलते हैं। लेकिन मित्रता मूल्यों का सौदा नहीं
है। यह दुनिया की पाक नियामत है जिसे भगवान ने भी पावन भाव से निभाया है। साथ में
यह भी कहा जाता है कि मित्रता हो जाती है, की नहीं जाती। सच्ची मित्रता कालजयी
होती है और कुछ मित्रता क्षणभंगुर होती है। क्षणभंगुरता पानी के बुलबुले, बरसाती
मेढक अथवा मौसमी नाले जैसी होती है। बात वही है कि स्वार्थ पूर्ण, दोस्ती खत्म,
क्या हम में से अधिकांश यही नहीं कर रहे हैं। हम अपनी मित्रता पर कितने संजीदा
हैं। आज हम एक श्वांस में बचपन के कितने मित्रों के नाम गिना सकते हैं ? आप हफ्ते, महीने या वर्ष में कितने दोस्तों को
बिना किसी काम के याद करते हो ?
अरे भाई, सोचों...?
आज अधिकतर सभी ऐसा
ही कुछ कर रहे हैं। वास्तव में यही बदलाव है, पर सही बदलाव समाज को सही दिशा देता
है. और गलत बदलाव समाज को पतन की ओर ढकेलता है। बचपन में एक ही स्कूल मे पढने
वाले, मोहल्ले में एक साथ गिल्ली –डंडा
खेलने वाले, किसी को
चिढाकर अगले पल मनाने वाले हम भी तो रहे हैं। आज की व्यस्तताओं, महत्वाकाक्षांओं
औऱ रिश्तों के अबमूल्यन ने हमें पास रहते हुए भी दूर कर दिया है। हम इसे विकास की
विडम्बना कहें या वरदान, हर कुछ गोलमाल सा लगने लगा है। आज बचपन के जिस लंगोटिया
यार को अपने देश की मिट्टी से ज्यादा विदेशी संस्कृति से लगाव हो गया है,
रामायण-गीत से ज्यादा नीति और शांति विदेशी पुस्तकों में नजर आती है। जो अपने देश
में रहते हुए भी विदेशी-जीवन शैली अपनाना अपनी शान समझता है। भारतीय परम्पराओं एवं
भारतीयता पर से जिसका विश्वास उठ गया है। हितैषी और स्वार्थी में फर्क करना भूल
गया है। ऐसे मित्र को उसकी इस दुनिया से बाहर निकालने का काम सच्चे मित्रों के
अलावा और कोई नहीं कर सकता।
मुंबई की एकजुट संस्था
का नाटक यार बना बडी इसी विचारधारा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
भारत रंग महोत्सव के
दौरान कमानी सभागार में एकजुट मुंबई की निर्देशिका नादिरा ज़हीर बब्बर ने अपनी टीम
के सज्जाद खान, यशपाल शर्मा, और चिन्मय दास के साथ एक नई परिकल्पना के साथ यार बना
बडी नाटक की समृद्ध प्रस्तुति दी।
मिथिलेश
खुराना(यशपाल शर्मा), कार्तिक कोठारी(चिन्मय दास) एवं जयदीप वानखेड़े (सज्जाद खान)
बचपन के सच्चे और परस्पर समर्पित मित्र हैं। वक्त के साथ और रूचियों के अनुरूप
तीनों अपनी अपनी अलग जिंदगी जीते हैं। जयदीप पाश्चात्य संस्कृति में इतना डूब जाता
है कि वह भारतीयता और अपनों को भी हेयदृष्टि से देखने लगता है। दोस्तों की सोच और
बातचीत में भी उसे ओछापन नजर आता है। यब देखकर मिथिलेश चुप नही बैठ पाता। वह जयदीप
की बेमानी परिवेश, अतिशय फिज़ूलखर्ची एवं सुगना से मंगनी तोड़ने पर बहुत परेशान
होता है। वह तीसरे मित्र कार्तिक के साथ मिलकर अपने मित्र को हकीकत की दुनिया में
वापस लाने का बीड़ा उठाता है। मित्र की खातिर बेइज्जती, स्वाभिमान यहाँ तक कि अपनी
पत्नी तक को कही गई अनाप-शनाप बातों पर भी संयम बरतता है। उसका मानना है कि हर
रिश्तों से बड़ा मित्रता का रिश्ता होता है। यह अपनी मर्जी का रिश्ता है जिसे कभी
भी बनाया और कभी भी तोड़ा जा सकता है। एक सच्चा दोस्त भला अपने मित्र की
फिजूलखर्ची और उसके बिगड़ते भला कैसे देख सकता है। बस ऐसी ही मीठी-नमकीन बातें हैं
जो दर्शकों के सीधे दिल में उतर जाती है। दोस्तों के बीच गिले-शिकवे ,
रूठना-मनाना, गाली-गलौज, आरोप-प्रत्यारोप, जयदीप को तरह-तरह से समझाना, उसके
अनावश्यक महंगे शौक को औचित्यहीन निरूपित करना जैसे संवादों के दृश्य नाटक के लिए
तैयार भव्य सेट के अन्दर बखूबी प्रस्तुत किए गए। इन दोस्तों की तीन चार बैठकों में
ही आखिर जयदीप की ऑंखे खुलती है। वह अपने सच्चे मित्रों की मित्रता पहचानता है।
अपनी पूर्व मंगेतर सुगना से माफी माँगता है। यहां तक कि जापान के मशहूर आर्टिस्ट
से ली गई एक करोड़ की बहुमूल्य कलाकृति को भी मित्रता के आड़े आने की बात कह डंडे
से तोड़ देना चाहता है। ये ऑंसुओं से धुले वही पल होते हैं जब तीनों मित्रों की
निश्चल, पवित्र और नि:स्वार्थ
मित्रता नए आयाम तय करती है। बोलचाल की सीधी-सपाट बयानबाजी, चरित्रों के अनुरूप
भाषाशैली, सटीक उत्तर-प्रत्युत्तर, खुशी-गम, मिलन-विरह, घमंड-विनम्रता, परस्पर
समर्पण की भावना की सहज प्रस्तुति एवं भूत-अभूत से हटकर वर्तमान की जानी-मानी
बातों का ताना-बाना अर्थात यार बना बडी नाटक अपनी पटकथा को लेकर निश्चित रूप से
हटकर साबित हुआ। इस सफल प्रस्तुति के लिए पूरी एकजुट मुंबई औऱ उनकी निर्देशिका
नादिरा जी के साथ साथ उनके अभिनेतागण बधाई के पात्र हैं। जिन्होंने भारत रंग
महोत्सव की शोभा अपने कार्य़शैली के जरिए औऱ बढ़ा दी।
लेखक
रजनीश कुमार
rajnish17kumar@gmail.com




