Thursday, 31 January 2013

यार बना बडी की समीक्षा...रजनीश की कलम से

यार बना बडी...रजनीश बाबा मेहता 

यार बना बडी नाटक देखने के बाद मेरे मन में दोस्ती के लिए नई विचार जो पनपी उसे मैं अपने शब्दों के जरिए बांधने की कोशिश की है।
समाज रिश्तों में बँधे इंसानों का समूह मात्र नहीं है। सुख:दुख, खान:पान, अच्छाई:बुराई और मानवीय संवेदनाओं के बगैर इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। इंसानों को छोड़कर अन्य जीव-जंतु इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। पूर्व में इंसान जीने के लिए भोजन और रहने के लिए एक छत से ही संतुष्ट रहता था। धीरे-धीरे उसे रिश्तों और संगठनात्मक फायदों का आभास हुआ। पहले खून के रिश्तों का फिर सामाजिक रिश्तों। हमारे समाज में रिश्ते भी कई तरह के होते हैं। कुछ स्वार्थ के लिए तो कुछ श्रद्धा के लिए। कुछ लाभ के लिए बनाए जाते हैं तो कुछ बदले की भावना से। इसी तरह कुछ रिश्ते विरासत में मिलते हैं। कुछ संतति के लिए और कुछ स्वयं ही बन जाते हैं। रिश्तों की मित्रता और वैमनस्यता दोनों ही होती है। यदि मित्रता का रिश्ता है तो वह निश्चल और परस्पर समर्पण भाव लिए होना चाहिए।
मित्रता तो आज की जरूरत और शग़ल होता जा रहा है मित्रता को संजीदगी से निभाना आज सबसे अधिक घाटे का रिश्ता बन गया है। आज के परिवेश में मित्रता के मायने बदल गए हैं। हम अपने पूर्वजों और ग्रंथों द्वारा बतलाई कृष्ण-सुदामा, कर्ण-दुर्योधन, राम-सुग्रीव आदि की मित्रता से ही सहमत नजर नहीं आते । बात केवल लाभ या हानि का नहीं है। बात है मैत्रीवत रिश्तों के निर्वहन की। हम जानते हैं कि समय, काल और परिवेश के अनुरूप मानवीय एवं भौतिक मूल्यों में परिवर्तन होता है। अथाह भंडारों के बाद भी दो घूँट पानी और कुछ पल प्राणवायु के अभाव में लोगों के मरने के किस्से सबने सुने होंगे। स्थान और आवश्यकता के अनुसार मूल्य बदलते हैं। लेकिन मित्रता मूल्यों का सौदा नहीं है। यह दुनिया की पाक नियामत है जिसे भगवान ने भी पावन भाव से निभाया है। साथ में यह भी कहा जाता है कि मित्रता हो जाती है, की नहीं जाती। सच्ची मित्रता कालजयी होती है और कुछ मित्रता क्षणभंगुर होती है। क्षणभंगुरता पानी के बुलबुले, बरसाती मेढक अथवा मौसमी नाले जैसी होती है। बात वही है कि स्वार्थ पूर्ण, दोस्ती खत्म, क्या हम में से अधिकांश यही नहीं कर रहे हैं। हम अपनी मित्रता पर कितने संजीदा हैं। आज हम एक श्वांस में बचपन के कितने मित्रों के नाम गिना सकते हैं ? आप हफ्ते, महीने या वर्ष में कितने दोस्तों को बिना किसी काम के याद करते हो ? अरे भाई, सोचों...?

आज अधिकतर सभी ऐसा ही कुछ कर रहे हैं। वास्तव में यही बदलाव है, पर सही बदलाव समाज को सही दिशा देता है. और गलत बदलाव समाज को पतन की ओर ढकेलता है। बचपन में एक ही स्कूल मे पढने वाले, मोहल्ले में एक साथ गिल्ली डंडा
खेलने वाले, किसी को चिढाकर अगले पल मनाने वाले हम भी तो रहे हैं। आज की व्यस्तताओं, महत्वाकाक्षांओं औऱ रिश्तों के अबमूल्यन ने हमें पास रहते हुए भी दूर कर दिया है। हम इसे विकास की विडम्बना कहें या वरदान, हर कुछ गोलमाल सा लगने लगा है। आज बचपन के जिस लंगोटिया यार को अपने देश की मिट्टी से ज्यादा विदेशी संस्कृति से लगाव हो गया है, रामायण-गीत से ज्यादा नीति और शांति विदेशी पुस्तकों में नजर आती है। जो अपने देश में रहते हुए भी विदेशी-जीवन शैली अपनाना अपनी शान समझता है। भारतीय परम्पराओं एवं भारतीयता पर से जिसका विश्वास उठ गया है। हितैषी और स्वार्थी में फर्क करना भूल गया है। ऐसे मित्र को उसकी इस दुनिया से बाहर निकालने का काम सच्चे मित्रों के अलावा और कोई नहीं कर सकता।

मुंबई की एकजुट संस्था का नाटक यार बना बडी इसी विचारधारा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
भारत रंग महोत्सव के दौरान कमानी सभागार में एकजुट मुंबई की निर्देशिका नादिरा ज़हीर बब्बर ने अपनी टीम के सज्जाद खान, यशपाल शर्मा, और चिन्मय दास के साथ एक नई परिकल्पना के साथ यार बना बडी नाटक की समृद्ध प्रस्तुति दी।

मिथिलेश खुराना(यशपाल शर्मा), कार्तिक कोठारी(चिन्मय दास) एवं जयदीप वानखेड़े (सज्जाद खान) बचपन के सच्चे और परस्पर समर्पित मित्र हैं। वक्त के साथ और रूचियों के अनुरूप तीनों अपनी अपनी अलग जिंदगी जीते हैं। जयदीप पाश्चात्य संस्कृति में इतना डूब जाता है कि वह भारतीयता और अपनों को भी हेयदृष्टि से देखने लगता है। दोस्तों की सोच और बातचीत में भी उसे ओछापन नजर आता है। यब देखकर मिथिलेश चुप नही बैठ पाता। वह जयदीप की बेमानी परिवेश, अतिशय फिज़ूलखर्ची एवं सुगना से मंगनी तोड़ने पर बहुत परेशान होता है। वह तीसरे मित्र कार्तिक के साथ मिलकर अपने मित्र को हकीकत की दुनिया में वापस लाने का बीड़ा उठाता है। मित्र की खातिर बेइज्जती, स्वाभिमान यहाँ तक कि अपनी पत्नी तक को कही गई अनाप-शनाप बातों पर भी संयम बरतता है। उसका मानना है कि हर रिश्तों से बड़ा मित्रता का रिश्ता होता है। यह अपनी मर्जी का रिश्ता है जिसे कभी भी बनाया और कभी भी तोड़ा जा सकता है। एक सच्चा दोस्त भला अपने मित्र की फिजूलखर्ची और उसके बिगड़ते भला कैसे देख सकता है। बस ऐसी ही मीठी-नमकीन बातें हैं जो दर्शकों के सीधे दिल में उतर जाती है। दोस्तों के बीच गिले-शिकवे , रूठना-मनाना, गाली-गलौज, आरोप-प्रत्यारोप, जयदीप को तरह-तरह से समझाना, उसके अनावश्यक महंगे शौक को औचित्यहीन निरूपित करना जैसे संवादों के दृश्य नाटक के लिए तैयार भव्य सेट के अन्दर बखूबी प्रस्तुत किए गए। इन दोस्तों की तीन चार बैठकों में ही आखिर जयदीप की ऑंखे खुलती है। वह अपने सच्चे मित्रों की मित्रता पहचानता है। अपनी पूर्व मंगेतर सुगना से माफी माँगता है। यहां तक कि जापान के मशहूर आर्टिस्ट से ली गई एक करोड़ की बहुमूल्य कलाकृति को भी मित्रता के आड़े आने की बात कह डंडे से तोड़ देना चाहता है। ये ऑंसुओं से धुले वही पल होते हैं जब तीनों मित्रों की निश्चल, पवित्र और नि:स्वार्थ मित्रता नए आयाम तय करती है। बोलचाल की सीधी-सपाट बयानबाजी, चरित्रों के अनुरूप भाषाशैली, सटीक उत्तर-प्रत्युत्तर, खुशी-गम, मिलन-विरह, घमंड-विनम्रता, परस्पर समर्पण की भावना की सहज प्रस्तुति एवं भूत-अभूत से हटकर वर्तमान की जानी-मानी बातों का ताना-बाना अर्थात यार बना बडी नाटक अपनी पटकथा को लेकर निश्चित रूप से हटकर साबित हुआ। इस सफल प्रस्तुति के लिए पूरी एकजुट मुंबई औऱ उनकी निर्देशिका नादिरा जी के साथ साथ उनके अभिनेतागण बधाई के पात्र हैं। जिन्होंने भारत रंग महोत्सव की शोभा अपने कार्य़शैली के जरिए औऱ बढ़ा दी।

लेखक
रजनीश कुमार
rajnish17kumar@gmail.com

Sunday, 27 January 2013

त्रिपुरारी शर्मा: नाटक मेबी दिस समर समीक्षा... रजनीश की कलम से


Rajnish Kumar The Director, Writer 
निर्देशक त्रिपुरारी शर्मा
Laboni Performing Arts, New Delhi
बिना शादी किए लिव इन रिलेशनशिप के तहत पति-पत्नी की तरह रहना इतना भी आसान नहीं है, जितना कि आजकल के युवाओं को लगता है। 15वें भारत रंग महोत्सव के दौरान राष्ट्रीय नाट्य विघालय के सम्मुख सभागार में पेश किए गए नाटक Maybe This Summer में इस जटिल रिश्ते की इन्हीं उलझनों को पेश किया गया।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में प्रोफेसर त्रिपुरारी शर्मा द्वारा लिखा गया व उन्हीं के द्वारा निर्देशित इस नाटक को बेहद गजब की पेशकारी के साथ टीकम जोशी और गौरी देवल ने सम्मुख सभागार में प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्तुति के दौरान ज्यादा दर्शकों की नामौजूदगी मुझे इसलिए खल रही थी कि एक तो सभागार बहुत छोटा था और दूसरी बात ये कि इतना बढ़िया नाटक इतने छोटे सभागार में क्यों किया गया। जब नाटक बेहतरीन होता है तो उसे हमेशा बड़े सभागार में करवाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शक बढ़िया नाटक का लुत्फ ले सकें।
नाटक मे बी दिस समर एक बड़े शहर में साथ रह रहे एक लड़के और लड़की के बारे में था। बड़े शहरों में इस तरह साथ रहने की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। दोनों कामकाजी है और दोनों ने अपना स्थान खुद बनाया है। यह नाटक इस तरह के रिश्ते की प्रकृति और जटिलता को सामने लाने के प्रयास के रूप में पेश किया गया। नाटक ने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह जीवन को जीने का अर्थपूर्ण तरीका है ?
नाटक लिव इन रिलेशनशिप के तहत रहने वाले युवाओं के लिए भी सवाल उठाए कि क्या उन्हे शादी नहीं कर लेनी चाहिए या फिर अलग-अलग हो जाना चाहिए ? इस तरह के रिश्तों की भावनात्मक डोर आखिर कितनी मजबूत होती है ?
इसके साथ ही नाटक में दिखाया गया कि दोनों पात्र शहरी जीवन से आए हैं, और अपने साथ अपना परिवेश भी लेकर जी रहे है। दोनों के अपने अपने जीवन मूल्य है। क्या वह स्थान कभी घर बन सकता है जहा इस तरह के युवा एक घर की ही तरह रहने का प्रयास करते है। नाटक में दिखाया कि दोनों पात्र एक-दूसरे को समझते है, और बेहद प्यार भी करते है, लेकिन बहुत सारे सवाल उन्हें घेर लेते हैं, और उन्हे अंतत: इस निर्णय पर पहुचना ही पड़ता है, कि अब या तो उन्हे शादी कर लेनी चाहिए या फिर एक दूसरे को छोड़कर चले जाना चाहिए।
सवालों के उहापोह के बीच 2 घंटे का नाटक कैसे अपने अंजाम तक पहुंच जाता है ये पता ही नहीं चल पता है। इसमें जितनी मेहनत लेखिका त्रिपुरारी शर्मा ने अपने लिखे संवाद के जरिए किया उतना की अभिनेता ने भी किया। उम्रदराज लेखिका त्रिपुरारी शर्मा ने ऐसे कसे संवाद लिखे हैं जिससे हर युवा पीढी कहीं ना कहीं इत्तफाक रखता है।  मुझे अपने थिएटर के करियर में पहली बार ऐसा लगा कि इस नाटक में मैं अभिनय कर रहा हूं। एक कमरे में जब कहानी शुरू होती है तो फिर अभिनेता पूरे 2 घंटे तक मंच पर टिके रहकर दर्शकों के बांधे रखता है। ऐसे नाटक को देखकर दिल गदगद हो जाता है क्योंकि नाटक के बाद तुरंत ये एहसास होता है कि त्रिपुरारी शर्मा जैसे नाटककार और लेखिका मौजूद हैं तब तक इस विधा में तरह तरह की सुखद अनुभूति का एहसास दर्शकों को समय समय पर मिलता रहेगा।
नाटक मे बी दिस समर में मंच सज्जा भी खूबसूरती से किया गया। एक लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े को कमरे में जिस तरह से समान रहता है निर्देशक ने उसी अंदाज में पेश किया। जुगाड़तंत्र रियल लाइफ के अलावा स्टेज पर भी खूब दिखता है। पोर्टेब्लिटी का उदाहरण भी कई जगह पर है।
भारतीय रंग महोत्सव अगर गुलजार हुआ तो उसके पीछे त्रिपुरारी शर्मा के इस नाटक का भी अहम् योगदान है । Maybe This Summer हमारी और आपकी कहानी को पूरी तरह से परिभाषित भी करता है।
लेखक
रजनीश कुमार
rajnish17kumar@gmail.com

मंटो पर नाटक दफा 292 की समीक्षा... रजनीश की कलम से

Rajnish Kumar Oponion on Dafa 292 Play

दफा 292
मंटो
राष्ट्रीय नाट्य विघालय रंगमंडल

हिंदी थिएटर मंटो की प्रगतिशील बोहेमियन छवि से बार-बार विमोहित होता है। अपनी बौद्धिक सीमा में वह इस छवि के रूमान पर मुग्ध हुआ रहता है। मोहन राकेश ने मंटो की कहानियों में जिस जुमलेबाजी को एक खास कमजोरी के तौर पर लक्ष्य किया था, हिंदी थिएटर उसे एक नाटकीय तत्त्व के तौर पर गदगद होकर इस्तेमाल करता है।

लेकिन 15वें भारतीय रंग महोत्सव के दौरान अभिमंच प्रेक्षागृह में हुई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की प्रस्तुति 'दफा- 292' की विशेषता यह है कि मंटो की एक परिहासपूर्ण कहानी के जरिए उसमें इस रूमान से परे सरकने की कोशिश की गई है। युवा रंगकर्मी अनूप त्रिवेदी द्वारा निर्देशित इस प्रस्तुति में कथ्य के तीन चरण हैं।

पहला, मंटो और उनकी बीवी का संवाद,  दूसरी कहानी 'तीन खामोश औरतें',  तीसरा, मंटो पर मुकदमा और उपसंहार। इस सारे सिलसिले में मंटो अपने खयालात और हालात को अक्सर एकालाप में भी बयान करते नजर आते हैं। वो बताते हैं कि 'कम्युनिस्ट मुझपर फाहशनिगारी का इल्जाम लगाते हैं', कि 'कोई तकियाई हुई रंडी मेरे अफसाने का मौजूं बन सकती है', कि 'जैसे में खाना खाता हूं, गुसल करता हूं, सिगरेट पीता हूं, वैसे ही अफसाना लिखता हूं' । अनूप त्रिवेदी ने रोशनी के दो अलग-अलग वृत्तों में मंच पर दो मंटो पेश किए हैं। दो मंटो और दो ही उनकी बीवियां। यह चीज देर तक चलने वाले पति-पत्नी के चुहुलनुमा झगड़े की एकरसता को थोड़ा कम करती है। बगैर किसी शोर-शराबे के साफ-सुथरे दृश्यों में रोशनी के फोकस और छायाएं धीमे से एक प्रभाव बनाते हैं। इन दृश्यों में कुछ भी अनावश्यक नहीं है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर बैठी तीन औरतों के बातूनीपन की कहानी 'तीन खामोश औरतें' में एक तख्त मंच पर है और उसके किनारे पर एक लैंपपोस्ट खड़ा है। बाकी दृश्य ट्रेन के गुजरने के स्वर, गार्ड की सीटी वगैरह से बनता है। लेकिन असली चीज है चरित्र की छवि। अनूप त्रिवेदी में इसकी अच्छी सूझ है। पहली बातूनी औरत धाराप्रवाह बोले जा रही है। दूसरी उसे औचक सुन रही है। यह दूसरी वाली बीच-बीच में खों-खों करके थोड़ा विचित्र तरह से हंसती है। बाद में यह दूसरी वाली बोलना शुरू करती है तो अब तक अलग-थलग बैठी तीसरी वाली का भौंचक्का-सा उत्सुक चेहरा देखते ही बनता है। कुछ ही देर में तीसरी वाली शुरू हो जाती है, और इस बीच वहीं प्लेटफॉर्म पर सोने का उपक्रम कर रहा बंदा पहलू बदलता हुआ निरीह मुद्रा में रह-रह कर उन्हें देख रहा है। एक मौके पर वह पहली बातूनी औरत की बात सुनता हुआ अपनी बंडी उतार देता है। लेकिन औरत बोलने में इस कदर मशगूल है कि उसपर उघारे बदन की अशालीनता का असर भी कुछ देर बाद होता है। तब उसका हल्की सकपकाहट में नजरें फेर लेना जल्दी से घरेलू स्त्री की अच्छी छवि बनाता है। प्रस्तुति एक कोलाज की तरह है, जिसमें बाद में कुछ फुटपाथिये दुकानदार मंटो के मुकदमे की चर्चा करते हैं कि पता नहीं गिरे इंसानों को उठाने में उसे क्या मजा आता है! कि वो ऐसे अफसाने लिखता है जैसी बातों के मुतल्लिक सोचना भी अपने में संगीन जुर्म है। अनूप मंच पर वो स्पेस बनाते हैं, जहां छोटे-मोटे किरदार भी गौर से दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में इधर के दिनों में जिस तरह चीजों से ठुंसे हुए ऊटपटांग किस्म के नाटक होते रहे हैं। उनमें यह बिल्कुल अलग तरह की प्रस्तुति थी। पूरे दृश्य विधान में त्रुटियां या चूकें इसमें नहीं दिखाई देतीं। अनूप त्रिवेदी की पहचान अब तक मुख्यतः अभिनेता के तौर पर रही है, पर यह प्रस्तुति उनकी सुलझी हुई रंग-दृष्टि को सामने लाती है। विशेषत: दृश्य के कैनवास और उसमें चरित्रांकन से बनती छवियों को लेकर। नाटक में गलतियों की गुंजाईश नहीं थी क्योंकि नाटक में अभिनेता की परिपक्वता हमें काफी हद तक प्रभावित करती है। साहित्यिक अंदाज में हकीकत का ये फसाना अपने अंजाम तक जब पहुंचता है तो दर्शक खड़े होकर देर तक तालियां बजाते रह जाते हैं। नाटक हर तरीके से परिपूर्ण है। अभिनय से लेकर, मंच सज्जा हो या फिर प्रकाश व्यवस्था हर मोर्चे पर निर्देशक ने बारिकी से काम किया है जो नाटक को पूरी तरह से सफल बना दिया।

इस नाटक को देखने के बाद मैं मंटो की जिंदगी और लिखने की शैली से काफी प्रभावित हुआ। हालांकि मंटो पर अश्लीलत के आरोप लगे और कई तरह से मुकदमे भी चले। सजा भी हुई। नाटक का नाम दफा 292 रखने के पीछे ये भी सोच है। नाटक का आखिरी हिस्सी इसी पर केंद्रित है औऱ बिना अपनी तरफ से टिप्पणी किए निर्देशक इस बात को रेखांकित कर देता है। जिन लोगों या सामाजित ताकतों ने मंटों पर इस तरह के आरोप लगाए थे उनके जेहनियत कैसी थी। उनकी मानसिकता में क्या था ? मंटों क्यों अपने समय के कुछ लोगों को असहज कर देते थे ? समाज में किस तरह सच्चाईयों से मुंह मोड़ने की प्रवृत्ति भी होती है, ये इस नाटक के आखिरी दृश्य में बहुत ही बेहतरीन तरीके से उभरता है।

ऐसा नहीं था कि मंटो का विरोध सिर्फ राजनैतिक, प्रशासनिक या मजहबी ताकतों ने किया। खुद प्रगतिशील कहे जानेवाले खेमें में भी मंटो का विरोध हुआ। एक बार तो प्रगतिशील लेखक संघ में मंटो के बारें में निंदा प्रस्ताव भी रख गया। ये दीगर बात है कि ये प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। मगर इतिहास में ये दर्ज रहेगा कि मंटो को अपनी बिरादरी, यानि लेखकों की बिरादरी में भी विरोध झेलने पड़े। आजकल कई लोग बार बार बहसों के दौरान लक्ष्मण रेखा की बात करते हैं। मंटो ने तो अपने लेखन में कई बार लक्ष्मण रेखा तोड़ीं। शायद इसी वजह से एक बड़े लेखक भी बनें। जो कि नाटक में मौजूद संवादों के संदर्भ से बखूबी झलकता है। 

लेखक
रजनीश कुमार
  Rajnish17kumar@gmail.com



आत्मकथा नाटक की समीक्षा... रजनीश की कलम से

Rajnish The Director , Writer 


आत्मकथा
निर्देशक-विनय शर्मा
पदातिक ग्रुप
नाटक ने सिनेमा को कई कलाकार दिए हैं और ये कलाकार लगातार बेहतर काम भी कर रहे हैं । समाज को एक नए सिरे से देखने का काम फिल्में भी कर रही हैं और इसके बेहतर परिणाम सामने आ रहे हैं। उक्त बातें प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 15वें भारत रंग महोत्सव के उद्घाटन के अवसर पर कहीं. उन्होंने कहा कि थिएटर समाज के कई रूपों को दिखाता है यह विरोध का भी सशक्त माध्यम हैं। इसका मतलब ये नहीं कि थिएटर को सिर्फ विरोध के लिए इस्तेमाल किया जाए। थिएटर को अपने विचारों के जरिए औऱ भी मजबूत बनाने की जरूरत है। 15वें भारत रंग महोत्सव में श्याम बेनेगल के इस संवाद के साथ शुरू हुआ थिएटर का महाकुंभ। और पहली प्रस्तुति थी आत्मकथा

 एक बार फिर फिल्मों से थिएटर की तरफ़ रुख किया है जाने माने अभिनेता कुलभूषण खरबंदा। अभिनेता कुलभूषण खरबंदा के नाटक आत्मकथासे इस रंगमंचीय कार्यक्रम की शुरूआत हुई। स्त्री-पुरुष के संबंधों, एक लेखक के अंतरंग पहलुओं और एक शोध छात्रा के माध्यम से संबंधों की पड़ताल करता यह नाटक दर्शकों को बांधे रखा। कुलभूषण खरबंदा, अनुभा फतेहपुरिया, चेतना जालान और संचयिता भट्टाचर्जी का अभिनय बेहद सराहनीय है। कोलकाता के पदातिक समूह द्वारा की गई प्रस्तुति का निर्देशक वरिष्ठ निर्देशक विनय शर्मा ने किया।
गौरतलब है कि भारत रंग महोत्सव में इस वर्ष कुल 87 प्रस्तुतियां में पहली प्रस्तुति आत्मकथा अपने आपमें एक जानदार नाटक हैं लेकिन दर्शकों को अंत तक बांधे रख पाने में कामयाब नहीं सके।

उद्घाटन सत्र के बाद पदातिक कोलकाता  की प्रस्तुति आत्मकथा लेखक महेश एलकुंचवार के नाटक से पन्द्रहवें भारंगम की औपचारिक शुरूआत हुई।
प्रस्तुति की शैली यथार्थवादी थी । जिसमें एक ड्राईग रूम का सेट बनाया गया था। जिसके दीवारों का बेहतरीन ढंग से इस्तेमाल कर उसपर वीडियो प्रोजेक्शन भी किया जा रहा था। दोनों तरफ़ की दीवारों को जोड़ता हुआ बीच में एक चल सेट था। जिस पर टेलीफ़ोन लगा था।  उसे पीछे से बीच में ले आ कर कमरे का विभाजन कर लिया जाता था। टेलीफ़ोन पर होने वाली बातचीत एक युक्ति थी जिससे नाटक का कथ्य भी खुलता था, और इसके नैरेशन की एकरैखिकता को भी तोड़ा जाता था। नाटक का बहुत सारा हिस्सा फ़्लैश बैक में होने की जगह कई जगह नाटक देर से समझ में आती है। काली दीवारों पर नेगेटिव्स की तरह चलने वाले प्रोजेक्शन के साथ प्रस्तुति प्रारंभ हुई और रंगमंच के  के जाने माने अभिनेता कुलभूषण खरबंदा अनंतराव के रूप में स्टेज के बीच में आये और आत्मकथाको बोलना शुरू किया तिलक और गांधी जी के समय को जोड़ते हुए उम्मीद बढ़ी की प्रस्तुति यादगार रहेगी लेकिन ऐसा हो ना सका, देखने से प्रभावशाली नजर आने वाला डिजाईन ही प्रस्तुति के लिये आत्मघाती लगने लगा। हर दृश्य के फेड आऊट और फ़ेड इन  के बीच में पीछे के हिस्से को सामने लाकर दीवार बनाना जिससे टेलीफ़ोन लगी हुई है और ऐसा बार बार करनाइससे नाटक में तनाव बिखर गया और बिखरता चला गया और कई जगह प्रस्तुति उबाऊ भी होने लगी। इस प्रक्रिया में अभिनेताओं की उर्जा का अधिकांश तो सेट के समंजन में चला गया और रही सही कसर दो मुख्य अभिनेताओं के अभिनय ने पूरी कर दी जो अधेड़ की भूमिका निभाते कहीं कहीं असरदार तो कहीं कहीं कुछ अधिक ही थके लगे रहे थे।
नाटक में अनंतराव एक शोध छात्रा को अपनी आत्मकथा लिखवा रहें हैं। लेकिन आत्मकथा लिखाते हुए वे सच का सिर्फ़ अपना हिस्सा सुना रहे हैं वह भी कल्पना के कलेवर में लपेट कर। सच का एक हिस्सा उनकी पत्नी के पास है जो अनंतराव से अलग रहती है। क्योंकि अनंतराव का अपनी पत्नी की छोटी बहन से ही अतरंग रिश्ता बन गया था। अन्य दो पात्रों में शोध छात्रा प्रग्या हैं जो आत्मकथा लिखने के क्रम में अनंतराव से संवाद-विवाद करते हुए उनकी तरफ़ आकर्षित होते चली जाती है। और दूसरा चरित्र अनंतराव की पत्नी की बहन वासंती का है जिसका जीवन जीने का अपना विद्रोही दृष्टिकोण है। यथार्थवाद शैली में प्रस्तुति इस प्रस्तुति में कथ्य का उलझाव बना ही रहता है। आत्मकथा लिखने के क्रम में हर पात्र का सत्य के प्रति अपने दृष्टिकोण सत्य की सापेक्षता की ओर इशारा करता है साथ ही यह भी कि आत्मकथा में कल्पना कितनी हावी रहती है। लेखक के अपने चरित्र, पुरस्कारलिप्सा, अहम,  इत्यादि उस पर कितना हावी रहते हैं। नाटक के कथ्य में काफ़ी कुछ था, लेकिन नाटक में यह सब पीछे छूट गया। पति पत्नी की अलगाव की कहानी मुख्य  कहानी भी ठीक से संप्रेषित नहीं हुई। समय के लिहाज से भी यह एक अप्रासंगिक नाटक लगा और आभास हुआ कि यथार्थवादी रंग मुहावरा अब कितना नीरस और ऊबाउ हो गया है, और वीडियो या अन्य युक्तियों को जोड़ देने के बाद भी कुछ हासिल नहीं होता। प्रस्तुति में गति का निर्वाह ही नहीं था। फलस्वरूप यह लंबा खीच गया और मध्यांतर के बाद ही कई दर्शक बाहर निकल गए। सब मिलाकर अगर नाटक की बात की जाए तो फिर ये उद्घाटन नाटक और फिल्म जगत के चर्चित हस्ती कुलभूषण खरबंदा के अभिनय की वजह से दर्शक अंत तक बैठे रहते हैं नहीं तो अगर ऐसा कर पाना संभव नहीं था। संभावनों से परे इस नाटक में सीखने को तो बहुत कुछ मिलता है लेकिन ये निराशा की ओर भी ले जाता है।

निर्देशक विनय शर्मा ने सेट बेहतरीन डिजाइन किया औऱ प्रकाश की परिकल्पना भी तारीफ के काबिल थी लेकिन अभिनेता कई बार सेट को समझने में उलझने लगते हैं।

खैर पूरी तरह से पूरी तरह से मेरी उम्मीदों पर नहीं उतर पाया लेकिन खुशी इस बात की थी कि मैं कुलभूषण खरबंदा जैसे महान अभिनेता को अभिनय करते देख पाया जिनकी वजह से यह नाटक काफी हद तक अच्छी थी।
                                        लेखक    
रजनीश कुमार
rajnish17kumar@gmail.com



मोहनदास नाटक की समीक्षा ... रजनीश की कलम से


मोहनदास
निर्देशक राजेंद्रनाथ
श्रीराम सेंटर रंग मंडल

यथार्थ को आप कैसे पकडेंगे ? आप कह सकते हैं कि यथार्थ को पकड़ना क्या है ?     जो हमारे सामने है यथार्थ है । लेकिन क्या यथार्थ इतना ही है ? दर्शनशास्त्र तो हमेशा से ही कहता है कि,  नहीं यह बस उसका आभास है । तालाब के जल की तरह है जिसकी तलहटी में क्या है ये देखना मुश्किल है । हमारी दुनिया का यथार्थ भी वैसा ही है। इसकी कई परते हैं । बिलकुल इस वर्चुअल/आभाषी दुनिया की तरह । दृश्य के परे का जो जाल है उसको देखने के लिये खास दृष्टि और औजार चाहिये। रचनात्मक प्रतिभायें यही करती हैं, वह हमेशा यथार्थ की पड़ताल करती है, और उस यथार्थ को सामने लाती है जो तल में है।
  मोहनदासकी प्रस्तुति भी यही करती है, मोहनदासकी कहानी तो इतनी भर है कि किसी अन्य व्यक्ति जो सामर्थ्यवान है ने जबरन उसके नाम को हथिया लिया है और इस अनाधिकार कब्ज़े से मोहनदास यातना पाता रहता है। लेकिन इस यातना के पीछे सामाजिक सरंचनाओं की पृष्ठभूमि  और उनका इतिहास है । जिसमें सदियों से मोहनदास और उनके जैसे लोग पिस रहें हैं, और उसके हक पर कोई उसके ही नाम से कब्ज़ा जमाये बैठा है। यह कब्ज़ा छिन भी जाये तो भी मोहनदास के लिये जीवन आसान नहीं है। तो संकट अब मोहनदास के पहचान पर ही नहीं   उसके जीने के अधिकार पर भी है क्योंकि उसके सांस लेने की हवा और जगह दोनों सिकुड़ती जा रही है। मोहनदास जाहिर है समाज की हाशिये पर पडी हुई जातियों से संबंध रखता है। जो सरकार कि बनाई किसी लिस्ट में नहीं है। और हां मोहनदास का नाम मोहनदास और मां का नाम पुतलीबाई और पत्नी का नाम कस्तुरीबाई ऐसे ही नहीं है. साथ ही गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे जज महोदय की उपस्थिति भी एक फ़ैंटेसी की उपस्थिति है।
उदय प्रकाश की चर्चित कहानी मोहनदासपर फ़िल्म भी बनी है और इसे साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला है। इस कहानी को बड़ी ही संवेदनशीलता से दिलचस्प शैली में वरिष्ठ निर्देशक राजेंद्रनाथ ने श्रीराम सॆंटर रंगमंडल के साथ प्रस्तुत किया है। यहां यह ध्यान रहे कि राजेन्द्रनाथ ऐसे निर्देशक है जो हमेशा रंगमंच की वास्तविक शक्तियों पर भरोसा करते हैं। उनकी प्रस्तुति का आधार ही अभिनेता है और अभिनेताओं ने बखूबी इस जिम्मेवारी  को निभाया है अगर दूसरे शब्दों में कहें तो हर कुछ किरदार ने नाटक को जीवंत बना दिया।  प्रस्तुति की नैरेटिव शैली प्रयोगात्मक है जो लगभग अंत से शुरु होती है। और हम मोहनदास को देखते हैं जो अपने पहचान से इनकार कर रहा है और इससे पीछा छुड़ाने के लिये कोई भी हलफ़नामा देने को तैयार है. प्रस्तुति में लेखक उदय प्रकाश का चरित्र ही सूत्रधार की भूमिका में है, जो हर पात्रों से दर्शक का परिचय कराता है कहानी का संचालन करता है और जरूरी मुद्दो पर रूककर कहानी को संदर्भों से जोड़ता है। प्रस्तुति शुरू होकर अतीत की यात्रा करती है, और  दर्शक क्रमशः मोहनदास की त्रासदी और उसके कारणों को समझता है देखता है। महत्वपूर्ण यही है कि त्रासदी का जैसे लेखक ने कोरा ब्यौरा नहीं दिया वैसे ही निर्देशक भी कोरा ब्यौरा नहीं देता। वह इस त्रासदी के कारण और कार्य  संबंधों की व्यापक पड़ताल करता है, और पड़ताल करने में दर्शक को सक्षम भी बनाता है, और यकीन मानिये कि नाटक फ़िर स्टेज के साथ साथ दर्शक के मस्तिष्क में भी चलती है। याद कीजिये कि ब्रेख्त ने भी यहीं कहा था कि नाटक की सफ़लता यहीं है कि वह प्रेक्षागृह के बाहर शुरु हो।
उदय प्रकाश की कहानियों की यह खासियत है कि वे अपनी कहानी और पात्रों को वृहतर आख्यानों की शृंखला से जोड़ते हैं। उनकी कहानी का पात्र किसी द्वीप का निवासी नहीं बल्कि वह इसी भूमंडल का प्राणी है। और इस भूमंडल पर घटने वाली हर घटना के परिणाम का वह किसी ना किसी तरह से भागी है। इस कहानी में कहानीकार ने समय संदर्भों को जोड़ा है, और बताया है, कि मोहनदास की नियति किसी एक खास व्यक्ति की नियति नहीं है। प्रस्तुति ने भी इस समय संदर्भों को बखूबी पेश किया है। सूत्रधार रुक कर सारे संदर्भों का ब्यौरा देता है, ‘यह वहीं समय है जब पेट्रोल के दाम बढ़ने पर वामपंथी पार्टियां सरकार के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रही थी। जबकि देश की अधिकांश जनता को पेट्रोल से मतलब नहीं था’, ‘यह वही समय है जब सत्तायें निरंकुश और क्रूर होती जा रही है’, ‘यह वही समय है, जब  एशिया के दो संप्रभु देश नेस्तनाबूत किये जा रहे हैं’, इत्यादि। प्रस्तुति इस पूरे वृतांत को अपने में समेटती है, और उसमें मोहनदास की स्थिति को लोकेट करती है। और उत्पीड़क बिरादरी को कठघरे में लेती है। सत्ता और समाज के उन तमाम ढांचो की पोल खोलती है, जो शक्ति और संसाधन पर कब्जा जमायें हुएं है और उनके वास्तविक हक़दारों को बेद्खल करने की व्यस्थित तैयारी भी कर चुके हैं। इसमें एक और जहां समाज की अंदरूनी व्यवस्था हैं वही व्यापक परिप्रेक्ष्य में बड़े राष्ट्र और उनका लालच। प्रस्तुति समाज में छा रही एकरूपता को भी चिह्नित करती है जहां सभी एक जैसा होने की होड़ में हैं।
जैसा कि उपर बताया गया कि अभिनेता ही प्रस्तुति की जान है, वैसे यह कहना भी अजीब है, क्योंकि नाटक में तो अभिनेता ही प्रस्तुति की जान होने चाहिये लेकिन रंगमंच के क्षेत्र में यह वह समय  जो उन प्रयोगों का है। जिसमें अभिनेता बस एक यंत्र है. इसलिये जिस प्रस्तुति में अभिनेता हाड़ मांस का होता है उसकी अलग से चर्चा करनी पड़ती है। सूत्रधार की भूमिका में श्रीकांत ने बेहतरीन अभिनय किया है। उन्होंने अपने देह और स्पीच में भूमिका को आत्मसात कर लिया है। शांतचित्त होकर स्थिर स्वर में बोले गये उनके संवाद भीतर तक उतर जातें हैं । समीप सिंह ने मोहनदास की भूमिका निभाई है जो वाकई में कमाल और प्रशंसनीय है। क्योंकि मोहनदास नाटक देखते वक्त अभिनेता मोहनदास के किरदार को जीवंत कर दर्शकों के आंखो के सामने ला दिया। अन्य पात्र भी अपनी भूमिकाओं में संजीदगी से उतरे हैं। दृश्य परिकल्पना बिलकुल सादा है और खाली मंच पर बस कुछ प्राप्स और एक चित्र है। लेकिन खाली मंच औऱ सादा परिकल्पना  एक गहराई की ओर ईशारा करता है जो दर्शकों को बार बार कल्पना करने पर मजबूर करता है।  प्रस्तुति में कबीर के कुछ भजनों और एक आध छत्तीसगढी लोकगीत को भी शामिल किया गया है जिनका चयन अच्छा है। और अभिनेता ने संगीत के साथ नृत्य को भी बेहतर ढंग से निभाया है। मैं आखिर में यही कहना चाहूंगा कि जो  संवेदना को और गहराते हैं वो एक परिवेश भी रचते हैं।

15वें भारतीय रंग महोत्सव में मोहनदास नाटक ने अपनी अमिट छाप छोडी जिसे दर्शक कभी नहीं भूल पाएगा। 

लेखक 
रजनीश कुमार
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