Wednesday, 14 July 2021

सफ़र का साथी_कहानीबाज़

सफ़र का साथी हूं सफ़र की ही बात करता हूं। बस सफ़र में ही रहना चाहता हूं। कहीं कहीं से लफ्ज़ चुनकर लाता हूं बिन धागों की स्याही से पिरो जाता हूं। इश्क़ औऱ अंतहीन सफ़र दोनों एक जैसे होते हैं। हर बार वही नयापन हर बार वही ताज़गी। मिलो ना कभी, ख़ामोश ख़्वाहिशों के साथ। ख़्वाब को भी ले आना।। आज एहसासों को शाम के सफ़र पे जो बुलाया है। रूह अगर सुकून बन गई तो हर्फ़ बेआबरू भी हो सकती है। आसमान में पूरा चांद रहा तो मुशायरों की महफ़िल भी हो सकती है। फुर्सत मिले तो एक हल्की हंसी के साथ आ जाना। सफ़र पर थोड़ा सिनेमाई इश्क़ का घूंट पिला जाना। सुन तो लो, मिलो कभी सफ़र पर कोरे कागज़ों पर बिखरी गज़ल सुनेंगे किस्से-कहानियां बुनेंगे तुम हौले-हौले कहना मैं धीमे-धीमे लिखूंगा। सुनो ना, मिलो तो उस अंतहीन सफर पर जहां दोनों मिलकर किस्से- कहानियां बुनेंगे। मिल रहे हो ना। इंतज़ार करूंगा उस अंतहीन सफर पर । आना जरूर। कहानीबाज़# रजनीश बाबा मेहता

Monday, 5 July 2021

बेफिक्र हिंदुस्तान का मीडिल क्लास ।

ये हिंदुस्तान है । वो हिंदुस्तान, जहां बड़ी-बड़ी इमारतें अब आसमान को छूने लगी है। , अरेबियन सागर जिसका हर पल सज़दा करता है। जिसकी हवाओं और फ़िजाओँ में तिरंगे की लहर ऐसी है, जो संगीत सी सुनाई देती है। बदलते हिंदुस्तान में इंसानी ज़िंदगी अमीरियत की बोरियत में खो गई है। लेकिन जो बात मिडिल क्लास के मजे में है, वो मर्सीडिज वाले क्लास में कतई नहीं है।,भरोसा नहीं होता, तो एक बार समयचक्र का पहिया पीछे घुमाकर याद कर लीजिए। कि कैसे अम्मा को पापा स्कूटी पर बिठाकर बाज़ार तक ले जाया करते थे।,रस्ते में भुट्टे वाला दिख जाए , तो पका हुआ भुट्टा नहीं, बल्कि कच्चे भुट्टे को पकवाकर खाते थे।, प्यास लगती, तो सड़क किनारे सोते गन्नेवाले को उठाकर ताजा-ताजा जूस बनवाते थे।, नई गाड़ी खरीदने पर तो नींबू मिर्ची लटकाना भूलते ही नहीं थे।,और हां, लंबी यात्रा पर निकलने से पहले गाड़ी में गणपति को प्रणाम जरूर करते थे। यात्रा शुभ हो। अगर वही गाड़ी अगर पुरानी हो जाए, तो बेचते नहीं थे। बल्कि बरसों-बरसों तक संभाल कर रखते थे। मीडिल क्लास वाली बातें, यादों को मिटाना या बदलना जानते ही नहीं।बस एक रविवार की छुट्टी मिलती थी। उस रोज परिवार के साथ बाहर खाने का मजा दोगुना हो जाता था। तंदूर वाली रोटी के इंतजार में ना जाने क्या-क्या ऑर्डर कर जाते थे। बड़ी वाली दीदी का तो जवाब ही नहीं था।,भरी दोपहरी में रोड किनारे बैठकर घंटों मेंहदी लगवाती।,औऱ हम सब, उसके इंतजार में बंदर-बकरियों को बचा-खुचा खाना खिलाकर टाइम पास कर रहे होते।, ढ़लते सूरज के साथ जिद होती थी, कि समंदर किनारे फुटबॉल भी खेलेंगे।, जहां लहरों के पागलपन पर , पूरा परिवार एक साथ सपने बुना करते थे। मैं तो उन स्कूली बच्चों को घूमते देख जल्दी से बड़े होने का सपना देखा करता था।, पापा अगर ज्यादा खुश हुए, तो समंदर किनारे स्कूटी राइड भी मिल ही जाती थी। अम्मा खुश हुई तो कुछ ना कुछ सस्ता सामान, महंगा खरीद लेती थी।,फिर क्या रस्ते पर हम सब चुप। अम्मा औऱ पापा एक दूसरे की खामियां गिनवाने में चकर-चकर करते रहते। जो भी हो , ये मिडिल क्लास हर वक्त मजे में डूबी होती है।, सुबह से शाम इन्ही छोटी-छोटी खुशियों तले इंतजारी घड़ियां मुकम्मल होती थी। छुट्टी वाला पूरा दिन एक सेकेंड की भांति गुज़र जाता था, पता ही नहीं चलता था।,औऱ हां, दुर्गा पूजा में गांव जाना भूलते नहीं थे । साल भर का इंतजार यहीं खत्म होता था। कच्चे रस्तों और खेतों की पगडंडियों पर बैलगाड़ी में भैंस बंधा देखकर सबकी हंसी निकल जाती थी।,घास का गट्ठर लिए औरतें दिख जाए, तो पापा अम्मा को सलाह देने से चूकते नहीं थे। मैं तो पोखरे में कागज का नाव डालकर उसके चलने का घंटों इंतजार करता रहता…करता रहता।, कभी बारिश हो जाती , तो पानी के बूंदों को बस महसूस करता और सोचता कि काश शहर लौटने के दिन नजदीक ना आएं।,बरगद की छांव तले सूरज से आंख मिचोली खेलते खेलते कब सो जाता पता ही नहीं चलता। अब तो हर गांव में भी शहर जैसी नई सुबह होने लगी है।,लेकिन मिडिल क्लास वाली बातें और यादें , जाती ही नहीं। बस, अफसोस सिर्फ एक ही बात का है। कि कमबख्त अपर मिडिल क्लास खुद को अमीरियत की बोरियत में डुबोकर, ना इधर के रहे ना उधर के। बस जहां भी रहे मीडिल क्लास वाली यादों के साथ ही रहें। क्योंकि ये हिंदुस्तान है। मीडिल क्लास वालों का हिंदुस्तान। जहां अमीरियत एक पल के बाद बोरियत हो जाती है। #कहानीबाज़

Monday, 14 June 2021

जब 89 साल के चे हुए।

बेतरतीब दाढ़ी, सितारे लगी टोपी, मुंह में सिगार और पांव में ऊंचे जूते.. ये आदमी कई पीढ़ियों के ज़हन में है। भले नाम तुरंत याद ना आए तो भी कोई नहीं कह सकता कि मैंने इस आदमी को नहीं देखा। किसी का अंदाज़ा है कि ये कोई पॉप स्टार है तो किसी ने इसे अमेरिकी हीरो बताया। अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन अमेरिकी यूथ में आज खूब पसंद किया जाता है। टीशर्ट, जूते, हेलेमेट, लाइटर.. किसी भी चीज़ पर आप उसके चेहरे का दीदार कर सकते हैं। जाने-अनजाने कई पीढ़ियां उससे वाकिफ रही हैं। ये चे है.. अर्नेस्तो चे ग्वेरा। चे ग्वेरा आज बेशक इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन अपने विचारों की वजह से दुनिया के हर उस इंसान में बसे हुए हैं जो अपनी ज़िंदगी यात्रा के जरिए बदलने का माद्दा रखते हैं। हर उस इंसान में बसे हुए हैं जो इस बाजारवाद के खिलाफ लड़ाई में खड़ा हुआ है।कोहिमा नागालैंड के बाज़ार की दीवारें हों या  जेएनयू की दीवारें । छात्रों के विचारों से लेकर हर गली-मोहल्ले की दीवारों पर चे की तस्वीर दिखाई देती है। जरूरी नहीं कि आप कम्यूनिस्ट हों तभी आप चे को मानोगे। चे तो एक ऐसा विचार है, जो किसी भी विचारधारा से कोसों उपर हैं। जिसे कोसने का सवाल ही पैदा नहीं होता। 39 साल की उम्र में चे औऱ मौत में दोस्ती हो गई थी। लेकिन यकीन मानिए तब तक चे हर विचारों में , लोगों के ज़ेहन में इस कदर घुस गए थे कि जिसे निकालना आज तो क्या आने वाली कई सदियों तक नामुमकिन होगा। हिंदुस्तान में भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,औऱ हिंदुस्तान से बाहर चे गुआरा दुनिया के पटल पर दो ऐसे क्रांतिकारी हुए जो आम इंसान के भीतरी आत्मक्रांति को जगा देता है। अर्नेस्तो ‘चे’ ग्वेरा ने क्यूबा का ना होकर भी वहां हुई सशस्त्र क्रांति में अहम रोल निभाया था। फिदेल कास्त्रो ने सरकार बनाई तो दूसरे देशों से संंबंध स्थापित करने का ज़िम्मा उन्हें ही सौंपा। नेहरू सरकार ने चे को विशेष आमंत्रण भेजा और 30 जून 1959 को वो दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पहुंचे थे। किसी रॉकस्टार सरीखे दिखते चे की अगवानी प्रोटोकॉल ऑफिसर डी एस खोसला ने की थी। 1 जुलाई 1959 को चे और नेहरू की मुलाकात हुई औऱ उन्होंने साथ ही खाना खाया। वो दिल्ली के करीब पिलाना गांव भी गए थे।
कमाल ये है कि चे की इस दौरे की जानकारी उन्हें चाहनेवालों को भी नहीं है। लोगों को ये बात हैरान करती है कि वो कभी भारत आए थे। यहां फाइल्स में उनका नाम अर्नेस्ट गेवारा दर्ज है। दिल्ली ही नहीं चे कलकत्ता भी गए और उसके अलावा कई और शहरों में भी। उनके इस दौरे की जानकारियां संजोने का काम किसी ने भी ठीक से नहीं किया। चे के संग्रह में वो तस्वीरें भी हैं जो उन्होंने कलकत्ता की सड़कों पर खींची। वो बंगाल के मुख्यमंत्री से भी मिले थे लेकिन ये बात फिर हैरान करती है कि वामपंथियों तक ने चे के दौरे पर कभी विस्तार से लिखना ज़रूरी नहीं समझा। खैर जब चे क्यूबा लौटे तो अपनी रिपोर्ट कास्त्रो को सौंपी। उसमें उन्होंने भारत के बारे में काफी कुछ लिखा है। सबसे अहम ये है कि खुद हथियार लेकर क्रांति करनेवाले चे ने गांधी के सत्याग्रह के प्रति आदर का भाव प्रकट किया। ओम थानवी के एक लेख के मुताबिक चे ने रिपोर्ट में लिखा- ‘‘जनता के असंतोष के बड़े-बड़े शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अंग्रेजी उपनिवेशवाद को आखिरकार उस देश को हमेशा के लिए छोड़ने को बाध्य कर दिया, जिसका शोषण वह पिछले डेढ़ सौ वर्षों से कर रहा था।’’के पी भानुमति ने ऑल इंडिया रेेडियो के लिए उनका साक्षात्कार दिल्ली के अशोका होटल में लिया था जहां वो ठहरे थे। चे ने तब उनसे कहा था – ‘आपके यहां गांधी हैं, दर्शन की एक पुरानी परंपरा है। हमारे लैटिन अमेरिका में दोनों नहीं हैं। इसलिए हमारी मन:स्थिति ही अलग ढंग से विकसित हुई है।’कमाल देखिए कि चे ग्वेरा भारतीयों को युद्ध से दूर रहनेवाला मानते थे। उन्होंने रिपोर्ट में लिखा था – ‘भारत में युद्ध शब्‍द वहां के जनमानस की आत्‍मा से इतना दूर है कि वह स्‍वतंत्रता आंदोलन के तनावपूर्ण दौर में भी उसके मन पर नहीं छाया।’ अगर चे आज भारत का दौरा करते तो शायद भारत को लेकर उनकी बहुत सी राय बदल जाती। आज चे का जन्मदिन है। 14 जून 1928 को वो अ्रर्जेंटीना में पैदा हुए थे। मानव को बंधन से आज़ाद कराने के लिए उन्होंने घर, पेशा और देश तक छोड़ दिए थे। आखिरकार अपने हिस्से की नौ गोलियां झेलकर वो मुक्त हो गया। . . #कहानीबाज़ . रजनीश बाबा मेहता

Friday, 21 May 2021

गंगा :- सब स्वीकार करती है, प्रार्थना भी पाप भी।

गंगा । सब स्वीकार करती है, प्रार्थना भी, पुण्य भी, पाप भी ! राग भी, द्वेष भी, द्वंद भी, दानव भी , मानव भी, खुशहाली भी, हरियाली भी। धरती औऱ आकाश भी । मोक्षदायिनी गंगा सब स्वीकार करती है। . नाम में इतनी पवित्रता , जो नि:श्चल मन को सुकू़नी दरवाजे के पार ले जाती है। कल-कल करती गंगा की आवाज कानों में संगीत सी घुलती चली जाती है। जब भी गंगा का कोई किनारा मिले, तो एक पल के लिए आंखें अपने आप ही बंद हो जाती है । और उन बंद आंखों के पीछे लहरों का संगीत रूहानी इबादत से ताल्लुक करा जाता है। यही तो वो पल होता है जब हम गंगा को अात्मसात कर चुके होते हैं। लेकिन फिर भी उसकी समझ से कोसों दूर खड़े , बस निहारते-निहारते अपने मन के कोनों में कई कहानियां खुद ही गढ़ लेते हैं। लेकिन सदियों से कालजयी गंगा तो गंगा है। उसे समझ पाना औऱ समझा पाना ठीक वैसी ही मुश्किल है, जैसे गंगा की गहराई को नंगे पांवों से नापना। गंगा एक बूंद में हो या लोटे में समाई हो। अंजुली में भरी हो या धरती की गोद में पड़ी हो। युगों-युगों से बहती वो धारा है सदियों से वो इबादती किनारा है। जिसे प्रार्थनाओं में मांगता हर बेचारा है बस हर-हर गंगे ही तो सबका सहारा है। . औऱ इतनी ही पुरानी गंगा के साथ साथ वो कहानी भी है, जिसकी निशानी हम सबके दिमाग में हमारी अम्मा बनाती हैं। घर से करीब थोड़ी ही दूर पर बांध के नीचे जो नदी बहती है, वो तब तक हमारे लिए सिर्फ गढ्ढे का पानी होता है, जब तक हमारी अम्मा ये नहीं बता देती हैं कि वो हर रोज सुबह-सुबह घर में क्या छिड़कती हैं ? बचपन वाला मन, सवालों का गट्ठर, जल्दबाजी में कुछ भी जानने या कहीं भी पहुंचने की जल्दी, आदत बन जाती है। औऱ फिर एक रोज अम्मा बता देती हैं, कि ये पानी सिर्फ पानी नहीं, वो नदी सिर्फ नदी नहीं, गंगा है ! जन्म लिया तो गंगा, मृत्यु से पहले गंगा, मृत्य के बाद गंगा। पूरा जीवन गंगा किनारे , गंगा सहारे। हर सांस की आस गंगा, हर प्यासे की प्यास गंगा, मनुष्यों की आस गंगा। गंगा के बिना इंसानी ज़िंदगी तो कल्पना मात्र भर है। हर सजीव, बिन गंगा के निर्जीव हो जाती है। उस रोज अम्मा की बातें इतनी तो समझ आ ही गई थी, कि जहां है मां गंगा का वास, वहां हैं सभी बहुत ख़ास। हालांकि गंगा की पौराणिक पृष्ठभूमि भी ना जाने कितनी दंत कथाओं से लिपटी हुई है। मगर मौजूदा वक्त में गंगा, हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री से निकलती है। जमीन से इस स्थान की उंचाई 3140 मीटर है। जिसके बाद लगभग 200 कि.मी. कि यात्रा करके, मां गंगा ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार पहुंचती है। ना जाने कितनों को मोक्ष देती गंगा, यहां इंसानी ज़िंदगी को राख की शक्ल में मुक्ति का मार्ग दिखाती है। पानी की चादर सी लगने वाली गंगा, कभी कुंभ का जश्न मनाती है, तो वहीं हर शाम किनारों पर आरती की घंटियो की आवाज से मन, गंगा की शीतलता को हौले-हौले महसूस करता रहता है। हरिद्वार से लगभग 800 कि.मी. की यात्रा करते हुए गढ़मुक्तेश्वर, सोरों, फर्रुखाबाद, कन्नौज, बिठूर, कानपुर होते हुए गंगा प्रयाग पहुंचती है। यहां गंगा का मिलन यमुना से होता है जिसे संगम कहा जाता है। संगम हिन्दुओं के लिए पवित्र और तीर्थ है। संगम के बाद गंगा मोक्ष नगरी वाराणसी (काशी) पहुंचती है। काशी में ही गंगा घाट पर इंसान देहत्याग कर मोक्ष के मार्ग पर चलना शुरू करता है। औऱ गंगा यहां से बहती हुई मिर्जापुर, पटना, भागलपुर होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें बहुत-सी सहायक नदियां सोन, गण्डक, सरयू, कोसी आदि मिल जाती है।फिर आगे बहरामपुर, वर्द्धमान, कोलकत्ता, हल्दिया होते हुए गंगा बंगाल की खाड़ी में मिलकर अपनी यात्रा पूर्ण करती हैं। इस यात्रा के दौरान दुनिया में गंगा को लेकर कई मान्यताएं औऱ दंत कथाएं प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए ब्रह्मा की घोर तपस्या की । ब्रह्मा प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी और पाताल तक जाने का आदेश दिया। ताकि भगीरथ के पूर्वज औऱ सगर के पुत्रों के आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब गंगा ने कहा कि, मैं इतनी ऊंचाई से जब पृथ्वी पर गिरूंगी, तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? इस समस्या को दूर करने के लिए राजा भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया। और फिर महादेव ने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वो धारा भगीरथ के पीछे पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहां सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वी वासियों के लिए श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भगीरथी कहते हैं। हालांकि इस कथा को राजा रवि वर्मा ने अपनी पेटिंग के जरिए बेहतरीन तरीके से उकेरा। महाभारत काल में भी गंगा-शान्तनु के वचन की कथाएं प्रचलित हैं। औऱ इसी महाभारत काल में भीष्म के जरिए गंगा को और करीब से जान पाए । कई कहानियों औऱ कथाओं को अपने दामन में समेटी गंगा, आज इंसानी गलतियों की वजह से थोड़ी-थोड़ी मैली जरूर हो गई है। लेकिन वक्त की ढलती शाम तले, वो दौर भी आएगा, जब गंगा की धारा एक बार फिर निर्मल औऱ स्वच्छ दिखाई देने लगेगी। . हृदय के सारे ख्व़ाब शांत हो जाती हैं, जब जब गंगा की आवाज आती है। बात सिर्फ गंगा को स्पर्श कर महसूस करने की है, जो हमें सुकूनी दरवाज़े से पार ले जाती है। तो करते हैं ना महसूस, क्योंकि ये नदी नहीं संस्कार है गंगा धरती की श्रृंगार है गंगा। गंगा तो गंगा है सब स्वीकार करती रहेगी प्रार्थना भी , पाप भी । . #कहानीबाज़ Rajnish BaBa Mehta

Wednesday, 21 April 2021

कहानी नागा साधु की

naga sadhu






साधु, मतलब सच्चा। 
औऱ नागा साधु ?  
कौन होते हैं ये लोग ? 
औऱ कुंभ मेले में स्नान के बाद कहां गायब  हो जाते हैं ?


एक अनसुलझी, एक अबूझ पहेली। 
निर्वस्त्र-निर्गुण, मदमस्त फ़कीर।
मोहपाश हो, या हो माया 
बांध ना पाई कोई लकीर।  
कांधे टांग कमंडल, धूनी रमाए 
हाथ बांधे त्रिशूल, गंगा की हर बूंद में समाए।
ब्रम्हकुंड पर खड़ा,राख में लिपटा 
वो मदमस्त नागा साधु खुद में सिमटा।।
कांधे टांग कमंडल,धूनी रमाए 

मस्तक पर केसरिया, लिए हाथ में चिमटा।।


नागा साधुओं से रिश्ता बचपन से ही रहा है। दरअसल  बचपन के सवाल भी बड़े अज़ीब होते थे। औऱ उन सवालों के एवज में जो मार पड़ती थी, उससे तो डर नहीं लगता था बस मार के बाद जो धमकी मिलती थी, वो कई दिनों तक कानों में गूंजती रहती थी। अरसा गुजर गया, ज़िंदगी की भाग-दौड़ में हम कब उन सारे सवालों को पीछे छोड़, उसका जवाब बन गए, पता ही नहीं चला। वो तो बस एक रोज कुंभ के मेले में चलते-चलते जब नागा साधुओं की टोली पर नज़र पड़ी, तो मन की भीतरी सतह पर बैठा एक डर, भड़भड़ाकर सामने गया। सारे सवालों का जवाब तो उम्र के अनुभव तले तलाश लाया था।  लेकिन नागा साधुओं की पहेली को कभी सुलझा नहीं पाया। औऱ सुलझाता भी कैसे ? अम्मा कहती थी, नागा साधु तो खुद ही अनसुलझी पहेली होते हैं।लेकिन इस कुंभ में हिम्मत जुटा ली। चाहे कुछ भी हो जाए, इस बार नागा साधुओं के रहस्य को समझकर ही रहेंगे। 

हर-हर महादेव के नारों की गूंज के साथ गंगा घाट में डुबकी लगाई औऱ फिर मलाना की बूटी की तलाश में घुस गया साधुओं की टोली में। जहां एक टेंट में नागा साधु जो दिखने में अपने आप ही कठोर साधना की तरह लग रहे थे, लग गए उनसे दोस्ती यारी भंजियाने।  ज्यादा देर तो नहीं लगी, हां, घंटे-दो घंटे में दोस्ती-यारी जैसी वाली बात होने लगी थी। इस दौरान पुरूषों की टोली का आवन जावन तो लगा हुआ था ही, लेकिन आश्चर्य वाली बात ये थी कि महिलाएं भी नागा साधुओं के आर्शीवाद के लिए जद्दोजहद करती दिखाई दे रही थी   

मुझे क्या, मुझे तो बस इतना जानना था कि आप हैं कौन, औऱ  बदन पर लिबास क्यूं नहीं पहनते हैं ?


सवाल एक, अगर नागा साधु दोस्त बन जाए तो फिर कई जवाब मिलना तो आदतन हो जाता है। 


शिव और अग्नि का ऐसा स्वरूप, जो सच्चाई के धरातल से कहीं औऱ कोसों उपर। 

तो शुरू से शुरूआत करते हैं।   



दरअसल अर्द्धकुंभ, महाकुंभ और सिंहस्थ के दौरान नागा साधु को संत समाज के 13 अखाड़ों में से 7 जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन , अखाड़े ही उन्हें नागा बनाते हैं।



नागा साधु बनने के लिए सबसे पहले ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती है। जिसके बाद उन्हें  3 साल तक अपने गुरुओं की सेवा करना होता है। वहां से उसे धर्म, दर्शन और कर्मकांड आदि को समझना होता है। इस परीक्षा को पास करने के बाद महापुरुष बनाने की दीक्षा प्रारंभ होती है। जो बरसों तक चलती है। 


कुंभ के दौरान इन्हें संन्यासी से महापुरुष बनाया जाता है, जिसकी तैयारी किसी सेना में शामिल होने जैसी होती है। कुंभ में पहले उसका मुंडन करके नदी में 108 डुबकी लगवाई जाती है, इसके बाद वह अखाड़े के 5 संन्यासियों को अपना गुरु बनाता है।


 महापुरुष बन जाने के बाद उन्हें अवधूत बनाए जाने की तैयारी शुरू होती है। अवधूत बनाने के लिए उस साधु का जनेऊ संस्कार करते हैं और उसके बाद उसे संन्यासी जीवन की शपथ दिलवाई जाती है। शपथ के बाद उसका पिंडदान करवाया जाता है। इसके बाद बारी आती है दंडी संस्कार की और फिर होता है पूरी रात ' नम: शिवाय' का जाप।


भोर होते ही उन्हें अखाड़े ले जाकर उससे विजया हवन करवाया जाता है और फिर गंगा में 108 डुबकियों का स्नान होता है। डुबकियां लगवाने के बाद अखाड़े के ध्वज के नीचे दंडी त्याग करवाया जाता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया को 'बिजवान' कहते हैं


 अंतिम परीक्षा दिगम्बर और फिर श्रीदिगम्बर की होती है। दिगम्बर नागा एक लंगोटी धारण कर सकता है, लेकिन श्रीदिगम्बर को बिना कपड़े के रहना होता है। श्रीदिगम्बर नागा की इन्द्री तोड़ दी जाती है।


एक साधु, जीवन की संपूर्णता का त्याग कर नागा साधु बनकर  एक ऐसी यात्रा प्रारंभ करता है, जो रहस्य और जिज्ञासाओं से भरी होती है। दरअसल मुश्किल यहां से कई गुना बढ़ जाती है। 


नागा बन गए साधु को वन, हिमालय, आश्रम और पहाड़ों में कठिन योग-साधना या तपस्या तो करनी ही होती है। साथ ही  नागा बनने वाले साधुओं को भस्म, भगवा वस्त्र, चिमटा, धूनी, कमंडल और रुद्राक्ष की माला भी धारण करना होता है।


 ये नागा साधु हिमालय में शून्य से भी नीचे के तापमान में नग्न रहकर जीवित रह लेते हैं, कई कई दिनों तक तो खाना भी नसीब नहीं होता। 


 

 नागा साधु हमेशा ज़मीन पर सोते हैं। अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं। पैदल भ्रमण करते हैं।  भ्रमण के दौरान भिक्षा मांगकर अपना पेट भरते हैं। दिन में एक ही समय भिक्षा के लिए मात्र 7 घरों में जाते हैं। यदि सातों घरों से कोई भिक्षा मिले, तो उन्हें भूखा ही सोना होता है। 

 

 नागा साधुओं के पास खुद के हथियार जैसे तलवार, त्रिशूल और भाला रहते हैं जिन्हें उसे चलाने की शिक्षा मिलती है। जंगल में उनका सामना जंगली जानवरों से हो जाए तो वे बगैर हथियारों के भी लड़ाई लड़ना जानते हैं। मठों और मंदिरों की रक्षा के लिए नागा साधुओं ने कई कालांतरों में कई लड़ाइयां लड़ी हैं। पुराने समय में नागा साधुओं को अखाड़ों में एक योद्धा की तरह तैयार किया जाता था।

 

दीक्षा लेने के बाद नागा साधुओं को उनकी वरीयता के आधार पर पद भी दिए जाते हैं। कोतवाल, बड़ा कोतवाल, पुजारी, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव उनके पद होते हैं। मूलत: नागा साधु के बाद महंत, श्रीमहंत, जमातिया महंत, थानापति महंत, पी महंत, दिगंबर श्री, महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर पद होते हैं।

 

 चार आध्यात्मिक पद भी होते हैं- 1. कुटीचक, 2. बहूदक, 3. हंस और सबसे बड़ा 4. परमहंस। नागाओं में परमहंस सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। इसके अलावा नागाओं में औघड़ी, अवधूत, महंत, कापालिक, श्मशानी आदि भी होते हैं। 

 

 प्रयाग के महाकुंभ में दीक्षा लेने वालों को नागा, उज्जैन में दीक्षा लेने वालों को खूनी नागा, हरिद्वार में दीक्षा लेने वालों को बर्फानी औऱ नासिक में दीक्षा वाले खिचड़िया नागा कहलाते हैं


नागा की ज़ुबानी उसके बनने की कहानी सुनने के बाद भी एक सवाल अभी भी था, कि जिस्म पर लिबास क्यूं नहीं है ? उस जाते हुए नागा ने कहा, लिबास के अंदर भी तो तुम्हारी ज़िस्म नंगी है।  बस नज़रों का फेर है, हमारी नंगी ज़िस्म के उपर लिबास तुम्हें नज़र नहीं आता है, भस्मी, भभूत ही  तो लिबास है। अगर नहीं मानते हो तो फिर ये तो अपनी अपनी अज्ञानता और सोच पर निर्भर करता है कि कौन क्या कब औऱ कैसे देख पाता है। ये देखने और समझने की कला उस दिन सीख जाओगो या यूं कहें तो,

जो चाहोगे सो बन जाओगे

जिस दिन थोड़ा भी साधु हो जाओगे।।


ब्रम्हकुंड पर खड़ा,राख में लिपटा 

वो मदमस्त नागा साधु खुद में सिमटा।।

कांधे टांगे कमंडल,धूनी रमाए 

मस्तक पर केसरिया, लिए हाथ में चिमटा।।



#कहानीबाज़

रजनीश बाबा मेहता