Wednesday, 7 June 2017

भाप बन गया मेरा जिस्म_क़ातिब - रजनीश बाबा मेहता

क़ातिब रजनीश बाबा मेहता

एक पुरूष के यौन-शोषण की व्यथा

16 साल की उम्र में ज़िदगी भाप की तरह लगती है, जमीन पर उबलती है और आसमान की ओर उड़ जाती है। इसी उम्र में यौवन औऱ प्रेम का पता, दिमाग और दिल को पहली बार लगता है।खैर पहले किसका नंबर आता है ये इंसान-इंसान के उपर निर्भर करता है, लेकिन हर कोई गणित के पन्ने पर यही जोड़ने-घटाने में लगा रहता है कि स्वाभाव को पहला स्वाद किसका लगा है। बाकियों का तो पता नहीं लेकिन मुझे पहली बार स्वाद यौवन का लगा जिसमें कामुकता का रस भरपूर था, चेहरे पर भले ही मुछें की रोएं अभी हटी नहीं थी लेकिन प्रेम से पहले, लत काम भावनाओं का जग गया। हालांकि इस मामले में मेरी गलती कतई नहीं थी क्योंकि स्कूल के सीनियर जो मुझसे पहले जवान हो गए थे उनकी कहानी हर रोज सुन-सुनकर मुझे भी धीरे-धीरे ज्ञान प्राप्त होना शूरू हो गया था। लेकिन मेरी भावनाओं बांध थोड़ा अलग और थोड़ा तन्हा किस्म का था।
मसूरी के बोर्डिंग स्कूल में बारहवीं के एक्जाम से ठीक 2 महीने पहले हॉस्टल में सब लोग ऐसे दिखते थे मानों बचपन से ही यूपीएससी टॉपर बनने की ठान ली हो, लेकिन हकीकत तो ये था कि शाम के 4 से 6:30 का इंतजार सबको होता था, क्योंकि इस वक्त हम 12 लड़के अपनी हठ औऱ वासना की चर्चा में व्यस्त होते। एग्जाम के बाद अपनी इच्छाओं को शांत करने का तरीका ढूंढने में लगे रहते, हालांकि मैं भी उनकी बातों में शामिल था और अपना नोट मैं भी बनाता जा रहा था। कागज वहीं दीवार की दरार में छुपा देता, जिसमें मसूरी से लेकर दिल्ली, लखनऊ , कलकत्ता, मुंबई को कोठों के ठिकानों का पता था, कागज में लिखने और छुपाने का सिर्फ दो मकसद था, एक तो कहीं प्रिसिंपल के हाथ लग गया तो फिर हाथ पर इतने लाल निशान होंगे कि एक्जाम में खुद खुद फेल हो जाएंगे जो कि हमलोग एकदम नही चाहते थे, दूसरा कि  कहीं भूल गया तो मुश्किल हो जाएगा इसलिए वो दरार हॉस्टल के बक्से से एकदम सेफ था।
आज मंडली लगी थी स्कूल के बाहरी बाउंड्री पर, और चर्चा हो रही थी, किसी सुल्ताना खान के नाम की। अब तक हर मीटिंग में मैं बाउंड्री के नीचे ही खड़ा होता था लेकिन आज12 फीट उंची बाउंड्री पर चढ़ कर बैठ गया, क्योंकि पहली बार किसी लड़की के नाम की चर्चा हुई तो मुझे अंदाजा हो गया कि आज कोई बाप जरूर बन जाएगा यानि वक्त तो लगेगा पूरा क्योंकि बहस हर मुद्दे पर जोरों से होनी है। दिल्ली का ही एक सीनीयर दीपक तंवर ने जोरदार भाषण दिया उसने कहा कि -वो 10 साल की उम्र से कई बुरी लतों से ग्रसित रहा है, खासकर ड्रग की लत ने उसकी जिंदगी को बुरी तरह हिला कर रख दिया, लेकिन वक्त रहते ड्रग की लत से तो निकल गया, लेकिन सेक्स की लत से वो आज तक नहीं निकल पाया, क्योंकि सेक्स की लत होती ही बड़ी जटिल है। उसकी बातों को सुनकर मजा तो रहा था लेकिन मेरा मानना है कि लत एक बीमारी है, और यह भावनात्मक सदमे का एक लक्षण है, जो हमारी कल्पनाओं से गुजरकर हकीकत की शक्ल में एक अरसे बाद आती है। दिल्ली का लौंडा था  हमारा सीनीयर,उसने अपनी और सुलताना खान के किस्से बड़े जोरदार ढ़ंग से सुना दिया, जिसके बाद हमलोंगों का नोट्स भी बड़ा तगड़ा बना, हालांकि फोन नंबर भी देने का वादा तो किया लेकिन दिल्ली पहुंचने के बाद। अब मुछें तो निकली नहीं लेकिन ख्वाहिशों का बांध तो बन ही चुका था जिसे तोड़कर हम सब उड़ने की फिराक में थे।
आखिरी पेपर हिंदी का हुआ, और फिर एग्जाम के बाद मैं तो सीधे दिल्ली जाने की बस पकड़ ली, साथ में दिल्ली के काफी सीनियर औऱ कुछ क्लासमेट लड़कियां भी थी। हालांकि कहानी सुनकर मैंने संभोग से समाधि की ओर, LIFE BEFROE TEEN AGE, मतलब मैने अपने मतलब की सारी किताबें इकट्ठाकर बैग में रख लिया था। चलती बस में सबलोग सो गए लेकिन मैं उन किताबों में गुम था, लेकिन मेरी अंतरंग भावना मुझे कुछ खास यानि उतना उत्साहित नहीं कर रही थी जितने की उम्मीद मैं कर रहा था , पता नहीं शायद पहली बार था या फिर दीपक तंवर के अनुसार इमोशन की सही नब्ज पकड़ में नहीं रही थी। किताब के हर पन्ने के हर शब्द तो मानों मेरे दिमाग पर यूं छप रहे थे जैसे मौका पड़ने पर मैं कुछ भूलना नहीं चाहता था, साथ ही भावनाओं का ज्वार जिस्म में आर-पार सांय-सांय हवा की तरह हो रही थी। सर्द भरी रात में वोल्वो बस के अंदर सबके सासों की आवाजें धीरे-धीरे रही थी, तभी पिछली सीट पर कुछ आभास हुआ, जाकर देखा तो दीपक तंवर दिल्ली की एक लड़की साक्षी लांबा के साथ एक ही चादर में लिपटा आधी नींद में सो रहा था। सीनीयर होने की वजह से ज्यादा कुछ बोल नहीं पाया लेकिन साला था वो बड़ा मौकापरस्त मतलब जहां मौका मिलता वो मार लेता। दिल्ली पहुंचने के बाद हम 4 लड़के के रहने का ठिकाना पहाड़गंज के एक होटल में कर खुद दीपक तंवर तुगलकाबाद अपने घर ये बोलकर चला गया कि शाम में 7 बजे सुलताना खान के दरबार में चलेंगे। तंवर के जाने के बाद हमलोगों ने मन ही मन में अपनी-अपनी ख्वाहिशों की लंबी लिस्ट बनाने में लग गया, जिसमें हवस की स्याही ज्यादा गाढ़ी थी।
शाम होते ही दीपक तंवर खुद की कार लेकर हमलोगों के साथ दिल्ली के कोठों की दुनिया की तरफ चल पड़ा, मरघट सी गलियां, गंदी दीवारे, गंदे दरवाजे-खिड़कियां, हर जगह के कोने में पान-गुटखे की थूक मानों थूकी नहीं गई हो बल्कि ठूंसी गई हो।चुपचाप चलता रहा, तंवर ने साला सब पहले से सेटिंग करके रखा था, 55 साल का आदमी आते ही पहले तो तंवर को सलाम किया औऱ फिर चुपचाप तंग सीढ़ीयों से हमें उपर ले गया, हम सब एक 4 फीट के बंद औऱ गंदे दरवाजे के सामने खड़े थे, दरवाजा देखकर मैंने अंदाजा लगा लिया था कि गोदाम भी इसी तरह सड़ा हुआ होगा, लेकिन नहीं एक पल में मेरी बातें गलत साबित हो गई, दरवाजा खुलते ही जैसे हम उसके अंदर गए, एक बड़ा सा आलीशान हॉल जहां हर चीज शीशे की बनी हुई और करीने से रखी हुई थी, मानों मुगले आजम का सेट हो। हमें आदेश मिला की बैठ जाइए और हम चुपचाप सोफे पर दुबक लिए, हमारे लिए रूहाफजा लाया गया, मुझे तो ऐसा लग रहा था कि हम किसी के घर के मेहमान हैं, इतनी मेहमान-नवाजी ने हम-सबके तरंग को सुस्त करके रख दिया। सामने हल्की सी आवाज हुई, देखा तो एक 28 साल की लड़की मुंह पर स्कार्फ बांधे हमारी ओर चली रही थी, एक पल के लिए ऐसा लगा कि बदन का कोई हिस्सा काम क्यूं नहीं कर रहा, सुल्ताना खान आते ही सामने सिंगल सोफे पर धंसते ही अपने मुंह से स्कॉर्फ हटाया, भाई मैंने तो ऐसी रंडियां आज तक नहीं देखी थी, माफ किजिएगा शब्द थोड़े कठोर हैं पर मैंने आज तक स्कूल में भी ऐसी लड़की नहीं देखी। तंवर ने उम्र 28 बताया लेकिन कोई 18 से उपर कह दे तो दिल्ली के जीबी रोड पर दंगा हो जाएगा। हालांकि आते ही तंवर उसके तलवे में पड़ गया, लेकिन उसने बोला  वो कल तक खाली नहीं है परसों जाना, अब मुश्किल ये थी कि हमें आज शाम ही निकलना ही था दिल्ली से अपने अपने घर, लेकिन लाख बोलने के बावजूद भी वो मानी नहीं औऱ हम बाकी बूढ़ी औरतों को घूरते हुए चुपचाप होटल लौट आए। लेकिन मैंने ठान लिया था कि मैं अपना टेस्ट तो एक बार करके रहूंगा, सबलोग अपने-अपने घर निकल गए लेकिन मैं बहाना देकर वहीं रूका रह गया।  2 दिन का इंतजार और होटल का बंद कमरा, आप समझ सकते हैं मेरी बेसब्री की हालत, किताबें कम प़ड़ गई तो दिल्ली स्टेशन औऱ फिर दरयिगंजज से सारी कामुक भरी किताबों को बल्क में खरीदकर ले आया ,औऱ 2 दिन में सबको 2-2 बार पूरी तरह से चाट डाला। शाम का वक्त जैसे हुआ मैं पूरी तरह से वैसे ही सज गया जैसे मोहल्ले में किसी की बारात जानी हो, साथ ही जितनी परफ्यूम की बोतल बैग में था सबको थोड़ा-थोड़ा लगा लिया कि कुछ कसर ना रह जाए। ऑटो सीधा उसी तंग गलियों के नीचे रूकी, मैं चुपचाप अकेले ही फिर उसी दरवाजे के पास खड़ा जा जो 4 फीट का गंदा सा था, लेकिन आज वो मुझे मेरे मन की आंखों से साफ दिख रहा था, मलंग अंदाज में मैं मदमस्त होकर पहुंच तो गया लेकिन डर के मारे मेरा शरीर हल्का होता जा रहा था। तभी दरवाजा तेज आवाज के साथ खुला और मुझे अंदर बुलाया गया, मेरे कदम मानों मेरी सुन ही नहीं रहे थे, एक के बाद एक खुद खुद चलते जा रहे थे। आखिरकार 1 मिनट बाद मैं सुल्ताना के कमरे में था जो किसी जन्नत से कम नहीं, मानों ईश्वर ने स्वर्ग का द्वार यहीं से बना रखा हो, मद्धिम रोशनी की झनझनाहट, कमरे के हर कोने में शीशे की शक्ल भी अजीब थी, खुशबू भी मेरी नसों में धीरे-घीरे भरती जा रही थी, तभी एकाएक बिस्तर पर जोर से उछल कर सुल्ताना बैठी औऱ बोल पड़ी- सॉरी बोलती हूं तुम्हें ,दरअसल थो़ड़ा बाहर का कस्टमर जाता है तो फिर वक्त नहीं मिलता। मैंने हां में बस सर ही हिला पाया। तेरा बाकी दोस्त किधर उसने झट से दूसरा सवाल दाग दिया। मैं थोड़ा हिचकते हुए बता कि वो लोग बाद में आएंगे उसे कुछ काम है। थोड़ी देर में ऐसी-वैसी इधर-उधर की बातें होने लगी, मैं अब तक कम्फर्ट हो चुका था। खिड़की के पास अपने बाल का जुड़ा खोलते हुए बोले जा रही थी- देख जो करना जल्दी करना ठीक है, अंग्रेजी में कुछ मत बोलना करने को।  हालांकि मेरे पास इसका जवाब नहीं था क्योंकि मैं अंदर से हिला हुआ था। जैसे ही वो पलटी मेरी नजरे औऱ शरीर में हजारों वोल्ट का ऐसा करंट दौड़ा कि मैं झट से चुपचाप जेब से पैसे निकालकर हाथ उसके सामने कर दिया। अदाओं से चलती हुई कपड़े बदन पर अब नाम मात्र के थे हाथों से पैसे लेते हुए हंसते हुए बोली , ये मेरे लिए जिस्म से भी ज्यादा कीमती है, बहुत मंहगे दामों में खरीदती हूं मैं इसे, उसने ये बात हंसी में तो बोल दी लेकिन हकीकत इससे भी खतरनाक होता है, जो अपने जिस्म से पैसों को खरीदती है।  बिस्तर पर जाकर लेट गई औऱ मुझे आने का इशारा किया। मैं चुपचाप उसके पास गया लेकिन मेरा एहसास औऱ मेरी तरंग मेरे मन का साथ नहीं दे रही थी, शरीर मानों सुन्न पड़ गया हो, ऐसा लग रहा था कि मैं इन सबके लिए बना ही नहीं हूं। हालांकि जितनी किताबें पढ़ी उसके सारे शब्द मेरे दिमाग में मंत्रोच्चार की तरह गूंजने लगे थे। मैं पास बैठ तो गया लेकिन कुछ करना नहीं चाहता था। मैं सिर्फ उसको पढ़ना चाहता था उसी किताब की तरह जिसे मैं दो तीन दिनों तक पढ़ता रहा मैंने उसका मुश्किल से हाथ पकड़ा और उससे पूछा कि , तुम कौन हो  औऱ जिंदगी से क्या चाहती हो ? सुलताना खान पहली बार थोड़ा सख्त हुई उसने ये जवाब देते हुए कहा कि सब मेरी कहानी जानना चाहते हैं और मैं अपनी कहानी किसी को नहीं बताना चाहती हूं, तू बच्चा है इसलिए कुछ बोला नहीं, नहीं तो उठाकर बाहर फेंक देती। चाहता क्या है मुझसे।
बातें करना चाहता हूं, तुम्हारे बारें में जानना चाहता हूं, तुम्हें पढ़ना चाहता हूं, ये सब बातें उसे बोलकर मैं भी तनकर उसके सामने टिका तो था लेकिन जिस काम के लिए मैं आया उसमें जल्दबाजी मेरे शरीर में दिखी नहीं। वो उत्तेजना कोसों गायब हो गई। मैंने उसका वक्त लिया उससे बातें की बस उसी बात के पैसे देकर मैं होटल के कमरे में लौट आया। सुलताना समझ चुकी थी मैंने आजतक किसी लड़की को हाथ तक नहीं लगाया। 3 दिन गुजर गए हर रोज मैं उसके पास जाता औऱ घंटों सिर्फ बातें कर लौट आता, अब वो मेरी दोस्त बन चुकी थी, कभी-कभी तो वो मुझे अपने कमरे में बिठाकर पास के कमरे में कुछ ग्राहक भी निपटाकर जाती औऱ मैं उसी के बिस्तर पर उल्टा लेटा रहता। मेरा मन उसमें था और उसका मन हर किसी में, लेकिन हैरत की बात थी कि स्कूल में मेरी काम वासना की भावना जो मन में थीवो गई कहां ? हालांकि मैं उसमें उलझना नहीं चाहता था, अब मेरे पास दिल्ली में 3 दिन और बचे थे, दिन भर में इधर-उधर घूमता रहता और शाम होते ही सुलताना खान की दुनिया में खो जाता। लेकिन अभी तक कुछ भी मेरे मन के मुताबिक हुआ नहीं।
उस रोज भी मैं हर रोज की तरह खूब सज-धज कर गया था, अब ना तो मुझे कोई बैठने के लिए कहता और ना ही कोई रूहाफजा पिलाता, सबको मेरी आदत हो चुकी थी। जैसे ही सुलताना के कमरे में गया वो टेलीफोन पर किसी से जोर जोर से बातें कर रही थी मुझे सिर्फ इतना सुनाई दिया कि वो किसी को कह रही थी कि , दुनिया पैसे से समान खरीदते हैं लेकिन मैं अपने कोठों पर पैसे को खरीदती हूं,औऱ जब तक मेरी जवानी है तब तक खरीदती रहूंगी। फिर दो मिनट ऐसे ही जोर जोर से बोलकर फोन रखकर हांफने लगी। मैंने जल्दी से जाकर पीछे से उसे थाम लिया, मुझे देखकर उसके चेहरे का रंग नहीं बदला अभी भी गुस्से में थी मैं कुछ बोल पाता कि उसने मुझे बिस्तर पर जोर का धक्का देकर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया जब तक मुझे समझ आता वो बिस्तर के कोने को उठाकर वहां से कुछ निकाला और अगले 10 मिनट तक मुझसे जोर जबरदस्ती करती रही। पहले तो मेरे आंखों के सामने अंधेरा छा सा गया लेकिन थोड़ी देर बाद मैं दर्द से चिल्लाता रहा लेकिन सुलताना खान को कोई फर्क नहीं पड़ा, वो मेरे शरीर पर वो पूरी तरह हावी हो चुकी थी , मेरे दोनों हाथों को पीछे से मोड़ककर उसने पकड़ रखा था, उसकी गिरफ्त मैं चाहकर भी नहीं निकल पाया, 10 मिनट के बाद वो निढाल होकर मेरे उपर गिर गई, और मेरे कान के पास अपना मुंह लाकर हांफते हुए बोली, जमाना गुजर गया था मर्जी से किए हुए आज पूरा हुआ फिक्र ना कर आज तेरे से पैसे नहीं लूंगी।मेरा पूरा शरीर जल रहा था मेरे मुंह से एक शब्द तक नहीं निकला, उसकी पक़ड़ ढ़ीली होते ही मैं तेजी से चुपचाप उठा और जेब से पैसे निकलकर उसके हाथों में रखकर वहां से निकल गया, सुलताना कुछ बोलने लगी थी लेकिन जाते हुए मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, मैं चुपचाप चला जा रहा था, ऐसा लग रहा था कि मैं ठगा गया, मेरा शोषण हुआ है, लेकिन एक पल में ख्याल आया कि इसलिए तो मैं यहां आया था फिर मुझे दोषी सा महसूस क्यूं हो रहा था, मुझे मजा क्यूं नहीं आया। ऑटो में बैठते ही जैसे ही मिरर में अपनी शक्ल देखी तो पता चला कि आज मेरी मुछों के रोंए के रंग में कालापन आना शुरू हो गया था। हर बात का एहसास पहली बार हुआ, लेकिन सुल्ताना को क्या हो गया था, उसका तो रोज का काम था ये, फिर ये पागलपन क्यूं ? मैं इस वक्त सिर्फ और सिर्फ अपने अनसुलझे सवालों में उलझा था, दिल्ली की सर्दी में भी मुझे पसीना भर-भर के रहा था।  कमरे में घुसते ही मैं तुरंत बाथरूम में नहाने के लिए घुस गया जहां गीजर के गरम पानी का भाप पूरे बाथरूम में भरा हुआ था। खुद के जिस्म को जब आइने में देखा तो पूरा छलनी-छलनी हो चुका था, दर्द के मारे मेरा बुरा हाल था, मैं घंटों बाथरूम में नहाता रहा, और यही सोचता रहा कि क्या मैं इसी सुख के लिए यहां सुलताना के पास रूका रहा, या फिर जो चाहिए था मुझे मिला नहीं। सवालों की फेहरिस्त में मैं उलझता जा रहा था, लेकिन जवाब कुछ सूझ नहीं रहा था। रात कैसे कटी पता नहीं लेकिन नींद इतनी जबरदस्त आई कि वक्त का पता ही नहीं चला, घड़ी में 11 बज चुके थे। दरवाजे पर दस्तक से मेरी आंखें खुली, अधमने ढंग से कपड़े पहनते हुए दरवाजा खोला तो सामने ट्रैवल एजेंट वाला , टिकट लिए खड़ा था। साहब तीन दिन बाद की टिकट मिली है बड़ी मुश्किल से , 4500 हुआ कुल टोटल। मैं बिना सवाल जवाब किए उसे पैसे पकड़ाए औऱ रफा-दफा किया। घंटों समान समेटने के बाद मैं नहाकर सुलातना के कोठे की तरफ फिर निकल पड़ा , लेकिन इस बार मेरा कोई मकसद  था भी या नहीं ,खुद को भी नही पता था, रास्ते में कई बार सोचा की जाउं या ना जाऊं, लेकिन यही सोचते-सोचते मैं वहां पहुंच गया। मुझे देखते ही सुल्ताना के चेहरे पर मुस्कान सी गई औऱ ताना मारते हुए बोल पड़ी , दर्द बड़ा जल्दी चला गया है लगता है, दूसरी पारी खेलनी है क्या ? मैंने भी सर हां में हिलाया औऱ कमरे में चुपचाप चला गया, सुलताना से मुझे सहनुभूति वाली मुहब्बत हो गई थी, जिसमें मुझे ऐसा लग रहा था कि जो चाहिए अगर मुझे सुलताना से नहीं मिला तो कहीं नहीं मिलेगा। मैं करीब दो और दिन तक लगातार सुल्ताना के हरम में हाजिर होता रहा, लेकिन हर बार वो मुझपर इतना हावी होती की मैं खुद के साथ रेप होने के जैसा महसूस करने लग गया, थोड़ा थका सा, थोड़ा बुझा सा रहने लगा, हालांकि जिस दिन की मेरी टिकट थी उस दिन पता नहीं कहां से दीपक तंवर टपक पड़ा, और आते ही फट पड़ा कि उसके बगैर मैं सुल्ताना के पास जाता रहा। मैंने उसे समझाने की कोशिश की, कि सुलताना आम वेश्याओं की तरह नहीं है, वो दोस्ती के काबिल है। ये पहला मौका था जो मैंनें सुलताना के लिए इतनी सहानुभूति दिखाई थी। हालांकि दीपक तंवर बातों का जाल लेकर मेरे पास आया था वो ना तो चुप होने का नाम लेता और ना ही कुछ समझने को राजी था। लेकिन जैसे ही मैंने उसे पहली बार वाली बात बताई तो वो खामोश हो गया पहले तो वो बात बदलने औऱ टालने की कोशिश करता रहा, लेकिन मेरे बार बार बोलने पर जो उसका कबूलनामा सामने आया वो मेरे होश उड़ाने के लिए काफी था।
पागल है तू, समझ नहीं पाया तू सुल्ताना को, वो सेक्स एडिक्शन की शिकार है भाई, तूने जब पहली बार उसके साथ सेक्स किया तो क्या तूझे अजीब सा लगा या नहीं। तंवर की बातों को मैं समझ नहीं पाया। औऱ मैं भी झट से पूछ बैठा- अजीब मतलब ! अजीब मतलब .. ये बोलते हुए कुछ पल के लिए सोचा औऱ गंभीरता से बोला की मतलब यौन शोषण। हालांकि एक पल के उसकी बातों पर कोई भी हंस सकता था लेकिन हकीकत यही था। हालांकि तंवर ने मेरा जबरदस्ती टिकट कैंसिल करवाकर रात में एक जगह आने का इन्विटेशन देते हुए चला गया। मैं अभी तक इसी उधेड़बुन में लगा था कि अभी तक हर चीज की लत सुनी थी लेकिन सेक्स एडिक्शन की शिकार वो भी एक लड़की भरोसा नहीं हुआ लेकिन खुद की भावनाओं को भी तो समझा नहीं पा रहा था
दिल्ली की गरमी चरम पर थी, लेकिन मैं तंवर के बताए पते पर वक्त से करीब आधे घंटे पहले पहुंच गया, हालांकि ज्यादा इंतजार तो नहीं करना पड़ा लेकिन जब तंवर आया तो मैं उसके हूलिए को देखकर चौंक गया। सतरंगी पैंट पहने, सर पर कलफुल हैट औऱ बनियान के अलावा उसके बदन पर एक पतला सा हरे रंग का स्टॉल था। मुझे याद है कि जब हम फुटबॉल खेलते थे स्कूल में तो तंवर अक्सर निक्कर में खेला करता था औऱ उसकी छाती की बाल पर लड़के ज्यादा कमेंट मारा करते थे लेकिन आज तंवर की छाती पर एक भी बाल का नामोनिशान ना था। मुझे इससे पहले कि कुछ समझ आता तंवर मेरे गर्दन पर हाथ रखकर एक बड़े से कमरे में घुस गया। जहां उसने मुझे पहले तो नहाने को बोला और जब मैं मना करना चाहा तो उसने हंसते  हुए बोला कि ये खेल ही ऐसा है ,नहाने के बाद ही इस खेल में हिस्सा लेते हैं लोग। जिसकी तलाश में तू भटकता आया है वो आज तूझे मिल जाएगा, तंवर पर भरोसा रख। मुझे समझ नहीं आया औऱ चुपचाप उसके बताए मार्ग पर चल पड़ा
ये पहला मौका था ,जब मैं भाप से नहाया था, ये मेरे लिए किसी रहस्य से कम ना था, पानी का नामोनिशान नहीं सिर्फ भाप ही भाप, मेरे बगल में तंवर उस भाप को ऐसे महसूस कर रहा था,जैसे मानों दुनिया का चरम सुख इसी भाप में है। अब रहस्य ऐसा गहराया कि मेरा दिमाग तो एक पल के लिए सुलताना को भूल ही गया। भाप से नहाने के बाद निक्कर में ही मुझे तंवर एक छोटे हॉल में ले गया, जहां का नजारा देखकर नॉर्मल आदमी तो कभी रूक ही नहीं सकता था। अचानक मैं उस जगह पर खड़ा था जहां करीब 30 मर्द आपस में आलिंगन की मुद्रा में व्यस्त थे, मैं एक पल के लिए पलटकर वहां से भागना चाहा लेकिन दो कदम के बाद मेरे पैर मानों उठ ही नहीं रहे थे, मेरा मन मेरे पैरों का साथ नहीं दे रहा था, मुझे वो आजादी अचानक ना जाने क्यों अच्छी लगने लगी। क्या जादू हुआ मेरे जेहन में, बेअसर दिमाग अचानक असर में कैसे गया, मेरे शरीर की तरंग को क्या हो गया था मैं भाव-विभोर सा क्यों होने लगा, मेरा मन छटपटाहट से क्यूं भर गया ? सवालों का तो पूलिंदा बनता जा रहा था लेकिन जवाब नहीं मिल पा रहा था, बस उस आजादी का जादू मेरे कदमों की जंजीर बन गई, और मैं पलटते हुए उस भीड़ में खो गया।
करीब 2 घंटे बाद एक जब आंख खुली तो पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि मेरे कामुकता को सही मकाम मिल गया। अब मुझे समझ में गया था कि सुलताना के साथ मुझे वो सुख क्यों नहीं मिला जो मैं चाहता था, क्योंकि मैं उसके लिए बना ही नहीं था। लेकिन मुझे सुलताना की सेक्स एडिक्शन की बीमारी वाली बात मेरे सुख पाने से कहीं ज्यादा दुखदायी था
मन जब तनाव में रहता या परेशान होता है तो मैं अपने भीतर अपनी मां की वो आवाज़ सुनता था कि मैं अच्छा नहीं हूं, गे लोग एक समुदाय के रूप में जुड़े होते हैं. यदि आप सोचते हैं कि आप उन्हीं में से एक हैं तो वो आपका ख़्याल रखना शुरू कर देते हैं और आप फिर उस ग्रुप में शामिल हो जाते हैं, जहां से आपके और मेरे लिए एक अलग  ,तो वहीं बाकी लोगों के लिए रहस्यमयी दुनिया की शुरूआत हो जाती है। मैं जानता हूं कि यह मूर्खतापूर्ण लगता है, यदि आप किसी के शरीर को गे कहकर गाली का तमगा देते हैं तो यह अपराध है, मैंने ऐसा कभी नहीं किया क्योंकि मैं अब भी एक गे ही हूं, लेकिन मैं इसके बारे में सोचता हूं, इसे स्वीकार करना काफ़ी कठिन है, हालांकि एक बहुत बड़ी संख्या में लोग इस कम्यूनिटी को नुक़सान पहुंचाने के बारे में अक्सर सोचता हैं क्योंकि वो अपनी भावनाओं से निपटने में असमर्थ हैं।

मुझे मेरी पहचान तो मिल गई लेकिन एक गुनाह मेरे साथ सुलताना ने किया था जिसकी सजा उसे मुझे ही देना था। खुद को पाने के बाद सबसे पहला सवाल मेरे ज़ेहन में ये आया कि सुलताना ने मेरा यौन शोषण सिर्फ अपनी बीमारी की वजह से किया या फिर पैसोें के लिए या मेरी इच्छाओं का ख्याल रखासुलताना को लेकर अब भी अपनी जिज्ञासाओँ के कोने में जगह बनाई हुई थी। अब मैं इस शहर से जल्द से जल्द निकल जाना चाहता था लेकिन एक अधूरा काम पूरा करने के बाद।

कैलेंडर आज तारीख 28 अप्रैल बता रहा था,यानि मेरा फर्जी जन्मदिन की तारीख जिसे मैं अक्सर लड़कियों के सामने शेखी बघारने के लिए इस्तेमाल करता था।  जितना हो सकता था मैं सज-धजकर हाथ में गिफ्ट का बड़ा सा पैकेट लेकर सुल्ताना के पास पहुंचा, जिस्म पर हरे रंग की आधी कटी हुई टीशर्ट, और घुटने तक की लाल पैंट पहने, रईस लग रही थी, हालांकि रईस तो थी ही वो, क्योंकि जितना वो कमाती थी उतना तो शायद इस देश के प्रधानमंत्री की तनख्वाह भी नहीं होगी, लेकिन हमारे समाज में वेश्याओं को लोग रईस कहां मानते हैं, बस एक भोग करने वाली वस्तु और किसी को गाली देना हो तो फिर इस कौम का सहारा ले लेते हैं लोग, एक सवाल था जेहन में की औरतें ही वेश्याएं क्यों होती है ? पता नहीं जो भी था लेकिन मैं वक्त जाया नहीं करना चाहता था क्योंकि आज रात मुझे उटी के लिए निकलना था घर से बार बार फोन रहे थे कि छुट्टियों में मैं कहां रह गया, औऱ मैं बता भी नहीं पा रहा था कि मैं किस भंवर में फंसा हूं और मेरी पहचान मुझे मिल गई है।
जैसे कुछ बोलना चाहा तभी चहकती ही सुलताना आई औऱ फिर एक तानाजमाना गुजर गया साहब की शक्ल देखे हुए आज इधर कैसे ! और वो भी गिफ्ट , कहीं प्यार तो नहीं हो गया तुम्हें, देखना अक्सर रंडियों के पास आकर लोग अटक जाते हैं। ये बोलकर इतने जोर से वो हंसी , जो मुझे कतई अच्छा नहीं लगा मैं एकदम सीधे मुद्दे पर गया, औऱ उसे साथ में बाहर जाने का ऑफर दे डाला। वो भी अंतरंगी पागल मजाक में ले लिया और जाने से मना कर दिया कि बच्चों के साथ बाहर नहीं जाती पता नहीं क्या क्या बोल गई, लेकिन मैं आज अपने फैसले पर अटल था। हालांकि लाख झूठ औऱ मन्नत के बाद वो मेरे जन्मदिन के नाम पर 1 घंटे के लिए बाहर जाने के लिए राजी हो गई। तंवर ने सारा इंतजाम करके रखा था, एक फोन पर गाड़ी दरवाजे पर हमारे लिए खड़ी थी वो भी ड्राइवर के साथ। सुलताना एक मिनट बोलकर अंदर गई औऱ जब बाहर आई तो मैं देखता रहा, मैंने अपनी कच्ची उम्र में फैसला किया था कि अगर शादी करूंगा तो सिर्फ और सिर्फ सुल्ताना के साथ लेकिन उसे सही रास्ते पर लाने के बाद।
मैं ज्यादा बातें ना करके सीधे उसे गाड़ी में ले गया औऱ फिर ड्राइवर को एक एड्रेस बताकर चलने को बोल दिया। हालांकि उस एड्रेस के बारें में सुलताना ने यूं ही पूछ दिया कि जन्मदिन का इंतजाम यहां है। मैंने भी उस वक्त झट से हां कर दिया।
करीब 40 मिनट के बाद हमारी गाड़ी एक बड़े से कंपाउंड में रूकी औऱ मैं झट से गाड़ी से बाहर निकलते ही सुलताना को अंदर ही कुछ देर बैठने को बोला औऱ सामने की ओर लपक लिया। करीब 10 मिनट के बाद 2 आदमी और 4 औऱतें सुल्ताना को घसीटते हुए गाड़ी से निकालते हुए अंदर की ओर ले जाने लगे, हालांकि मेरा ड्राइवर इससे पहले कुछ बोलता मैंने उसे हाथों से इशारा करते हुए चुप रहने को कहा, और तब दीपक तंवर भी प्लान के मुताबिक वहां पहुंचा जिसने ड्राइवर को खुद संभाल लिया।
सुल्ताना को घसीटते हुए लोग ले जा रहे थे, वो सिर्फ मेरा नाम लेकर चिल्ला रही थी, मुझे ये लोग क्यों पकड़ के ले जा रहे हैं बताओ,
मैंने उसकी बातों को अनसुना कर सिर्फ अपनी उंगली से बोर्ड की तरफ देखने का इशारा किया। उस वक्त मुझे पूरा भरोसा था कि सुलताना पढ़कर कांप गई थी ,जिसपर लिखा था - रिहैब सेंटर ये देखते ही सुल्ताना के चेहरे पर सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए गुस्सा था और कहते हैं ना कि रंडियों की कभी जात नहीं बदलती तो असलियत भी ज़बान पर ही गई, जितनी भी गंदी गालियां दे सकती थी उसने दे दिया बस एक लाईन आखिरी में बोली की मैंने सही नहीं किया उसके साथ, उसने बहुत बड़ी गलती कर दी।
मैं चुपचाप उसके नजदीक गया औऱ बोला , तुम सेक्स एडिक्टेड होऔऱ मैं ये उस दिन ही जान गया था जिस दिन तुमने मेरे साथ पहली बार मेरा रेप किया था। मैं क्या करता मैं तुम्हें बीमार नहीं देख सकता,इसलिए तुम्हें इलाज के लिए यहां भर्ती करा दिया, फिक्र मत करो तुम्हारी तरह बहुत लड़कियां हैं यहां, तुम जल्दी ठीक हो जाओगी और एक दिन मैं तुम्हें लेने जरूर आउंगा फिक्र मत करो, मैं तुमसे शादी भी कर सकता हूं अगर तुम ठीक हो गई तो।   मैं और कुछ बोलना चाह रहा था तब तक तंवर मुझे खींचते हुए वहां से ले जाने लगा मैं अपने मकसद में कामयाब हो चुका था, तंवर इसे बदला समझ रहा था  लेकिन मैं क्या समझ रहा था ये सिर्फ मैं ही जानता था जो कि मैं किसी को बताना नहीं चाहता था ,क्योंकि किसी भी फैसले पर मैं जल्दी से पहुंचने की जल्दबाजी में भी नहीं था, कम समय में एक इंसान से मिला औऱ मैं उसे मुकाम तक पहुंचा कर अपनी नई पहचान के साथ वहां से निकल पड़ा। जाते जाते बस मेरे कानों में उसकी आवाजें रही थी।
पागल है तू, तूने बहुत बड़ी गलती कर दी, प्लीज मुझे ले चल यहां, प्लीज। वो गिरगिराने पर इसलिए उतर आई क्योंकि उसे पता चल चुका था कि उसे यहां से सिर्फ और सिर्फ मैं ही निकाल सकता हूं। धीरे-धीरे आवाजें मद्धम पड़ने लगी, एक वक्त के बाद मुझे सुनाई देना बंद हो गया बस कभी कभी उसकी बातें सिर्फ दिमाग में गूजती थी। 2 महीनें गुजर गए मैं अपनी फैमिली के साथ उटी में छुट्टियां मना रहा था
सबकुछ बदला क्या ? ये सवाल खुद से था यही सोचकर और अब मैं खुद की जिंदगी में उलझ गया, मैं चीनी से काफ़ी आसक्त था और कुकीज़ बहुत ज़्यादा खाता था. भावनाओं को सुन्न करने का एक तरीका था, अपनी ज़िंदगी से निपटने के लिए पलायनवाद का सहारा लेता था,16 साल की उम्र में मुझे पता चला गया था मुझे भाप से नहाने में मजा आता है यानि मैं गे था मेरी कामुकता सामान्य नहीं थी , उसमें एक घबराहटपन के साथ साथ संतुष्टि तो थी लेकिन अभी भी मन के कोने में कुछ अधूरा था मैं बिल्कुल किनारे पर गया था,और मुझे पूरी तरह एहसास हो गया था कि बचपन में ख़ुद के लिए निजी जगह की तलाश ,मैं क्यों करता था ? औऱ अब बचपन की उंगली पकड़कर चला था, साला जवानी की दहलीज कब पार कर गया पता ही नहीं चला।
आखिरकार मेरी पहचान मुझे मिल गई थी लेकिन मैं किसी की पहचान बदल तो नहीं सकता बस अपनी जिद पूरा कर सकता था जो मैंने किया। सुल्ताना आज भी रिहैब में अपने सेक्स एडिक्शन की बीमारी से लड़ रही है, सुना है कि वो अभी तक ठीक नहीं हुई और अपनी भूख को शांत करने के लिए रिहैब में काम कर रहे हर मर्द का इस्तेमाल करती है, सेंटर वालों को पता चला तो उसे एक कमरे में बंद कर दिया, जहां एकदम जेल की तरह रह रही है वोऔर एक मैं अपनी नई पहचान से खुश हूं बस दुख इस बात का था कि मेरा शोषण एक रंडी ने किया था जिससे मैं अनजाने में कुछ पल के लिए ही सही प्यार कर बैठा था। खैर मेरी सहानुभूति खुद से है। क्योंकि मैं कुछ अब बदल नहीं सकता ना सुल्ताना को ना खुद को।
अब कोई ख्वाहिश पालता नहीं पूरा करता हूं, क्योंकि मेरे मुछों के रोएं का हर बाला काला हो चुका है