मस्तक पर केसरिया, लिए हाथ में चिमटा।।
नागा साधुओं से रिश्ता बचपन से ही रहा है। दरअसल बचपन के सवाल भी बड़े अज़ीब होते थे। औऱ उन सवालों के एवज में जो मार पड़ती थी, उससे तो डर नहीं लगता था । बस मार के बाद जो धमकी मिलती थी, वो कई दिनों तक कानों में गूंजती रहती थी। अरसा गुजर गया, ज़िंदगी की भाग-दौड़ में हम कब उन सारे सवालों को पीछे छोड़, उसका जवाब बन गए, पता ही नहीं चला। वो तो बस एक रोज कुंभ के मेले में चलते-चलते जब नागा साधुओं की टोली पर नज़र पड़ी, तो मन की भीतरी सतह पर बैठा एक डर, भड़भड़ाकर सामने आ गया। सारे सवालों का जवाब तो उम्र के अनुभव तले तलाश लाया था। लेकिन नागा साधुओं की पहेली को कभी सुलझा नहीं पाया। औऱ सुलझाता भी कैसे ? अम्मा कहती थी, नागा साधु तो खुद ही अनसुलझी पहेली होते हैं।लेकिन इस कुंभ में हिम्मत जुटा ली। चाहे कुछ भी हो जाए, इस बार नागा साधुओं के रहस्य को समझकर ही रहेंगे।
हर-हर महादेव के नारों की गूंज के साथ गंगा घाट में डुबकी लगाई औऱ फिर मलाना की बूटी की तलाश में घुस गया साधुओं की टोली में। जहां एक टेंट में नागा साधु जो दिखने में अपने आप ही कठोर साधना की तरह लग रहे थे, लग गए उनसे दोस्ती यारी भंजियाने। ज्यादा देर तो नहीं लगी, हां, घंटे-दो घंटे में दोस्ती-यारी जैसी वाली बात होने लगी थी। इस दौरान पुरूषों की टोली का आवन जावन तो लगा हुआ था ही, लेकिन आश्चर्य वाली बात ये थी कि महिलाएं भी नागा साधुओं के आर्शीवाद के लिए जद्दोजहद करती दिखाई दे रही थी ।
मुझे क्या, मुझे तो बस इतना जानना था कि आप हैं कौन, औऱ बदन पर लिबास क्यूं नहीं पहनते हैं ?
सवाल एक, अगर नागा साधु दोस्त बन जाए तो फिर कई जवाब मिलना तो आदतन हो जाता है।
शिव और अग्नि का ऐसा स्वरूप, जो सच्चाई के धरातल से कहीं औऱ कोसों उपर।
तो शुरू से शुरूआत करते हैं।
दरअसल अर्द्धकुंभ, महाकुंभ और सिंहस्थ के दौरान नागा साधु को संत समाज के 13 अखाड़ों में से 7 जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन , अखाड़े ही उन्हें नागा बनाते हैं।
नागा साधु बनने के लिए सबसे पहले ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती है। जिसके बाद उन्हें 3 साल तक अपने गुरुओं की सेवा करना होता है। वहां से उसे धर्म, दर्शन और कर्मकांड आदि को समझना होता है। इस परीक्षा को पास करने के बाद महापुरुष बनाने की दीक्षा प्रारंभ होती है। जो बरसों तक चलती है।
कुंभ के दौरान इन्हें संन्यासी से महापुरुष बनाया जाता है, जिसकी तैयारी किसी सेना में शामिल होने जैसी होती है। कुंभ में पहले उसका मुंडन करके नदी में 108 डुबकी लगवाई जाती है, इसके बाद वह अखाड़े के 5 संन्यासियों को अपना गुरु बनाता है।
महापुरुष बन जाने के बाद उन्हें अवधूत बनाए जाने की तैयारी शुरू होती है। अवधूत बनाने के लिए उस साधु का जनेऊ संस्कार करते हैं और उसके बाद उसे संन्यासी जीवन की शपथ दिलवाई जाती है। शपथ के बाद उसका पिंडदान करवाया जाता है। इसके बाद बारी आती है दंडी संस्कार की और फिर होता है पूरी रात 'ॐ नम: शिवाय' का जाप।
भोर होते ही उन्हें अखाड़े ले जाकर उससे विजया हवन करवाया जाता है और फिर गंगा में 108 डुबकियों का स्नान होता है। डुबकियां लगवाने के बाद अखाड़े के ध्वज के नीचे दंडी त्याग करवाया जाता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया को 'बिजवान' कहते हैं ।
अंतिम परीक्षा दिगम्बर और फिर श्रीदिगम्बर की होती है। दिगम्बर नागा एक लंगोटी धारण कर सकता है, लेकिन श्रीदिगम्बर को बिना कपड़े के रहना होता है। श्रीदिगम्बर नागा की इन्द्री तोड़ दी जाती है।
एक साधु, जीवन की संपूर्णता का त्याग कर नागा साधु बनकर एक ऐसी यात्रा प्रारंभ करता है, जो रहस्य और जिज्ञासाओं से भरी होती है। दरअसल मुश्किल यहां से कई गुना बढ़ जाती है।
नागा बन गए साधु को वन, हिमालय, आश्रम और पहाड़ों में कठिन योग-साधना या तपस्या तो करनी ही होती है। साथ ही नागा बनने वाले साधुओं को भस्म, भगवा वस्त्र, चिमटा, धूनी, कमंडल और रुद्राक्ष की माला भी धारण करना होता है।
ये नागा साधु हिमालय में शून्य से भी नीचे के तापमान में नग्न रहकर जीवित रह लेते हैं, कई कई दिनों तक तो खाना भी नसीब नहीं होता।
नागा साधु हमेशा ज़मीन पर सोते हैं। अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं। पैदल भ्रमण करते हैं। भ्रमण के दौरान भिक्षा मांगकर अपना पेट भरते हैं। दिन में एक ही समय भिक्षा के लिए मात्र 7 घरों में जाते हैं। यदि सातों घरों से कोई भिक्षा न मिले, तो उन्हें भूखा ही सोना होता है।
नागा साधुओं के पास खुद के हथियार जैसे तलवार, त्रिशूल और भाला रहते हैं जिन्हें उसे चलाने की शिक्षा मिलती है। जंगल में उनका सामना जंगली जानवरों से हो जाए तो वे बगैर हथियारों के भी लड़ाई लड़ना जानते हैं। मठों और मंदिरों की रक्षा के लिए नागा साधुओं ने कई कालांतरों में कई लड़ाइयां लड़ी हैं। पुराने समय में नागा साधुओं को अखाड़ों में एक योद्धा की तरह तैयार किया जाता था।
दीक्षा लेने के बाद नागा साधुओं को उनकी वरीयता के आधार पर पद भी दिए जाते हैं। कोतवाल, बड़ा कोतवाल, पुजारी, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव उनके पद होते हैं। मूलत: नागा साधु के बाद महंत, श्रीमहंत, जमातिया महंत, थानापति महंत, पी महंत, दिगंबर श्री, महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर पद होते हैं।
चार आध्यात्मिक पद भी होते हैं- 1. कुटीचक, 2. बहूदक, 3. हंस और सबसे बड़ा 4. परमहंस। नागाओं में परमहंस सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। इसके अलावा नागाओं में औघड़ी, अवधूत, महंत, कापालिक, श्मशानी आदि भी होते हैं।
प्रयाग के महाकुंभ में दीक्षा लेने वालों को नागा, उज्जैन में दीक्षा लेने वालों को खूनी नागा, हरिद्वार में दीक्षा लेने वालों को बर्फानी औऱ नासिक में दीक्षा वाले खिचड़िया नागा कहलाते हैं ।
नागा की ज़ुबानी उसके बनने की कहानी सुनने के बाद भी एक सवाल अभी भी था, कि जिस्म पर लिबास क्यूं नहीं है ? उस जाते हुए नागा ने कहा, लिबास के अंदर भी तो तुम्हारी ज़िस्म नंगी है। बस नज़रों का फेर है, हमारी नंगी ज़िस्म के उपर लिबास तुम्हें नज़र नहीं आता है, भस्मी, भभूत ही तो लिबास है। अगर नहीं मानते हो तो फिर ये तो अपनी अपनी अज्ञानता और सोच पर निर्भर करता है कि कौन क्या कब औऱ कैसे देख पाता है। ये देखने और समझने की कला उस दिन सीख जाओगो या यूं कहें तो,
जो चाहोगे सो बन जाओगे
जिस दिन थोड़ा भी साधु हो जाओगे।।
ब्रम्हकुंड पर खड़ा,राख में लिपटा
वो मदमस्त नागा साधु खुद में सिमटा।।
कांधे टांगे कमंडल,धूनी रमाए
मस्तक पर केसरिया, लिए हाथ में चिमटा।।
#कहानीबाज़
रजनीश बाबा मेहता
