हर रोज की तरह दिन की शुरूआत यूं तो एक जैसी हुई। सूरज पूरब से ही निकला, नींद 9 बजे ही खुली। वो एसी पर कबूतर सुबह से ही फड़फड़ाना स्टार्ट कर दिया था। धूप का रंग सुनहरा ही था। हवाओं में पेड़ हल्की-हल्की झूम रही थी। मतलब प्रकृति की बनाई किसी चीज में फर्क नहीं था, कोई बदलाव नहीं। बस आज थोड़ा इंसानी हौसला कमजोर दिखाई दिया। हर रोज की तरह मेरी सोसायटी के बाहर बन रहे सड़क का काम बंद था।उपर वाले फ्लैट में कंस्ट्रक्शन भी बंद था। बरसों बाद या कहें तो पहली बार सोसायटी का दरवाजा पूरी तरह से लॉक़्ड था। ना कोई अंदर जा सकता था ना ही कोई बाहर। गेटकीपर से पूछा तो ज्ञान लंबा पेल दिया कि “ना तो बाहर जाने देंगे ना ही बाहर से अंदर जाने देंगे।” बड़ा ही नादानी से जवाब दिया कि “सर आज कर्फ्यू है ना तो रहिए ना घर में एक दिन। अगर आप बाहर जाएंगे, अगर कुच्छो हो गया तो फिर कौन जिम्मेदारी लेगा?” पांडे चौकीदार बड़ा ही नादान। वैसे भी बंबई की चौकीदारी यूपी-बिहार वाले ही तो करते हैं। खैर जनता कर्फ्यू के सपोर्ट में हम भी बड़ी तैयारी से लगे हैं। जो बन पड़ेगा करेंगे चाहे कुछ भी हो। बिस्तर से उठने के बाद यही सब दिमाग में घुरिया रहा था कि तभी मोबाईल पर मैसेज का बीप। पहले तो लगा कि साला कोरोना वाला मैसेज अब नहीं पढ़ना। लोगों को कोरोना हो ना हो ये मैसेज पढ़-पढ़कर जरूर हो जाएगा। खैर काम का भी बहुत मैसेज होता है इसलिए चुपचाप मोबाइल उठाकर लगा मैसेज पढ़ने।
स्क्रोल…स्क्रोल….स्क्रोल। एक मिनट..एक मिनट। शशि सिंह का मैसेज। हर रोज , हर दो घंटे के बाद या तो राजनीति से जुड़ा मैसेज भेजता है या फिर कोरोना को लेकर सावधानी वाला मैसेज। लेकिन आज एक सवाल पूछा, वैसे भी शशि सवाल पूछने औऱ जवाब देने में माहिर है।
“स्टॉक बना लिए हो”
कोरोना के चक्कर में हर कोई यही नसीहत दे रहा था सोचा कि नॉर्मल होगा।
“स्टॉक बनाने की क्या जरूरत है। सरकार ने बोला है स्टॉक को लेकर कोई मारामारी ना करें। तुम बना लिए हो क्या ?”
शशि सिंह के बारे में एक बात बता दूं कि वो दुनिया से एक कदम आगे रहता है। दिल्ली विश्वविघालय में हम बैचमेट थे। जेनएयू जब गए तो भाई साहब वहां जाते ही छात्र संघ के चुनाव में निर्दलीय प्रेसीडेंट खड़ा होकर हंगामा मचा दिया। कई पार्टियों की नींद उड़ा दी। प्रेसिडेंटियल डिबेट में तो भाई साहब ने जो गर्दा उड़ाया था। क्या राम का नाम, क्या धर्म की बातें ! मसल कर रख दिया हर विषय को। आजकल राजनीतिक विशेषज्ञ के तौर पर काम कर रहा है। औऱ बार बार न्यूज चैनल में गेस्ट के तौर पर जाने के चक्कर में लगा रहता है। खैर जो भी हो, शशि ज्ञानी तो है।
“अरे एक सप्ताह का नहीं, 6 महीने के स्टॉक की बात कर रहा हूं”।
6 महीने के स्टॉक के नाम पर दिमाग पड़पड़ा गया। वैसे भी शशि जब बकवास करता है तो फिर उसकी इंतहा हो जाती है।
“बौरा गए हो क्या बे, 6 महीने का स्टॉक काहे बनाएंगे। यहां साला मुंबई बोलने के बाद भी बंद नहीं हुआ तो आगे स्टॉक की कमी काहे कि। मगर तुम 6 महीने किस हिसाब से बोल रहे हो बे” ।
“भाई हमने तो बना लिया पूरे 6 महीने का । इ जो कोरोना है ना, 31 मार्च तक तो खत्म होने वाला है नहीं। लेकिन एक बात मान लो कोरोना के बाद भारत में इबोला आएगा।”
“अब इ साला इबोला कौन सा भसूड़ी है बे। या तूने सुबह-सुबह गांजा मार लिया”।
“मत मानो हम्मर बात”। वैसे भी गांजा तो कॉलेज में ही छोड़ दिए थे तुम्हारे साथ”।
शशिया बातों का पलटवार जबरदस्त तरीके से करता है। अब बात भले मजाक वाली थी लेकिन साला दिमाग फ्राई तो हो चुका था। कोरोना के चक्कर में देश का बंटाधार तो हो ही रहा था साथ ही आम लोगों की जिंदगी पर जबरस्त नकारात्मक प्रभाव पड़ना शुरू हो चुका है। कोरोना तक तो ठीक था लेकिन इबोला का नाम सुनकर दिमाग एक बार तो कांप ही गया। सोचा साले से जानकारी तो ले ही लेता हूं। मुझे पता था कि शशि का साइलेंट मजाक एकदम बकवास होता है।
“ 6 महीने स्टॉक औऱ फिर इबोला, इ का है रै। बताओ जरा, अब ज्ञान पेले हो तो पूरी जानकारी देना। नहीं तो ये सब चुतियाप मत बतियाया करो”।
“आधा जानकारी देते सुने हो हमको ? देखो कोरोनवा रहेगा जुलाई तक, जो कि चाइना से आया है। कोरोना में आदमी एक-आध मरता है या फिर बच भी जाता है। लेकिन इबोला आएगा साउथ अफ्रीका से। जिसमें एक साथ हजारों आदमी मरता है। औऱ इबोला से बचना है तो 45 डिग्री में रहना पड़ेगा। काहे कि ज्यादा गर्मी में इबोला टिक नहीं पाता है। इसलिए 6 महीने का स्टॉक तो हम बना लिए। और सब दोस्त को भी मैसेज कर रहे हैं वो लोग भी बना ले”।
“इबोला ने तुमको क्या फोन करके बोला कि हम कोरोना के बाद आएंगे। उल्टी सीधी बात करके काहे अपना दिमाग जलाते हो औऱ दूसरों का भी मैयौ कर देतो हो”।
“मानना हो तो मानो, नहीं मानना है तो मत मानो। सोचा तुम दूर रहते हो बता दें पहले।”
“अबे दूर काहे बात का, बिहार दिल्ली से बंबई कहां दूर है”।
“ जाने दो बात को, लेकिन मौका मिले तो स्टॉकबा बना लेना”।
भाई साहब उसके बाद शशिया से जो जबरदस्त बहस हुआ। साले को हम पगलैट बोलकर फोन रख दिए। लेकिन दिमाग एक पल के लिए सोचने लगा कि उसने मजाक में ही ये बात कही। अगर कहीं से भी ये सच हुआ तो फिर फिल्मों में जो देखते थे कि हीरो भागे जा रहा है पीछे से दुनिया खत्म हो रही है, वो तो एकदम सच हो जाएगा। खैर जो भी हो इबोला अभी सिर्फ कल्पनाओं औऱ शशिया के कथाओं में है। मगर कोरोना का कहर आसान नहीं है। हल्के में लेने की आदत हम हिंदुस्तानियों की जाती नहीं। वैसे भी भावना औऱ भरोसे को हथियार बना लेते हैं। 1 बॉल में 8 रन बनाना रहेगा तो भी हम जीत की उम्मीद में हाईलाइट तक देख जाते हैं। मगर कोरोना के हाईलाइट को हल्के में ना लेकर गंभीरता से लेने वाली बात है।
अब इबोला को लेकर थोड़े गंभीर हम भी हो गए। तो दिल्ली में दोस्त से पूछा कि कोई अफ्रीकन वायरस है क्या? सामने से जवाब आया “हां”।
अब सोचने वाली बात ये है कि नार्मल सर्दी, जुकाम की शक्ल में कोरोना का साइलेंट कहर दुनिया के 110 देशों में जमकर धमाल मचा रहा है। तो फिर ये शशिया का इबोला कहीं सच हुआ तो फिर मामला औऱ भी बड़ा हो सकता है।
खैर खतरा सबको पता है, हर जगह खबर, मैसेज औऱ सोशल माध्यम से जानकारी पहुंचाई जा रही है। लेकिन इन सबके बीच एक सबक तो सबको सीखना चाहिए कि छोटी-छोटी सफाई, मास्क, हाथ धोने वाली बात, के अलावा जो बीमार है उससे दूरी को लेकर सतर्कता जैसी बातें पता होने के बाद भी अमल में नहीं ला रहे थे अब उसे जिंदगी का हिस्सा बना लें। हमेशा के लिए ।
क्योंकि ऐसा नहीं किया तो फिर इंसानों को इस दुनिया में हमेशा के लिए आइसोलेशन में रहना पड़ेगा। कुछ लोग मजाक में ही सही लेकिन सही बात कह रहे हैं कि प्रकृति पलटवार करती जरूर है। अब इस कौरोना भरे मौसम में बस जानकारी औऱ उसपर अमल ही बचाव है। ऐसे मामले पर सरकार की बातों को नजरअंदाज करना बौद्धिकता नहीं बेवकूफी होगी।
सरकार गाइडलाइन जारी कर रही है लेकिन लोग देर से मान रहे हैं। ताली औऱ थाली बजाने को लेकर सबने संज्ञा, विशेषण औऱ सर्वनाम बनाकर चुटकुला बना डाला। लेकिन एक बात तो सबको पता है कि मौत का कोई संज्ञा ,विशेषण औऱ सर्वनाम नहीं होता। मौत जब आएगी तो फिर सबलोग उसका विलोम ही ढ़ूंढ़ते नजर आएंगे।
खैर कोरोना का प्रकोप कम हो तो अच्छा है, लेकिन साले शशिया सुन ले “तेरा इबोला अगर आया तो पहले तू ही मरेगा। तेरा स्टॉक किसी औऱ के काम आएगा।”
कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता