Sunday, 19 April 2020

साधु का डर

कहानी साधु का डर _Writer & VO- Rajnish BaB Mehta


VIDEO LINK - https://www.youtube.com/watch?v=uhlO-Rsl3IE

बचपन से ही अम्मा एक बात कहती थी, 
कि अगर बदमाशी किया, 
तो फिर इन साधु बाबा से बोलकर तुम्हें पकड़वा दूंगी।
झोले में बंद कर ले जाएंगे।  
वो लंबी-लंबी जटाओं तले दो घूरती आंखें 
पूरा माथा तिलक के नाम पर राख से सना हुआ।
ललाट के बीचों बीच सिंदूरी लाल रंग का गहरा टीका। 
बदन पर कपड़े, किस्मत जैसी ही छोटी 
एक ही अंगोछा औऱ आधी लुंगी में पूरा शरीर भरा हुआ।   
किसी के हाथ में सारंगी, तो कोई डमरू वाला त्रिशूल लेकर घूमता था।
उस त्रिशूल से बड़ा ही डर लगता था। उपर से अम्मा, उसी का धौंस खूब जमाती थी। 
मोहल्ले-टोले में हर रोज एक या दो साधु तो चक्कर लगा ही जाते थे। 
डर, बचपन वाला डर। दिमाग चौकन्ना मगर हर पल उस जटाधारी का डर। 
पता नहीं कब किस ओर से आएगा, औऱ झोले में बंद कर ले जाएगा। 
गली के दूर मुहाने पर अगर गेरूआ वाला दिख गया 
तो फिर कंचे की बाजी बीच में ही छोड़कर फरार हो जाते थे।
उस उम्र में साधु जादूगर लगता था। 
औऱ अब, इस भागती जिंदगी में मन करता है कि साधू ही बन जाउं
मतलब वही वाली बात है , कि जब तक कोई चीज समझ में ना जाए 
तब तक इंसान उससे डरता रहता है। लेकिन अगर एक बार समझ में गया तो फिर उसे 
जिंदगी का हिस्सा बना लेता है। या फिर खुद उसके जैसा बनने की कल्पना करने लगता है। 
बड़ा अजीब देश है हिंदुस्तान वैराग्य की बड़ी अजीब परिभाषा लिखी जाती है यहां। 
ऐसा क्या होता है कि इंसान साधू बनने पर मजबूर हो जाता है। 
भरे भस्म में खोए, लाल लिबासों में लिपटे, जटाओं में सिमटें ना जाने कितने साधुओं को देखा।
कई बार उसके साथ जाने को लेकर तमन्नाएं भी जागी। हिम्मत नहीं कर पाया। 
कुंभ के बाद वापस गांव गया। अम्मा को सारी कहानी सुना डाला। 
हंसते हुए बोल पड़ी, अपने डर का पीछा आजतक कर रहे हो  
कर तो रहा हूं। लेकिन खामोशी से। सारी ख्वाहिशों के दरवाजों को बंद करके। 

"कबीरा संगति साधु की , हरे और की व्याधि।
संगति बुरी असाधु की ,   आठों पहर उपाधि ।।"

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता