Tuesday, 5 November 2013

दास्तान-ए-औऱंगजेब सीरीज - 1

इस मंदिर के आगे नतमस्‍तक हो गया था विध्‍वंसकर्ता औरंगजेब!


दास्तान-ए-औऱंगजेब सीरीज - रजनीश बाबा मेहता
भारत का वर्तमान जितना दिलचस्प है, इतिहास उतना ही रोचक। यहां मुगल, तुर्क और अंग्रेज शासकों ने या तो राज किया या फिर धन-संपदा लूटकर ले गए। मुगलों और अंग्रेजों ने लंबे समय तक राज किया है। मुगल शासकों का यूपी से गहरा संबंध रहा है। उनसे जुड़े अनेक तथ्य और घटनाएं बहुत दिलचस्प हैं।   
आगरा किला से करीब एक किलोमीटर दूर श्‍यामजी मंदिर है। यह मंदिर प्राचीन बताई जाती है। मंदिरों को तुड़वाने के लिए बदनाम मुगल शासक औरंगजेब ने इसे भी ध्‍वस्‍त करने का आदेश दिया था।  
लेकिन उसके साथ कुछ ऐसा हुआ कि वह भी मंदिर के सामने नतमस्‍तक हो गया। उसने मंदिर के खर्च के लिए एक रुपया रोजाना और एक गांव की जागीर भी दे दी थी। इतिहासकारों ने इस घटना को अपनी किताब में लिखा है।
यह मंदिर बिजलीघर चौराहे से छीपीटोला जाने वाली सड़क पर है। इतिहासकार आरके शर्मा अपनी पुस्‍तक ‘तवारीख ए आगरा’ में चौकाने वाली बातें लिखी हैं। उनके मुताबिक औरंगजेब ने सत्‍ता अपने पास लेने के बाद से मंदिर विध्‍वंसक नीति शुरू कर दी थी। उसने श्‍यामजी मंदिर को भी तोड़ने का आदेश दिया। तब मंदिर के पुजारियों को बंदी बना लिया गया था।
कुछ लेखक लिखते हैं कि  कि उस रात औरंगजेब ठीक से सो नहीं सका। अगले ही दिन उसने अनोखा आदेश दिया। औरंगजेब ने मंदिर के खर्च के लिए एक रुपया रोजाना देने का ऐलान किया। इसके साथ ही एक गांव भी जागीर में मंदिर को प्रदान की गई। आगरा तहसील का श्‍यामो गांव कभी इस मंदिर की जागीर था। उस वक्‍त एक रुपए की कीमत बेहद ज्‍यादा थी।
औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का आदेश 12 अप्रैल 1679 में सारे मंदिर तोड़ने का आदेश जारी किया था। उसी वक्‍त उसने अकबर द्वारा बंद किया गया जजिया कर भी फिर से लागू कर दिया था। इसी के तहत मथुरा में औरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला द्वारा बनवाए गए केशव देव के भव्‍य मंदिर को तुड़वा डाला था। मंदिर विध्‍वंस की नीति के तहत ही औरंगजेब ने आगरा के श्‍यामजी मंदिर को भी तोड़ने का आदेश दिया था। 

संकलन 
रजनीश बाबा मेहता 

Tuesday, 29 October 2013

अभिमन्यु की आत्महत्या - राजेंद्र यादव , संकलन रजनीश बाबा मेहता

आज भले ही राजेंद्र यादव जी जैसे साहित्यकार हमारे बीच नहीं रहे..लेकिन इस हंस को हिंदुस्तान भूल नहीं पाएगा। 
                                   रजनीश बाबा मेहता 

I shall depart. Steamer with swaying masts, raise anchor for exotic landscapes.
- Sea Breeze, Mallarme
तुम्हें पता है, आज मेरी वर्षगाँठ है और आज मैं आत्महत्या करने गया था? मालूम है, आज मैं आत्महत्या करके लौटा हूँ?
अब मेरे पास शायद कोई 'आत्म' नहीं बचा, जिसकी हत्या हो जाने का भय हो। चलो, भविष्य के लिए छुट्टी मिली!
किसी ने कहा था कि उस जीवन देने वाले भगवान को कोई हक नहीं है कि हमें तरह-तरह की मानसिक यातनाओं से गुजरता देख-देखकर बैठा-बैठा मुस्कराए, हमारी मजबूरियों पर हँसे। मैं अपने आपसे लड़ता रहूँ, छटपटाता रहूँ, जैसे पानी में पड़ी चींटी छटपटाती है, और किनारे पर खड़े शैतान बच्चे की तरह मेरी चेष्टाओं पर 'वह' किलकारियाँ मारता रहे! नहीं, मैं उसे यह क्रूर आनंद नहीं दे पाऊँगा और उसका जीवन उसे लौटा दूँगा। मुझे इन निरर्थक परिस्थितियों के चक्रव्यूह में डालकर तू खिलवाड़ नहीं कर पाएगा कि हल तो मेरी मुट्ठी में बंद है ही। सही है, कि माँ के पेट में ही मैंने सुन लिया था कि चक्रव्यूह तोड़ने का रास्ता क्या है, और निकलने का तरीका मैं नहीं जानता था.... लेकिन निकल कर ही क्या होगा? किस शिव का धनुष मेरे बिना अनटूटा पड़ा है? किस अपर्णा सती की वरमालाएँ मेरे बिना सूख-सूखकर बिखरी जा रही हैं? किस एवरेस्ट की चोटियाँ मेरे बिना अछूती बिलख रही हैं? जब तूने मुझे जीवन दिया है तो 'अहं' भी दिया है, 'मैं हूँ' का बोध भी दिया है, और मेरे उस 'मैं' को हक है कि वह किसी भी चक्रव्यूह को तोड़ कर घुसने और निकलने से इंकार कर दे..... और इस तरह तेरे इस बर्बर मनोरंजन की शुरूआत ही न होने दे.....
और इसीलिए मैं आत्महत्या करने गया था, सुना?
किसी ने कहा था कि उस पर कभी विश्वास मत करो, जो तुम्हें नहीं तुम्हारी कला को प्यार करती है, तुम्हारे स्वर को प्यार करती है, तुम्हारी महानता और तुम्हारे धन को प्यार करती है। क्योंकि वह कहीं भी तुम्हें प्यार नहीं करती। तुम्हारे पास कुछ है जिससे उसे मुहब्बत है। तुम्हारे पास कला है; हृदय है, मुस्कराहट है, स्वर है, महानता है, धन है और उसी से उसे प्यार है; तुमसे नहीं। और जब तुम उसे वह सब नहीं दे पाओगे तो दीवाला निकले शराबखाने की तरह वह किसी दूरे मैकदे की तलाश कर लेगी और तुम्हें लगेगा कि तुम्हारा तिरस्कार हुआ। एक दिन यही सब बेचनेवाला दूसरा दूकानदार उसे इसी बाजार में मिल जाएगा और वह हर पुराने को नए से बदल लेगी, हर बुरे को अच्छे से बदल लेगी, और तुम चिलचिलाते सीमाहीन रेगिस्तान में अपने को अनाथ और असहाय बच्चे-सा प्यासा और अकेला पाओगे.... तुम्हारे सिर पर छाया का सुरमई बादल सरककर आगे बढ़ गया होगा और तब तुम्हें लगेगा कि बादल की उस श्यामल छाया ने तुम्हें ऐसी जगह ला छोड़ा है जहाँ से लौटने का रास्ता तुम्हें खुद नहीं मालूम.... जहाँ तुममें न आगे बढ़ने की हिम्मत है, न पीछे लौटने की ताकत। तब यह छलावा और स्वप्न-भंग खुद मंत्र-टूटे साँप-सा पलटकर तुम्हारी ही एड़ी में अपने दाँत गड़ा देगा और नस-नस से लपकती हुई नीली लहरों के विष बुझे तीर तुम्हारे चेतना के रथ को छलनी कर डालेंगे और तुम्हारे रथ के टूटे पहिए तुम्हारी ढाल का काम भी नहीं दे पाएंगे.... कोई भीम तब तुम्हारी रक्षा को नहीं आएगा।
क्योंकि इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता तुम्हें किसी अर्जुन ने नहीं बताया- इसीलिए मुझे आत्महत्या कर लेनी पड़ी और फिर मैं लौट आया- अपने लिए नहीं, परीक्षित के लिए, ताकि वह हर साँस से मेरी इस हत्या का बदला ले सके, हर तक्षक को यज्ञ की सुगंधित रोशनी तक खींच लाए।
मुझे याद है : मैं बड़े ही स्थिर कदमों से बांद्रा पर उतरा था और टहलता हुआ 'सी' रूट के स्टैंड पर आ खड़ा हुआ था। सागर के उस एकांत किनारे तक जाने लायक पैसे जेब में थे। पास ही मजदूरों का एक बड़ा-सा परिवार धूलिया फुटपाथ पर लेटा था। धुआंते गड्ढे जैसे चूल्हे की रोशनी में एक धोती में लिपटी छाया पीला-पीला मसाला पीस रही थी। चूल्हे पर कुछ खदक रहा था। पीछे की टूटी बाउंड्री से कोई झूमती गुन-गुनाहट निकली और पुल के नीचे से रोशनी-अँधेरे के चारखाने के फीते-सी रेल सरकती हुई निकल गई-विले पार्ले के स्टेशन पर मेरे पास कुछ पाँच आने बचे थे।
घोड़ाबंदर के पार जब दस बजे वाली बस सीधी बैंड स्टैंड की तरफ दौड़ी तो मैंने अपने-आपसे कहा -"वॉट डू आई केयर? मैं किसी की चिंता नहीं करता!"
और जब बस अंतिम स्टेज पर आकर खड़ी हो गई तो मैं ढालू सड़क पार कर सागर-तट के ऊबड़-खाबड़ पत्थरों पर उतर पड़ा। ईरानी रेस्त्रां की आसमानी नियोन लाइटें किसी लाइटहाउस की दिशा देती पुकार जैसी लग रही थीं,.... नहीं, मुझे अब कोई पुकार नहीं सुननी.... कोई और अप्रतिरोध पुकार है जो इससे ज्यादा जोर से मुझे खींच रही है। दौड़ती बस में सागर की सीली-सीली हवाओं में आती यह गंभीर पुकार कैसी फुरहरी पैदा करती थी। और मैं ऊँचे-नीचे पत्थरों के ढोकों पर पाँव रखता हुआ बिल्कुल लहरों के पास तक चला आया था। अँधेरे के काले-काले बालों वाली आसमानी छाती के नीचे भिंचा सागर सुबक-सुबककर रो रहा था, लंबी-लंबी साँसें लेता लहर-लहर में उमड़ा पड़ रहा था। रोशनी की आड़ में पत्थर के एक बडे से टुकड़े के पीछे जाने के लिए मैं बढ़ा तो देखा कि वहाँ आपस में सटी दो छायाएँ पहले से बैठी हैं 'ईवनिंग इन पेरिस' की खुशबू पर अनजाने ही मुस्कराता मैं दूसरी ओर बढ़ आया। हाँ, यही जगह ठीक है, यहाँ से अब कोई नहीं दीखता। धम से बैठ गया था। सामने ही सागर की वह सीमा थी जहाँ लहरों से अजगर फन पटक-पटक फुफकार उठते थे और रूपहले फेनों की गोटें सागर की छाती पर यहाँ-वहाँ अँधेरे में दमक उठती थीं। पानी की बौछार की तरह छींटे शरीर को भिगो जाते थे और पास की दरारवाली नाली में झागदार पानी उफन उठता था।
सब कुछ कैसा निस्तब्ध था! कितना व्याकुल था! हाँ, यही तो जगह है जो आत्महत्या-जैसे कामों के लिए ठीक मानी गई है। किसी को पता भी नहीं लगेगा। सागर की गरज में कौन सुनेगा कि क्या हुआ और बड़े-बड़े विज्ञापनों के नीचे एक पतली-सी लाइन में निकली इस सूचना को कौन पढ़ेगा? इस विराट बंबई में एक आदमी रहा, न रहा। मैंने जरा झाँककर देखा- मछुओं के पास वाले गिरजे से लेकर ईरानी रेस्त्रां के पास वाले मंडप तक, सड़क सुनसान लेटी थी। बंगलों की खिडकियाँ चमक रही थीं और सफेद कपड़ों के एकाध धब्बे-से कहीं-कहीं आदमियों का आभास होता था। रात का आनंद लेने वालों को लिए टैक्सी इधर चली आ रही थी।
असल में मैं आत्महत्या करने नहीं आया था। मैं तो चाहता था कोई मरघट-जैसी शांत जगह, जहाँ थोड़ी देर यों ही चुपचाप बैठा जा सके। यह दिमाग में भरा सीसे-सा भारी बोझ कुछ तो हल्का हो, यह साँस-साँस में रड़कती सुनाई की नोक-सा दर्द कुछ तो थमे। लहरें सिर फटककर-फटककर रो रही थीं और पानी कराह उठता था। घायल चील-सी हवा इस क्षितिज तक चीखती फिरती थी। आज सागर-मंथन जोरों पर था। चारों ओर भीषण गरजते अँधेरे की घाटियों में दैत्यवाहिनी की सफें की सफें मार्च करती निकल जाती थीं। दूर, बहुत दूर, बस दो चार बत्तियाँ कभी-कभी लहरों के नीचे होते ही झिलमिला उठती थीं। बाईं ओर नगर की बत्तियों की लाइन चली गई थी। सामने शायद कोई जहाज खड़ा है, बत्तियों से तो ऐसा लगता है। इस चिंघाड़ते एकांत में, मान लो, एक लहर जरा-सी करवट बदलकर झपट पड़े तो...? किसे पता चलेगा कि कल यहाँ, इस ढोंके की आड़ में, कोई अपना बोझ सागर को सौंपने आया था, एक पिसा हुआ भुनगा। मगर आखिर मैं जियूँ ही क्यों? किसके लिए? इस जिंदगी ने मुझे क्या दिया? वहीं अनथक संघर्ष स्वप्न भंग, विश्वासघात और जलालत। सब मिलाकर आपस में गुत्थम-गुत्था करते दुहरे-तिहरे व्यक्तित्व, एक वह जो मैं बनना चाहता था, एक वह जो मुझे बनना पड़ता था...
और उस समय मन में आया था कि, क्यों नहीं कोई लहर आगे बढ़कर मुझे पीस डालती? थोड़ी देर और बैठूँगा, अगर इस ज्वार में आए सागर की लहर जब भी आगे नहीं आई तो मैं खुद उसके पास जाऊँगा। और अपने को उसे सौंप दूँगा..... कोई आवेश नहीं, कोई उत्तेजना नहीं, स्थिर और दृढ़... खूब सोच-विचार के बाद....
अँधेरे के पार से दीखती रोशनी के इस गुच्छे को देख-देखकर जाने क्यों मुझे लगता है कि कोई जहाज है जो वहाँ मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। जाने किन-किन किनारों को छूता हुआ आया है यहाँ लंगर डाले खड़ा है कि मैं आऊँ और वह चल पड़े। यहाँ से दो-तीन मील तो होगा ही। कहीं उसी में जाने के लिए तो मैं अनजाने रूप से नहीं आ गया... क्योंकि वह मुझे लेने आएगा यह मुझे मालूम था। दिन-भर उस जानने को मैं झुठलाता रहा और अब आखिर रात के साढ़े दस बजे बंबई की लंबी-चौड़ी सड़कें, और कंधे रगड़ती भीड़ें चीरता हुआ मैं यहाँ चला आया हूँ। जाने कौन मन में घिसे रिकार्ड-सा दिनभर दुहराता रहा है कि मुझे यहाँ जाना है। अनजान पहाड़ों की खूंख्वार तलहटियों से आती यह आवाज हातिम ने सुनी थी और वह सारे जाल-जंजाल को तोड़कर उस आवाज के पीछे-पीछे चला गया था। जाने क्यों मैंने भी तो जब-जब पहाड़ों के चीड़ और देवदारू-लदे ढलवानों पर चकमक करती बर्फानी चोटियों और लहराते रेशम से फैले सागर की तरंगों को आँख भरकर देखा है, मुझे यही आवाज सुनाई दी है और मुझे लगा है कि उस आवाज को मैं अनसुनी नहीं कर पाऊँगा। हिप्नोटाइज्ड की तरह दोनों बाँहें खोलकर अपने को इस आवाज को सौंप दूँगा। अब भी इसी पुकार पर मैं अपने-आपको पहाड़ की चोटी से छलांग लगाकर लहरों तक आते देख रहा हूँ। वह जहाज मेरी राह में जो खड़ा है, मैं आवाज देकर उन्हें बता देना चाहता हूँ कि देखो, मैं आ गया हूँ.... देखो, मैं यहाँ बैठा हूँ, मुझे लिए बिना मत जाना।
मुझे लगता है एक छोटी-सी डोंगी अभी जहाज से नीचे उतार दी जाएगी और मुझे अपनी ओर आती दिखाई देगी...बस, उस लहर के झुकते ही तो दीख जाएगी। उसमें एक अकेली लालटेन वाली नाव! कहाँ पढ़ा था? हाँ याद आया, चेखव की 'कुत्तेवाली महिला' में ऐसा ही दृश्य है जो एक अजीब कवित्वपूर्ण छाप छोड़ गया है मन पर.....गुरोव और सर्जिएव्ना को मैं भूल गया हूँ (अभी तो देखा था उस पत्थर की आड़ में) मगर इस फुफकारते सागर को देखकर मेरा सारा अस्तित्व सिहर उठता है। यह गुर्राते शेर-सी गरज और रह-रहकर मूसलाधार पानी की तरह दौड़ती लहरों की वल्गा-हीन उन्मत्त अश्व-पंक्तियाँ। मुझे इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता कोई नहीं बताता? अलीबाबा के भाई की तरह मैंने भीतर जाने के सारे रास्ते पा लिए हैं लेकिन उस 'सिम-सिम खुला जा' मंत्र को मैं भूल गया हूँ जिससे बाहर निकलने का रास्ता खुलता है। लेकिन मैं उस चक्रव्यूह में क्यों घुसा? कौन-सी पुकार थी जो उस नौजवान को अनजान देश की शहजादी के महलों तक ले आई थी?
दूर सतखण्डे की हाथीदांती खिड़की से झाँकती शहजादी ने इशारे से बुलाया और नौजवान न जाने कितने गलियारे और बारहदरियाँ लाँघता शाहजादी के महलों में जा पहुँचा। सारे दरवाजे खुद-बखुद खुलते गए। आगे झुके हुए ख्वाजासराओं के बिछाए ईरानी कालीन और किवाड़ों के पीछे छिपी कनीजों के हाथ उसे हाथों-हाथ लिये चले गए; और नौजवान शाहजादी के सामने था....ठगा और मंत्र-मुग्ध।
शाहजादी ने उसे तोला; अपने जादू और सम्मोहन को देखा और मुस्करा पड़ी। नौजवान होश में आ गया। हकला कर बोला, "हीरे बेचता हूँ, जहाँपनाह।"
"हाँ, हमें हीरों का शौक है और हमने तुम्हारे हीरों की तारीफ सुनी है।"
और उसकी चमड़े की थैली के चमकते अंगारे शाहजादी की गुलाबी हथेली पर यों जगमगा उठे जैसे कमल पर ओस की बूँदें सतरंगी किरणों में खिलखिला उठें.... उसे हीरों का शौक था। उसे हीरों की तमीज थी। उसके कानों में हीरे थे, उसके केशों मे हीरे थे, कलाइयाँ हीरों से भरी थीं और होठों के मखमल में जगमगाती हीरों पर आँख टिकाने की ताव उस नौजवान में नहीं थी।
"कीमत.....?" सवाल आया।
"कीमत....?"
"कीमत नहीं लोगे क्या?" शाहजादी के स्वर में परिहास मुखर हुआ।
नौजवान सहसा संभल गया, "क्यों नहीं लूँगा हुजूर? यही तो मेरी रोजी है। कीमत नहीं लूँगा तो बूढ़ी माँ और अब्बा को क्या खिलाऊँगा।" लेकिन वह कहीं भीतर अटक गया था। उसकी पेशानी पर पसीना चुहचुहा आया।
"कीमत क्या, बता दे?" किसी ने दुहराया।
"आपसे कैसे अर्ज करूँ कि इनकी कीमत क्या है? जरूरतमंदों और पारखियों के हिसाब से हर चीज की कीमत बदलती रही है। आपको इनका शौक है, आप ज्यादा जानती हैं।"
"फिर भी, बदले में क्या चाहोगे?" शाहजादी ने फिर पारखी निगाह से हीरों को तोला। उसकी आवाज दबी थी, "लगते तो काफी कीमती हैं।"
"हुजूर, जो मुनासिब समझें। खुदारा, मैं सचमुच नहीं जानता कि इनकी कीमत आपसे क्या माँग लूँ? आप एक दीनार देंगी, मुझे मंजूर है।" नौजवान कृतार्थ हो आया।
"फिर भी आखिर, अपनी मेहनत का तो कुछ चाहोगे ही न!" शहजादी की आँखों के हीरे चमकने लगे थे और उनमें प्रशंसा झूम आई थी।
"हीरों को सामने रखकर शाहजादी इनकी मेहनत की कहानी सुनना पसंद करेंगी?" इस बार नौजवान की वाणी में आत्मविश्वास था और उसने गर्दन उठा ली थी। होंठों पर मुस्कुराहट रेंग आई थी।
"तुम लोग ये सब लाते कहाँ से हो?"
"कोहकाफ से!"
"कोहकाफ" सुनकर ताज्जुब से खुले शाहजादी के मुँह की ओर नौजवान ने देखा और बाँहों की मछलियों को हाथों से टटोलते हुए बोला, "तो सुनिए, मेढ़ों और बकरों का एक बड़ा झुंड लेकर में पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर जा पहुँचा। वहाँ उनकों मैंने जिबह कर डाला और उनके गोश्त को अपने बदन पर चारों तरफ इस तरह बाँध लिया कि मैं खुद भी गोश्त की एक भारी लोथ लगने लगा। उसी गलाजत और बदबू में मुझे वहाँ कई दिन बारिश और धूप सहते लेटे रहना पड़ा। तब फिर आँधी की तरह वह उकाब आया जिसका मुझे इंतजार था। चारों ओर एक जलजले का आलम बरपा हो गया था। उसने झपटकर मुझे अपने पंजों में दबोचा और बच्चों को खिलाने के लिए ले चला घोंसले की तरफ।
बीच आसमान में लटकता मैं चला जा रहा आखिर मैंने अपने आपको बहुत ही वसीह खुली घाटी में पाया। यही कोहकाफ था। यहाँ एक चोटी पर मादा उकाब अपने बच्चों को दुलरा रही थी। जैसे ही मैंने जमीन छुई, छुरी की मदद से अपने को फौरन ही उस सड़े गोश्त से अगल कर लिया, और चुपचाप एक चट्टान की आड़ में हो गया। चारों ओर देखा तो मेरी आँखे खुशी से दमकने लगीं। वह घाटी सचमुच हीरों की थी। कितने भरूँ और कितने छोडूँ! मैं सब कुछ भूलकर दोनों हाथों से ही अपनी झोली में भरने लगा। लेकिन यह देखकर मेरी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई कि चारों तरफ उस घाटी में भयानक अजदहे लहरा रहे थे - उकाब के डर से उस चोटी के पास नहीं आते थे, लेकिन जैसे उस चोटी की रखवाली कर रहे हों। उनकी फुंकारों से सारी घाटी गूँज रही थी।
जलती लपटों-सी जीभें देख-देखकर मेरे तो सारे होश फना हो गए। अब कैसे लौटूँ? आखिर मैंने मौत की परवाह न करके फिर उसी उकाब के साथ वापस आने की सोची और फिर उसके पंजे से जा चिपका। बीच में पकड़ छूट गई; क्योंकि दो दिन लगातार लटके उड़ते रहने से मेरे हाथों ने जवाब दे दिया था। छूटकर जो गिरा तो सीधा समुंदर में जा पड़ा। खैर, किसी तरह एक बहता हुआ तख्त हाथ लगा और उसी के सहारे आपके इस खूबसूरत मुल्क में आ लगा।"
नौजवान की आवाज मैं चुनौती और आत्मविश्वास दोनों थे। "यह मेरी मेहनतकी कहानी है, शाहजादी!"
शाहजादी ने उस जांबाज नौजवान को प्रशंसा की निगाहों से देखा, "आफरीं! सचमुच आदमी तुम हिम्मत वाले हो?" फिर जाने क्या सोचती-सी अनमनी अपलक आँखों से उसे देखती रही- देखती रही और दूर कहीं हीरे की घाटियों में खो गई। वह भूल गई कि उसके होंठों की वह मुस्कराहट अभी तक अन-सिमटी पड़ी है। वहीं कहीं दूर से बोली, "यों चारों तरफ से गलाजत में लिपटे, पंजों में बिंधे अनजानी खूंख्वार अँधेरी घाटियों में उतरते चले जाने में कैसा लगा होगा तुम्हें? और फिर जब तुमने भट्टों-सी जलती अजदहों की आँखे देखी होंगी।" फिर उसे होश आ गया। स्नेह से बोली, "अच्छा कीमत बोल दो अब। और देखो, हमें इसी घाटी के हीरे और चाहिए।"
"आपने इन्हें परखा, मेरी मेहनत को देखा, बस आपकी यह हमदर्द मुस्कुराहट ही इनकी कीमत थी और वह मुझे मिल गई।"

Tuesday, 1 October 2013

Almost Virgin डायरी (8)


 

ये उसकी कहानी है। दिल्ली की एक लड़की की कहानी। उस लड़की की कहानी जिसकी जिंदगी जीने की अपनी टर्म्स एंड कंडीशंस है। वो चाहती है कि घटिया लोगों का जवाब उन्हीं के तरीके से दिया जाए... हां, अगर मैं कुछ ज्यादा ही ओपननेस के साथ बात कर रही हूं तो डोंट थिंक रॉन्ग... मैं कोई ऐसी-वैसी उस टाइप की लड़की नहीं हूं...आपसे कुछ शेयर करना चाहती हूं तो इसलिए कि यस-यस...नो...नो...के डायलेमा में फंसी हजारों लड़कियों में डिसीजन लेने की डेयरिंग आ सके... वे उन कंडीशंस से निपटने की हिम्मत पैदा कर सकें। वे उन कंडीशंस से निपटने की हिम्मत पैदा कर सकें, जो लड़कियां होने के कारण कदम-कदम पर फेस करती हैं। 

 

सीन 1 : दोस्ताना   

आजकल मेरे दिन फेसबुक पर ज्यादा बीतने लगे थे। अकेली और सिंगल लाइफ में रियल लाइफ के दोस्तों से मिलना जुलना अब कुछ कम होने लगा था। कुछ सहेलियों की शादी हो गई थी और श्वेता और विभा जैसी मेरी अच्छी दोस्त  अपने  ब्वॉयफ्रेंड और मंगेतर संग बिजी थी ऐसे में मेरी लाइफस्टाइल में भी चेंज आ गया था। अब में इंटरनेट के  संसार में अपना समय कुछ अधिक बिताने लगी थी। यूं तो दिन में कई बार फेसबुक पर लोगों की पोस्ट को रीड करना और लाइक करना नया सगल बन गया था, लेकिन शाम के 6 बजे का मुझे कुछ ज्यादा ही इंतजार रहने लगा था और उसका सबसे बड़ा कारण था फेसबुक पर मेरा नया दोस्त अमय वत्स । अमय थोड़ा रोमांटिक होने के साथ ही कुछ इमोशनल टाइप का बंदा लगा था और सबसे खास बात जो मुझे उसमें नजर आई थी वो उसका लुक। कुछ दिनों बात करने के बाद मैंने उसे समझने के लिए थोड़ा बोल्ड और बिंदास अंदाज में बात करने की कोशिश भी की, लेकिन वह इन सब बातों से बचने की कोशिश करता था। मुझे वह डिसेंट लगा। दूसरे अन्य लोगों की तरह कम से कम पिछले तीन माह की चैटिंग में मेरे फिगर को लेकर कोई सवाल जवाब नहीं किया था। ऐसा कुछ नहीं पूछा था, जिससे लगा हो कि यह बंदा लड़कियों के मामलें में कुछ कमजोर किस्म का है। 
सीन 2 : उस दिन लगा कि मैं अमय से प्या‍र करने लगी हूं 

मेरी सिंगल लाइफ में फेसबुक के कारण थोड़ा रोमांटिक टिवस्ट‍ आ गया था और यह बात मुझे उस वक्त समझ में आई जब अमय से वन वीक मेरी बातचीत नहीं हो पाई। मैं उन सात दिनों में उसे बहुत मिस करने लगी थी और यह एक ऐसी बात थी, जिसने मुझे लगभग बैचेन कर दिया था। पहले तो लगा कि इंटरनेट की लत के कारण ऐसा हो रहा है, लेकिन दिमाग की घंटी बजी और दिल ने कहा मैडम आप इंटरनेट पर तो रोज ही आ रही है लोगों से बात करती है, दोस्तों की पोस्ट लाइक करती है....ऐसे में अगर आप उसे मिस कर रही हैं तो इसमें इंटरनेट का नहीं, बल्कि आपके दिल में अमय के लिए प्यार भरे जज्बात का होना है।  दिमाग में चल रहे सवाल का समाधान खोजने में लगी थी कि अगले ही पल मैनें लेपटॉप ऑन किया और अमय की फेसबुक फ्रोफाइल देखना शुरू किया और  मुझे ये तो पता था कि बंदा दिल्ली का है और एक एमएनसी में काम करता है, लेकिन आज यह देखकर दिल खुश हो गया कि जनाब ने अपना नंबर भी फेसबुक पर अपडेट किया हुआ है। मैं सोच में पढ़ गई अमय से तीन माह से बात कर रही हूं पहले भी  उसका प्रोफाइल देखा है, लेकिन जनाब ने इससे पहले तो कभी अपना नंबर यहां शेयर नहीं किया था पिछले एक सप्ताह से बात भी नहीं हुई कहीं अमय मुझसे किसी बात पर नाराज तो नहीं जो फेसबुक पर आए, नंबर अपडेट किया और अन्य दोस्तों  से कुछ बात की हो और मुझे इग्नोर कर दिया हो। या कहीं ऐसा तो नहीं कि वह ऑनलाइन रहा हो और मैं ही उस वक्त एफबी पर नहीं रही हूं। फिर दिल ने कहा यार अगर ऐसा होता तो कम से कम कोई मेसैज तो देता । ये बातें सोचते-सोचते मेरा ब्लड प्रेशर कुछ बढ़ गया था और मैं पेरशान हो चुकी थी। मुझे उस दिन पहली बार लगा कि मैं इसे इतना मिस कर रहीं हूं कहीं ये प्यार तो नहीं ?
सीन 3 : कुछ ऐसे हुई मोबाइल पर पहली बार बात 

रात को खाना खाने के बाद छत पर टहलते हुए मेरे मन में वही सवाल चल रहे थे, फोन पर कई बार एफबी का एकाउंट चेक कर चुकी थी कोई नया मैसेज नहीं था। हां, कुछ दोस्तों ने मेरी आज की एक तस्वीर फेसबुक पर देखकर ये जरूर अनुमान लगा लिया था कि मैं आज कुछ अफसेट हूं, मैं हैरान थी तो क्या इसका मतलब फेसबुक पर फोटो में देखकर लोग हाले दिल भी पता कर लेंगे। तभी मन में विचार आया कि अमय को कॉल किया जाए बंदा है तो दिल्ली का ही एक बार बात करके देखते हैं, सब ठीक तो है ना  और कुछ देर बाद मेरे फोन पर एक मधुर आवाज आई और वह अमय की थी, मेरे हैलो का जवाब में उसने कहा मैडम " क्या जान सकता हूं कि आप कौन बोल रही है ?" मैनें कहा "जी सरकार आप जान सकते नहीं, आप तो हमें जानते ही हैं बस आप हमें पहचानते नहीं है, फिर जानबूझकर टाल रहे हैं ?"

 "जी नहीं ऐसी बात नहीं, कहीं आप पिहू तो नहीं हो ?" 

"ना जी सरकार आपका जवाब गलत है" 

"ओह तो आप शायद पूजा जी हो" 

इस बार मैं हंस पड़ी "तो क्या आपका जवाब लॉक कर दिया जाए? सोच लो गलत निकला तो हर्जाना देना पड़ सकता है ?" 

मेरी इस बात पर उसने कहा "ओह तो आप स्वीटी बोल रही हो ।" 

इस बार मैनें चुटकी लेते हुए कहा "कमाल करते हो अमय कितनी गर्लफ्रेंड है यार तुम्हारी कभी इन नामों का जिक्र नहीं किया और हमें तो आप भूल ही गए यार... मैं रिया बोल रही हू,..आपकी फेसबुक दोस्त काफी दिनों से बात नहीं हुई थी सो फेसबुक पर आपका नंबर मिल गया तो कॉल कर लिया ?"

"ओह ग्रेट....तो ये आप है मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा और पिहू मेरी कजिन है कभी-कभी ऐसे मजाक वो करती रहती है। स्वीटी और पूजा मेरे ऑफिस में काम करती है कई दिनों से ऑफिस जाना नहीं हो पाया था, इसलिए लगा कि हो ना हो वहीं दोनों टांग खिचाई कर रहीं हो ।"

 मैंने फिर थोड़ा सा फन करते हुए "अच्छा जी तो ये टांग खिचाई के कारण ही जनाब वन वीक से नहीं आ रहे थे, लड़कियों के साथ टांग खिचाई का खेल खेलना अच्छी बात नहीं अमय।" 

"अरे नहीं रिचा ऐसी बात नहीं  आप मजाक अच्छा कर लेती हो। दरअसल, मैं इन दिनो इंटरनेट पर अधिक रहने लगा था, इसलिए एक दिन मॉम ने नाराज होकर मेरा लेपटॉप और मोबाइल का इंटरनेट कनेक्शन 10 दिन के लिए बंद रखने का फरमान दे दिया था सो मैं मां की बात टाल नहीं सका ...."

 अमय की बात सुनकर मैं हैरान रह गई और बोल पड़ी "तो आप मॅाम बॅाय हो .... सो स्वीट यार पर 10 दिन इंटरनेट से दूर रहने में आपको बेचैनी महसूस नहीं होती ।" "होती है यार... पर मां से बड़ा कोई और होता है क्‍या ? खैर इसके बाद अमय के साथ मेरी लंबी बातचीत हुई और मैंने उससे अगले दिन गुड़गांव के मॉल में मिलने के लिए यहकर बुला लिया कि "यार इतने दिन बात करते हुए हो गए एक मुलाकात हो जाए वीकएंड पर ।" मेरी इस बात पर सहमति जताते हुए वह शाम 5 बजे  मॉल में मिलने के लिए तैयार हो गया । 
सीन 4 : पहली मुलाकात में अमय तो मा दा लाडला ?

अमय से मिलने के लिए मैं बेहद उत्सुक थी सो उस दिन अपनी सबसे प्‍यारी नई ड्रेस पहनी और आज बहुत दिन बाद मैं ब्यूटी पार्लर भी गई थी।  6 बजे अमय से मुलाकात हुई जनाब  जींस  पेंट और ब्लैक शर्ट में आए थे, बंदा हैंडसम लग रहा था और हाय हैलो के बाद हम फूड कार्नर की तरफ बढ़ चले थे। इस दौरान मैनें नोट किया कि 10 मिनट में अमय तीन बार अपनी मम्मी का कॉल रिसीव कर चुका था और इस बात की सूचना दे चुका था कि मैं ठीक-ठाक हूं और सही टाइम पर मॉल में सकुशल पहुच चुका हूं । मैनें अमय से पूछा "तो क्या आपकी मां यह जानती है कि आप यहां आए हैं?" वह बोला "हां यार, मैं मां से पूछे बिना कोई काम नहीं करता है वह मेरी बहुत चिंता करती है।" मैनें अगला सवाल किया कि तो क्या वह जानती है कि तुम यहां क्यों  आए हो । वह बोला "हां रिया मैनें उनको बता दिया था कि मैं यहां तुम से मिलने ही आ रहा हू ।" मैं हैरान थी कोई लड़का हर एक बात अपनी मम्मी से शेयर करता है या पूछकर करता है। इतना तो लड़किया भी नहीं सोचती आजकल ।

 कुछ देर हम बात करते रहे कि तभी अमय ने कहा "एक मिनट मां फोन पर है मैं अभी बात करके आता हूं .... मैं ओके कहकर मैन्यू  देखने लगी और अपनी पसंद का खाना आर्डर करने ही वाली थी कि अमय आया और बोला "सॉरी वो मां आपके बारे में पूछ रही थी सो वही बताने लगा था ।" मैनें आश्चमर्य में पढ़ते हुए पूछा "क्या बताया फिर तुमने'.... 'अरे कुछ नहीं यहीं की आप किस तरह की ड्रेस पहनती है,  ड्रिंक करना आपको पसंद नहीं और हां मां ने खाने के लिए जरूरी टिप्स भी दिया ।" मैं उसकी बात सुनकर हिल पडी और मैनें कहा "यार अमय ये किसने कह दिया कि मैं ड्रिंक नहीं करती और रही बात पहनने की तो यार मैं तो हर तरह के कपड़े पहनना पसंद करती हूं यहां तक कि शार्ट -स्कर्ट भी इसमें बुराई क्या है। अच्छा  ये बताओं खाने में क्या आर्डर करना है वैसे एक बात बता दू तुम्हारा ये सोचना गलत है कि मैं नॉनवेज नहीं खाती"  इस पर अमय बोला "वो आपकी फेसबुक प्रोफाइल पर देखा था इसलिए मां को बोल दिया वो क्या है ना मेरी मम्मी पूजा पाठ बहुत करती हैं इसलिए नॉनवेज से हमें दूर रहने को कहती है। रही बात फूड की तो मेरे लिए सिंपल दही और चपाती का आर्डर कर दो और आप अपनी पसंद के अनुसार कुछ भी ले लो। ड्रिंक और नॉनवेज नो प्लीज ।"  मैनें ओके कहा और अपने लिए सिंपल थाली का आर्डर कर  दिया। खाना खाते समय तीन बार उसकी मां का फोन आया और वहीं सब इधर उधर की बातें साथ ही शाम 9 बजे तक घर आने की हिदायत अमय को मिल चुकी थी ।

कुछ देर मॉल में हम साथ घूमते रहे और इस बीच मैनें पूछा "अमय मां के करीब होना अच्छी बात है, लेकिन क्या सचमुच तुम नॉनवेज या फिर कभी ड्रिंक करना पसंद नहीं करते ।" अमय बोला ऐसा नहीं मैं नॉनवेज पसंद करता हूं, लेकिन जब से मां को पता चला, डांट पड़ी है तब से सब बंद ।" साथ ही उसने बताया कि सच तो यह है कि वह मां से दूर या उनकी कही बात कभी टाल नहीं पाता। तभी एक बार फिर उसके मोबाइल की रिंग बज उठी और इस बार भी उसकी मां ही फोन पर थी। कुछ देर बात करने के बाद अमय ने बताया कि "मां का कहना है कि 8 बजकर 25 मिनट हो गए हैं और मुझे 9 बजे तक हर हाल में घर पहुंच जाना चाहिए सो अब हमें चलना चाहिए ।' मैं कहना चाहती थी कि साथ में कोई फिल्म देख लेते हैं, लेकिन जनाब की मां का फरमान सुनकर मैंने अपने दिल की बात को टालना ही मुनासिब समझा और हम दोनों ने एक-दूसरे को अलविदा कहकर अपने-अपने रास्ते निकल पड़े 


सीन 5 :  हमनें अपने दिल को कुछ यूं समझाया 

घर पहुचकर मेरे माइंड में जो सबसे बड़ा सवाल उठा कि क्या ऐसे लड़के के साथ मैं जिंदगी गुजारना पसंद करूंगी जो हर एक बात में अपनी मां की सलाह लेता हो ? मान लो मैं ऐसा करती हूं तो क्या बाद में उसकी मां से मेरी छोटी-छोटी बातों पर नोक-झोंक नहीं होगी ? ऐसा सोचना ही था कि मुझे एकता कपूर के सास - बहू वाले नाटक याद आ गए, जिनको देखने के बाद मैं सोचती थी क्या ऐसे भी बहुए अपनी सास से लड़ती होंगी? तभी खुद ही जवाब अपने आप मिल गया। हां, रिया अगर अमय जैसे पति हो जो बीवी की बात ना मानकर केवल अपनी मां की बात मानकर चले तो कोई भी बहू होगी सास से तो लड़ ही जाएगी और उसके बाद क्या होगा ? वहीं अमय अपनी मां का पक्ष लेते हुए अपनी वाइफ को ही सुनाएगा । मैं इस विचार को सोचकर ही डर गई मन को यह समझाने की कोशिश की। यार थोड़ा बहुत तो हर कोई मां के करीब रहता है, लेकिन अमय के साथ प्यार में पढ़ने और उसे जीवनसाथी के रूप में चुनने का प्लान मैंने कैंसिल कर दिया। हैंडसम और अच्छी‍ जॉब करने वाला बंदा सिर्फ इसलिए मिस कर दिया क्यों कि जनाब के अपने कोई विचार थे ही नहीं वो जो कुछ भी करते थे सब अपनी मां से पूछकर।

 



Wednesday, 18 September 2013

सबसे भयानक MASS SUICIDES, जब हजारों ने एक साथ पी लिया ज़हर

 
आत्महत्या यानी जानबूझकर खुद की हत्या करना। आज के समय में इसे निंदनीय माना जाता है, लेकिन प्राचीन समय में ऐसा नहीं था। आज से कई सौ साल पहले आत्महत्या को सम्मान्य समझा जाता था। भारत की सतीप्रथा इस बात का सबूत है। मोक्ष जैसी धार्मिक भावनाओं से प्रभावित होकर भी कई लोग आत्महत्या करते थे, लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। दुनिया के ज़्यादातर देशों में आत्महत्या को गंभीर अपराध माना जाता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या के प्रयास को गंभीर अपराध माना गया है और पकड़े जाने पर सजा का प्रावधान भी है। दूसरे देशों में भी इससे जुड़े सख्त कानून हैं। इतिहास में झांकने पर सामूहिक आत्महत्या के भी कई मामले मालूम चलते हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों में घटित इन दुखद घटनाओं में हजारों लोगों ने खुद की जीवनलीला खत्म कर ली। पिछले कुछ सालों में घटित सामूहिक आत्महत्या की घटनाओं में ज्यादातर का कारण धार्मिक भावनाएं थीं। धार्मिक रीति-रिवाजों और प्रवर्तकों के प्रभाव में आकर हजारों लोग आत्महत्या कर चुके हैं।

जिम जोन्स के नेतृत्व में 1970 के अंत तक एक ऐसे समुदाय की खोज हुई जो दुनिया से अलग दक्षिण अमेरिका के एक जंगल जॉन्सटाउन में रहते थे। सन् 1978 में अमेरिकी कांग्रेस के लियो रयान ने इनके बारे में तथ्यों का पता लगाने के लिए जॉन्सटाउन का दौरा किया। वहां से लौटते वक्त जॉन्सटाउन के 18 लोग जो उस समुदाय से निकलना चाहते थे, उनके साथ वापस जाने की कोशिश करने लगे। इन 18 लोगों के इस कदम से वहां हिंसा भड़क गई। समुदाय के लोगों ने उन पर गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में एक कांग्रेसी रयान और  तीन पत्रकार समेत एक व्यक्ति भी मारा गया जो वहां से निकलना चाहता था। 11 लोग जख्मी भी हुए। घटना के कुछ ही घंटों के बाद इस समुदाय के नेता ने समुदाय के सभी लोगों को पोटेशियम साइनाइड पीकर सामूहिक आत्महत्या करने का आदेश दिया। नेता के आदेश पर पहले छोटे बच्चों को पोटेशियम साइनाइड पिलाकर मार दिया गया। इस सामूहिक आत्महत्या में बच्चों सहित नौ सौ से अधिक लोगों के जीवन का अंत हो गया।

वर्जिन मैरी के एक कथित आदेश के बाद 1980 में भविष्य बताने वाले कैथोलिक शाखा MRTC  की स्थापना हुई। इस शाखा ने यह घोषणा की थी कि एक निश्चित दिन दुनिया का अंत हो जाएगा। इस संप्रदाय के सदस्य झूठी गवाही से बचने के लिए इशारों में बातें करते थे। वे व्यभिचार से बचने के लिए सेक्स से परहेज करते थे और सप्ताह में दो दिन का उपवास भी करते थे। जैसे-जैसे वह दिन नजदीक आता गया, वैसे-वैसे वहां के लोगों की उत्सुकता बढती गई। उन्होंने खेतों में काम करना बंद कर दिया। हालांकि, यह भविष्यवाणी झूठी साबित हुई। इसके बाद लोगों ने अपने नेताओं से भविष्यवाणियों की प्रामाणिकता को लेकर सवाल करने शुरू कर दिए। तभी फिर 17 मार्च को प्रलय के दिन की घोषणा की गई और सभी 1000 अनुयायियों को मोक्ष प्राप्ति का जश्न मनाने के लिए आमंत्रित किया गया। इनमें बच्चे और वयस्क भी शामिल थे। जोसफ किब्वेतीरे, जोसफ कसपुरारी, जॉन कामगार, डोमिनिक कतारिबबो और क्रेडोनिया म्वेरिंदेवो वे पांच नेता थे, जिनके आदेश पर ये सब हुआ। सभी इस बात से वाकिफ थे कि यह आत्मघात के समान होगा। टेक्सास में एक पहाड़ी के शिखर से फ्लोरेंस के एक चर्च के सदस्य हाउटेफ द्वारा यीशु के दूसरे अवतार की घोषणा की गई। इस घोषणा के उपरांत 1959 में सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट चर्च रोम मत का विरोध करने वाले एक संप्रदाय का जन्म हुआ। इस भविष्यवाणी की विफलता के बाद ऐसे बहुत से लोगों ने अपने-आप को भविष्य बताने वाला बताया। उनमें से एक वरनन हॉवेल ने उस संप्रदाय को अपने विश्वास मत में लेने की कोशिश की। उसने बताया कि वही आधिकारिक तौर पर यीशु के दायित्वों को संभालने का हकदार है।

1994 में एटीएफ को उसके खिलाफ गैरकानूनी हथियार रखने और बच्चों को प्रताड़ित करने के बारे में पता लगाने का हुक्म मिला, लेकिन एटीएफ के आक्रामक रवैये के कारण उन्हें कई प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ा। कई दिनों तक चली लड़ाई के बाद एफबीआई ने बड़ी संख्या में लोगों को आत्महत्या से बचाने के लिए अनुयायियों को घेरने की कोशिश की। हालांकि, परिसर के भीतर सामूहिक आत्मदाह के लिए आग जला दी गई थी। इस आग में 80 लोगों ने अपनी जान गंवा दी। ये सामूहिक आत्महत्या थी या एफबीआई द्वारा किया गया सफाया, आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।

एक भटका हुआ संप्रदाय उस समय सुर्खियों में आया, जब 1997 में काले रंग की टी-शर्ट और जूते पहने हुए 39 लोगों ने उत्तरी सैन डिएगो में सामूहिक आत्महत्या कर ली। मरने वालों की आयु 26 से 72 वर्ष के बीच थी। उन्होंने आत्महत्या इस विश्वास से किया कि एक धूमकेतु पृथ्वी को पार कर रहा है, जो एक उच्च स्तर पर बदलाव के द्वारा सब कुछ नष्ट कर देगा।

धार्मिक अनुष्ठान से प्रेरित होकर किये जाने वाले आत्मदाह हमेशा अलौकिक प्रसाद या मोक्ष प्राप्ति जुड़े नहीं रहे हैं, जैसा कि वर्तमान समय में पाया गया है। साठ के दशक में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा अनुष्ठानिक आत्महत्या वियतनाम युद्ध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का संकेत थी। 1963 में थिक क्वांग डुक नाम का व्यक्ति निडर होकर दक्षिण वियतनाम के प्रशासन द्वारा बौद्धों के उत्पीड़न के विरोध में एक व्यस्त साइगॉन सड़क पर खुद को जला लिया। ऐसा करने पर बौद्ध समुदायों द्वारा एक बोधिसत्व को सम्मानित किया। इसके बावजूद, सरकार ने थिक क्वांग डुक की तरह आत्मदाह प्रदर्शन करने वाले बौद्ध भिक्षुओं को दंडित किया गया। बहरहाल, बौद्ध धर्म में खुद को नुकसान पहुंचाना गुनाह माना गया है। वहीं, बौद्ध भिक्षुओं द्वारा आत्मदाह एक नि:स्वार्थ कार्रवाई के रूप में धर्म के प्रकाश को फैलाने और लोगों की आंखें खोलने के लिए सही बताया गया।

1906 में बाली में एक अनुष्ठानिक सामूहिक आत्महत्या की गई जिसे पुपुतान के नाम से जाना गया। यह आत्मदाह सिर्फ इसलिए किया गया, क्योंकि इसे करने वाले लोग डच आक्रमणकारियों के अधीन नहीं होना चाहते थे। डच सेनापति ने दो आदेश दिए। उसने कहा कि सभी कीमती वस्तुओं को जला दिया जाये और एक मार्च निकाला जाये, जिसमें जवान व्यक्तियों, उनकी पत्नियों, बच्चों से लेकर बौद्ध भिक्षु सभी शामिल हों। डच रेजिमेंट के साथ आमना-सामना होते ही प्रधान पुजारी ने पुपुतान के राजा के कलेजे को चाकू से छलनी कर दिया। इसके बाद दोनों समूहों ने आपस में मार-काट उस समय तक जारी रखा, जब तक महिलाओं ने सेना को अपने गहने देने शुरू नहीं किए। उस दिन दोपहर तक इस भिड़ंत में बाली के 1000 से अधिक लोगों ने आत्महत्याएं की। अब डच आक्रमणकारियों के लिए ज्यादा कुछ करने को बचा नहीं था। आज बच्चों को पुपुतान के बारे में पढाया जाता है और उस दिन की याद में उत्सव मनाया जाता है।

कनाडा से संचालित होने वाला एक ऐसा गुप्त समाज है, जो यह मानता है कि अभी भी टमप्लर के सैनिक मौजूद हैं। यह समाज स्विट्ज़रलैंड में स्थित है। उनका उद्देश्य ईसाई और इस्लामी धर्मों को एकजुट करना था। वो पूरे विश्व में यीशु के दूसरे उत्तराधिकारी के आने को लेकर एक मत तैयार करना चाहते थे। उस समय उनके द्वारा किये गए कार्य नए युग के दर्शन से पूरी तरह मेल खाते हैं। कई सालों तक होने वाली आत्महत्याएं और मौतें एक विशेष संप्रदाय से संबंधित हैं। यहां तक कि 1994 में एक तीन महीने के बच्चे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसकी पहचान ईसा के विरोधी के रूप की गई थी। उसी वर्ष अक्टूबर में 48 वयस्कों और बच्चों को मृत पाया गया। इनके सर में गोली मारी गई थी। सामूहिक आत्महत्या के शिकार हुए इन लोगों के शव स्विट्ज़रलैंड में स्थित भूमिगत उपासना मंदिर से प्राप्त हुए थे। उस मंदिर के तल में जितने भी शव मिले, उन सभी को टमप्लर प्रतीकों की वस्तुओं के साथ एक लाइन में खड़ा किया गया था।

एकलव्य ने अंगूठा दिया था दान, वंशज आज भी निभा रहे 'वचन'!

महाभारत का यह प्रसंग पूरे विश्व में गुरु-शिष्य संबंध का एक अनुपम उदाहरण है। प्रिय शिष्य अर्जुन का कोई प्रतिद्वंदी न हो जाए, यह सोचकर द्रोणाचार्य ने तथाकथित निम्न जाति के शिष्य एकलव्य से गुरुदक्षिणा के बहाने उसका अंगूठा मांग लिया था। गुरु द्रोण की योजना थी कि अंगूठा न होने से एकलव्य कभी बाण नहीं चला पाएगा। पर शिष्य भी कितना महान था कि झट किसी बात की परवाह किए बिना अपना अंगूठा काटकर गुरु को दे दिया। आज उसकी गुरुभक्ति की मिसाल दी जाती है।

भारतवर्ष के सुदूर पूर्वोत्तर राज्य मेघालय की जनजाति आज भी तीरंदाजी में प्रवीण मानी जाती है लेकिन तीरंदाजी करते समय यह अंगूठे का प्रयोग नहीं करती। इनमें से बहुतों ने एकलव्य का नाम भी नहीं सुना है। लेकिन इतना जानते हैं कि उनके किसी पुरखे ने अपना दाहिना अंगूठा गुरुदक्षिणा में दे दिया था, इसलिए तीर चलाते समय अंगूठे का उपयोग नहीं करना चाहिए।मेघालय में खासी जयंतिया जनजाति की आबादी करीब 12 लाख है। यह क्षेत्र उनकी संस्कृति और लोक परम्परा से समृद्ध है। भैंस के सींगों, बांसुरी और मृदंगों से निकली स्वर लहरियों के साथ नृत्य और मदिरापान यहां के सामाजिक समारोहों व धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग है।इन जनजातियों में विवाह संबंध अपने कुल-गोत्र के बाहर होते हैं। पर 19वीं सदी के मध्य में ईसाइयत के आगमन अनेक जनजातीय और सामुदायिक संस्थाओं को क्षति पहुंची है।

यहां पर कुल जनसंख्या का लगभग 85 प्रतिशत जनजातीय आबादी है। मेघालय देश के उन तीन राज्यों में से एक है जहां पर ईसाई बहुमत है। अन्य दो राज्य- नागालैंड और मिजोरम भी भारत के उत्तर पूर्व में ही स्थित हैं।खासी जयंतिया के अलावा यहां की अन्य कई जनजातीयों में संपत्ति का उत्तराधिकार और जनजातिय शासन का उत्तराधिकार, दोनों मातृवंश के आधार पर होते हैं और मां से सबसे छोटी बेटी को मिलते हैं।हालांकि शासन और संपत्ति का प्रबंधन इन महिलाओं द्वारा चुने गए पुरूषों के हाथ में होता है।
कुछ हद तक अलगाव के कारण जयंतिया लोग अपनी मातृसत्तात्मक संस्कृति को बचाए रखने में काफी हद तक सफल रहे हैं। वे अब भी झूम पद्धति से खेती करते हैं और आलू यहां की मुख्य फसल है।

Thursday, 5 September 2013

आखिर नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों जलाया गया था

आखिर नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों जलाया गया था


अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन दुनिया का संभवत: पहला विश्वविद्यालय था, जहां न सिर्फ देश के, बल्कि विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने 450-470 ई. के बीच की थी। पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में स्थापित इस विश्वविद्यालय में तब 12 हजार छात्र और 2000 शिक्षक हुआ करते थे।

गुप्तवंश के पतन के बाद भी सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। लेकिन एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव के तुर्क लुटेरे ने नालंदा विश्वविद्यालय को जला कर इसके अस्तित्व को पूर्णत: नष्ट कर दिया।

यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। इस विश्वविद्यालय में विभिन्न धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। इस विश्वविद्यालय की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा की गई थी। इस महान विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके वैभव का अहसास करा देते हैं। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में अपने जीवन का एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में यहां व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था।
यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब 10,000 एवं अध्यापकों की संख्या 2000 थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था, 10,000 विद्यार्थी और 1510 आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति रही थी।
नालंदा विश्वविद्यालय को एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाले तुर्क लुटेरे बख्तियार खिलजी ने 1199 ई. में जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया। उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था।
ऐसा कहा जाता है कि बख्तियार खिलजी एक बार बहुत बीमार पड़ गया। उसके हकीमों ने उसे ठीक करने की पूरी कोशिश की, मगर वह स्वस्थ नहीं हो सका। किसी ने उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र से इलाज कराने की सलाह दी। उसे यह सलाह पसंद नहीं आई। उसने सोचा कि कोई भारतीय वैद्य उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान कैसे रख सकता है और वह किसी काफ़िर से अपना इलाज क्यों करवाए। फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा।

जब वैद्यराज इलाज करने पहुंचे तो उसने उनके सामने शर्त रखी कि वह उनके द्वारा दी कोई दवा नहीं खाएगा, लेकिन किसी भी तरह वह ठीक करे, वर्ना मरने के लिए तैयार रहे। बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई, बहुत उपाय सोचा और अगले दिन उस सनकी बख्तियार खिलजी के पास कुरान लेकर चले गए। उन्होंने कहा कि इस कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढ़ लीजिये, आप ठीक हो जाएंगे!
वैद्यराज के कहे अनुसार, उसने कुरान पढ़ा और ठीक हो गया। लेकिन ठीक होने पर खुश होने की जगह उसे बड़ी झुंझलाहट हुई और गुस्सा आया कि उसके हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है?

बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने  व वैद्य को पुरस्कार देने के बदले बख्न्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया। उसने पुस्तकालयों को भी जला कर राख कर दिया। वहां इतनी पुस्तकें थी कि आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू-धू करके जलती रहीं। यही नहीं, उसने अनेक धर्माचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला।
बता दें कि नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी। अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध आचरण और संघ के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक था।

इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के आचार्य थे। ये श्रेणियां योग्यतानुसार बनाई गई थीं। नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और स्थिरमति प्रमुख थे। 7वीं सदी में ह्वेनसांग के समय इस विश्वविद्यालय के प्रमुख शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक और विद्वान थे। एक प्राचीन श्लोक से ज्ञात होता है कि प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट्ट भी इस विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। उनके लिखे जिन तीन ग्रंथों की जानकारी उपलब्ध है, वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। विद्वान बताते हैं कि उनका एक अन्य ग्रंथ आर्यभट्ट सिद्धांत था। इसके आज मात्र 34 श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ का 7वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था।

13वीं सदी तक इस विश्वविद्यालय का पूर्णतः अवसान हो गया। मुस्लिम इतिहासकार मिनहाज और तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के वृत्तांतों से पता चलता है कि इस विश्वविद्यालय को तुर्कों के आक्रमणों से बड़ी क्षति पहुंची। तारानाथ के अनुसार तीर्थिकों और भिक्षुओं के आपसी झगड़ों से भी इस विश्वविद्यालय की गरिमा को भारी नुकसान पहुंचा। इसपर पहला आघात हुण शासक मिहिरकुल द्वारा किया गया। 1199 में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।


                                                RAJNISH BABA MEHTA
                                                       FILMMAKER

Sunday, 25 August 2013

माशूका अनारकली की जिंदगी की आखिरी रात की सच्चाई!




इतिहास के कई काल खंडों में एक से बढ़कर एक कहानियां बिखरी हैं, जिनकी हकीकत को बयां करने के लिए भले ही कितने भी सबूत क्यों न मौजूद हों, कम ही पड़ जाते हैं। कुछ ऐसा ही वाकया पेश आता है मुगलिया दौर के नायक-नायिकाओं और उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं को लेकर भी। सलीम-अनारकली के प्रेम प्रसंग को ही लें।

कितना कुछ जानते हैं हम उनके अमर प्रेम के बारे में, फिर वो चाहें किस्से-कहानियां हों, किताबें हों या फिर कोई नाटक या फिल्में, जिनमें हमेशा से ही इनके सच्चे प्यार को जगह मिलती रही है। इन दोनों के प्यार के बारे में कौन नहीं जानता। पर आज इस स्पेशल स्टोरी को पढ़िए और जानिए क्या थी एक मरती हुई माशूका की आखिरी हसरत?


अनारकली और शहजादा सलीम का प्रेम प्रसंग जगजाहिर है। दोनों एक दूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे। मुहब्बत के नशे में चूर इस जोड़े को इस बात का इल्म न था कि उनकी प्रेम कहानी का इतना मार्मिक हश्र होगा। इस जोड़े ने साथ मिलकर प्यार के कई इम्तहान तो पास किए, मगर आखिरकार दुनिया के दस्तूर के आगे इस जोड़े को भी झुकना पड़ा। और तो औऱ, इनके प्यार को अगर सबसे ज्यादा किसी को ऐतराज था तो वे थे शहंशाह अकबर। वो नहीं चाहते थे कि शहजादा सलीम, जिसे आगे चलकर बादशाह बनना था, वो किसी कनीज के प्यार में इस कदर डूब जाए कि वो अपने होश-हवास खो बैठे।
अकबर का ऐतराज इस बात पर भी था कि अगर सलीम ने अनारकली से शादी कर ली तो अनारकली को मल्लिका-ए-हिंदोस्तां की उपाधि दी जाएगी। यह उनकी हुकूमत के लिए काफी शर्मसार करने वाला क्षण होगा। इस बात को मद्देनजर रखते हुए शहंशाह अकबर ने शहजादा सलीम को कई बार चेताया, समझाया और यहां तक कि बेदखल करने की धमकी भी दी, मगर मुहब्बत के इस परवाने पर कोई असर न हुआ।

आखिरकार, अकबर की ज्यादतियों से तंग आकर सलीम ने अपने ही पिता के खिलाफ बगावत कर दी। 
सलीम को जंग में शिकस्त का सामना करना पड़ा और बादशाह अकबर ने सलीम के आगे यह शर्त रखी की या तो वह अनारकली को उनके हवाले कर दे या फिर मौत के लिए तैयार रहे। सलीम ने अनारकली को सौंपने के बजाए मौत का दामन थामने का निर्णय किया। मगर ऐन वक्त पर अनारकली ने बादशाह अकबर के आगे समर्पण कर दिया।
बादशाह अकबर नहीं चाहते थे कि एक अदनी-सी कनीज सलीम से शादी कर मल्लिका-ए-हिंदोस्तां बने। इसलिए उन्होंने पहले भी सलीम और अनारकली को चेताया था कि वे इस मुहब्बत को भूल जाएं। मगर ये हो न सका। सलीम के लिए अनारकली की चाहत बढ़ती ही चली गई। इस बात से बेखबर कि आने वाले वक्त में उसकी मुहब्बत के लिए बहुत भारी होने वाला है। वह तो बस शहजादे की मुहब्बत में गिरफ्तार रही। अकबर को यह सब बर्दाश्त न हुआ और उन्होंने अनारकली को बंधक बना कर तहखाने में कैद कर लिया।
जब सलीम को इस बात का पता चला तो उन्होंने अनारकली को तहखाने की कैद से छुड़ा कर अपने ही पिता के खिलाफ अपने साथियों को लेकर बगावत का ऐलान किया। पर वे सफल न हो सके। अकबर ने अब तक फैसला कर लिया था कि अनारकली को अब हर हाल में मरना ही होगा। जब अनारकली ने बादशाह के आगे समर्पण किया, तब अकबर ने उसे गिरफ्तार करवा कर मौत की सजा मुकर्रर कर दी। 

अनारकली से जब उसकी आखिरी ख्वाहिश पूछी गई तो उसने अपने दिल की हसरत जाहिर की। मौत से पहले बस एक आखिरी रात अपने आशिक शहजादा सलीम के साथ गुजारने का मौका दिया जाए। अनारकली को मालूम था कि उसके पास कोई रास्ता नहीं है, फिर भी बादशाह अकबर ने उसे एक बार फिर जिंदगी जीने का मौका देते हुए कहा कि तुम चाहो तो जिंदगी मांग सकती हो। सच्ची मुहब्बत की गिरफ्त में कैद अनारकली ने मांगी तो मांगी केवल एक ही चीज और कहा कि अगर हो सके तो वह अपनी मुहब्बत शहजादा सलीम की बांहों में मरना चाहती है।
ऐसा न भी हो सके तो बस एक बार उसे एक दिन शहजादा सलीम के साथ बिताने दिया जाए, ताकि वह जीवन भर की अपनी यादों को अपने प्रियतम के साथ समेट सके। कुछ वक्त साथ बिता सके। मुहब्बत के जाम पी सके और फिर इन्हीं सुनहरे यादों के सहारे वो मौत को गले लगा लेगी। 
बादशाह अकबर इस बात के लिए राजी हो गए। मगर शर्त वही थी कि अगर इस बात का पता शहजादा सलीम को चला तो न वो बचेगी और न ही सलीम। अपने प्रेमी की जिंदगी बचाने के लिए अनारकली ने हंसते हुए फैसला कर लिया कि उसे क्या करना है। उसने अपने प्रेमी के जीवन की खातिर सुनहरी यादों के साथ मौत को गले लगाना ही बेहतर समझा। 
अनारकली ने फिर अपने जीवन का आखिरी दिन सलीम के साथ बिताया। दोनों ने प्रेम की गहराइयों में गोते लगाते हुए एक-दूसरे के आगोश में दिन काट दिया। बीतते वक्त के साथ अनारकली के वादे का समय हो रहा था। फिर उसने शहजादा को जाम पिला कर मदहोश कर दिया। 
मदहोशी की हालत में शहजादे को छोड़कर अनारकली ने अकबर के आगे समर्पण कर दिया। शाही फैसले के अनुसार उसे जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया। एक कहानी यह भी कहती है कि अकबर ने उसे जीवन दान दे दिया और सजा के बाद उसे तत्काल गुप्त सुरंगों के रास्ते मुगलिया सल्तनत के बाहर भेज दिया गया, जिसके बाद कभी उसका पता नहीं चल पाया।
खैर, सच्चाई जो भी हो इस बात को कोई नहीं झुठला सकता कि अनारकली के इस कदम ने उसे मुहब्बत के सच्चे पैरोकारों के तौर पर हमेशा के लिए अमर कर दिया। 
अनारकली का वास्तविक नाम नादिरा था। उसको यह नाम सलीम ने दिया था। अनारकली का जन्म लाहौर में16वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में हुआ था। वह बला की खूबसूरत थी और शहजादा सलीम अय्याश।
अकबर को जब यह बात पता चली तब उन्होंने सलीम को 14 साल के लिए सेना में रहकर सैनिक अनुशासन सीखने का हुक्म दिया। सलीम जब 14 साल बाद लौटकर लाहौर आया, तब उसके जश्न में अनारकली का मुजरा पेश किया गया। सलीम पहली ही नजर में अनारकली को दिल दे बैठा। अनारकली का दिल भी शहजादे के लिए धड़क उठा।

इसके बाद दोनों प्यार के समंदर में गोते लगाते रहे, पर उन्हें इस बात का इल्म न था कि उनके प्यार का हश्र कुछ इस तरह का होगा।

अनारकली को लाहौर में जिस जगह चुनवाया गया था, वहां आज अनारकली मार्केट है, जो पाकिस्तान के सबसे बड़े मार्केट में से एक है। 

    क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता