Thursday, 19 December 2019

फांसी से पहले रामप्रसाद बिस्मिल मां से मिलकर रोने लगे थे । - कहानीबाज




9 अगस्त 1925 को गुलाम हिंदुस्तान के लखनऊ से करीब कुछ ही दूरी पर काकोरी कांड की घटना ने बिरतानिया हुकूमत की नींव हिला दी थी। 19 दिसंबर 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जिला जेल, अशफाक उल्लाह खान को फैजाबाद जिला जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद के मलाका जेल में फांसी दी गई थी। आजादी के मतवालों ने अपनी शहादत देकर आने वाले आजाद हिंदुस्तान की नींव का निर्माण कर दिया था। लेकिन कुछ किस्सा इतना दिलचस्प है जिसे सुनकर आज भी शरीर सिहरन से भर उठता है। इन्हीं किस्सों के पुलिंदों में एक किस्सा है रामप्रसाद बिस्मिल का, जो फांसी के कुछ वक्त पहले की घटना है। 

फांसी से पहले रामप्रसाद बिस्मिल की मां बिस्मिल से आखिरी बार मिलने जेल पहुंची। लकड़ी के टूटे बेंच पर हाथों में खाने की पोटली लिए मां के घंटों इंतजार के बाद उनके सामने जंजीरों में जकड़े उनके बेटे को लाया गया। एक दारोगा की गुजारिश पर अंग्रेज अधिकारी ने बिस्मिल के जंजीर खोल दिए। जंजीर खुलते ही बिस्मिल मां के पैरों को चूमकर उसे गले से लगा लिया। मां का कलेजा भी गर्व से फूला हुआ था, वो भी अपने बेटे को एक बच्चे की भांति अपनी आगोश में समेट लेना चाह रही थी। लेकिन अचानक मजबूत हृदय वाले क्रांतिकारी बिस्मिल की आंखों में आंसू गए। बिस्मिल के मानस में मां से जुड़ी तमाम स्मृतियां साकार हो उठी।मां के स्नेह और वात्सल्य को याद कर बिस्मिल का मन भर आया।बिस्मिल को रोते देख मां इसका कारण समझ गई, लेकिन अपने आंसू बहाकर बिस्मिल को औऱ कमजोर नहीं करना चाहती थी। खुद की भावनाओं पर काबू रखते हुए मां भर्राए गले से बोल उठी - “‘मैं तो समझती थी कि तुमने अपने आप पर विजय पा ली है। किंतु यहां तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है। अगर तुम्हें मौत से इतना ही डर लग रहा है तो किसने कहा था तुम्हें क्रांतिकारी बनने” ? 
मां की बातों पर बिस्मिल आंखों के आंसूओं को पोछने लगा औऱ इससे पहले कुछ बोलने की कोशिश करता , मां ने हिम्मत बांधकर बिस्मिल को संभालना चाहा- “जीवन पर्यंत देश के लिए आंसू बहाकर अब अंतिम समय तुम मेरे लिए रोने बैठे हो? यह कायरता ठीक नहीं। तुम्हें वीर की भांति हंसते हुए प्राण देते देखकर मैं स्वयं को धन्य समझूंगी। मुझे गर्व है कि इस गए-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश के लिए स्वयं को बलिदान कर रहा है। मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था। उसके बाद तुम देश के लिए ही थे और उसी के काम गए। मुझे इसका तनिक भी दुख नहीं है।क्रांतिकारी रोया नहीं करते 
मां की बात सुनकर बिस्मिल ने खुद के आंसुओं पर नियंत्रण पाते हुए मां का हाथ पकड़ते हुए जोश में कहा -“‘मां! मुझे अपनी मृत्यु पर कतई दुख नहीं है। विश्वास रखिए, मैं अपनी मृत्यु पर बहुत संतुष्ट हूं। बस थोड़ा इस बात से चिंतित हूं कि अगले जनम भी मुझे तेरा बेटा बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा या नहीं

बिस्मिल की बात सुनकर मां रोई नहीं बल्कि मुस्काराते हुए कह गई कि तू तो अब सबसे बड़ी मां भारत मां का बेटा हो गया वो भी कई जनमों के लिए मां से आखिरी वक्त विदा लेते हुए बिस्मिल ने उनका पैर चूमकर मिट्टी माथे पर लगाकर चुपचाप अपनी बैरक में वापस चला गया।  

फांसी वाले दिन गोरखपुर जेल में जब जेलर राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी के लिए लेने आईं तो वह काफी अच्छे मूड में थे। इस समय वह कसरत कर रहे थे। इस दौरान जेलर ने उनसे कहा कि अब आपको फांसी होने जा रही है, आपका कसरत करने का क्या फायदा है ?  इसके बाद उन्हेंने जेलर को करारा जवाब दिया। राम प्रसाद बिस्मिल ने कहा था मैं कसरत इसलिए कर रहा हूं ताकि स्वस्थ रहूं और अगले जन्म में में ब्रिटिश हुकूमत का खात्मा कर सकूं।  इतना बोलते ही बिस्मिल जोर जोर से हंसने लगे थे। उसके बाद जेलर एक शब्द भी ना कह सका। बिस्मिल ने फांसी से पहले उसी जेलर को एक मुट्ठी मिट्टी देते हुए कहा हो सके तो मेरे बैरक में इस मिट्टी को रखवा देना। 
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु--कातिल में है। 

पटना के अजीमाबाद के मशहूर शायर बिस्मिल अजीमाबादी की रचना पढ़कर रामप्रसाद बिस्मिल फांसी के फंदे को चूमकर शहीद हो गए। बिस्मिल आज भले ही सिर्फ बातों में बचे हों लेकिन उनकी कहानियां हमेशा जज़्बातों में जिंदा रहेगी। 

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 

Tuesday, 17 September 2019

Why LION LOOM it is a dying art?

Why LION LOOM it is a dying art? 

It would be wrong to say that the age old practice of traditional weaving has declined. It is very much in practiced. But it is a dying art. A stronghold in the niche market is the need of the hour as a very large section of the loin loom weavers has given up weaving for a faster growing market as they could not upkeep with the competition in the marketing industry. One of the many reason is also because, we do not know the scope in the bigger market. We seldom focus on the domestic market, but loin loom has its value beyond that in the export market in Europe, America and other foreign countries. Considering the economic role of the textiles in employment, generation and exports to developed countries, the intervention of the government is required; giving out trainings for better craftsmanship and empowering women of today with more job opportunities. There should be policies implemented and iterated according to the modern world and the standards of using quality products with more refined finishing needs to be upgraded to enter into the bigger market. Yet, not forgetting its eccentric value, which is very important.

Loinloom, is not just an art, it is the mirror reflection of our identity which holds together the cultural ethnicity, the tradition and the craftsmanship of our society. But sadly, it is on the verge of its extinct and cries for help from the pit scratching its way for more attention. Loinloom, one of the oldest devices for weaving textiles, is a backstrap loom found in parts of Northeast India, China, Bhutan and Myanmar. That being said, Nagaland is among the very few places with this valuable culture still adept. Over the years it has attracted so many international brands into the domain. The northeast state has tremendous potential in promoting loin loom sector as a trademark for the ethnicity because the region has been widely applauded for their indigenous variety and interesting use of color play and motifs.

Friday, 13 September 2019

हिंदी, हमारी हिंदी,आपकी हिंदी, हम सबकी हिंदी।।

कातिब,कहानीबाज रजनीश बाबा मेहता



















हिंदी हमारी सभ्यता संस्कृति की पहचान है। 
हिंदी हमारी गंगा जमुनी तहज़ीब की आन है। 
हिंदी , हर हिंदुस्तानी का सम्मान है।
जिसके बिना हिंद थम जाए 
ऐसी जीवनरेखा है हिंदी। 
हर हिंदुस्तानी का अभिमान है हिंदी 
हिन्दी, मादर-ए-हिंद की शान है , हिंदी।  
हिन्दी मेरी भाषा है, हिन्दी मेरी आशा है ,हिन्दी का उत्थान करना, 
यही हर हिंदुस्तानी की जिज्ञासा है।

14 सितंबर 1949 बुधवार का दिन था। हिंदुस्तान की संसद अभी अपने बालपन के पालनों में खेल रही थी । जवाहरलाल नेहरू संसद के गलियारों में चाय के साथ धूप का मजा ले रहे थे। तभी बाबा साहेब अंबेडकर आते ही नेहरू के कंधे पर हाथ रखते हुए हिंदी को लेकर किए गए फैसले पर खुशी जाहिर की। लेकिन नेहरू ने ये कहकर अपने मन की शंका जाहिर कर दी कि आने वाले दिनों में जो दर्जा हिंदी को देना चाहिए वो उसे पूरी तरह नहीं दिया जा रहा है। अंबेडकर नेहरू की मन की पीड़ा को समझ गए औऱ वो तुरंत ही मजाकिया लहजे में बोल पड़े,”आप कहें राष्ट्रभाषा घोषित कर दें। एक देश एक भाषा, अच्छा रहेगा ना”। हंसते हुए नेहरू ने बाबा साहब को कहा कि , ये वो भी जानते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो फिर एक औऱ गृह युद्ध के लिए तैयार हो जाओ”। दोनों ठहाके मारते हुए संसद के दरवाजों में गुम हो गए। 
हिंदी को लेकर नेहरू की मंशा एकदम साफ थी लेकिन वो जानते थे कि अगर हिंदी के वर्चस्व को पूरी तरह से स्थापित किया गया तो फिर दक्षिण के साथ साथ कई औऱ जगहों पर इसको लेकर विद्रोह छिड़ जाएगा। औऱ उस वक्त भारत किसी भी आंतरिक युद्ध के लिए ना तो तैयार था औऱ न ही ऐसी किसी स्थिति का सामना करने के मूड में था। भाषाओं को लेकर नेहरू औऱ अंबेडकर दोनों एकमत नहीं थे। दोनों अंग्रेजी भाषा में पढ़े लिखे विद्वान औऱ फैसला उनको हिंदी के बारे में लेना था। लेकिन अंबेडकर जो बीच का रास्ता निकालने में माहिर माने जाते थे उन्होंने इस बार हिंदी को भी बीच मंझधार में छोड़ दिया। अंबेडकर ने उस वक्त ये कहा था कि आने वाले दिनों में हिंदी को उसके मुकम्मल मकाम तक पहुंचाया जाएगा, लेकिन वो जानते थे कि जो फैसला कर रहे हैं वही आखिरी होगा बाकी भविष्य के वादे सारे खोखले ही साबित होंगे। 
हालांकि उस रोज 14 सितंबर, 1949 को भारत की संवैधानिक सभा में हिन्दी को देवनागिरी लिपि में लिखा गया था और हिन्दी को भारत गणराज्य की अधिकारिक भाषा भी घोषित किया गया था। तब से लेकर इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। हालांकि हिन्दी भाषा को भारत की अधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला भारत के संविधान में 26 जनवरी, 1950 से प्रभाव में आया है। भारतीय संविधान के मुताबिक, देवनागिरी लिपि में लिखित हिन्दी भाषा को पहले भारत की अधिकारिक भाषा के रुप में अनुच्छेद 343 के तहत अपनाया गया था। नेहरू के मन में हिंदी को लेकर पशोपेश जो था वो सालों तक उसके मन को सालता रहा। यही वजह है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस दिन के महत्व को समझते हुए इस दिन को हिन्दी दिवस के रुप में मनाने की इच्छा जताई थी। औऱ भारत में पहली बार हिन्दी दिवस, 14 सितंबर साल 1953 में मनाया गया। 

हालांकि आजादी के बाद से लेकर आजतक हिंदी के मामले में भले ही सुधार हुआ है लेकिन इतने बरस गुजर जाने के बाद ये सुधार का सफर एकतदम धीमी है। हालांकि हिन्‍दी को राजभाषा बनाए जाने से काफी लोग खुश नहीं थे और इसका विरोध करने लगे. इसी विरोध के चलते बाद में अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। 
इसे हिन्‍दी का दुर्भाग्‍य ही कहा जाएगा कि इतनी समृद्ध भाषा कोष होने के बावजूद आज हिन्‍दी लिखते और बोलते वक्‍त ज्‍यादातर अंग्रेजी भाषा के शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया जाता है. और तो और हिन्‍दी के कई शब्‍द चलन से ही हट गए. ऐसे में हिन्‍दी दिवस को मनाना जरूरी है ताकि लोगों को यह याद रहे कि हिन्‍दी उनकी राजभाषा है और उसका सम्‍मन व प्रचार-प्रसार करना उनका कर्तव्‍य है. हिन्‍दी दिवस मनाने के पीछे मंशा यही है कि लोगों को एहसास दिलाया जा सके कि जब तक वे इसका इस्‍तेमाल नहीं करेंगे तब तक इस भाषा का विकास नहीं होगा.। 

1. वर्तमान में भारत में 43.63 फीसदी लोग हिन्‍दी भाषा बोलते हैं. जबकि 2001 में यह आंकड़ा 41.3 फीसदी था. तब 42 करोड़ लोग हिन्दी बोलते थे. जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच हिन्दी बोलने वाले 10 करोड़ लोग बढ़ गए. साफ है कि हिन्दी देश की सबसे तेजी से बढ़ती भाषा है.
2. इसे आप हिन्‍दी की ताकत ही कहेंगे कि अब लगभग सभी विदेशी कंपनियां हिन्‍दी को बढ़ावा दे रही हैं. यहां तक कि दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल में पहले जहां अंग्रेजी कॉनटेंट को बढ़ावा दिया जाता था वही गूगल अब हिन्‍दी और अन्‍य क्षेत्रीय भाषा वाले कॉन्‍टेंट को प्रमुखता दे रहा है. हाल ही में ई-कॉमर्स साइट अमेजन इंडिया ने अपना हिन्दी ऐप्‍प लॉन्च किया है. ओएलएक्स, क्विकर जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही हिन्दी में उपलब्ध हैं. स्नैपडील भी हिन्दी में है.

3. इंटरनेट के प्रसार से किसी को अगर सबसे ज्‍यादा फायदा हुआ है तो वह हिन्‍दी है. 2016 में डिजिटल माध्यम में हिन्दी समाचार पढ़ने वालों की संख्या 5.5 करोड़ थी, जो 2021 में बढ़कर 14.4 करोड़ होने का अनुमान है.

4. 2021 में हिन्दी में इंटरनेट उपयोग करने वाले अंग्रेजी में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से अधिक हो जाएंगे. 20.1 करोड़ लोग हिन्दी का उपयोग करने लगेंगे. गूगल के अनुसार हिन्दी में कॉन्‍टेंट पढ़ने वाले हर साल 94 फीसदी बढ़ रहे हैं, जबकि अंग्रेजी में यह दर सालाना 17 फीसदी है. 

5. अभी विश्‍व के सैंकड़ों व‍िश्‍वविद्यालयों में हिन्‍दी पढ़ाई जाती है और पूरी दुनिया में करोड़ों लोग हिन्‍दी बोलते हैं. यही नहीं हिन्‍दी दुनिया भर में सबसे ज्‍यादा बोली जाने वाली पांच भाषाओं में से एक है.

6. दक्षिण प्रशान्त महासागर के मेलानेशिया में फिजी नाम का एक द्वीप है. फिजी में हिन्‍दी को आधाकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है. इसे फि‍जियन हिन्दी या फि‍जियन हिन्दुस्तानी भी कहते हैं. यह अवधी, भोजपुरी और अन्य बोलियों का मिलाजुला रूप है.

8. साल 2017 में ऑक्‍सफोर्ड डिक्‍शनरी में पहली बार 'अच्छा', 'बड़ा दिन', 'बच्चा' और 'सूर्य नमस्कार' जैसे हिन्‍दी शब्‍दों को शामिल किया गया. 7. पाकिस्‍तान, नेपाल, बांग्‍लादेश, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, न्‍यूजीलैंड, संयुक्‍त अरब अमीरात, युगांडा, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, मॉरिशस और साउथ अफ्रीका समेत कई देशों में हिन्‍दी बोली जाती है।

हिंदी हमारे हिंद की धड़कन है, हिंदी हमारे हिंदुस्तान की भाषा है । 

कितना मजा आता है जब हिंदी दिवस पर कुछ लोग हिंदी के नाम पर खुद को सबसे बड़ा क्रांतिकारी घोषित कर देते हैं। बतकही की ऐसी पराकाष्ठा पार कर देते हैं जिसे पढ़कर ऐसा लगता है कि साला इससे बड़ा हिदीं का कोई क्रांतिकारी है ही नहीं । लेकिन वो भूल जाते हैैं  औऱ खुद अपना सारा  काम अंग्रेजी में करते है। नौकरी आवेदन के लिए बोलो तो फटाक से अंग्रेजी में चार-पांच पेज पेल डालेगा। अब जब मौका है हिंदी दिवस का तो हम जैसे हिंदी भाषी को साला आज बड़ा अजीब लग रहा है कि पूरा साल हिंदी में काम करते रहे, सिनेमा हिंदी में बनाते हैं, स्क्रिप्ट हिंदी में लिखते हैं, सारा काम हिंदी के आड़े तिरछे लकीरों से ही करते हैं तो आज ही क्यों इस बतकही में शामिल हुआ जाए ? हमारे लिए तो बंबई में हर पल हिंदी दिवस होता है, नौकरी में, कहानी में, किताबों में, कविताओं में,सनिमा में, सोच में हर जगह। अब जब हिंदी का जन्मदिवस मनाना है तो फिर आंख मूंद कर ही सही ताली तो बजाना ही पड़ेगा औऱ साथी केक भी खाना ही पड़ेगा। लो जी हमने भी हिंदी दिवस मना लिया । लेकिन हम भी कम नहीं कुछ ज्ञान तो पेल ही देंगे।  

जरा इधर ध्यान दीजिए कि हिंदी दिवस का शुरूआत कैसे हुई ।

सबसे पहली बार हिंदी के गलियारे में सुगबुगाहट 1918 में एक इस देश का एक बुजुर्ग आदमी ने किया था औऱ उसका नाम था महात्मा गांधी। गांधी ने इसे जनमानस की भाषा कहा था और इसे देश की राष्ट्रभाषा भी बनाने को कहा था। अब देखिए साला इस देश की किस्मत कि हिंदी के जन्मस्थान में आजादी के बाद ऐसा कुछ नहीं हो सका। कुछ अंग्रेजी टाइप के सत्ता में आसीन लोगों ने जाति-भाषा के नाम पर राजनीति कर  कभी भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया। तड़प ऐसी कि राजभाषा तो बन गए बस एक कदम पर मोक्ष मिलना था वो आज तक नहीं मिला। यानि दूसरे शब्दों में कहे तो हिंदी की आत्मा आज भी राष्ट्रभाषा बनने के लिए भटक रही है । अगर क्रांति करनी है तो भाई अपनी वन लाइनर वाली हिंदी मैसेज से नहीं कुछ योगदान से किजिए जिससे क्रांति की लौ उठे औऱ हम अपने घर में हिंदी को सही स्थान दिला पाएं। हालांकि इस काम की शुरूआत बहुत पहले चुकी है लेकिन तड़प आज तक बाकी है,आजादी के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास और व्यौहार राजेन्द्र सिंह आदि लोगों ने बहुत से प्रयास किए। जिसके चलते इन्होंने दक्षिण भारत की कई यात्राएँ भी की, लेकिन इन बेचारे हिंदी के सच्चे क्रांतिकारी को क्या मिला, सब किताब की जिल्द(कवर) पर बड़े-बड़े अक्षरों में नाम औऱ फिर ये लोग मर गए। बस घर की अलमारी में वो किताब रखी है जिसे गाहे बगाहे कभी कभार निकालते हैं औऱ आधे पढ़कर सो जाते है अगले दिन काम वाली उस किताब को वहीं अलमारी में ऱख देती है। ठीक हिंदी की राष्ट्रभाषा बनाने की क्रांति भी कुछ निकम्मे कामगारों की वजह से इसे दिल्ली के सरकारी दफ्तरों की अलमारी में बंद कर दिया गया।
हालांकि  यूं तो अंग्रेजी भाषा के बढ़ते चलन और हिंदी की अनदेखी को रोकने के लिए हर साल 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है लेकिन एक दिन में क्रांति मिलनी होती तो साला बात ही क्या था ।आजादी मिलने के दो साल बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एक मत से हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया था, उस वक्त भी मुद्दा राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर उठाया गया लेकिन उस वक्त की सरकार अंग्रेजों औऱ अंग्रेजी की सरपरस्ती के दबे इतनी दबी हुई थी कि वो हिंदी को मोक्ष तक पहुंचने नहीं दिया, औऱ बाकी लोग भी हिंदुस्तान के नए मालिक की बात मानकर चुपचाप राजभाषा को कबूल किया और इसके बाद से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। सोचिए गांधी जिस बात को 1918 में उठाया था उस बात की कद्र आजादी के बाद नहीं , ये कौन लोग हैं जो हमारे अधिकार पर हिटलरी फैसला करते हैं, उनकी भाषा दरअसल हिंदी है ही नहीं, अब ऐसे में उदाहरण के तौर पर देखें तो एक मुसलमान आदमी कैसे हिंदी की कद्र कर सकता है, वो तो अपना गाना गाएगा। 
अब जरा इस पर ध्यान दीजिए 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ साथ राजभाषा नीति भी लागू हुई। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि भारत की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप है। हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का प्रयोग भी सरकारी कामकाज में किया जा सकता है। अनुच्छेद 343 (2) के अंतर्गत यह भी व्यवस्था की गई है कि संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक, अर्थात वर्ष 1965 तक संघ के सभी सरकारी कार्यों के लिए पहले की भांति अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग होता रहेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी कि इस बीच हिन्दी न जानने वाले हिन्दी सीख जायेंगे और हिन्दी भाषा को प्रशासनिक कार्यों के लिए सभी प्रकार से सक्षम बनाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 344 में यह कहा गया कि संविधान प्रारंभ होने के 5 वर्षों के बाद और फिर उसके 10 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे, जो अन्य बातों के साथ साथ संघ के सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में और संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग पर रोक लगाए जाने के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा। आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए इस अनुच्छेद के खंड 4 के अनुसार 30 संसद सदस्यों की एक समिति के गठन की भी व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 120 में कहा गया है कि संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है।
वर्ष 1965 तक 15 वर्ष हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी अंग्रेजी को हटाया नहीं गया और अनुच्छेद 334 (3) में संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह 1965 के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रखने के बारे में व्यवस्था कर सकती है। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भारत की राजभाषा है।

यानि अंग्रेजी आज भी अपना पिछवाड़ा हिंदी के पीछे बैठकर खुजा रहा है। 26 जनवरी 1965 को संसद में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि "हिन्दी का सभी सरकारी कार्यों में उपयोग किया जाएगा, लेकिन उसके साथ साथ अंग्रेज़ी का भी सह राजभाषा के रूप में उपयोग किया जाएगा।" वर्ष 1967 में संसद में "भाषा संशोधन विधेयक" लाया गया। इसके बाद अंग्रेज़ी को अनिवार्य कर दिया गया। इस विधेयक में धारा 3(1) में हिन्दी की चर्चा तक नहीं की गई। इसके बाद अंग्रेज़ी का विरोध शुरू हुआ। 5 दिसंबर 1967 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राज्यसभा में कहा कि हम इस विधेयक में विचार विमर्श करेंगे। अब बताइए आइरन लेडी ने विचार के नाम पर हिंदी को ऐसा लटकाया कि साला आज तक इनकी पुश्तें विचार ही कर रही है।
वर्ष 1990 में प्रकाशित एक पुस्तक "राष्ट्रभाषा का सवाल" में शैलेश मटियानी जी ने यह सवाल किया था कि हम 14 सितम्बर को ही हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं। इस पर प्रेमनारायण शुक्ला जी ने हिन्दी दिवस के दिन इलाहाबाद में इसके कारण को बताया था कि इस दिन ही हिन्दी भाषा के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। इस कारण इस दिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। लेकिन वे इस जवाब से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि इस दिन को हम राष्ट्रभाषा या राजभाषा दिवस के रूप में क्यों नहीं मनाते हैं। इसके साथ ही शैलेश जी ने इस दिन हिन्दी दिवस मनाने को शर्मनाक पाखंड करार दिया था।
अब हर लोग अपने तरीके से अपनी बात कहने में लगे हैं। विरोध तो नाम भर का रह गया, अधिकार मांगने की बात तो दूर अब तो दुनिया उंगलियों तक सीमित रह गई है । 
जाति औऱ भाषा के नाम पर राजनीति करने वाले चन्द राजनेताओं की वजह से देश का सम्मान बनने वाली भाषा सिर्फ राजभाषा तक सीमित रह गई। बजी-खुची कसर आज के बाजारीकरण ने पूरी कर दी जिस पर अंग्रेजी की बड़ी जबरदस्त पकड़ है । आज हिंदी जानने और बोलने वालों को एक गंवार के रूप में देखा जाता है । कुछ लोग तो इंटरव्यू में जाने से पहले इसलिए डर जाते हैं क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती औऱ इंटरव्यू के बाद वो दूसरे इंटरव्यू की नाकाम तैयारी में लग जाता है। यानि अंग्रेजी की वजह से बेचारे हिंदी भाषी की जबरदस्त पेलाई और बेइज्जती। 

हिंदी को लेकर अगर कोई राज्य तारीफ के काबिल है तो वो नार्थ इस्ट के सारे राज्य। नार्थ इस्ट के आठ राज्यों में हिंदी को लेकर जबरदस्त मुहिम चलाई जा रही है। सुनकर आश्चर्य होता है कि अरूणाचल प्रदेश में सैकड़ों कबीलाई समूह होने के बावजूद उनलोगों के बीच हिंदीं गजब अंदाज में प्रचलित है। तो इस हिंदी दिवस पर नार्थ इस्ट के हिंदी के खंगालने के लिए के चक्कर लगाना जरूरी है। 

हिंदी को लेकर सिर्फ बातें नहीं उसको लेकर काम किया जाना चाहिए। हिंदी को दिल से अपनाने की जरूरत है ना कि सहानुभूति कि। 



हिंदी वाला सिनेमाई साधु 
रजनीश बाबा मेहता 

Sunday, 8 September 2019

कितना मुश्किल होता है बेहतर पाने का आकर्षण।

FILM पुण्यतिथि:death Anniversary Writer Director Rajnish BaBa Mehta 


 Writer Director Rajnish BaBa Mehta
 Writer Director Rajnish BaBa Mehta 

 Writer Director Rajnish BaBa Mehta 
 Writer Director Rajnish BaBa Mehta 
 Writer Director Rajnish BaBa Mehta 




ये एक ऐसा सफ़र हैं जहां चलना अकेला होता है। अगर साथ किसी का होता है, तो फिर वो कहानियों का साथ औऱ सिनेमा के जज़्बात होते हैं। आसान नहीं होता किसी भी कहानी के आकर्षण को सिनेमा के सकल संसार तक पहुंचाना। बरसों बीत जाते हैं, कई राहगीर टकराते हैं। कुछ हौसले तोड़ देने की बात करते हैं, तो कोई हौसला बनकर साथ खड़ा हो जाता है। सिनेमा की समझ है ही ऐसी, जिसे समझाना हर किसी को आता है, लेकिन समझना कोई नहीं चाहता। शब्दों की काली लकीरों के पीछे से झांकते हुए चुपचाप चलते रहने का फैसला कभी-कभी भीष्म प्रतिज्ञा जैसा प्रतीत होता है। कभी-कभी मन अडिग रहने को मना कर देता है, तो कभी फिर से प्रण कर पथरीले रास्तों का राहगीर बन ख़्वाबगीर को कस कर गले लगा लेता है। कितना मुश्किल होता है बेहतर पाने का आकर्षण। पाना सबको बेहतर से बेहतर है, वो भी अभूषणों से जड़ित आकर्षित इससे पहले कि सोच संकुचित हो, निकल जाता हूं ऐसी दुनिया से। खो जाता हूं कहानीबाजी की गर्भ-गृह में जहां कुछ लकीरों के जरिए इंसानी जिंदगी को तब तक कुरेदता रहूंगा जब तक वो कोरे पन्नों पर अपनी तस्वीर ना बना ले। कहानी के आकार और प्रकार निश्चित होते ही सिनेमा के संकल संसार में एक बार फिर लौट आउंगा। मायानगरी के कुरूक्षेत्र में हर कोई अपने-अपने चक्रव्यूह की रचना कर अभिमन्यु बनने की फ़िराक में है। लेकिन शायद वो भूल जाते हैं कि चक्रव्यूह तोड़ना तो अर्जुन को भी आता था। और वैसे चक्रव्यूह रोज-रोज भेदे नहीं जाते है। कहानीबाजी के सफर में चक्रव्यूह कुछ इसी अंदाज में टूटता आया है, जब सिनेमाई ताबीर का जिक्र सरेआम होता है। कुछ मिला, कुछ बाकी रहा। कुछ मिला इसलिए क्योंकि बरसों की तपस्या से कुछ निर्माण किया। कुछ बाकी इसलिए रहा क्योंकि सफर ज़ारी है औऱ जारी रहेगा, कहानीबाजी के पैमाने तले सिनेमा के अंदाज को सीखने की, परखने की।  

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता


7th Indian cine film festival Mumbai 8th Sep 2019

Saturday, 24 August 2019

अगर राम के नाम पर हमें बांटा जा रहा है तो हम कृष्ण के नाम पर एक हो जाएं।

अगर राम के नाम पर हमें बांटा जा रहा है तो हम कृष्ण के नाम पर एक हो जाएं। 
अमीर ख़ुसरो, रसखान, नज़ीर अकबराबादी और वाजिद अली शाह जैसे कई मुस्लिम मतावलंबियों ने कृष्ण की स्तुति करके दोनों धर्मों के बीच पुल बनाने की कोशिशें की हैं
किस्सा है कि राम भक्त तुलसी एक बार घाट से स्नान करके घर जा रहे थे. रास्ते में उन्हें कन्हैया जी के दर्शन हो गए. और दर्शन भी क्या हुए! बांके बिहारी वाली छवि में खड़े हुए थे कन्हैया जी. यानी सिर पर मोर पंखी और होंठों पर बांसुरी और त्रिभंगी मुद्रा. तुलसी ने उन्हें प्रणाम किया और चल दिए. कृष्ण हतप्रभ रह गए! आख़िर तीन लोक के नाथ थे, महाभारत के सूत्रधार थे, द्वापर के सबसे बड़े पात्र थे. राम में तो 12 कलाएं मानी जाती हैं. कृष्ण 16 कलाओं से परिपूर्ण थे. उनकी अनदेखी! कृष्ण ने जब उनसे इस उपेक्षा का कारण पूछा तो तुलसी बोले, ‘क्या कहूं छबि आपकी, भले बने हो नाथ. तुलसी मस्तक जब नवे, धनुस बान हो हाथ.’

अब तुलसी तो सबसे बड़े राम भक्त, शायद हनुमान से भी बड़े. पर कृष्ण के भी भक्त कम नहीं हुए हैं. हिंदू धर्म के अलावा इस्लाम, ईसाई, जैन और सिख मज़हबों के अनुयायी तक कृष्ण की लीला से विस्मित रहे हैं. ग़लत नहीं होगा अगर कहें कि कृष्ण गंगा-जमुनी तहज़ीब के सबसे बड़े प्रतीक हैं.
-कृष्ण भक्ति और सूफ़ीवाद का मिलन-
ग्यारहवीं शताब्दी के बाद इस्लाम भारत में तेज़ी से फैला. लगभग इसी समय भक्ति काल और सूफ़ीवाद में ज़बरदस्त संगम हुआ और भारत में इस्लाम कृष्ण के प्रभाव से अछूता नहीं रह पाया. सूफ़ीवाद ईश्वर और भक्त का रिश्ता प्रेमी और प्रेमिका के संबंध की मानिंद मानता है. इसलिए राधा या फिर गोपियां या सखाओं का कृष्ण से प्रेम सूफ़ीवाद की परिभाषा में एकदम सटीक बैठ गया. नज़र ज़ाकिर अपने लेखब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ बांग्ला लिटरेचरमें लिखते हैं कि चैतन्य महाप्रभु के कई मुस्लिम अनुयायी थे.
स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी और उड़ीसा के गवर्नर रहे बिशंभर नाथ पांडे ने वेदांत और सूफ़ीवाद की तुलना करते हुए एक लेख में कुछ मुसलमान कृष्ण भक्तों का ज़िक्र किया है. इनमें सबसे पहले थे सईद सुल्तान जिन्होंने अपनी क़िताबनबी बंगशमें कृष्ण को नबी का दर्ज़ा दिया. दूसरे, अली रज़ा. इन्होंने कृष्ण और राधा के प्रेम को विस्तार से लिखा. तीसरे, सूफ़ी कवि अकबर शाह जिन्होंने कृष्ण की तारीफ़ में काफी लिखा. बिशंभर नाथ पांडे बताते हैं कि बंगाल के पठान शासक सुल्तान नाज़िर शाह और सुल्तान हुसैन शाह ने महाभारत और भागवत पुराण का बांग्ला में अनुवाद करवाया. ये उस दौर के सबसे पहले अनुवाद का दर्ज़ा रखते हैं.
और उस दौर के सबसे मशहूर कवि अमीर ख़ुसरो की कृष्ण भक्ति की बात ही कुछ और है. बताते हैं एक बार निज़ामुद्दीन औलिया के सपने में श्रीकृष्ण आये. औलिया ने अमीर ख़ुसरो से कृष्ण की स्तुति में कुछ लिखने को कहा तो ख़ुसरो ने मशहूर रंगछाप तिलक सब छीनी रे से मोसे नैना मिलायकेकृष्ण को समर्पित कर दिया. इसमें कृष्ण का उल्लेख यहां मिलता है, ‘... री सखी मैं जो गई थी पनिया भरन को, छीन झपट मोरी मटकी पटकी मोसे नैना मिलाईके...
भक्ति काल के रसखान
भक्ति काल के कबीर, नामदेव और एकनाथ तुकाराम जैसे चिंतकों ने निर्विकार की पूजा को महत्व दिया, पर वहीं कुछ मुसलमान कवियों पर कृष्ण हावी हो गए. इनमें सईद इब्राहिम उर्फ़रसखानका नाम सबसे पहले आता है. बिल्कुल सूरदास की तरह उन्होंने भी कृष्ण लीलाओं का वर्णन किया है. रसखान की कृष्ण भक्ति को अब क्या कहिए. भागवत पुराण का फ़ारसी में अनुवाद करने वाले रसखान की कृष्ण कल्पना में ठेठ ब्रज भाषा छलकती है. उनका कृष्ण वर्णन कुछ ऐसा है मानो कृष्ण उनके सामने ही लीला कर रहे हैं. मसलन, वे देख रहे हैं कि कभी कृष्ण पहाड़ उठा रहे हैं तो कभी धूल से सने हुए हैं. कभी व्यास, नारद को छका रहे हैं तो कभी कृष्ण गोपियों की चिरोरी करते हुए छाछ मांग रहे हैं.

सेस, गनेस, महेस, दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावें
जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुभेद बतावें
नारद से सुक ब्यास रहें पचि हारे तऊ पुनि पार पावें
ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भर छाछ पे नाच नचावें
गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा लेने के बाद रसखान वृन्दावन में ही बस गए. अंतिम सांस उन्होंने मथुरा में ली थी और वहीं उनका मकबरा भी है.
आलम शेख़
आलम शेख़ रीति काल के कवि थे. उन्होंनेआलम केलि’, स्याम स्नेहीऔर माधवानल-काम-कंदलानाम के ग्रंथ लिखे. ‘हिंदी साहित्य का इतिहासमें रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि आलम हिंदू थे जो मुसलमान बन गए. उनका मानना है कि प्रेम की तन्मयता की दृष्टि से आलम की गणनारसखानसे होनी चाहिए.

पालने खेलत नंद-ललन छलन बलि,
गोद लै लै ललना करति मोद गान है
आलमसुकवि पल पल मैया पावै सुख,
पोषति पीयूष सुकरत पय पान है
नंद सों कहति नंदरानी हो महर सुत,
चंद की सी कलनि बढ़तु मेरे जान है
आइ देखि आनंद सों प्यारे कान्हा आनन में,
आन दिन आन घरी आन छबि आन है
नज़ीर अकबराबादी
रीति काल के अंतिम सालों में नज़ीर अकबराबादी का कृष्ण प्रेम तो रसखान के कृष्ण प्रेम से टक्कर लेता हुआ दिखता है. कुछ ऐसी रार जैसी मीरा को राधा से रही होगी. वैसे इतिहास में राधा का पात्र जयदेव केगीत गोविन्दके बाद ही आता है.

कृष्ण उपासना का प्रचलन इसी दौरान अधिक हुआ. नज़ीर की दृष्टि में श्रीकृष्ण दुःख हरने वाले, कृपा करने वाले और परम आराध्य ही हैं. उनके लिए कृष्ण पैगंबर जैसे हैं. उन्होंने कृष्णचरित के साथ रासलीला का वर्णन किया है तो कृष्ण के बड़े भाई बलदेव परबलदेव जी का मैलानामक कविता लिखी. कृष्ण की तारीफ़ में लिखते हुए वे उन्हें सबका ख़ुदा बताते हैं.
तू सबका ख़ुदा, सब तुझ पे फ़िदा, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी
है कृष्ण कन्हैया, नंद लला, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी
तालिब है तेरी रहमत का, बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा
तू बहरे करम है नंदलला, सल्ले अला, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी.’
एक कविता में वे कृष्ण पर लिखते हैं:
यह लीला है उस नंदललन की, मनमोहन जसुमत छैया की
रख ध्यान सुनो, दंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की.’
बताते हैं कि भीख मांगने वाले जोगी के निवेदन पर नज़ीर नेकन्हैया का बालपनकविता कही
क्या-क्या कहूं किशन कन्हैया का बालपन
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन.’
इस कविता में पूरे 32 छंद हैं जिनमें कृष्ण के एश्वर्य और माधुर्य दोनों का ज़बरदस्त वर्णन है.
वाजिद अली शाह का कृष्ण प्रेम
देखिये यूं तो फैज़ाबाद का राम लला प्रेम जगज़ाहिर है. पर वहां से निकले और लखनऊ आकर बसे नवाबों के आख़िरी वारिस वाजिद अली शाह कृष्ण के दीवाने थे. 1843 में वाजिद अली शाह ने राधा-कृष्ण पर एक नाटक करवाया था. लखनऊ के इतिहास की जानकार रोज़ी लेवेलिन जोंस लास्ट किंग ऑफ़ इंडियामें लिखती हैं कि ये पहले मुसलमान राजा (नवाब) हुए जिन्होंने राधा-कृष्ण के नाटक का निर्देशन किया था. लेवेलिन बताती हैं कि वाजिद अली शाह कृष्ण के जीवन से बेहद प्रभावित थे. वाजिद के कई नामों में से एककन्हैयाभी था.
कृष्ण और बॉलीवुड.
वाजिद अली शाह के बाद तो अंग्रेज़ गए थे. विलियम जे हंटर, जॉन मिल, जॉन बेर्वेर्ली निकोल्स जैसे लेखकों और विचारकों ने हमारे ज़हनों में झूठ ठूंस-ठूंस कर साबित कर दिया कि हिंदू और मुस्लिम साथ नहीं रह सकते क्यूंकि दोनों मुख्तलिफ़ कौमें हैं. आज़ादी के बाद बॉलीवुड में राजा मेहदी अली खान, शकील बदायूंनी जैसे गीतकारों का कृष्ण वर्णन बेहद शानदार है. पर एक शायर का नाम लिए बिना यह लेख ख़त्म नहीं हो सकता. वे थे निदा फ़ाज़ली. जितना अच्छा उन्होंने कृष्ण पर लिखा इस दौर में शायद ही कोई लिख पाया. उनका एक शेर देखिये:

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला.’

हम मुख्तलिफ़ थे, कोई शक नहीं. पर साथ थे, इसमें भी कोई शक नहीं। 

संकलन 
रजनीश बाबा मेहता 
kahanibaaj.blogspot.com

साभार -सत्याग्रह