Monday, 25 May 2020

जब आप किताबें नहीं पढ़ते हैं, यात्राएं नहीं करते हैं, सिनेमा नहीं देखते हैं, तो फिर आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta



जब आप किताबें नहीं पढ़ते हैं, यात्राएं नहीं करते हैं, सिनेमा नहीं देखते हैं, तो फिर आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं। औऱ मौत की किस्म भी बड़ी अजीब होती है ।  दिमाग में ऐसी हलचल पैदा करता है जो आदमी को निकम्मा होने का एहसास दिलाता है। भागते वक्त के साथ हालात इंसानों को हवा के थपेड़ों से पीछे धकेल देता है । जिसके बाद इंसानी फितरत , शांति की बात करने औऱ तलाशने की अधूरी कोशिश में जीन जान से जुट जाता है। हर पल सुधार औऱ ध्यान वाली सोच को लेकर सिर्फ बतकही में वक्त गुजारना ही आत्मसंतुष्टि समझने की भूल कर बैठता है।   एक क्षेत्रीय कहावत है – “करने की सौ शिकायत, ना करने की एक शिकायत मगर हम के तौर पर मौजूद इंसान सौ शिकायत करने के बाद भी, उस अकेले एक शिकायत को भी करने से पीछे नहीं हटता है। खैर खुद पर काबू पाना आसान भी कहां होता है। बस बोलने के लिए बोलना भी तो जरूरी होता है। तो बस बोलते रहिए सिर्फ। 
लेकिन इस बतोलबाजी के बीच, बातों की अधूरी साजिश औऱ आजमाईश के तले कुछ ऐसे क्रांतिकारी लोग भी होते हैं, जो अनजान सफर पर भी मीलों पैदल चलकर आत्मसंतुष्टि के सागर से सिर्फ एक बूंद हलक के नीचे उतारकर अगली मंजिल की तरफ निकल पड़ते हैं। मजा तो तब है, जब आइनों सी चमकती बनावटी दुनिया में, ना तो कहीं से आना है, ना तो कहीं जाना है, बस एक अंतहीन इंतज़ार, वो भी बिना बेसब्री वाली। मगर ऐसा तभी मुमकिन है जब सुनसान और अनाजने सफर की तलाश अधूरी बची हो। अब जब सफर ही नहीं तो फिर पैरों के छालों की बातें सिर्फ बेमानी ही होगी। एहसासों की लकीरों को उकरेने के लिए कभी-कभी हमें खुद के साथ रहने की या वक्त गुजारने की जरूरत क्यों महसूस होने लगती है ? इसी जरूरत वाली एहसास को समझने औऱ सुलझाने के लिए किताबों का सहारा लेना चाहिए, अगर वहां भी बात बनी तो फिर  यात्राएं करके सामाधान निकालने की जुगत या नहीं तो फिर सिनेमा के माध्यम से सवाल को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। यकीन मानिए ये एक जश्न की तरह है। वैसे भी ज़िंदगी का एक उसूल है,  कि एक बार की मिली ज़िदगी अधूरी क्यों रहे ? क्यों ना अपनी शर्तों पर जी लिया जाए !
खामोशी से कोरे कागज पर उकेरी लकीरें ना जाने कितनी वेदना और संवेदना प्रकट कर देते हैं, जो शायद कभी कभी पूरी सिनेमा में भी देखने को नहीं मिलती है। कभी कभी तो यात्राओं का एक कदम ज़िदगी का नया फ़लसफा सिखा जाता है। कभी-कभी सिनेमा का एक डॉयलॉग ज़िंदगी जीने का नजरिया बदल देता है।  
 ये सब एक पल की आत्म संतुष्टि के लिए खुद की ख्वाहिश मात्र भर है। बस, हम औऱ आप पूरा करना चाहते हैं। बस पूरा करना। क्योंकि अधूरा कोई नहीं रहना चाहता। 
मैं भी नहीं। इस मैं में पूरा ब्रम्हांड हैं। 

कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, 21 May 2020

क्या गांधी होने की कीमत गोली है ?

WRITER DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA


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31 अक्टूबर 1984 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस ऐतिहासिक न्यूज बुलेटिन के जरिए पूरे हिंदुस्तान को नहीं बल्कि पुरी दुनिया को इंदिरा जी पर हुए हमले के बारे में खबर मिली थी। इस वीडियो को जब जब देखता था तब तब दिमाग में एक ही ख्याल आता था, कि क्या गांधी शब्द में इतनी गरमाहट है, कि लोग उसे लेकर एक पल में कोई ना कोई राय बना लेते हैं। मैंने भी बनाया। इससे अछूता मैं भी नहीं रहा। आज राजीव गांधी की पुण्यतिथि है। आज ही के दिन तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में 21 मई, 1991 की रात एक आत्मघाती बम धमाके में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। 
कॉलेज के दिनों में मैं महात्मा गांधी पर एक रिसर्च पेपर तैयार कर रहा था। गांधी को गहराई से जानने औऱ समझने के लिए दिल्ली के सारे बड़े विश्वविघालय की लाइब्रेबी की खाक छानता रहता था। उसी दौरान जेएनयू के लाइब्रेबी के बाहर एक प्रोफेसर ने मेरी जिज्ञासा को भांपकर तंज कसते हुए कहा था कि, इस देश में गांधी होने की कीमत गोली है। यही एक लाइन थी जिसने मेरे रिसर्च की दिशा और दशा बदल दी। बात एकदम सटीक और सच्चाई की धरातल पर सुलगती हुई हकीकत के हर कोनों को बयां कर रही थी। महात्मा गांधी की हत्या के बाद , इंदिरा गांधी को भी गोली मार दी गई। राजीव गांधी को बम से उड़ा दिया गया। तीन गांधी की हत्या उस प्रोफेसर की लाइन एक नई सोच औऱ समझ की ओऱ इशार कर रही थी। भरोसा नहीं होता था कि हिंदुस्तान में इन जैसे महानुभावों की हत्या की जाएगी। वक्त का कारवां उड़ता चला गया। एक बार फिर थिएटर के दिनों में मुलाकात उर्दू एकेडमी के सचिव अनीस आज़मी से हुई। जिन्होंने गांधी के मरने के बाद शमीम करहानी की लिखी कविता को पढ़कर सुनाया था।
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जगाओ बापू को, नींद गई है
अभी उठके आये हैं,बज़्म--दुआ से
वतन के लिये, लौ लगाके ख़ुदा से
टपकती है रूहानियत सी फ़ज़ा से
चली जाती है, राम की धुन, हवा से
दुखी आत्मा, शान्ति पा गई है
जगाओ बापू को, नींद गई है।
ये घेरे है क्यों, रोने वालों की टोली
ख़ुदारा सुनाओ मन्हूस बोली
भला कौन मारेग बापू को गोली
कोई बाप के ख़ूं से, खेलेगा होली?
अबस, मादर--हिन्द, शरमा गई है
जगाओ बापू को, नींद गई है।

मोहब्बत के झण्डे को गाड़ा है उसने
चमन किसके दिल का, उजाड़ा है उसने?
गरेबान अपना ही फाड़ा है उसने
किसी का भला क्या, बिगाड़ा है उसने?
उसे तो अदा, अम्न की भा गई है
जगाओ बापू को, नींद गई है।

अभी उठके खुद वो, बिठायेगा सबको
लतीफ़े सुनाकर, हंसायेगा सबको
सियासत के नुक़्ते बतायेगा सबको
नई रोशनी दिखायेगा सबको
दिलों पर सियाही सी क्यों छा गई है?
जगाओ बापू को, नींद गई है।

वो सोयेगा क्यों, जो है सबको जगाता
कभी मीठा सपना, नहीं उसको भाता
वो आज़ाद भारत का है, जन्म दाता
उठेगा, आँसू बहा, देस-माता
उदासी ये क्यों, बाल बिखरा गई है
जगाओ बापू को, नींद गई है।

वो हक़ के लिए, तन के अड़ जाने वाला
निशां की तरह, रन में गड़ जाने वाला
निहत्था, हुकूमत से लड़ जाने वाला
बसाने की धुन में, उजड़ जाने वाला
बिना, ज़ुल्म की जिससे,थर्रा गई है
जगाओ बापू को, नींद गई है।

वो उपवास वाला, वो उपकार वाला
वो आदर्श वाला , वो आधार वाला
वो अख़लाक़ वाला, वो किरदार वाला
वो मांझी, अहिन्सा की पतवार वाला
लगन जिसकी, साहिल का सुख पा गई है
जगाओ बापू को, नींद गई है।

कोई उसके ख़ू से, दामन भरेगा
बड़ा बोझ है, सर पर क्योंकर धरेगा
चराग़ उसका दुशमन, जो गुल भी करेगा
अमर है अमर, वो भला क्या मरेगा
हयात उसकी, खुद मौत पर छा गई है
जगाओ ना बापू को, नींद गई है।
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यकीन मानिए उस क्लास में जितने भी स्टूडेंट थे सबकी आंखें ऩम हो गई थी। उस वक्त मेरा एक फैसला ये था कि गांधी और गोली को लेकर कुछ ना कुछ बनाएंगे जरूर। कम रिसोर्स और ज्यादा मेहनत के बल पर हमने एक फिल्म बनाई जिसका नाम था गांधी औऱ गोली। 
कई सारे फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को दिखाया गया। कई अवॉर्ड भी हासिल किया। मगर सवाल राजीव गांधी की मौत पर अटक जाती थी। आज जब उनकी पुण्यतिथि है तो एक बार फिर वही रिसर्च पेपर मेरी आंखों के सामने नाच गई। एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसने बहुत कुछ खोया। उन्होने राजनीति के खेल में अपने हाथ गंदे जरूर किए मगर भारत के भविष्य की नए मुकाम तक तो जरूर ले गए।
प्रधानमंत्री के तौर पर देश की सेवा करने वाले राजीव गांधी, नेहरू-गांधी परिवार के आखिरी सदस्य थे जो राजनीति में इतने शीर्ष तक पहुंचे। राजनीति में आने से पहले वे पेशे से पायलट थे।
बहुत कम लोग यह जानते हैं कि राजीव गांधी पायलट के साथ ही फोटोग्राफी के भी बेहद शौकीन थे। उनके इस शौक के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं थी। उनकी तस्वीरों को छापने के लिए कई पब्लिशरों ने भी मशक्कत की थी, लेकिन उन्होंने कभी अनुमति नहीं दी। उनके निधन के बाद जब सोनिया गांधी ने राजीव गांधी द्वारा खींची गई तस्वीरों के संग्रह को किताब का रूप दिया तब जाकर दुनिया के सामने इस बात का खुलासा हुआ। उस किताब का नाम है 'राजीव्स वर्ल्ड- फोटोग्राफ्स बाय राजीव गांधी'।
राजीव गांधी संभवत: देश के इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो कई बार खुद ही अपनी गाड़ी चला कर जगह-जगह जाते थे। कई बार तो राजीव गांधी चुनावी रैलियों में भी खुद ही अपनी कार चला कर पहुंच जाते थे। सुरक्षा गार्डों को तेजी से उनके पीछे चलते रहना पड़ता था।
राजीव गांधी की बदौलत भारत को कम्पूयटर नसीब हुआ। 
गाथाएं कितनी भी हो लेकिन मेरी सिनेमाई सफर की सुई एक ऐसी कहानी में अटकी है जिसमें गांधी औऱ गोली के रिश्तों की बात कुबबुला रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि जब जब गांधी औऱ गोली शब्द का जिक्र होता है तो महात्मा गांधी, के बाद इंदिरा गांधी औऱ फिर राजीव गांधी की हत्या सोचने पर मजबूर कर देती है।
गांधी के जुडी़ हर एक चीज ऐतिहासिक होती है, चाहे वो अच्छे के लिए हो या फिर बुरे के लिए। बात तो इतिहास की है। हर बार बुनी औऱ गढ़ी जाती है, औऱ हर बार नए सिरे से।कभी कभी किस्मत भी इंसान को अजीब मुहाने पर लाकर खड़ा कर देती है। भले ही उससे उसका लेना देना हो या नहीं। 
मेरे लिए सिर्फ कहानी है।
कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता