Sunday, 28 July 2019

बिहार ने दिया था भारत को पहला कार्डियोलॉजिस्ट, डॉक्टर श्रीनिवास की कहानी


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बिहार का एक बड़ा हिस्सा इन दिनों बाढ़ की तबाही झेल रहा है. इससे पहले राज्य के इन्हीं हिस्सों में सूखे और जल संकट का दौर था.
अब बाढ़ के बाद इन इलाकों में बीमारियों का प्रकोप बढ़ेगा. पिछले दिनों नीति आयोग ने हेल्थ इंडेक्स पर राज्यों की एक सूची जारी की. जिसमें बिहार सबसे निचले पायदान से ठीक ऊपर है.
पिछले दिनों मुज़्ज़फ़रपुर में होने वाले सैकड़ों बच्चों की मौत की ख़बरों के बीच बिहार का खस्ताहाल मेडिकल सुविधाओं के चिथड़े उड़ते हुए लोगों ने देखा है.
ऐसे में यक़ीन करना मुश्किल है कि इसी बिहार ने देश को पहला कार्डियोलॉजिस्ट यानी 'दिल का डॉक्टर' दिया था.
डॉक्टर श्रीनिवास भारत के पहले कॉर्डियोलॉजिस्ट थे, इस बात की पुष्टि 2017 में तब हुई जब भारत सरकार को डाक विभाग ने श्रीनिवास पर एक पोस्टल इनवेलेप जारी किया, जिस पर डॉक्टर श्रीनिवास भारत के पहले कार्डियोलॉजिस्ट का स्टैम्प लगा हुआ है.
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Image captionभारतीय डाक विभाग की ओर से श्रीनिवास पर जारी स्पेशल कवर
तांडव आइंस्टीन समदर्शी बताते हैं, "2017 में डाक विभाग ने प्रमाण पूछा था, हमारे लिए ये समस्या थी. लेकिन वह हार्वर्ड से पढ़े हुए थे तो मुझे मालूम था कि वहां डॉक्यूमेंटेशन को काफी संभाल कर रखा जाता है."

कैसे हुई थी पुष्टि?

"हमने वहां उन लोगों को पत्र लिखा और कहा कि पिताजी जब यहां आए थे उस वक्त का कोई डाक्यूमेंटेशन है या नहीं. दो दिन बाद जवाब आया कि पिताजी की ट्रेनिंग से संबंधित सारे पेपर और एयरमेल अर्काइव हैं. तीसरे दिन मुझे वो सब जानकारी मिल गई. उन डॉक्यूमेंटेशन को टाइम लाइन पर बिठा कर देखा गया तो मालूम चला कि वे इकलौतै भारतीय थे इस बैच में जिन्हें पॉल डि व्हाइट से ट्रेनिंग लेने का मौका मिला था."
पॉल डि व्हाइट को मार्डन कार्डियोलॉजी का फ़ादर कहा जाता है.
समदर्शी ये भी बताते हैं कि 1950 में श्रीनिवास की ट्रेनिंग ख़त्म हुई थी और उसी साल हार्वर्ड के मैसाच्यूट्स जेनरल हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजी विभाग से इस्तीफ़ा देकर अमरीका में हृदय रोग के प्रचार प्रसार में जुट गए थे.
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Image caption30 सितंबर, 1948 को पॉल डि व्हाइट के विभाग में डॉ. श्रीनिवास, मिडल पंक्ति में बाएं से पहले हैं डॉ. श्रीनिवास
वैसे दिलचस्प यह है कि लंबे समय तक भारत में ये माना जाता रहा था कि डॉक्टर पद्मावती (शिवारामाकृष्णा अय्यर) भारत की पहली कार्डियोलास्टि थीं. 102 साल की पद्मावती अभी भी जीवित हैं और उन्हें 1992 में पद्म विभूषण भी मिल चुका है. लेकिन पद्मावती का चिकित्सीय करियर 1953 से शुरू हुआ था जबकि श्रीनिवास 1950 से भारत में आकर डॉक्टरी करने लगे थे.
ये इनवेलेप आठ नवंबर, 2017 में बिहार के तत्कालीन गवर्नर सतपाल मलिक ने जारी किया था. डाक विभाग के स्पेशल कवर इनवेलेप जारी होने के बाद से ये बहस समाप्त होती दिख रही है.
समदर्शी बताते हैं कि डॉक्टर पद्मावती भारत की पहली महिला कार्डियोलॉजिस्ट हैं, इसमें कहीं कोई शक नहीं है.
बहरहाल, डॉक्टर श्रीनिवास का बिहार के दरभंगा ज़िले (अब समस्तीपुर ज़िले) के गढ़सिसई गांव में 1919 में जब जन्म हुआ था तब उनके गांव में स्कूल तक नहीं था. ऐसे में श्रीनिवास को पढ़ाई के लिए ननिहाल के गांव वीरसिंहपुर ड्योढ़ी जाना पड़ा.
समस्तीपुर के किंग एडवर्ड हाई स्कूल से 1936 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद श्रीनिवास पटना साइंस कॉलेज पहुंच गए.
साल 1938 से 1944 के बीच श्रीनिवास ने पटना मेडिकल कॉलेज (जो उस वक्त प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल) से अपनी पढ़ाई पूरी की.
डॉक्टरी की पढ़ाई ख़त्म करने के बाद श्रीनिवास को नौकरी भी मिल गई. लेकिन वे नौकरी हासिल करने के बाद थमे नहीं बल्कि विदेश जाकर विशेषज्ञता हासिल करने का रास्ता तलाशने में जुट गए.

फ़ादर ऑफ़ मॉर्डन कॉर्डियोलॉज़ी से ट्रेनिंग

उन्हें मौका भी मिल गया और स्कॉलरशिप के जरिए वे 1947 में अमरीका पहुंच गए. पॉल डि व्हाइट से प्रशिक्षण के बाद श्रीनिवास चाहते तो अमरीका में ही ठहर सकते थे लेकिन वे बिहार लौट आए और पटना मेडिकल कॉलेज में काम शुरू किया.
तांडव आइंस्टीन समदर्शी के मुताबिक उस वक्त पीएमसीएच में कार्डियोलॉजी का कोई विभाग ही नहीं था. ऐसे में अलग अलग विभागों में ही श्रीनिवास को अपने मरीज तलाशने होते थे और जैसे तैसे उनका इलाज करना होता था.
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Image captionपॉल डि व्हाइट को मॉर्डन कॉर्डियोलॉजी का फ़ादर कहा जाता है
ऐसे में एक दिन श्रीनिवास ने वो काम किया जो अमूमन सरकारी विभागों में होता नहीं है. उस दिलचस्प किस्से के बारे में समदर्शी बताते हैं, "एक बिल्डिंग खाली हुई थी तो अस्पताल प्रबंधन उसमें संक्रामक रोगों का विभाग शुरू करना चाहता था. लेकिन मेरे पिता ने रातों रात उसमें हृदयरोगियों को डाल दिया. फिर हंगामा हो गया कि श्रीनिवास ने सरकारी बिल्डिंग हड़प ली है."
"उनकी शिकायत हुई. एक कड़क स्वास्थ्य निदेशक होते थे कर्नल बीसी नाथ. उन्होंने पिताजी को बुलवा लिया और सीधे पूछा कि आपको सरकारी नौकरी करनी है कि नहीं, आपने सरकार की बिल्डिंग हड़प लिया, बिना परमिशन के आपने ऐसे कैसे किया?"
बिहार के एस श्रीनिवास देश के पहले कार्डियोलॉजिस्ट थे.
"तो मेरे पिताजी ने उन्हें अपनी तालीम के बारे में बताया और कहा कि मैं हृदय रोगियों को एक जगह देखना चाहता हूं तो बीसी नाथ ने कहा ठीक है कल मैं आपको बुलाकर फिर मिलूंगा. कल पिताजी जब अस्पताल पहुंचे तो उस जगह पर पूरा विभाग तैनात था, नर्स, दूसरे स्टाफ़, बेड और अन्य सुविधाएं. सब रातों रात हो गया. ये उस दौर में ब्यूरोक्रेसी की ताक़त और काम करने का नज़रिया था."

इंदिरा गांधी की मदद

जल्दी ही श्रीनिवास ने पटना में इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ कार्डियोलॉजी खड़ा कर दिया. इसकी कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है. तांडव आइंस्टीन समदर्शी बताते हैं, "1966 में इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो पिताजी ने उनसे मिलने का समय लिया . समय मिल गया तो पिताजी ने इंदिरा जी से कहा कि हमलोग इस सेंटर का नाम आपके नाम पर रखना चाहते हैं और अनुमति चाहते हैं.
उन्होंने अपने सचिव से कहा,"हाथों हाथ अनुमति पत्र मिलने के बाद जब पिताजी चलने लगे तो इंदिरा जी ने कहा आप इतना बड़ा संस्थान बना रहे हैं तो अर्थ की मदद नहीं चाहिए, पिताजी ने कहा वो भी चाहिए. तो उन्होंने पूछा कितने की मदद चाहिए. पिताजी ने कहा दस करोड़ रुपये मिल जाते तो अच्छा होता. इंदिरा जी ने कहा ठीक है. पिताजी पटना लौटे और उस पैसे की व्यवस्था उनके यहां आने से पहले हो चुकी थी."
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श्रीनिवास से जुड़े इन किस्सों को आज बिहार की स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़कर देखिए तो ऐसा लगता है कि हालात लगातार बिगड़ते ही गए.
मौजूदा समय में बिहार की स्वास्थ्य सुविधाओं के लचर हाल पर तांडव समदर्शी बताते हैं, "कुछ तो राजनीतिक सोच की कमी है और कुछ ट्रेनिंग की भी कमी है. हम लोग हार्वर्ड में जब कोर्स कर रहे थे उस वक्त भी कंपैसन का कोर्स डॉक्टरों को पढ़ाते थे और बौद्ध भिक्षुक यह पढ़ाता था. आज भी पढ़ाता है. अपने यहां दूसरों के दुख को लेकर चिंता का भाव कहीं नहीं दिखता है, सिस्टम में सब कोई मैटिरियलिस्टक होने के पीछे भाग रहा है."
वैसे दिलचस्प यह है कि आज जो ईसीजी मशीन हर हॉस्पिटल में दिखाई देती है, वो श्रीनिवास ही पहली बार भारत लेकर आए थे. श्रीनिवास ने इंसानी पहचान के लिए ईसीजी से जुड़ा सिद्धांत भी दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि दो इंसानों के ईसीजी एकसमान नहीं होते.

श्रीनिवास की उपलब्धियां

तांडव आइंस्टीन समदर्शी बताते हैं, "पहले ईसीजी मशीन होती थी, उसमें बड़ी- बड़ी मशीनें होती थीं, तार-वार हाथ में लगाया जाता था, पांवों को बाल्टी जैसे उपकरण में रखा जाता था. अब जो पेपर निकलता है और स्टायलस मूव करता है, वो मशीन पहली बार भारत पिताजी लेकर आए थे. उस मशीन से पिताजी ने ना जाने कितने नामचीन लोगों की ईसीजी बनाई थी."
वैसे ये मशीन आज भी ठीक ठाक काम कर रही है, श्रीनिवास ने इसे लेकर बिहार सरकार को प्रस्ताव भी दिया था कि बेली रोड पर बने संग्रहालय में इसे रखने के लिए एक कोना दिया जाए, लेकिन उस पर बिहार सरकार ने कुछ ध्यान नहीं दिया.
समदर्शी कहते हैं, "पता नहीं सरकार का क्या सोचना है उस पर लेकिन हमलोगों ने महसूस किया कि उस संग्रहालय में उन लोगों को जगह मिलनी चाहिए जिन्होंने बिहार का नाम दुनिया भर में रोशन किया."
श्रीनिवास की ईसीजी मशीनइमेज कॉपीरइटSRINIVAS FAMILY
इतना ही नहीं श्रीनिवास ने ही पहली बार कहा था कि दो जीवित इंसानों के ईसीजी आपस में नहीं मिलते, मतलब ईसीजी से भी इंसान की पहचान हो सकती है. 1958 ने उनके इस अध्ययन को ब्रिटेन की स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस ने अपने यहां लागू किया. इस अध्ययन को श्रीनिवास ईवी मैथड ऑफ़ आईडेंटीफिकेशन कहा जाता है.
वैकल्पिक चिकित्सीय पद्धति पर भी श्रीनिवास ने 1960 में ही विचार रखा था. श्रीनिवास 1977 में जब रिटायर हुए तो उन्होंने एलोपैथी, होम्योपैथी, यूनानी, आयुर्वेद और नेचुरापैथी जैसे सभी विधाओं को एक साथ मिलाकर पॉलीपैथी के जरिए लोगों को इलाज शुरू किया. उन्होंने बीमारी के कारण और उसके कारगर इलाज की उपलब्धता पर काम करने लगे.
आठ नवंबर, 2010 तक श्रीनिवास पटना के बेहद व्यस्ततम डॉक्टर बने रहे और साथ ही दस किताबों का लेखन भी किया. वैसे दिलचस्प यह भी है कि वे भारत की 1993 में दूसरे विश्व धर्म संसद में वैज्ञानिक अध्यात्मिकी पर बोलने के लिए आमंत्रित किए गए थे. इस घटना के ठीक सौ साल पहले 1893 में इसी धर्म संसद में पहली बार दुनिया ने विवेकानंद को सुना था.
श्रीनिवास जैसी प्रतिभाएं दुनिया भर में मुकाम ज़रूर बनाती रहीं लेकिन बिहार हेल्थ इंडेक्स में लगातार पिछड़ता गया, ये अजीब विरोधाभास है.

साभार - बीबीसीहिंदी 
संकलन 
कहानीबाज
https://www.bbc.com/hindi/india-49144232

Wednesday, 24 July 2019

भारत की आजादी की कही हुई दास्तान, वो तारीख जिसके बारे में आप कई बार सुन चुके हैं । - कहानीबाज

ये कहानी 70 साल पहले की है, जब देश दो हिस्सों में बँट गया-- भारत और पाकिस्तान. विभाजन के इतिहास से जुड़ी कुछ अहम तारीख़ों पर एक नज़र.

दिसंबर 1885 में `इंडियन नेशनल कांग्रेस की पहली बैठक मुंबई में हुई थी. पहले बीस वर्षों में, कांग्रेस का ज़ोर आज़ादी से ज्यादा ब्रिटिश राज में रह रहे भारतीय लोगों की दशा सुधारने पर था।

लेकिन 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद, कांग्रेस ने राजनीतिक सुधार की मांग तेज़ कर दी और आख़िरकार पूर्ण स्वराज के लिए आवाज़ उठाई.

1906 में “भारतीय मुसलमानों के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए” मुस्लिम लीग की स्थापना की गई.


गांधी औऱ जिन्ना वार्ता विफल  1938-1942
फ़रवरी 1938 में महात्मा गाँधी और मोहम्मद अली जिन्ना ने देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जारी तनाव का हल निकालने के लिए बातचीत शुरु की. लेकिन ये बातचीत जुलाई में नाकाम हो गई. दिसंबर में मुस्लिम लीग ने “मुसलमानों के उत्पीड़न” की जाँच के लिए एक समिति बनाई.

फ़रवरी 1938 में महात्मा गाँधी और मोहम्मद अली जिन्ना ने देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जारी तनाव का हल निकालने के लिए बातचीत शुरु की. लेकिन ये बातचीत जुलाई में नाकाम हो गई. दिसंबर में मुस्लिम लीग ने “मुसलमानों के उत्पीड़न” की जाँच के लिए एक समिति बनाई.
पाकिस्तान बनने की कड़ी में एक अहम पड़ाव 23 मार्च 1940 को आया. इस दिन मुस्लिम लीग ने लाहौर में एक प्रस्ताव रखा जिसे बाद में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ के नाम से भी जाना गया. इसके तहत एक पूरी तरह आज़ाद मुस्लिम देश बनाए जाने का प्रस्ताव रखा गया.
वहीं वायसराय लिनलिथगो ने अगस्त प्रस्ताव की घोषणा की, जिसमें कार्यकारी परिषद और एक नई युद्ध सलाहकार परिषद में भारतीय प्रतिनिधियों की नियुक्ति किए जाने का ऐलान हुआ.कांग्रेस और लीग ने अगस्त प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया और 17 अक्तूबर को कांग्रेस ने अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दिया.

ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने राजनीतिक और कानूनी गतिरोध दूर करने की कोशिश की. इसके लिए 11 मार्च 1942 को ब्रिटिश संसद में घोषणा की गई कि इंग्लैंड के प्रसिद्ध समाजवादी नेता सर स्टिफ़र्ड क्रिप्स को जल्द ही नए सुझावों के साथ भारत भेजा जाएगा जो राजनीतिक सुधारों के लिए भारतीय नेताओं से बातचीत करेंगे.
22-23 मार्च 1942 को सर स्टिफ़र्ड क्रिप्स दिल्ली आए. उन्होंने भारतीय नेताओं से लंबी बातचीत की और 30 मार्च को क्रिप्स प्रस्ताव प्रकाशित हुआ.
क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को भारतीय राष्ट्रवादियों ने नामंज़ूर कर दिया.
साल 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्‍व में भारत छोड़ो आंदोलन शुरु हुआ.

महात्मा गाँधी और जिन्ना ने सितंबर 1944 में पाकिस्तान की मांग पर बातचीत की, पर ये वार्ता नाकाम रही. इस मुद्दे पर दोनों में गहरे मतभेद थे.
जिन्ना को पाकिस्तान पहले चाहिए था और आज़ादी बाद में जबकि गाँधी का कहना था कि आज़ादी पहले मिलनी चाहिए. ऐसी आज़ादी जिसमें प्रमुख रूप से हिंदू बहुमत वाली अस्थायी सरकार, मुसलमानों की पहचान सुरक्षित रखने का आश्वासन दे.
1946 में मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन की योजना से खुद को अलग कर लिया और आंदोलन छेड़ दिया जिसके बाद देश भर में मारकाट शुरू हो गई.
हिंसा की पहली लहर कलकत्ता में 16 से 18 अगस्त के बीच शुरू हुई. ‘ग्रेट कैलकटा किलिंग्स' के नाम से याद की जाने वाली इस घटना में करीब 4000 लोग मारे गए, हज़ारों घायल हुए और लगभग एक लाख लोग बेघर हुए. इस हिंसा की आग पूर्वी बंगाल के नोआखाली ज़िले और बिहार तक फैल गई.

1947- विभाजन का साल




29 जनवरी को मुस्लिम लीग ने संविधान सभा को भंग करने की मांग की, फ़रवरी में पंजाब में भी सांप्रदायिक हिंसा शुरू हो गई.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि ब्रिटेन जून 1948 तक भारत छोड़ देगा और लॉर्ड माउंटबेटन वायसरॉय का पद संभालेंगे.
24 मार्च को लॉर्ड माउंटबेटन ने वायसरॉय और गवर्नर जनरल के पद की शपथ ली.
15 अप्रैल को गांधी और जिन्ना ने मिलकर आम लोगों से हिंसा और अव्यवस्था से दूर रहने की अपील की.
2 जून को माउंटबेटन ने भारतीय नेताओं से विभाजन की योजना पर बात की और 3 जून को नेहरू, जिन्ना और सिख समुदाय के प्रतिनिधि बलदेव सिंह ने ऑल इंडिया रेडियो के प्रसारण में इस योजना के बारे में जानकारी दी.

आख़िरकार 14 अगस्त को एक नया मुल्क पाकिस्तान बना और पाकिस्तान ने अपना पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया.
14 अगस्त की रात बारह बजे ब्रिटेन और भारत के बीच सत्ता का स्थांनातरण हुआ और 15 अगस्त को भारत ने अपना पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया.
लगभग सवा करोड़ लोग अपना घरबार छोड़ देश बदलने को मजबूर हो गए. अंदाज़न 5 से 10 लाख लोग हिंसा में मारे गए. हज़ारों महिलाओं को अगवा कर लिया गया. इतिहास के पन्नों में ऐसी त्रासदी की मिसाल बहुत कम मिलती है.
ऐसा कत्लेआम जिसमें बँटवारे की रेखा अपने साथ ग़ुस्सा, बेबसी और क्रूरता का सैलाब लेकर आई. यह रेखा अपने पीछे ऐसे ज़ख्म छोड़ गई जिन्हें आज भी दोनों देश पूरी तरह भर नहीं पाए हैं.

साभार- https://www.bbc.com/hindi/resources/idt-sh/partition_timeline_hindi
संकलन 
kahanibaaj.blogspot.com

कारगिल: जब रॉ ने टैप किया जनरल मुशर्रफ़ का फ़ोन....मोसाद की मदद से कारगिल युद्ध में मिली जीत

26 मई 1999 को रात साढ़े नौ बजे भारत के थलसेनाध्यक्ष जनरल वेदप्रकाश मलिक के सेक्योर इंटरनल एक्सचेंज फ़ोन की घंटी बजी. दूसरे छोर पर भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के सचिव अरविंद दवे थे. उन्होंने जनरल मलिक को बताया कि उनके लोगों ने पाकिस्तान के दो चोटी के जनरलों के बीच एक बातचीत को रिकार्ड किया है.
उनमें से एक जनरल बीजिंग से बातचीत में शामिल था. फिर उन्होंने उस बातचीत के अंश पढ़ कर जनरल मलिक को सुनाए और कहा कि इसमें छिपी जानकारी हमारे लिए महत्वपूर्ण हो सकती है.


कारगिल वॉर के दौरान थलसेना अध्यक्ष रहे जनरल वेद प्रकाश मलिक से बात करते हुए रेहान फ़ज़ल
Image captionकारगिल वॉर के दौरान थलसेना अध्यक्ष रहे जनरल वेद प्रकाश मलिक से बात करते हुए रेहान फ़ज़ल

जनरल मलिक ने उस फोन-कॉल को याद करते हुए बीबीसी को बताया, 'दरअसल दवे ये फ़ोन डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस को करना चाहते थे, लेकिन उनके सचिव ने ये फ़ोन ग़ल्ती से मुझे मिला दिया. जब उन्हें पता चला कि डीजीएमआई की जगह मैं फ़ोन पर हूँ तो वो बहुत शर्मिंदा हुए. मैंने उनसे कहा कि वो इस फ़ोन बातचीत की ट्राँस- स्क्रिप्ट तुरंत मुझे भेजें.'
जनरल मलिक ने आगे कहा, 'पूरी ट्रांस- स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद मैंने अरविंद दवे को फ़ोन मिला कर कहा मेरा मानना है कि ये बातचीत जनरल मुशर्रफ़ जो कि इस समय चीन में हैं और एक बहुत सीनियर जनरल के बीच में है. मैंने दवे को सलाह दी कि आप इन टेलिफ़ोन नंबरों की रिकार्डिंग करना जारी रखें, जो कि उन्होंने की.'

रॉ की टर्फ़ वॉर में दबदबा बनाने की कोशिश



ब्रजेश मिश्राइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

जनरल मलिक कहते हैं, ''तीन दिन बाद रॉ ने इन दोनों के बीच एक और बातचीत रिकार्ड की. लेकिन इस बार उसे डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिंजेंस या मुझसे साझा करने के बजाए उन्होंने ये जानकारी सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को भेज दी. 2 जून को जब मैं प्रधानमंत्री वाजपेई और ब्रजेश मिश्रा के साथ नौसेना के एक समारोह में भाग लेने मुंबई गया तो लौटते समय प्रधानमंत्री ने मुझसे ताज़ा ताज़ा 'इंटरसेप्ट्स' के बारे में पूछा.''

जनरल अज़ीज़इमेज कॉपीरइटPAK ARMY
Image captionपाकिस्तान सेना के पूर्व जनरल अज़ीज़ ख़ान

''तब जा कर ब्रजेश मिश्रा को अहसास हुआ कि मैंने तो उन्हें देखा ही नहीं है. वापस लौटते ही उन्होंने इस ग़लती को सुधारा और मुझे इस बातचीत की ट्रांस - स्क्रिप्ट भी भेज दी. ''
ये घटना बताती है कि लड़ाई के समय भी हमारा ख़ुफ़ियातंत्र जानकारियों को सबके साथ न बाँट कर चोटी के चुनिंदा लोगों तक पहुंचा रहा था ताकि 'टर्फ़ वॉर' में उनका दबदबा रहे.


टेप हुई बातचीत

टेप को नवाज़ शरीफ़ को सुनवाने का फ़ैसला

1 जून तक प्रधानमंत्री वाजपेई और सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति को ये टेप सुनवाए जा चुके थे.
4 जून को भारत ने इन टेपों को उनकी ट्राँस - स्क्रिप्ट के साथ प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को सुनवाने का फ़ैसला किया. अगर मुशर्ऱफ़ की बातचीत को रिकार्ड करना भारतीय इंटेलिजेंस के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, तो उन टेपों को नवाज़ शरीफ़ तक पहुंचाना भी कम बड़ा काम नहीं था.
सवाल उठा कि इन संवेदनशील टेपों को ले कर कौन इस्लामाबाद जाएगा?

भारतीय संपर्क सूत्रों की गुप्त इस्लामाबाद यात्रा

एक सूत्र ने नाम न लिए जाने की शर्त पर बताया कि इसके लिए मशहूर पत्रकार आर के मिश्रा को चुना गया, जो उस समय आस्ट्रेलिया गए हुए थे. उन्हें भारत बुला कर ये ज़िम्मेदारी दी गई.
इस डर से कि कहीं इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर उनकी तलाशी न ले ली जाए, उन्हें 'डिप्लोमैट' का दर्जा दिया गया ताकि उन्हें 'डिप्लोमैटिक इम्म्यूनिटी' मिल सके.
उनके साथ भारतीय विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव विवेक काटजू भी गए.


विवेक काटजूइमेज कॉपीरइटORF
Image captionविवेक काटजू, पूर्व राजनयिक

आर के मिश्रा ने सुबह साढ़े आठ बजे नाश्ते के समय नवाज़ शरीफ़ से मुलाकात कर उन्हें वो टेप सुनवाया और उसकी ट्रांस - स्क्रिप्ट उनके हवाले की.
मिश्रा और काटजू उसी शाम ये काम पूरा कर दिल्ली वापस आ गए. इस यात्रा को इतना गुप्त रखा गया कि कम से कम उस समय इसकी कहीं चर्चा नहीं हुई.
सिर्फ़ कोलकाता से छपने वाले अख़बार 'टेलिग्राफ़' ने अपने 4 जुलाई 1999 के अंक में प्रणय शर्मा की एक रिपोर्ट छापी जिसका शीर्षक था, 'डेल्ही हिट्स शरीफ़ विद आर्मी टेप टॉक.'


कारगिलइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इस रिपोर्ट में बताया गया कि भारत ने इस टेप को नवाज़ शरीफ़ को सुनाने के लिए विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव विवेक काटजू को इस्लामाबाद भेजा था.
रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमण ने 22 जून 2007 को आउटलुक पत्रिका में लिखे एक लेख 'रिलीज़ ऑफ़ कारगिल टेप मास्टरपीस ऑर ब्लंडर ?' में साफ़ कहा कि नवाज़ शरीफ़ को टेप सुनाने वालों को साफ़ निर्देश थे कि वो उस टेप को उन्हें सुना कर वापस ले आएं. उन्हें उनके हवाले न करें.
मिश्रा ने बाद में इस बात का खंडन किया कि उन्होंने ये काम किया था. विवेक काटजू ने भी कभी सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की.
इस सबके पीछे भारतीय ख़ेमे जिसमें रॉ के सचिव अरविंद दवे, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा और जसवंत सिंह शामिल थे, की सोच ये थी कि इन सबूतों से दो चार होने और इस आशंका के बाद कि भारत के पास इस तरह के और टेप हो सकते हैं, कारगिल पर पाकिस्तानी नेतृत्व और दबाव में आएगा.


आर के मिश्रा, पूर्व पत्रकारइमेज कॉपीरइटORF
Image captionवरिष्ठ पत्रकार आर के मिश्रा को ख़ासतौर पर इस्लामाबाद भेजा गया था.

टेपों को सार्वजनिक किया गया

इन टेपों के नवाज़ शरीफ़ द्वारा सुन लिए जाने के करीब एक हफ़्ते बाद 11 जून, 1999 को विदेश मंत्री सरताज अज़ीज़ की भारत यात्रा से कुछ पहले भारत ने एक संवाददाता सम्मेलन कर इन टेपों को सार्वजनिक कर दिया.
इन टेपों की सैकड़ों कापियाँ बनवाई गई और दिल्ली स्थित हर विदेशी दूतावास को भेजी गईं.


नवाज़ शरीफ़ और अटल बिहारी वाजपेयीइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionनवाज़ शरीफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी

मुशरर्फ़ की लापरवाही
भारतीय ख़ुफ़िया समुदाय के लोग अभी भी ये बताने में कतराते हैं कि उन्होंने इस काम को कैसे अंजाम दिया?
पाकिस्तानियों का मानना है कि इस काम में या तो सीआईए या फिर मोसाद ने भारत की मदद की. जिन्होंने इन टेपों को सुना है उनका मानना है कि इस्लामाबाद की तरफ़ की आवाज़ ज्यादा साफ़ थी, इसलिए संभवत: इसका स्रोत इस्लामाबाद रहा होगा.


परवेज़ मुशर्रफ़इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

कारगिल पर बहुचर्चित किताब 'फ़्रॉम कारगिल टू द कू 'लिखने वाली पाकिस्तानी पत्रकार नसीम ज़ेहरा अपनी किताब में लिखती हैं,' अपने चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टॉफ़ से इतनी संवेदनशील बातचीत खुले फ़ोन पर करके जनरल मुशर्रफ़ ने ये सबूत दिया कि वो किस हद तक लापरवाह हो सकते हैं. इस बातचीत ने सार्वजनिक रूप से ये सिद्ध कर दिया कि कारगिल ऑप्रेशन में पाकिस्तान के चोटी के नेतृत्व का किस हद तक हाथ है.'
दिलचस्प बात ये है कि अपनी बेबाक आत्मकथा 'इन द लाइन ऑफ़ फ़ायर' में परवेज़ मुशर्रफ़ इस घटना से साफ़ कन्नी काट गए और इस बातचीत का कोई ज़िक्र ही नहीं किया हाँलाकि बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में भारतीय पत्रकार एम जे अकबर को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने इन टेपों की असलियत को स्वीकार किया.

सरताज अज़ीज़ का दिल्ली में ठंडा स्वागत

इन टेपों को नवाज़ शरीफ़ के सुनवाए जाने के करीब 1 सप्ताह बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री सरताज अज़ीज़ दिल्ली पहुंचे तो पाकिस्तानी उच्चायोग के प्रेस काउंसलर बहुत परेशान मुद्रा में दिल्ली हवाई अड्डे के वीआई पी लाउंज में उनका इंतज़ार कर रहे थे.


सरताज अज़ीज़ के साथ जसवंत सिंहइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionपूर्व भारतीय मंत्री जसवंत सिंह के साथ पाक विदेश मंत्री सरताज अज़ीज़ और जी. पार्थसारथी

उनके हाथ में कम से कम छह भारतीय समाचार पत्र थे जिसमें मुशर्रफ़ अज़ीज बातचीत को हेडलाइन में छापा गया था. जसवंत सिंह ने अज़ीज़ से बहुत ठंडे ढंग से हाथ मिलाया.
इन टेपों से दुनिया और ख़ास तौर से भारत में ये धारणा मज़बूत हुई कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का कारगिल संकट में सीधा हाथ नहीं है और उनको सेना ने कारगिल अभियान की जानकारी से महरूम रखा है.

टेपों को सार्वजनिक करने की आलोचना

भारत के ख़ुफ़िया हल्कों में कुछ जगह इन टेपों को सार्वजनिक करने की आलोचना भी हुई.
रॉ के अतिरिक्त सचिव रहे और उस पर चर्चित किताब 'इंडियाज़ एक्सटर्नल इंटेलिजेंस - सीक्रेटेल ऑफ़ रिसर्च एंड अनालिसिस विंग' लिखने वाले मेजर जनरल वी के सिंह ने बीबीसी को बताया, 'ये पता नहीं है कि इन टेपों को सार्वजनिक कर भारत को अमरीका और संयुक्त राष्ट्र से कितने 'ब्राउनी प्वाएंटस' मिले, लेकिन ये ज़रूर है कि पाकिस्तान को इसके बाद इस्लामाबाद और बीजिंग के उस ख़ास उपग्रह लिंक का पता चल गया, जिस को रॉ ने 'इंटरसेप्ट' किया था. इसको उसने तुरंत बंद कर दिया.. इसका अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल है कि अगर वो 'लिंक' जारी रहता, तो हमें उसके बाद भी कितनी और महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली होतीं.'


वीके सिंह
Image captionरॉ के पूर्व अतिरिक्त मेजर जनरल वीके सिंह के साथ रेहान फ़ज़ल

चर्चिल का उदाहरण

मेजर जनरल वी के सिंह आगे कहते हैं, 'शायद रॉ या प्रधानमंत्री कार्यालय के उस समय के लोगों ने 1974 में प्रकाशित एफ़ डब्लू विंटरबॉथम की किताब 'अल्ट्रा सीक्रेट' नहीं पढ़ी थी जिसमें पहली बार दूसरे विश्व युद्ध के एक महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया स्रोत का ज़िक्र किया गया था. महायुद्ध की बहुत शुरुआत में ब्रिटेन ने जर्मनी के इंनसाइफ़रिंग डिवाइस 'एनिगमा' के कोड को तोड़ लिया था. इस जानकारी को अंत तक छुपा कर रखा गया और जर्मनों ने पूरे युद्ध के दौरान 'एनिगमा' का इस्तेमाल जारी रखा जिससे ब्रिटिश ख़ुफ़िया विभाग तक बेशकीमती जानकारियाँ पहुंचती रहीं. एक बार तो ब्रिटेन को यहां तक पता चल गया कि अगली सुबह 'लोफ़्तवाफ़े' यानि जर्मन वायु सेना कॉवेंट्री पर बमबारी करने वाली है. उस शहर के लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया कर उनकी जान बचाई जा सकती थी. लेकिन चर्चिल ने ऐसा न करने का फ़ैसला लिया, क्योंकि इससे जर्मनी को शक हो जाता और वो 'एनिगमा' का इस्तेमाल करना बंद कर देते.'


रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमनइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionरॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमन

भारत को मनोवैज्ञानिक युद्ध में फ़ायदा

लेकिन दूसरी तरफ़ रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमन का मानना था कि इन टेपों को सार्वजनिक करना मनोवैज्ञानिक युद्ध का सबसे बड़ा नमूना था. इसने हमारी सेना के उस दावे को पुख़्ता किया कि घुसपैठिए पाकिस्तानी सेना के 'रेगुलर' सिपाही हैं न कि जिहादी पृथकतावादी जैसा कि मुशर्रफ़ बार बार कह रहे थे.
इस जानकारी से अमरीका को इस फ़ैसले पर पहुंचने में भी आसानी हुई कि पाकिस्तान ने कश्मीर में नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया है और उन्हें हर हालत में भारत की भूमि से हटना चाहिए.
इन टेपों ने पाकिस्तानी लोगों के बीच पाकिस्तानी सेना और मुशर्रफ़ की विश्वस्नीयता भी संदेह के घेरे में ला दी. आज भी पाकिस्तान में बहुत से लोग हैं जो कारगिल पर मुशर्रफ़ की सुनाई कहानी को सिरे से ख़ारिज करते हैं.
इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इन टेपों को सार्वजनिक करने का वजह से ही दुनिया का पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा और उसे कारगिल से अपने सैनिक हटाने पड़े.
साभार- BBCHINDI 
संकलन- kahanibaaj.blogspot.com