Thursday, 19 December 2019

फांसी से पहले रामप्रसाद बिस्मिल मां से मिलकर रोने लगे थे । - कहानीबाज




9 अगस्त 1925 को गुलाम हिंदुस्तान के लखनऊ से करीब कुछ ही दूरी पर काकोरी कांड की घटना ने बिरतानिया हुकूमत की नींव हिला दी थी। 19 दिसंबर 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जिला जेल, अशफाक उल्लाह खान को फैजाबाद जिला जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद के मलाका जेल में फांसी दी गई थी। आजादी के मतवालों ने अपनी शहादत देकर आने वाले आजाद हिंदुस्तान की नींव का निर्माण कर दिया था। लेकिन कुछ किस्सा इतना दिलचस्प है जिसे सुनकर आज भी शरीर सिहरन से भर उठता है। इन्हीं किस्सों के पुलिंदों में एक किस्सा है रामप्रसाद बिस्मिल का, जो फांसी के कुछ वक्त पहले की घटना है। 

फांसी से पहले रामप्रसाद बिस्मिल की मां बिस्मिल से आखिरी बार मिलने जेल पहुंची। लकड़ी के टूटे बेंच पर हाथों में खाने की पोटली लिए मां के घंटों इंतजार के बाद उनके सामने जंजीरों में जकड़े उनके बेटे को लाया गया। एक दारोगा की गुजारिश पर अंग्रेज अधिकारी ने बिस्मिल के जंजीर खोल दिए। जंजीर खुलते ही बिस्मिल मां के पैरों को चूमकर उसे गले से लगा लिया। मां का कलेजा भी गर्व से फूला हुआ था, वो भी अपने बेटे को एक बच्चे की भांति अपनी आगोश में समेट लेना चाह रही थी। लेकिन अचानक मजबूत हृदय वाले क्रांतिकारी बिस्मिल की आंखों में आंसू गए। बिस्मिल के मानस में मां से जुड़ी तमाम स्मृतियां साकार हो उठी।मां के स्नेह और वात्सल्य को याद कर बिस्मिल का मन भर आया।बिस्मिल को रोते देख मां इसका कारण समझ गई, लेकिन अपने आंसू बहाकर बिस्मिल को औऱ कमजोर नहीं करना चाहती थी। खुद की भावनाओं पर काबू रखते हुए मां भर्राए गले से बोल उठी - “‘मैं तो समझती थी कि तुमने अपने आप पर विजय पा ली है। किंतु यहां तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है। अगर तुम्हें मौत से इतना ही डर लग रहा है तो किसने कहा था तुम्हें क्रांतिकारी बनने” ? 
मां की बातों पर बिस्मिल आंखों के आंसूओं को पोछने लगा औऱ इससे पहले कुछ बोलने की कोशिश करता , मां ने हिम्मत बांधकर बिस्मिल को संभालना चाहा- “जीवन पर्यंत देश के लिए आंसू बहाकर अब अंतिम समय तुम मेरे लिए रोने बैठे हो? यह कायरता ठीक नहीं। तुम्हें वीर की भांति हंसते हुए प्राण देते देखकर मैं स्वयं को धन्य समझूंगी। मुझे गर्व है कि इस गए-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश के लिए स्वयं को बलिदान कर रहा है। मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था। उसके बाद तुम देश के लिए ही थे और उसी के काम गए। मुझे इसका तनिक भी दुख नहीं है।क्रांतिकारी रोया नहीं करते 
मां की बात सुनकर बिस्मिल ने खुद के आंसुओं पर नियंत्रण पाते हुए मां का हाथ पकड़ते हुए जोश में कहा -“‘मां! मुझे अपनी मृत्यु पर कतई दुख नहीं है। विश्वास रखिए, मैं अपनी मृत्यु पर बहुत संतुष्ट हूं। बस थोड़ा इस बात से चिंतित हूं कि अगले जनम भी मुझे तेरा बेटा बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा या नहीं

बिस्मिल की बात सुनकर मां रोई नहीं बल्कि मुस्काराते हुए कह गई कि तू तो अब सबसे बड़ी मां भारत मां का बेटा हो गया वो भी कई जनमों के लिए मां से आखिरी वक्त विदा लेते हुए बिस्मिल ने उनका पैर चूमकर मिट्टी माथे पर लगाकर चुपचाप अपनी बैरक में वापस चला गया।  

फांसी वाले दिन गोरखपुर जेल में जब जेलर राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी के लिए लेने आईं तो वह काफी अच्छे मूड में थे। इस समय वह कसरत कर रहे थे। इस दौरान जेलर ने उनसे कहा कि अब आपको फांसी होने जा रही है, आपका कसरत करने का क्या फायदा है ?  इसके बाद उन्हेंने जेलर को करारा जवाब दिया। राम प्रसाद बिस्मिल ने कहा था मैं कसरत इसलिए कर रहा हूं ताकि स्वस्थ रहूं और अगले जन्म में में ब्रिटिश हुकूमत का खात्मा कर सकूं।  इतना बोलते ही बिस्मिल जोर जोर से हंसने लगे थे। उसके बाद जेलर एक शब्द भी ना कह सका। बिस्मिल ने फांसी से पहले उसी जेलर को एक मुट्ठी मिट्टी देते हुए कहा हो सके तो मेरे बैरक में इस मिट्टी को रखवा देना। 
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु--कातिल में है। 

पटना के अजीमाबाद के मशहूर शायर बिस्मिल अजीमाबादी की रचना पढ़कर रामप्रसाद बिस्मिल फांसी के फंदे को चूमकर शहीद हो गए। बिस्मिल आज भले ही सिर्फ बातों में बचे हों लेकिन उनकी कहानियां हमेशा जज़्बातों में जिंदा रहेगी। 

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता