Sunday, 25 August 2013

माशूका अनारकली की जिंदगी की आखिरी रात की सच्चाई!




इतिहास के कई काल खंडों में एक से बढ़कर एक कहानियां बिखरी हैं, जिनकी हकीकत को बयां करने के लिए भले ही कितने भी सबूत क्यों न मौजूद हों, कम ही पड़ जाते हैं। कुछ ऐसा ही वाकया पेश आता है मुगलिया दौर के नायक-नायिकाओं और उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं को लेकर भी। सलीम-अनारकली के प्रेम प्रसंग को ही लें।

कितना कुछ जानते हैं हम उनके अमर प्रेम के बारे में, फिर वो चाहें किस्से-कहानियां हों, किताबें हों या फिर कोई नाटक या फिल्में, जिनमें हमेशा से ही इनके सच्चे प्यार को जगह मिलती रही है। इन दोनों के प्यार के बारे में कौन नहीं जानता। पर आज इस स्पेशल स्टोरी को पढ़िए और जानिए क्या थी एक मरती हुई माशूका की आखिरी हसरत?


अनारकली और शहजादा सलीम का प्रेम प्रसंग जगजाहिर है। दोनों एक दूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे। मुहब्बत के नशे में चूर इस जोड़े को इस बात का इल्म न था कि उनकी प्रेम कहानी का इतना मार्मिक हश्र होगा। इस जोड़े ने साथ मिलकर प्यार के कई इम्तहान तो पास किए, मगर आखिरकार दुनिया के दस्तूर के आगे इस जोड़े को भी झुकना पड़ा। और तो औऱ, इनके प्यार को अगर सबसे ज्यादा किसी को ऐतराज था तो वे थे शहंशाह अकबर। वो नहीं चाहते थे कि शहजादा सलीम, जिसे आगे चलकर बादशाह बनना था, वो किसी कनीज के प्यार में इस कदर डूब जाए कि वो अपने होश-हवास खो बैठे।
अकबर का ऐतराज इस बात पर भी था कि अगर सलीम ने अनारकली से शादी कर ली तो अनारकली को मल्लिका-ए-हिंदोस्तां की उपाधि दी जाएगी। यह उनकी हुकूमत के लिए काफी शर्मसार करने वाला क्षण होगा। इस बात को मद्देनजर रखते हुए शहंशाह अकबर ने शहजादा सलीम को कई बार चेताया, समझाया और यहां तक कि बेदखल करने की धमकी भी दी, मगर मुहब्बत के इस परवाने पर कोई असर न हुआ।

आखिरकार, अकबर की ज्यादतियों से तंग आकर सलीम ने अपने ही पिता के खिलाफ बगावत कर दी। 
सलीम को जंग में शिकस्त का सामना करना पड़ा और बादशाह अकबर ने सलीम के आगे यह शर्त रखी की या तो वह अनारकली को उनके हवाले कर दे या फिर मौत के लिए तैयार रहे। सलीम ने अनारकली को सौंपने के बजाए मौत का दामन थामने का निर्णय किया। मगर ऐन वक्त पर अनारकली ने बादशाह अकबर के आगे समर्पण कर दिया।
बादशाह अकबर नहीं चाहते थे कि एक अदनी-सी कनीज सलीम से शादी कर मल्लिका-ए-हिंदोस्तां बने। इसलिए उन्होंने पहले भी सलीम और अनारकली को चेताया था कि वे इस मुहब्बत को भूल जाएं। मगर ये हो न सका। सलीम के लिए अनारकली की चाहत बढ़ती ही चली गई। इस बात से बेखबर कि आने वाले वक्त में उसकी मुहब्बत के लिए बहुत भारी होने वाला है। वह तो बस शहजादे की मुहब्बत में गिरफ्तार रही। अकबर को यह सब बर्दाश्त न हुआ और उन्होंने अनारकली को बंधक बना कर तहखाने में कैद कर लिया।
जब सलीम को इस बात का पता चला तो उन्होंने अनारकली को तहखाने की कैद से छुड़ा कर अपने ही पिता के खिलाफ अपने साथियों को लेकर बगावत का ऐलान किया। पर वे सफल न हो सके। अकबर ने अब तक फैसला कर लिया था कि अनारकली को अब हर हाल में मरना ही होगा। जब अनारकली ने बादशाह के आगे समर्पण किया, तब अकबर ने उसे गिरफ्तार करवा कर मौत की सजा मुकर्रर कर दी। 

अनारकली से जब उसकी आखिरी ख्वाहिश पूछी गई तो उसने अपने दिल की हसरत जाहिर की। मौत से पहले बस एक आखिरी रात अपने आशिक शहजादा सलीम के साथ गुजारने का मौका दिया जाए। अनारकली को मालूम था कि उसके पास कोई रास्ता नहीं है, फिर भी बादशाह अकबर ने उसे एक बार फिर जिंदगी जीने का मौका देते हुए कहा कि तुम चाहो तो जिंदगी मांग सकती हो। सच्ची मुहब्बत की गिरफ्त में कैद अनारकली ने मांगी तो मांगी केवल एक ही चीज और कहा कि अगर हो सके तो वह अपनी मुहब्बत शहजादा सलीम की बांहों में मरना चाहती है।
ऐसा न भी हो सके तो बस एक बार उसे एक दिन शहजादा सलीम के साथ बिताने दिया जाए, ताकि वह जीवन भर की अपनी यादों को अपने प्रियतम के साथ समेट सके। कुछ वक्त साथ बिता सके। मुहब्बत के जाम पी सके और फिर इन्हीं सुनहरे यादों के सहारे वो मौत को गले लगा लेगी। 
बादशाह अकबर इस बात के लिए राजी हो गए। मगर शर्त वही थी कि अगर इस बात का पता शहजादा सलीम को चला तो न वो बचेगी और न ही सलीम। अपने प्रेमी की जिंदगी बचाने के लिए अनारकली ने हंसते हुए फैसला कर लिया कि उसे क्या करना है। उसने अपने प्रेमी के जीवन की खातिर सुनहरी यादों के साथ मौत को गले लगाना ही बेहतर समझा। 
अनारकली ने फिर अपने जीवन का आखिरी दिन सलीम के साथ बिताया। दोनों ने प्रेम की गहराइयों में गोते लगाते हुए एक-दूसरे के आगोश में दिन काट दिया। बीतते वक्त के साथ अनारकली के वादे का समय हो रहा था। फिर उसने शहजादा को जाम पिला कर मदहोश कर दिया। 
मदहोशी की हालत में शहजादे को छोड़कर अनारकली ने अकबर के आगे समर्पण कर दिया। शाही फैसले के अनुसार उसे जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया। एक कहानी यह भी कहती है कि अकबर ने उसे जीवन दान दे दिया और सजा के बाद उसे तत्काल गुप्त सुरंगों के रास्ते मुगलिया सल्तनत के बाहर भेज दिया गया, जिसके बाद कभी उसका पता नहीं चल पाया।
खैर, सच्चाई जो भी हो इस बात को कोई नहीं झुठला सकता कि अनारकली के इस कदम ने उसे मुहब्बत के सच्चे पैरोकारों के तौर पर हमेशा के लिए अमर कर दिया। 
अनारकली का वास्तविक नाम नादिरा था। उसको यह नाम सलीम ने दिया था। अनारकली का जन्म लाहौर में16वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में हुआ था। वह बला की खूबसूरत थी और शहजादा सलीम अय्याश।
अकबर को जब यह बात पता चली तब उन्होंने सलीम को 14 साल के लिए सेना में रहकर सैनिक अनुशासन सीखने का हुक्म दिया। सलीम जब 14 साल बाद लौटकर लाहौर आया, तब उसके जश्न में अनारकली का मुजरा पेश किया गया। सलीम पहली ही नजर में अनारकली को दिल दे बैठा। अनारकली का दिल भी शहजादे के लिए धड़क उठा।

इसके बाद दोनों प्यार के समंदर में गोते लगाते रहे, पर उन्हें इस बात का इल्म न था कि उनके प्यार का हश्र कुछ इस तरह का होगा।

अनारकली को लाहौर में जिस जगह चुनवाया गया था, वहां आज अनारकली मार्केट है, जो पाकिस्तान के सबसे बड़े मार्केट में से एक है। 

    क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता 

No comments:

Post a Comment