कहानीबाज हूं मैं किताबों के सहारे जिंदगी कट जाए तो जिंदगी कैसी होगी ? पता नहीं!लेकिन किताबों के सहारे जिंदगी के साथ मैं हर उस कहानी को सुनहरे पर्दे पर प्रकाश की परिकल्पना करते हुए पेश करना चाहता हूं जिसमें मैंने सिनेमा की झलक देखी है। मैने अपनी जिंदगी से शर्त लगा रखी है कि मैं अपने ज़ेहन में बसी हर कहानी को सिनेमा का वो रूप दूंगा, जिसे दुनिया देखती रह जाएगी। फिल्म मेरे लिए नशा है। मैं इसी नशे में जिऊंगा।
Saturday, 1 February 2014
दर्द भरी वादी : सुकून या सितम
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I am कहानीबाज़। कहानियां लिखता हूं, औऱ फिर उसे सिनेमाई परदे तक पहुंचा कर कहानियों को मोक्ष की प्राप्ति करवाता हूं।
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