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| Writer & Director Rajnish BaBa Mehta |
मु्क़्तार सिंह ! पूरा नाम जानने में कई महीने लग गए, औऱ आधा नाम से कई महीनों तक इसी गफ़लत में था, कि मुक़्तार मुसलमान है। शूटिंग सेट पर जब भी मुक़्तार से मुलाकात होती तो कभी-कभार सलाम वालैकुम उससे कहता , मुंह में पान चबाता मुक़्तार बिना दाँत दिखाए हल्की वाली हँसी हँसते हुए, सर पर हाथ फेरता औऱ चुपचाप बगलियां झाँकते हुए पास से निकल लेता था। औऱ मैं हर बार यही सोचता कि ये सलाम वालैकुम का जवाब क्यों नहीं देता है ? दरअसल एक रोज़ पुलिस स्टेशन के सेटअप पर शूटिंग कर रहा था, औऱ वहां अपने मुक़्तार भाई, प्रॉडक्शन की मुफ़लिसी को छुपाने के लिए, खुद सेट पर ऐसे लगा हुआ था, जैसे मानों कोई बड़ा सेटअप, आज लगा ही डालेगा। पूरा हाथ पेंट से पुता हुआ, लेकिन मुंह गुटखे की वजह से हनुमान बना हुआ था। सेट में घुसते ही मुक़्तार लपककर कर मेरी तरफ आया औऱ पास दीवार पर थूकते ही बोला ‘सर सेटअप में कोई कमी हो तो बताईए, फ़ौरन दूर कर देंगे’। मैं भी अनायास बोल पड़ा ‘मुख़्तार मियां, बात अगर थोड़ी बहुत की होती, तो मैं खुद से ही कर लेता, लेकिन कमी की लड़ाई बहुत लंबी है, औऱ लड़ाई भी कुछ बड़े ओहदे वालों से है, रहने दो, जो सेटअप लगा है उसी में शूटिंग हो जाएगी’। हर बार की तरह टेलीविजन के फॉर्मेट के चक्कर में मैंने इस बार भी अपनी एसथेटिक्स का गला घोंट दिय। खैर मेरे हां कह देने भर से ही बात सेटअप की तो खतम हो गई थी । लेकिन मुक़्तार के नाम में मियां लग जाने से वो थोड़ा ख़फ़ा-सा हो गया, पूरा गुटखा वहीं गमले की जड़ में थूका औऱ भागकर वापस आते ही तपाक से बोल पड़ा- ‘सर हमहुं गोरखपुर के ठाकुर हैं, , मियां भाई नहीं। हमरा नाम मुख़्तार मियां नहीं सर, मुक़्तार सिंह है, ख नहीं क़, वो भी नुक़्ते के साथ, औऱ गांव में लोग मुख़्तार अंसारी की वजह से हमरे नाम को भी मुक़्तार से मुख़्तार कर दिया’। बस उसी दिन से हम भी कभी-कभी मुक़्तार की जगह अपना नाम मुख़्तार बोल देते हैं , लेकिन पहली बार अपना नाम किसी को सही-सही बताया तो वो आप हैं । शूटिंग के आर्ट डिपार्टमेंट में काम करने वाला मुक़्तार को आज कितना बुरा लगा होगा , कि लोग उसे मुसलमान समझते हैं। दरअसल है वो हिंदू, औऱ सबसे बड़ी बात ये थी कि मैं उसके मनोभाव के दर्द को समझ गया था, कि ये लड़का इतने दिनों में पहली बार अपना सही नाम सही-सही बताकर कैसा महसूस कर रहा होगा ? लेकिन आज ये पहली बार मेरे सामने मुसलमान ना होने की नाराज़गी औऱ अपने नाम को नुक़्ते के साथ सही तरीक़े से बताया। वो भी सोचा होगा, बहुत हो गया साला आज भड़ास निकाल ही देता हूं, शायद कल सबको मेरा नाम सही तरीके से पता चल जाए, औऱ बोलना भी शुरू कर दे ! थोड़ी देर एक ही जगह खड़ा-खडा़ उसकी परिस्थिति में खुद को रखकर देखा औऱ सोचा कि अगर मैं होता तो फिर गलत नाम औऱ ख़ासकर ग़लत धऱम का संबोधन खुद के लिए तो क़तई बर्दाश्त नहीं करता।
ख़ैर मुक़्तार की कहानी इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि आर्ट डिपार्टमेंट में काम करने वाला मुक़्तार सिंह उस बेनाम बहादुर हीरो की तरह है, जो बहादुरी की काम कर नाम फैलाने में क़तई विश्वास नहीं रखता है। दरअसल ऐसा करना उसकी फ़ितरत इसलिए नहीं है, क्योंकि वो जानता है कि अमीरों के इस खेल में दाव कभी-कभी उल्टा पड़ जाता है. और खुदा ना ख़ास्ता अगर उसके मामले में कहीं पड़ गया तो फिर बहादुरी की जगह बदनामी भी झेलनी पड़ सकती है औऱ उपर से नौकरी तो जाएगी ही जाएगी। इसलिए ज़ुबान बंद रखना ही बेहतर है, वो भी क्यों ना गुटखे से ही रखना पड़े।
दरअसल मुक़्तार की कहानी कुछ ऐसी है कि जिस प्रोडक्शन हाउस में मैं मशहूर चैनल के लिए टेलीविजन शो कर रहा हूं उसी प्रोडक्शन हाउस में वो पिछले 11 सालों से पूरी वफ़ादारी और इमानदारी के साथ काम कर रहा है। बस लापरवाही के नाम पर वो बीच शूटिंग के दौरान मोबाईल में भोजपुरी गाने सुनने बैठ जाता है, दरअसल मुक्तार को भोजपुरी हीरोइन बहुत नहीं, बल्कि बहुत्ते आकर्षित करती थी, और जब उसके पसंद का गाना कानों को लगता था तो फिर माइक में कितनी भी तेज आवाज में उसे बुलाया जाए वो सुनकर भी अनसुना कर देता है । लेकिन मुक़्तार के काम में कोई कमी नहीं। एक रोज़ मैं भी उसे अच्छे काम के लिए एक बीयर देने का वादा कर दिया। फिर क्या था हर रोज वो अच्छा काम करता औऱ अपने बीयर की गिनती में इज़ाफ़ा करने लग गया। गिनती 8 तक पहुँची तो फिर डिलीवरी भी लेनी शुरू कर दी ।
उस रात भी मुक़्तार अपने बीयर के नशे में चूर, बेफ़िक्राना अंदाज में जयपुर हाउस के कमरा नंबर 107 में बने सीढ़ीनुमा बिस्तर पर पसर कर सो रहा था। रात के क़रीब 2:30 बजे थे, स्टूडियों वीरान, सिर्फ हवाओं की अवाज सांय सांय करती हुई गूंज रही थी।
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अगर उस वक्त मुक़्तार के सोते चेहरे को अगर आप देख लेते तो आपको पता चलता कि दिन में तूफ़ान की तरह काम करने वाला ये पागल, रात के आखिरी पहर में कैसे शांत, शिथिल और बेजान सा हो जाता है। मुक़्तार के पीने की वजह जब सुना तो समझ आया कि बात तो सही कह रहा है। मुक़्तार का मानना था कि दिन भर शूटिंग के दौरान हर डिपार्टमेंट के थपेड़ों को झेलने के बाद रात में गहरी नींद के लिए कुछ दवाई तो चाहिए, अगर पीउंगा नहीं तो सपना भी आएगा, औऱ फिर सपने में भी जी हुजूर बोलता हुआ मिलूंगा ।
उस रात हुआ भी वही। 2:30 बजे रात के बाद आखिरी पहर जैसे ही शुरू हुआ, जयपुर हाउस की बिल्डिंग में वो 55 साल का सिक्योरिटी वाला पागलों की भाँति हर फ़्लोर पर बने कमरे के दरवाजे को तेज-तेज पीटता हुआ भागता जा रहा था। बेफ़िक्री ख्याल से सो रहा मुक़्तार दरवाजे पर तेज आवाज की वजह से एकाएक नींद से जागा और हड़बड़ाते हुए कमरे का दरवाजा खोलकर वॉचमैन के पीछे लपक लिया । एक पल के लिए मुक़्तार को कुछ समझ नहीं आया लेकिन दो मिनट के अंदर लोगों की चीख़-पुकार मच गई। पूरा आसमान रोशनी से लाल हो रखा था, औऱ आसमान में चांद अपने पूरे शबाब पर था । फूल मून की इस रात में मुक़्तार स्टूडियो में बने जयपुर हाउस से फ़्लोर नंबर 5 की तरफ नंगे पांव भागा। फ्लोर नंबर 5 में टेलीविजन की दुनिया का सबसे मशहूर सीरियल का सेट लगा हुआ था, और उसी स्टूडियो की बाहरी दीवार की तरफ एक बड़े से राजमहल का सेट ऐसे दिखता था मानों अकबर ने खुद अपने हाथों से बनाया हो।
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फ़्लोर नंबर 5 के गेट के सामने जैसे ही मुक़्तार सिंह पहुंचा, सामने का नजारा देखकर वो सन्न रह गया, उसका पूरा शरीर पत्थर की मानिंद एकदम से कठोर, औऱ पैर ज़मीन में धंसा हुआ महसूस करने लगा। आँखों में आंसू लिए मुक़्तार चाह कर भी एक क़दम हिल नहीं पा रहा था। पूरा स्टूडियो अंदर औऱ बाहर से धू-धू कर जल रहा था। आसमान में चांद ऐसे खिल रहा था मानों रात पूर्णिमा की हो औऱ आग चांद का क़दम छूने को बेकरार हो रहा हो। कभी-कभी मौत हसीन सी लगती है, शायद ये वक्त वही था, जब वो मीनार से उठती आग एक गुलदस्ते की माफ़िक़ एकदम ख़ूबसूरत लग रही था। दिखने में रूहानी, लेकिन ज़ेहन में भयावह तस्वीर इसलिए बन रहा था, क्योंकि सुबह जब भौतिकवादी दुनिया का दीदार होगा तो नफ़ा औऱ नुक़सान के तराज़ू पर कितनों का पलड़ा भारी होगा तो कितनों को हल्के दामों में सरे बाज़ार बेचा जाएगा। हालांकि मुक़्तार सिंह पिछले 11 साल से हर फ़्लोर पर ना जाने कितने सेट बनते और टूटते देखा था। टेलीविजन की दुनिया की ना जाने कितने सीरियल की तक़दीर इन सेट के ज़रिए बनते औऱ बिगड़ते देखा। सेट को बनने के बाद संभालने औऱ सँवारने की ज़िम्मेदारी मुक़्तार के कंधों पर भी रहती थी औऱ आज भी है। लेकिन आज ये पहला मौका था जब किसी शूटिंग के सेट को मुक़्तार इस तरह जलतकर राख होते देख रहा था। एक पल के लिए मुक़्तार बुत बना खड़ा ही रह गया, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे, कहां जाएं औऱ इस भयानक आग पर क़ाबू कैसे पाया जाए। लेकिन तब कुछ लोग मदद के लिए सोते हुए गांव वालों को उठाकर स्टूडियो ले आए , जिसके बाद लोग आग बुझाने के लिए वहीं पानी का जुगाड़ ढ़ूढ़ने में लग गए। एक मिनट के बाद मुक़्तार उल्टे पांव ऐसे भागा मानो वो इस आग को देखकर डर गया हो औऱ कहीं ऐसी छुप जाना चाहता हो, जहां उस आग की गरमी महसूस ना हो ।
उल्टे पांव भागते हुए मुक़्तार को हर कोई पीछे से पुकार रहा था, लेकिन उस वक्त खुद मुक़्तार को ही पता था कि उसे क्या करना है। स्टूडियो नंबर तीन के सामने बने किचन के बाहर मुक़्तार रूका औऱ मिनरल वाटर की 20 लीटर वाली क़रीब 20 बोतल को मु्ख्तार 5 मिनट तक लेकर दौड़ता रहा औऱ उस ना बुझने वाली आग को बुझाने की नाकाम कोशिश करता रहा। पानी जब ख़तम हो गया तो हाथ में गेहूँ वाले बोरे को लेकर आग बुझाने में जुट गया। जुट का वो बोरा आधी आग पकड़ चुका था लेकिन मुक़्तार को इस बात का कतई अंदाज़ा नहीं हुआ कि वो धीरे धीरे झुलसता जा रहा है । वो लगातार उस बोरे से आग बुझाने की नाकाम कोशिश के दौरान खुद को भी आग से बाहर नहीं रख पा रहा था। 11 साल से जिस घर के एक-एक कतरे को बनते देखा, वो आज उसकी आँखों के सामने ख़ाक बन रहा था। बोरे से आग बुझाने के दौरान मुक़्तार को शायद पता भी ना चला कि उसकी उँगलियां औऱ हाथ के कई हिस्से जल गए। बेचारा मुक़्तार खुद के दर्द को तो कब का भूल चुका था, उसकी नज़रें सामने आग से हट ही नहीं रही थी।
लेकिन कहते हैं ना कि प्रकृति का प्रकोप जब होता है तो फिर इंसानी कोशिश काम नहीं आती है। महल की मीनारों में लगी आग की वजह से उसके हिस्से धीरे-धीरे ढ़हकर ऐसे गिरते जा रहे थे मानों खिलौना हो। औऱ 2 घंटे में फ़्लोर नंबर 5 का अंदरूनी हिस्सा पूरी तरह जल चुका था। उस हसरती महल के सामने 5 फ़ीट 7 इंच का मुक़्तार आग बुझाने की नाकाम कोशिश में पागलों की तरह चिल्लाता जा रहा था। एक पल के लिए मानों सब कुछ ठहर गया हो, सिर्फ औऱ सिर्फ आसमान में चांद औऱ फिजाओँ में बहती हवा अपनी मौजूदगी का एहसास दिला रही थी। लेकिन ख़्वाहिशों और हसरतों के लिए पलने वाला बेगाना दिन आज शांत हो चुका था। रात की बीयर का नशा अब तक कोसों दूर हो चुका था। हर कोई अपने बोझिल क़दमों के साथ स्टूडियो के रोड पर यहां-वहां जमा होकर बस चर्चा करने में लग गए थे । रात के आखिरी पहर का का माहौल अब ऐसा लग रहा था मानों शाम के 9 बजे का वक्त हो,जब शूटिंग का पैकअप होने वाला होता है। लेकिन उस वक्त मुक़्तार ना तो किसी से कोई चर्चा करना चाहता था, और ना ही इस विषय में अपनी राय देने की स्थिति में था। नुकसान भले कंपनी के मालिक का हुआ हो लेकिन दिल पर पहाड़ सा बोझ, मुक़्तार महसूस कर रहा था।
जयपुर हाउस का कमरा नंबर 107 का दरवाजा तेज आवाज के साथ बंद कर मुक्तार उस कमरे में पहुंचा जहां वो 8 लोगों के साथ रहता था, चुपचाप अपने छोटे से बने सीढ़ीनुमा बिस्तर में घुस गया। हर कोई बातों में उलझा था, अपने-अपने तरीके से अपनी-अपनी कहानियां बनाने में लगा हुआ था। लेकिन मुक़्तार को सिर्फ यही सोच खाए जा रही थी कि, जो हुआ अच्छा नहीं हुआ, औऱ वो फायर ब्रिगेड की गाड़ी आग लगने के घंटो बाद आया। क्या फायदा ऐसी सिस्टम का, जो वक्त पर नहीं बल्कि वक्त के बाद काम आए, वो भी तब जब बचाने को कुछ बचे ही नहीं !
सबको पता था की सुबह की पहली किरण के साथ बंबई से कई गाड़ियां इस स्टूडियो के तरफ आएंगी, औऱ उनमें वो लोग बैठे होंगे जो यहां के लोगों की दशा और दिशा तय करते हैं। लेकिन मुक़्तार इन सब बातों से बेपरवाह अपनी उस सोच में अटका हुआ था, जब वो पहली बार गांव से बंबई आया, औऱ तब से लेकर आज तक इसी कंपनी का नमक खाया औऱ पूरी इमानदारी से उस नमक का हक हर रोज हर पल अदा करता है। छोटे से बिस्तर पर लगातार करवट बदल रहा मुक़्तार को नींद नहीं आ रही थी, तभी उसका हाथ उस आधी खाली बीयर की बोतल पर पड़ा जो उसकी पिछली रात की खुराक थी। फिर क्या था मुक़्तार बीयर की बोतल उठाया औऱ एक ही बार में बची सारी बीयर को गटक गया । तब तक सुबह के 6 बज चुके थे, मुक़्तार की आंखे नींद में खो गई थी ।
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जयपुर हाउस के कमरा नंबर 107 के बाहर तेज कोलाहल जारी था लेकिन कमरे के अंदर खामोशी बिखरी हुई थी। अब मुक़्तार अगली सुबह शूटिंग की तैयारी तो करेगा लेकिन रात के दृश्य के साथ कई दिनों तक खामोश रहेगा। और मुक्तार कई दिनों तक खामोश रहा भी, लेकिन मेरी एक मुलाकात के बाद वो खामोश ना रह सका, कहानीबाजी के चक्कर में मैंने उसे कुरेद दिया औऱ वो बेचारा बेबसी के साथ सारी कहानी लफ्जों में बीयर पाने की शर्त पर बता दिया।
कभी वक्त मिले तो मुक़्तार से जरूर मिलिएगा, एकदम सच्चा उस आग की तरह है जो अपने अंजाम तक पहुंच कर ही दम लिया।
अब जब भी मुक़्तार को देखता हूं तो मुझे वो अकबरी महल याद आता है औऱ ज़ुबां से सिर्फ यही निकलता है कि
“हवाओं की जागीर अब वीरान की विरासत है” !
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता




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