Friday, 21 May 2021

गंगा :- सब स्वीकार करती है, प्रार्थना भी पाप भी।

गंगा । सब स्वीकार करती है, प्रार्थना भी, पुण्य भी, पाप भी ! राग भी, द्वेष भी, द्वंद भी, दानव भी , मानव भी, खुशहाली भी, हरियाली भी। धरती औऱ आकाश भी । मोक्षदायिनी गंगा सब स्वीकार करती है। . नाम में इतनी पवित्रता , जो नि:श्चल मन को सुकू़नी दरवाजे के पार ले जाती है। कल-कल करती गंगा की आवाज कानों में संगीत सी घुलती चली जाती है। जब भी गंगा का कोई किनारा मिले, तो एक पल के लिए आंखें अपने आप ही बंद हो जाती है । और उन बंद आंखों के पीछे लहरों का संगीत रूहानी इबादत से ताल्लुक करा जाता है। यही तो वो पल होता है जब हम गंगा को अात्मसात कर चुके होते हैं। लेकिन फिर भी उसकी समझ से कोसों दूर खड़े , बस निहारते-निहारते अपने मन के कोनों में कई कहानियां खुद ही गढ़ लेते हैं। लेकिन सदियों से कालजयी गंगा तो गंगा है। उसे समझ पाना औऱ समझा पाना ठीक वैसी ही मुश्किल है, जैसे गंगा की गहराई को नंगे पांवों से नापना। गंगा एक बूंद में हो या लोटे में समाई हो। अंजुली में भरी हो या धरती की गोद में पड़ी हो। युगों-युगों से बहती वो धारा है सदियों से वो इबादती किनारा है। जिसे प्रार्थनाओं में मांगता हर बेचारा है बस हर-हर गंगे ही तो सबका सहारा है। . औऱ इतनी ही पुरानी गंगा के साथ साथ वो कहानी भी है, जिसकी निशानी हम सबके दिमाग में हमारी अम्मा बनाती हैं। घर से करीब थोड़ी ही दूर पर बांध के नीचे जो नदी बहती है, वो तब तक हमारे लिए सिर्फ गढ्ढे का पानी होता है, जब तक हमारी अम्मा ये नहीं बता देती हैं कि वो हर रोज सुबह-सुबह घर में क्या छिड़कती हैं ? बचपन वाला मन, सवालों का गट्ठर, जल्दबाजी में कुछ भी जानने या कहीं भी पहुंचने की जल्दी, आदत बन जाती है। औऱ फिर एक रोज अम्मा बता देती हैं, कि ये पानी सिर्फ पानी नहीं, वो नदी सिर्फ नदी नहीं, गंगा है ! जन्म लिया तो गंगा, मृत्यु से पहले गंगा, मृत्य के बाद गंगा। पूरा जीवन गंगा किनारे , गंगा सहारे। हर सांस की आस गंगा, हर प्यासे की प्यास गंगा, मनुष्यों की आस गंगा। गंगा के बिना इंसानी ज़िंदगी तो कल्पना मात्र भर है। हर सजीव, बिन गंगा के निर्जीव हो जाती है। उस रोज अम्मा की बातें इतनी तो समझ आ ही गई थी, कि जहां है मां गंगा का वास, वहां हैं सभी बहुत ख़ास। हालांकि गंगा की पौराणिक पृष्ठभूमि भी ना जाने कितनी दंत कथाओं से लिपटी हुई है। मगर मौजूदा वक्त में गंगा, हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री से निकलती है। जमीन से इस स्थान की उंचाई 3140 मीटर है। जिसके बाद लगभग 200 कि.मी. कि यात्रा करके, मां गंगा ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार पहुंचती है। ना जाने कितनों को मोक्ष देती गंगा, यहां इंसानी ज़िंदगी को राख की शक्ल में मुक्ति का मार्ग दिखाती है। पानी की चादर सी लगने वाली गंगा, कभी कुंभ का जश्न मनाती है, तो वहीं हर शाम किनारों पर आरती की घंटियो की आवाज से मन, गंगा की शीतलता को हौले-हौले महसूस करता रहता है। हरिद्वार से लगभग 800 कि.मी. की यात्रा करते हुए गढ़मुक्तेश्वर, सोरों, फर्रुखाबाद, कन्नौज, बिठूर, कानपुर होते हुए गंगा प्रयाग पहुंचती है। यहां गंगा का मिलन यमुना से होता है जिसे संगम कहा जाता है। संगम हिन्दुओं के लिए पवित्र और तीर्थ है। संगम के बाद गंगा मोक्ष नगरी वाराणसी (काशी) पहुंचती है। काशी में ही गंगा घाट पर इंसान देहत्याग कर मोक्ष के मार्ग पर चलना शुरू करता है। औऱ गंगा यहां से बहती हुई मिर्जापुर, पटना, भागलपुर होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें बहुत-सी सहायक नदियां सोन, गण्डक, सरयू, कोसी आदि मिल जाती है।फिर आगे बहरामपुर, वर्द्धमान, कोलकत्ता, हल्दिया होते हुए गंगा बंगाल की खाड़ी में मिलकर अपनी यात्रा पूर्ण करती हैं। इस यात्रा के दौरान दुनिया में गंगा को लेकर कई मान्यताएं औऱ दंत कथाएं प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए ब्रह्मा की घोर तपस्या की । ब्रह्मा प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी और पाताल तक जाने का आदेश दिया। ताकि भगीरथ के पूर्वज औऱ सगर के पुत्रों के आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब गंगा ने कहा कि, मैं इतनी ऊंचाई से जब पृथ्वी पर गिरूंगी, तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? इस समस्या को दूर करने के लिए राजा भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया। और फिर महादेव ने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वो धारा भगीरथ के पीछे पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहां सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वी वासियों के लिए श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भगीरथी कहते हैं। हालांकि इस कथा को राजा रवि वर्मा ने अपनी पेटिंग के जरिए बेहतरीन तरीके से उकेरा। महाभारत काल में भी गंगा-शान्तनु के वचन की कथाएं प्रचलित हैं। औऱ इसी महाभारत काल में भीष्म के जरिए गंगा को और करीब से जान पाए । कई कहानियों औऱ कथाओं को अपने दामन में समेटी गंगा, आज इंसानी गलतियों की वजह से थोड़ी-थोड़ी मैली जरूर हो गई है। लेकिन वक्त की ढलती शाम तले, वो दौर भी आएगा, जब गंगा की धारा एक बार फिर निर्मल औऱ स्वच्छ दिखाई देने लगेगी। . हृदय के सारे ख्व़ाब शांत हो जाती हैं, जब जब गंगा की आवाज आती है। बात सिर्फ गंगा को स्पर्श कर महसूस करने की है, जो हमें सुकूनी दरवाज़े से पार ले जाती है। तो करते हैं ना महसूस, क्योंकि ये नदी नहीं संस्कार है गंगा धरती की श्रृंगार है गंगा। गंगा तो गंगा है सब स्वीकार करती रहेगी प्रार्थना भी , पाप भी । . #कहानीबाज़ Rajnish BaBa Mehta

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