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| फेविकोल नाटक.....Rajnish BaBa Mehta |
15वें भारत रंग महोत्सव के दूसरे
दिन ही नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के अंतिम वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति के रूप में
जो घटा वह दरअसल नाटक नहीं था। वह शोषण था दर्शकों पर, जिन्हें बेवकूफ समझा गया। अंतिम वर्ष के छात्र फेविकोल नाटक के साथ
मंच पर उतरे तो जरूर लेकिन मजबूत कहानी के जरिए कमजोर निर्देशन और अभिनय में
परिपक्वता की कमी ने इस नाटक की छवि को धूमिल करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।.
राष्ट्रीय
नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित 15वें
भारतीय रंग महोत्सव के शुरुआती तीन दिनों की तस्वीर देश-दुनिया के कोने-कोने से आए
रंग प्रेमियों को हताश करने वाली रही। जिनमें सबसे बड़ा योगदान फेविकोल नाटक भी
रहा । . बीते वर्ष की तरह इस बार भी ताम-झाम बहुत ज्यादा दिखा और रंग प्रभाव बहुत
कम।
अभिमंच में मंचित
एनएसडी डिप्लोमा प्रोडक्शन 'फेविकोल' अपनी कहानी की कसौटी पर पूरी तरह
असरदार साबित नहीं हुई।
फेविकोल
नाटक की कहानी एक ऐसे मेहमान की है जो एक गरीब परिवार के घर जबरदस्ती रहने पहुंच
जाता है। शुरूआत में मेजबान मेहमान की हरकत से काफी खफा रहता है और उसे भगाने की
भरपूर कोशिश भी करता है। इस काम में वो अपनी बीवी की मदद भी लेकर असफल साबित होता
है। आखिरकार हार मानकर गरीब दंपत्ति ने जहां मेहमान को स्वीकर करने की अवस्था में
पहुंच जाता है तो वहीं दूसरी ओर मेहमान भाईसाहब धीरे धीरे घर में अपना प्रभाव और
प्रभुत्व जमाने लगता है। गरीब दंपत्ति इस बात से बेखबर हो चुका है कि मेहमान ने
अपना जाल बिछाना शुरू कर दिया है। गाय खरीदने के पैसे देने के साथ जो षडयंत्र का
सिलसिला शुरू हुआ वो अब हर बात में दिखने लगा। आखिरकार एक दिन मेहमान उस परिवार को
बीज खरीदने के लिए पैसे देता है लेकिन जब फसल काटने की बारी आती है तो मेहमान फसल
पर अपना हक जमाता है जिसे वो गरीब दंपत्ति परिवार अपने खेत का हवाला देते हुए नकार
देता है। गुस्से में मेहमान अब तक परिवार में फेविकोल में की तरह चिपक चुका होता
है जिसके बाद वो सरपंच के पास मामले की सुनवाई के लिए जाता है। सरपंच और पंचायत के
लोंगो की एंट्री थोड़ी अच्छी है। जब फैसले की बारी आती है तो मेहमान घूस देकर
सरपंच को खरीद लेता है औऱ फैसला अपने हक में करवा लेता है।
इस
कहानी को कॉमेडी के अंदाज में और भी बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता था। सेट जहां
साधारण था तो वहीं नाटक के दौरान सूत्रधार की भूमिका की तरह 3 लड़कियों का गाना
दर्शकों का काफी प्रभावित किया। आदिवासी और दलित वर्ग पर आधारित नाटक में केवल एक
सूत्रधार राजू का अभिनय बेहद दिलचस्प दिखाई देता है। लेकिन बाकी अभिनेता जहां अपने
काम से भी निराश करते हैं तो दूसरी ओर अंतिम वर्ष के छात्र होते हुए भी निर्देशक
कमजोर साबित हुए।
हमें
इस बात को जानक काफी आश्चर्य भी हुआ कि इस नाटक को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के
डिप्लोमा प्रोडक्शन के तौर पर भारत को कई और शहरों में भी प्रदर्शित किया जा चुका
है। ऐसे कमजोर नाटक को लेकर देश भर में घूमना शायद एनएसडी के साख पर सवाल खड़ा
करता है।
हालांकि यह नाटक देश में पर्यावरण, विस्थापन व पुनर्वास की समस्या पर आधारित है।
जो हमेशा से गंभीर विषय और सोचनीय मुद्दा रहा है। हालांकि नाटक के गर्भ में छिपा
ये मुद्दा दर्शकों तक आसानी से जरूर पहुंच जाता है क्योंकि नाटक में निर्देशक ने
पहनावे की शैली से लेकर सांस्कृतिक शैली को भी एक आदिवासी समुदाय से बखूबी जोड़े
रखा।
हालांकि नाटक को देखने के बाद एक लाइन बार बार जुबान पर आ जाती
है:-
हाशिए से निकली नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की हस्तियां
।

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