राजस्थान का नाम लेते ही सामने नजर आता है थार रेगिस्तान। मीलों तक फैली हुई रेत की वह चादर जिसे न जाने कितने वीर-सूरमाओं ने अपने लहू से सींचा है। लेकिन बहुत कम लोग ही इस बात को जानते हैं कि हवा के झोंको से पल में दूर-दूर तक फैल जाने वाली यह माटी लोहे का फौलाद भी रखती है।
इस धूल-मिट्टी में वह मजबूती है जिसका लोहा अंग्रेजों को भी मानना पड़ा था। इतिहासकारों के मुताबिक कमांडर लार्ड लेक की अगुवाई में अंग्रेजी सेनाओं ने 13 बार इस मिट्टी के किले पर हमला किया, लेकिन हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी।
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बात उस समय की है जब होल्कर के राजा जशवंतराव अंग्रेजी हुकूमत से भागकर भरतपुर में शरण ली थी। तब वहां के राजा रणजीत सिंह ने होल्कर नरेश को वचन दिया कि उन्हें बचाने के लिए वे अपनी जान की बाजी लगा देंगे। जब यह बात अंग्रेजी सेना के कमांडर इन चीफ को मालूम हुई तो उन्होंने भरतपुर के राजा रणजीत सिंह को चेतावनी दी कि यदि वे जयवंतराव होल्कर को अंग्रेजों के हवाले नहीं करते तो खुद को मौत के हवाले करने के लिए तैयार रहे। इतना सुनना था कि रणजीत सिंह का खून खौल उठा और बिना वक्त गंवाए उन्होंने कमांडर को संदेश भिजवाया जिसे पढ़कर अंग्रेज और भी आगबबूला हो गए और उसी वक्त कमांडर लेक ने पूरी बटालियन के साथ भरतपुर पर हमला बोल दिया।
अंग्रेजी सेनाओं ने जब तोप से गोले दागने शुरू किए तो ऐसा लगा मानो कुछ ही घंटों में युद्ध का फैसला हो जाएगा और भरतपुर में अंग्रेजों की विजय पताका लहराने लगेगी। लेकिन वे यह भूल गए थे कि उनका सामना केवल महाराजा रणजीत सिंह की सेना से ही नहीं, बल्कि जाटों के शौर्य और पराक्रम की विरासत को अपने में समेटे मिट्टी के उस किले से भी था जो लोहे का फौलाद रखता है।
तोप के गोलों के घमासान हमले के बावजूद अंग्रेज किले की दीवार नहीं तोड़ पाए। वह अभी भी पहले की तरह ही खड़ा अंग्रेजी सेनाओं को ललकार रहा था। यह सब देखकर कमांडर लार्ड लेक खुद भी हैरान थे। उन्होंने दोबारा जाट नरेश महाराजा रणजीत सिंह के पास संधि का प्रस्ताव भेजा, लेकिन वह जाट कहां पीछे हटने वाला था। उन्होंने फिर अंग्रेजी सेना को लडऩे की चेतावनी दी। अंग्रेजों ने इस बार अपनी दोगुनी ताकत से हमला किया, लेकिन सब बेकार। वे लगातार हमला किए जा रहे थे और लोहागढ़ का किला व जाट सेना हंसते हुए उसका सामना करते जा रहे थे।
क्या लिखा था जाट नरेश के संदेश में
जब अंग्रेजों को इस बात की जानकारी मिली कि होल्कर नरेश को भरतपुर के राजा रणजीत सिंह ने शरण दी है तो उनके कमांडर लार्ड लेक ने रणजीत सिंह को चेतावनी दी कि वे होल्कर नरेश को अंग्रेजों को सौंप दे अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहे। बदले में जाट नरेश ने अंग्रेजों के कमांडर को जो संदेश भेजा, वह कुछ इस तरह से था:
आप अपने हौंसले को जमा सकते हैं, हमने लडऩा सीखा है, झुकना नहीं।
कहा जाता है कि इस किले को कोई नहीं जीत पाया तो जाहिर है कि इसकी कोई वजह भी रही होगी। मिट्टी से बने इस किले में आखिर फौलाद जैसी ताकत कहां से आई। इसका कारण है इस किले की कारीगरी। किले के चारो ओर मिट्टी के गारे की मोटी दीवार है, जिसके बाहर गहरी खाई है जो कि पानी से भरी हुई है। ऐसे में जब दुश्मनों के तोप से निकले गोले इन दीवारों से टकराते हैं तो गारे की दीवार में धंसकर उनकी आग ठंडी हो जाती है। और यही वजह है कि सैंकड़ों गोलों को अपनी छाती पर झेलने के बावजूद यह इमारत आज भी जस की तस खड़ी है अपने दुश्मनों को उनकी हैसियत बताने के लिए।

अंग्रेजों ने टेके घुटने और किले के फौलाद को किया प्रणाम
अंग्रेजों की सेना लोहागढ़ की अभेद्य दीवारों के सामने पस्त होकर लौट गई। इसके बाद महाराजा रणजीत सिंह ने शरण में आए होल्कर नरेश को विदाई दी। होल्कर नरेश वहां से जाते वक्त भावुक हो गए, उन्हें समझ में नहीं आ रही था कि वह किस तरह से जाट नरेश महाराजा रणजीत सिंह को धन्यवाद कहें। फिर भी उन्होंने भरतपुर के सम्राट से कहा, होल्कर हमेशा भरतपुर का ऋणी रहेगा और हमारी मित्रता अमर रहेगी। इसी मित्रता का जिंदा गवाह है भरतपुर का यह किला 'लोहागढ़'


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