गांधी और गोली कथा,पटकथा,संवाद-रजनीश बाबा मेहता
ScreenPlay
SCENE
-1
LOCATION – JAMA MASZID DELHI
TIME – MORNING
SHOT –
JAMA MASJID GOOD VIEW AND PEAGON’S FLYING
MUSIC – AZAN
(ALLAH HU AKBAR )
SCENE
-2
LOCATION –SMALL
HUT/ROOM
TIME – MORNING
MUSIC – AZAN
(ALLAH HU AKBAR )
SHOT 1 -
HUT/ROOM
OUTDOOR SHOT
SHOT 2
- RADIO ON
TABLE
SHOT 3
- A MAN
PRAYING NAMAJ IN DIFFERENT STYLE
MUSIC –
AZAN (ALLAH HU AKBAR ) FADE TO FAMOUS SONG OF 1984 AND THAN NEWS OF
INDIRA
GANDHI DEATH NEWS.
SHOT 4 – MASTER
SHOCKED AND WALK OUT FROM ROOM IN ANGER MOOD
(WEARING SLEEPER, TAKING CLOTHS CUTWAYS)
SCENE
-3
LOCATION –OUTDOOR/ROAD
TIME – MORNING
SHOT 1 – MASTER WALK ON ROAD
डरता हूँ कामियाबी-ए-तकदीर देखकर
यानि सितमज़रीफी-ए-तकदीर देखकर
क़ालिब में रूह फूंक दी या ज़हर भर दिया
मैं मर गया ज़हराबा-ए-ह्यात की तासीर देखकर
सितमज़रीफी-ए-तकदीर का खेल एक बार फिर ऐसे मोड़ पे ले आया...जहां
1948 की तर्ज पर 1984 में भी.. दर्द मास्टर को ही मिला... सुबह का सवेरा हुआ नहीं
.. कि इंदिरा गांधी को मौत ने अपनी आगोश में ले लिया... सवालों की फेहरिस्त लिए मैं
चल तो रहा हूं.... लेकिन पूछूं
किससे ...कि क्या इस देश में गांधी होने की सजा मौत ही है... मौत की किस्म भी कैसी....हूं....
ख़ालिस गोली जैसी.... तकदीर का खेल भी ऐसा है... जिससे ना तो 1948 में शमीम करहानी
बच पाए और ना ही 1984 में मेरे जैसा मामूली मास्टर ...
SHOT END- DIRECTOR CREDIT LINE
SCENE
-4
LOCATION –TEA
STALL
TIME – EVENING
चायवाला – शाम बेहद सुहानी तो है... लेकिन
उदासी भरी... .. हो भी क्यों ना..जब्बार मियां ...अब तो ऐसा लग रहा है...कि अपने सर
से साया ही उठ गया है
जब्बार मियां – मियां तुम भी शायराना अंदाज में
बातें करने लगे हो... लेकिन कहते तो तुम ठीक ही
हो...आज की शाम मानों सर में चढ़ी जा रही है...खैर दो चाय … अदरक वाली..
चायवाला – ठीक है मियां तुरंत देता हूं....
जब्बार मियां – (राधेश्याम की तरफ) अरे अब तुम्हें क्या हो गया ..अभी तो तुम भले चंगे थे ..
राधेश्याम - यार आज का दिन ...कोई भूल
नहीं पाएगा ... बड़ी मुश्किल से भारत में ..विचारों के
नीचे
नई सोच ने पनपना शुरू ही किया था ...कि....उसका भी खून कर दिया गया
जब्बार मियां - देखो अब तुम मास्टर की तरह बातें ना करो... ये
सब उलझते सुलझते और लच्छेदार
बातें
बस मास्टर के मुंह से ही अच्छा लगता है...
चायवाला – साहब...दो चाय....फुल अदरक के
साथ....
जब्बार – मियां तुम्हारी चाय को आज
....माहौल ने फीका कर दिया है...लेकिन इसमें तुम्हारा कोई
कसूर
नहीं
(master enter in
stall)
मास्टर - 1 चाय बिना
चीनी के ....
चायवाला – जी अभी देता हूँ...
जब्बारमियां – अरे मास्टर साहब आज आने में जरा
देर कर दी...
मास्टर - हां ...रास्ते में कुछ
दिक्कतें आ गई थी.....खबरें तो तुमने सुनी ही होगी ....
राधेश्याम – हां .... सुनी तो है...लेकिन
दिल नहीं मान रहा ...कि लोग इंदिरा गांधी को ही गोली मार
देंगे...
मास्टर- ये पहला मौका
नहीं है... जब ...गांधी को उसके काम की कीमत... गोली मिली हो...
जब्बारमियां – समझा नहीं मास्टर साहब......
मास्टरसाहब – समझोगे कैसे मियां...कोई हाथ
भी नहीं मिलाएगा... जो तुम गले मिलोगे तपाक से
ये
हादसों का शहर है.... जो तुम मिलोगे इत्तफाक से...
चायवाला – शायरों की भाषा ....अपने को समझ नहीं
आती मास्टर साहब... हम तो ठहरे गंवार ...
जब्बारमियां – मियां तुम अपना फक्कराना अंदाज
अपने पास रखो औऱ चाय बनाओ..... मास्टर साहब
कहना
क्या चाहते हैं... जरा तसल्ली से समझाए ...
मास्टर – आज एक बार फिर गांधी ने गोली से
अपना रिश्ता मजबूत कर लिया है...ऐसा लगता है कि
आदम
की बेटी हंटरों की जद से आजाद होना चाहती है...लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं मिल
रहा...
राधेश्याम – मेरे ख्याल से आपके बातों
के पीछे .....कुछ और तो नहीं......
जब्बार - मतलब
जब्बार - मतलब
राधेश्याम - मतलब कहीं... गांधी की बात
तो नहीं ....
मास्टर – खूब समझे मियां ..... गांधी से ज्यादा
मुझे उस मास्टर की कविता सोने नहीं देती...
चायवाला- चाय..
मास्टर - हूं ... तुम्हें
तो याद भी नहीं होगा ...कि.1948 में बापू की मौत के बाद...शमीम करहानी...
ने कविता नहीं...बल्कि क्रंदन लिखा था....
राधेश्याम – ईशारों की भाषा तो आप लोग ही
जानें मास्टर साहब...हमे तो जरा तफ्तीश बताइए....
मास्टर – तो सुनो ...करहानी का क्रंदन...जिसकी
आगोश में उस गांधी का पूरा सच है....
जगाओ ना बापू को नींद आ गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई हैं
अभी उठके आये हैं।,बज़्म-ए-दुआ से
वतन के लिये, लौ लगाके ख़ुदा से
टपकती है रूहानियत सी फ़ज़ा से
चली जाती है, राम की धुन, हवा से
वतन के लिये, लौ लगाके ख़ुदा से
टपकती है रूहानियत सी फ़ज़ा से
चली जाती है, राम की धुन, हवा से
दुखी आत्मा, शान्ति पा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
ये घेरे है क्यों, रोने वालों की टोली
ख़ुदारा सुनाओ न मन्हूस बोली
भला कौन मारेग बापू को गोली
कोई बाप के ख़ूं से, खेलेगा होली ?
ख़ुदारा सुनाओ न मन्हूस बोली
भला कौन मारेग बापू को गोली
कोई बाप के ख़ूं से, खेलेगा होली ?
अबस, मादर-ए-हिन्द, शरमा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
जब्बारमियां – आखिरकर मार ही दिया
...........
मास्टर – हां मार ही दिया....उस अहिंसा के पुजारी को....जिसने
जिंदगी भर किसी को नहीं मारा...उसे
मार
ही दिया
चायवाला – कभी कभी मोहब्बत के झंडे को बुलंद करना
....भारी पड़ जाता है मास्टर साहब.....!
मास्टर – जो बीत गई
वो बात गई...सूरज निकला औऱ रात गई... हूं सही बोलते हो मियां....
अपना गरेबान
फाड़ कर..... मुहब्बत का पैगाम देना कितना भारी होता है...वो उनसे बेहतर कौन जान सकता
है.....
मोहब्बत के झण्डे को गाड़ा है उसने
चमन किसके दिल का, उजाड़ा है उसने ?
गरेबान अपना ही फाड़ा है उसने
किसी का भला क्या, बिगाड़ा है उसने ?
चमन किसके दिल का, उजाड़ा है उसने ?
गरेबान अपना ही फाड़ा है उसने
किसी का भला क्या, बिगाड़ा है उसने ?
उसे तो अदा, अम्न की भा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
राधेश्याम – आपके कहने का मतलब है कि बापू सोते नहीं
थे ..सिर्फ आंखे बंद करते थे...!
मास्टर - सोते नहीं.... दूसरों को जगाते थे...लेकिन
जब 30 जनवरी 1948 को सोए... तो.. ऐसा लगा कि वो अभी उठ पड़ेंगे...
चायवाला – औऱ कभी नहीं उठे.....
(मास्टर ना में सिर हिलाते हैं।)
अभी उठके खुद वो, बिठायेगा सबको
लतीफ़े सुनाकर, हंसायेगा सबको
सियासत के नुक़्ते बतायेगा सबको
नई रोशनी दिखायेगा सबको
लतीफ़े सुनाकर, हंसायेगा सबको
सियासत के नुक़्ते बतायेगा सबको
नई रोशनी दिखायेगा सबको
दिलों पर सियाही
सी क्यों छा गई है ?
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
वो सोयेगा क्यों, जो है सबको जगाता
कभी मीठा सपना, नहीं उसको भाता
वो आज़ाद भारत का है, जन्म दाता
उठेगा, न आंसू बहां, देस-माता
कभी मीठा सपना, नहीं उसको भाता
वो आज़ाद भारत का है, जन्म दाता
उठेगा, न आंसू बहां, देस-माता
उदासी ये क्यों, बाल बिखरा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
वो हक़ के लिए, तन के अड़ जाने वाला
निशां की तरह, रन में गड़ जाने वाला
निहत्था, हुकूमत से लड़ जाने वाला
बसाने की धुन में, उजड़ जाने वाला
निशां की तरह, रन में गड़ जाने वाला
निहत्था, हुकूमत से लड़ जाने वाला
बसाने की धुन में, उजड़ जाने वाला
बिना, ज़ुल्म की जिस्से,थर्रा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
जब्बार मियां – मैं गांधी को नहीं मानता हूँ
...लेकिन फिर भी कहना चाहता हूँ कि हमें उनसे कभी कुछ
खास नहीं मिला...
मास्टर – ये तुम कैसे कह सकते हो.... जब्बार मियां...उसने
जो खोया जो गंवाया....उसकी कीमत पूरे देश को पूरी मिली....
मुझे लगता
है तुम्हें इस बारे में और पढ़ने और जानने की जरूरत है....
चायवाला - सही कहा मास्टर साहब.. जब्बार मियां ..पढ़ो और पढ़ो
जब्बार मियां - तुम चाय बनाओ ठीक है....ज्यादा मत बोलो
मास्टर - गुस्सा क्यों
होते हो जब्बार ...एक बात बताओ क्या शमीम करहानी को भी तुम
पागल ही कहोगे...जिन्होंने गांधी के
मरने के बाद...देश
को ऐसे शब्दों में बांध दिया था...जिसकी तपिश आज भी महसूस होती है...
जब्बारमियां – मैं ये तो नहीं कह रहा..लेकिन
बापू की कुछ बातें दिमाग में नहीं घुसती है..खैर मैं आगे जानना चाहता हूं...मास्टर
साहब
मास्टर - बातें उन लोगों के दिमाग में नहीं घुसती...जिसका पेट भरा हो.... भूखे रहकर
भी उन्होंने अहिंसा की पतवार को मजबूती से थामे रखा था
वो उपवास वाला, वो उपकार वाला
वो आदर्श वाला , वो आधार वाला
वो अख़लाक़ वाला, वो किरदार वाला
वो मांझी, अहिन्सा की पतवार वाला
वो आदर्श वाला , वो आधार वाला
वो अख़लाक़ वाला, वो किरदार वाला
वो मांझी, अहिन्सा की पतवार वाला
लगन जिसकी, साहिल का सुख पा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
कोई उसके ख़ू से, न दामन भरेगा
बड़ा बोझ है, सर पर क्यों कर धरेगा
चराग़ उसका दुशमन, जो गुल भी करेगा
अमर है अमर, वो भला क्या मरेगा
बड़ा बोझ है, सर पर क्यों कर धरेगा
चराग़ उसका दुशमन, जो गुल भी करेगा
अमर है अमर, वो भला क्या मरेगा
हयात उसकी,खुद मौत पर छा गई है ।
जगाओ ना बापू को, नींद आ गई है । - 2
मास्टर – अब गांधी की नींद कभी नहीं टूटेगी.....लेकिन
वो अमर है....उसे भला कौन मारेगा....
जब्बार – 1948 में भी मार दिया गया था.... औऱ आज
....31 अक्टूबर 1984 की तारीख भी याद रखी
जाएगी...
मास्टर – सही कहा क्योंकि आज भी एक गांधी की कहानी गोली
पर ही खत्म हो गई...
अब
तो डर सा लगने लगा है.....
राधेश्याम – क्यों
मास्टर – चलता हूँ...चाय के पैसे लिख लेना...
(मास्टर जाने लगता है)
जब्बार मियां – कहानी अच्छी थी...पसंद भी आई
...लेकिन इस डर की वजह तो बताते जाइए मास्टर
साहब...
मास्टर – (पलटते हुए ) ....क्योंकि मेरे नाम में भी
....गांधी है....
(समाप्त)
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