महाभारत का यह प्रसंग पूरे विश्व में गुरु-शिष्य संबंध का एक अनुपम उदाहरण है। प्रिय शिष्य अर्जुन का कोई प्रतिद्वंदी न हो जाए, यह सोचकर द्रोणाचार्य ने तथाकथित निम्न जाति के शिष्य एकलव्य से गुरुदक्षिणा के बहाने उसका अंगूठा मांग लिया था। गुरु द्रोण की योजना थी कि अंगूठा न होने से एकलव्य कभी बाण नहीं चला पाएगा। पर शिष्य भी कितना महान था कि झट किसी बात की परवाह किए बिना अपना अंगूठा काटकर गुरु को दे दिया। आज उसकी गुरुभक्ति की मिसाल दी जाती है।
भारतवर्ष के सुदूर पूर्वोत्तर राज्य मेघालय की जनजाति आज भी तीरंदाजी में प्रवीण मानी जाती है लेकिन तीरंदाजी करते समय यह अंगूठे का प्रयोग नहीं करती। इनमें से बहुतों ने एकलव्य का नाम भी नहीं सुना है। लेकिन इतना जानते हैं कि उनके किसी पुरखे ने अपना दाहिना अंगूठा गुरुदक्षिणा में दे दिया था, इसलिए तीर चलाते समय अंगूठे का उपयोग नहीं करना चाहिए।मेघालय में खासी जयंतिया जनजाति की आबादी करीब 12 लाख है। यह क्षेत्र उनकी संस्कृति और लोक परम्परा से समृद्ध है। भैंस के सींगों, बांसुरी और मृदंगों से निकली स्वर लहरियों के साथ नृत्य और मदिरापान यहां के सामाजिक समारोहों व धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग है।इन जनजातियों में विवाह संबंध अपने कुल-गोत्र के बाहर होते हैं। पर 19वीं सदी के मध्य में ईसाइयत के आगमन अनेक जनजातीय और सामुदायिक संस्थाओं को क्षति पहुंची है।
यहां पर कुल जनसंख्या का लगभग 85 प्रतिशत जनजातीय आबादी है। मेघालय देश के उन तीन राज्यों में से एक है जहां पर ईसाई बहुमत है। अन्य दो राज्य- नागालैंड और मिजोरम भी भारत के उत्तर पूर्व में ही स्थित हैं।खासी जयंतिया के अलावा यहां की अन्य कई जनजातीयों में संपत्ति का उत्तराधिकार और जनजातिय शासन का उत्तराधिकार, दोनों मातृवंश के आधार पर होते हैं और मां से सबसे छोटी बेटी को मिलते हैं।हालांकि शासन और संपत्ति का प्रबंधन इन महिलाओं द्वारा चुने गए पुरूषों के हाथ में होता है।
कुछ हद तक अलगाव के कारण जयंतिया लोग अपनी मातृसत्तात्मक संस्कृति को बचाए रखने में काफी हद तक सफल रहे हैं। वे अब भी झूम पद्धति से खेती करते हैं और आलू यहां की मुख्य फसल है।
भारतवर्ष के सुदूर पूर्वोत्तर राज्य मेघालय की जनजाति आज भी तीरंदाजी में प्रवीण मानी जाती है लेकिन तीरंदाजी करते समय यह अंगूठे का प्रयोग नहीं करती। इनमें से बहुतों ने एकलव्य का नाम भी नहीं सुना है। लेकिन इतना जानते हैं कि उनके किसी पुरखे ने अपना दाहिना अंगूठा गुरुदक्षिणा में दे दिया था, इसलिए तीर चलाते समय अंगूठे का उपयोग नहीं करना चाहिए।मेघालय में खासी जयंतिया जनजाति की आबादी करीब 12 लाख है। यह क्षेत्र उनकी संस्कृति और लोक परम्परा से समृद्ध है। भैंस के सींगों, बांसुरी और मृदंगों से निकली स्वर लहरियों के साथ नृत्य और मदिरापान यहां के सामाजिक समारोहों व धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग है।इन जनजातियों में विवाह संबंध अपने कुल-गोत्र के बाहर होते हैं। पर 19वीं सदी के मध्य में ईसाइयत के आगमन अनेक जनजातीय और सामुदायिक संस्थाओं को क्षति पहुंची है।
यहां पर कुल जनसंख्या का लगभग 85 प्रतिशत जनजातीय आबादी है। मेघालय देश के उन तीन राज्यों में से एक है जहां पर ईसाई बहुमत है। अन्य दो राज्य- नागालैंड और मिजोरम भी भारत के उत्तर पूर्व में ही स्थित हैं।खासी जयंतिया के अलावा यहां की अन्य कई जनजातीयों में संपत्ति का उत्तराधिकार और जनजातिय शासन का उत्तराधिकार, दोनों मातृवंश के आधार पर होते हैं और मां से सबसे छोटी बेटी को मिलते हैं।हालांकि शासन और संपत्ति का प्रबंधन इन महिलाओं द्वारा चुने गए पुरूषों के हाथ में होता है।
कुछ हद तक अलगाव के कारण जयंतिया लोग अपनी मातृसत्तात्मक संस्कृति को बचाए रखने में काफी हद तक सफल रहे हैं। वे अब भी झूम पद्धति से खेती करते हैं और आलू यहां की मुख्य फसल है।
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