आत्महत्या यानी जानबूझकर खुद की हत्या करना। आज के समय में इसे निंदनीय माना जाता है, लेकिन प्राचीन समय में ऐसा नहीं था। आज से कई सौ साल पहले आत्महत्या को सम्मान्य समझा जाता था। भारत की सतीप्रथा इस बात का सबूत है। मोक्ष जैसी धार्मिक भावनाओं से प्रभावित होकर भी कई लोग आत्महत्या करते थे, लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। दुनिया के ज़्यादातर देशों में आत्महत्या को गंभीर अपराध माना जाता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या के प्रयास को गंभीर अपराध माना गया है और पकड़े जाने पर सजा का प्रावधान भी है। दूसरे देशों में भी इससे जुड़े सख्त कानून हैं। इतिहास में झांकने पर सामूहिक आत्महत्या के भी कई मामले मालूम चलते हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों में घटित इन दुखद घटनाओं में हजारों लोगों ने खुद की जीवनलीला खत्म कर ली। पिछले कुछ सालों में घटित सामूहिक आत्महत्या की घटनाओं में ज्यादातर का कारण धार्मिक भावनाएं थीं। धार्मिक रीति-रिवाजों और प्रवर्तकों के प्रभाव में आकर हजारों लोग आत्महत्या कर चुके हैं।
जिम जोन्स के नेतृत्व में 1970 के अंत तक एक ऐसे समुदाय की खोज हुई जो दुनिया से अलग दक्षिण अमेरिका के एक जंगल जॉन्सटाउन में रहते थे। सन् 1978 में अमेरिकी कांग्रेस के लियो रयान ने इनके बारे में तथ्यों का पता लगाने के लिए जॉन्सटाउन का दौरा किया। वहां से लौटते वक्त जॉन्सटाउन के 18 लोग जो उस समुदाय से निकलना चाहते थे, उनके साथ वापस जाने की कोशिश करने लगे। इन 18 लोगों के इस कदम से वहां हिंसा भड़क गई। समुदाय के लोगों ने उन पर गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में एक कांग्रेसी रयान और तीन पत्रकार समेत एक व्यक्ति भी मारा गया जो वहां से निकलना चाहता था। 11 लोग जख्मी भी हुए। घटना के कुछ ही घंटों के बाद इस समुदाय के नेता ने समुदाय के सभी लोगों को पोटेशियम साइनाइड पीकर सामूहिक आत्महत्या करने का आदेश दिया। नेता के आदेश पर पहले छोटे बच्चों को पोटेशियम साइनाइड पिलाकर मार दिया गया। इस सामूहिक आत्महत्या में बच्चों सहित नौ सौ से अधिक लोगों के जीवन का अंत हो गया।
वर्जिन मैरी के एक कथित आदेश के बाद 1980 में भविष्य बताने वाले कैथोलिक शाखा MRTC की स्थापना हुई। इस शाखा ने यह घोषणा की थी कि एक निश्चित दिन दुनिया का अंत हो जाएगा। इस संप्रदाय के सदस्य झूठी गवाही से बचने के लिए इशारों में बातें करते थे। वे व्यभिचार से बचने के लिए सेक्स से परहेज करते थे और सप्ताह में दो दिन का उपवास भी करते थे। जैसे-जैसे वह दिन नजदीक आता गया, वैसे-वैसे वहां के लोगों की उत्सुकता बढती गई। उन्होंने खेतों में काम करना बंद कर दिया। हालांकि, यह भविष्यवाणी झूठी साबित हुई। इसके बाद लोगों ने अपने नेताओं से भविष्यवाणियों की प्रामाणिकता को लेकर सवाल करने शुरू कर दिए। तभी फिर 17 मार्च को प्रलय के दिन की घोषणा की गई और सभी 1000 अनुयायियों को मोक्ष प्राप्ति का जश्न मनाने के लिए आमंत्रित किया गया। इनमें बच्चे और वयस्क भी शामिल थे। जोसफ किब्वेतीरे, जोसफ कसपुरारी, जॉन कामगार, डोमिनिक कतारिबबो और क्रेडोनिया म्वेरिंदेवो वे पांच नेता थे, जिनके आदेश पर ये सब हुआ। सभी इस बात से वाकिफ थे कि यह आत्मघात के समान होगा। टेक्सास में एक पहाड़ी के शिखर से फ्लोरेंस के एक चर्च के सदस्य हाउटेफ द्वारा यीशु के दूसरे अवतार की घोषणा की गई। इस घोषणा के उपरांत 1959 में सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट चर्च रोम मत का विरोध करने वाले एक संप्रदाय का जन्म हुआ। इस भविष्यवाणी की विफलता के बाद ऐसे बहुत से लोगों ने अपने-आप को भविष्य बताने वाला बताया। उनमें से एक वरनन हॉवेल ने उस संप्रदाय को अपने विश्वास मत में लेने की कोशिश की। उसने बताया कि वही आधिकारिक तौर पर यीशु के दायित्वों को संभालने का हकदार है।
1994 में एटीएफ को उसके खिलाफ गैरकानूनी हथियार रखने और बच्चों को प्रताड़ित करने के बारे में पता लगाने का हुक्म मिला, लेकिन एटीएफ के आक्रामक रवैये के कारण उन्हें कई प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ा। कई दिनों तक चली लड़ाई के बाद एफबीआई ने बड़ी संख्या में लोगों को आत्महत्या से बचाने के लिए अनुयायियों को घेरने की कोशिश की। हालांकि, परिसर के भीतर सामूहिक आत्मदाह के लिए आग जला दी गई थी। इस आग में 80 लोगों ने अपनी जान गंवा दी। ये सामूहिक आत्महत्या थी या एफबीआई द्वारा किया गया सफाया, आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।
एक भटका हुआ संप्रदाय उस समय सुर्खियों में आया, जब 1997 में काले रंग की टी-शर्ट और जूते पहने हुए 39 लोगों ने उत्तरी सैन डिएगो में सामूहिक आत्महत्या कर ली। मरने वालों की आयु 26 से 72 वर्ष के बीच थी। उन्होंने आत्महत्या इस विश्वास से किया कि एक धूमकेतु पृथ्वी को पार कर रहा है, जो एक उच्च स्तर पर बदलाव के द्वारा सब कुछ नष्ट कर देगा।
धार्मिक अनुष्ठान से प्रेरित होकर किये जाने वाले आत्मदाह हमेशा अलौकिक प्रसाद या मोक्ष प्राप्ति जुड़े नहीं रहे हैं, जैसा कि वर्तमान समय में पाया गया है। साठ के दशक में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा अनुष्ठानिक आत्महत्या वियतनाम युद्ध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का संकेत थी। 1963 में थिक क्वांग डुक नाम का व्यक्ति निडर होकर दक्षिण वियतनाम के प्रशासन द्वारा बौद्धों के उत्पीड़न के विरोध में एक व्यस्त साइगॉन सड़क पर खुद को जला लिया। ऐसा करने पर बौद्ध समुदायों द्वारा एक बोधिसत्व को सम्मानित किया। इसके बावजूद, सरकार ने थिक क्वांग डुक की तरह आत्मदाह प्रदर्शन करने वाले बौद्ध भिक्षुओं को दंडित किया गया। बहरहाल, बौद्ध धर्म में खुद को नुकसान पहुंचाना गुनाह माना गया है। वहीं, बौद्ध भिक्षुओं द्वारा आत्मदाह एक नि:स्वार्थ कार्रवाई के रूप में धर्म के प्रकाश को फैलाने और लोगों की आंखें खोलने के लिए सही बताया गया।
1906 में बाली में एक अनुष्ठानिक सामूहिक आत्महत्या की गई जिसे पुपुतान के नाम से जाना गया। यह आत्मदाह सिर्फ इसलिए किया गया, क्योंकि इसे करने वाले लोग डच आक्रमणकारियों के अधीन नहीं होना चाहते थे। डच सेनापति ने दो आदेश दिए। उसने कहा कि सभी कीमती वस्तुओं को जला दिया जाये और एक मार्च निकाला जाये, जिसमें जवान व्यक्तियों, उनकी पत्नियों, बच्चों से लेकर बौद्ध भिक्षु सभी शामिल हों। डच रेजिमेंट के साथ आमना-सामना होते ही प्रधान पुजारी ने पुपुतान के राजा के कलेजे को चाकू से छलनी कर दिया। इसके बाद दोनों समूहों ने आपस में मार-काट उस समय तक जारी रखा, जब तक महिलाओं ने सेना को अपने गहने देने शुरू नहीं किए। उस दिन दोपहर तक इस भिड़ंत में बाली के 1000 से अधिक लोगों ने आत्महत्याएं की। अब डच आक्रमणकारियों के लिए ज्यादा कुछ करने को बचा नहीं था। आज बच्चों को पुपुतान के बारे में पढाया जाता है और उस दिन की याद में उत्सव मनाया जाता है।
कनाडा से संचालित होने वाला एक ऐसा गुप्त समाज है, जो यह मानता है कि अभी भी टमप्लर के सैनिक मौजूद हैं। यह समाज स्विट्ज़रलैंड में स्थित है। उनका उद्देश्य ईसाई और इस्लामी धर्मों को एकजुट करना था। वो पूरे विश्व में यीशु के दूसरे उत्तराधिकारी के आने को लेकर एक मत तैयार करना चाहते थे। उस समय उनके द्वारा किये गए कार्य नए युग के दर्शन से पूरी तरह मेल खाते हैं। कई सालों तक होने वाली आत्महत्याएं और मौतें एक विशेष संप्रदाय से संबंधित हैं। यहां तक कि 1994 में एक तीन महीने के बच्चे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसकी पहचान ईसा के विरोधी के रूप की गई थी। उसी वर्ष अक्टूबर में 48 वयस्कों और बच्चों को मृत पाया गया। इनके सर में गोली मारी गई थी। सामूहिक आत्महत्या के शिकार हुए इन लोगों के शव स्विट्ज़रलैंड में स्थित भूमिगत उपासना मंदिर से प्राप्त हुए थे। उस मंदिर के तल में जितने भी शव मिले, उन सभी को टमप्लर प्रतीकों की वस्तुओं के साथ एक लाइन में खड़ा किया गया था।
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