Wednesday, 6 September 2017

शमशाद टेलर मास्टर

लेखक रजनीश बाबा मेहता 

फाटक पार करते ही चांदनी चौक की चौथी गली के नुक्कड़ पर शमशाद अतर अपनी कैची औऱ कपड़ों की दुनिया में मशगूल दिखाई दे रहा था । दुकान के सामने वाली डेस्क पर कपड़ों को कैची से खचाखचा ऐसे काटे जा रहा था मानों उसे रद्दी में फेंकनी हो, लेकिन क्या मजाल कि एक इंच भी इधर-उधर कट जाए। हिंदुओं के लगन वाले दिन में इस शमशाद अतर का तो ईद मनता था ईद, औऱ अभी का वक्त वही जबरदस्त उफान पर था। दिल्ली का हर पार्क, हॉल, होटल, रिसॉर्ट्स तो ना जाने कब से बुक करवा लिए गए थे, हालांकि कुछएक खाली मिल सकता था लेकिन अतर के यहां सेतय-तारीख पर अब कपड़े मिलना मुश्किल ही था, और लगभग लोग शमशाद अतर के टेलर से ही अपने कपड़े सिलवाने की ख्वाहिश रखते थे, क्योंकि शमशाद अतर साहब कपड़ों को भी शायरी के अंदाज में काटते और सिलते थे, नजरें किधर भी हो हाथ अतर साहब का एकदम सटीक बैठता था।कैंची और ज़ुबान के मामले में शमशाद अतर का कोई सानी नहीं था। मुंह में पान ठूंसे हुए, आंखों में हल्का सा सूरमा औऱ बाएं गाल पर एक बड़ा सा मस्सा, पूरी तरह एक कैरेक्टर की तरह दिखते थे। सलाम वालेक्कुम अतर साहब, कभी कभी कैंची और कपड़ों से नजरें भी हटा लिया करो, आजकल माहौल भी बड़ा शायराना चल रहा है। एकाएक तेज आवाज सुनते ही शमशाद अतर मेरी तरफ एक नजर देखने के बाद नजरे नीचीं कर काम में लग गए लेकिन लफ्ज कैंची की माफिक धारदार इस्तेमाल कर गए। गैर मुस्लिमों को सलाम-वलाम शोभा नहीं देता औऱ आपको मैं पिछले 12 साल से समझा रहा हूं लेकिन मानते ही नहीं हो। आखिरी मर्तबा बोल रहा हूं समझ जाओ इस बार, पढ़े लिखे हो अपने मर्ज की दवा ही करवा लो, लेकिन चलो कोई नहीं ये आखिरीबार है …वाल्लेकुम असलाम बताएं कैसे आना हुआ, घर में किसी की शादी है क्या ? 

साल 1998 मेरी बड़ी बहन की शादी एक बहुत बड़े घराने में तय हुई थी, औऱ घर में लगभग सभी के कपड़े गुडलक टेलर को ही सिलने के लिए दिया गया। हालांकि मैं शूटिंग के सिलसिले में रानीखेत में था और शादी के ठीक पांच दिन पहले ही घर आया तो घर पर बाबूजी ने हुकूम सुना दिया कि आज के आज ही कपड़े शमशाद टेलर को दे आओ। जिसके बाद मैं भी चुपचाप गुडलक टेलर पहुंच गया ।  पूछते तो ऐसे हो कि जैसे कुछ पता ही ना हो, घर में तो मैं ही आखिरी शख्स हूं जो आज कपड़े देने आया वैसे मालूम तो होगा ही आपको। अब जल्दी से नाप ले लो, मुझे महरौली जाना है । मैं शमशाद के सामने हाथ उपर कर खड़ा ऐसे हो गया मानों किसी ने हैंड्सअप बोल दिया हो। आखिरी तो आप हो ही 84 के दंगे के आखिरी वाले दिन पैदा हुए थे, खैर जाने दो पूछ लिया ऐसे ही, तुम्हारे अब्बा बता रहे थे कि घर-बार से मतलब रखता नहीं है इसलिए मैं भी तस्दीक कर लिया कि जनाब को अपनी बहन की शादी की खबर है या नहीं, और वैसे भी कुंवर प्रताप सिंह मेरे नमाज का वक्त हो गया है मुझे जल्दी निकलना पड़ेगा, लेकिन आप एक काम करो बल्लीमरान वाले गोदाम पर आ जाओ वहां कोई ग्राहक होगा नहीं तसल्ली से नाप लेकर आपको फारिग कर दूंगा। शमशाद कैंची औऱ कपड़ा समेट चुका था और कारीगरों को कुछ बताने में लग गया। ठीक है अतर साहब, मैं आधे घंटे बाद गोदाम पर आता हूं लेकिन देखो ज्यादा लेट मत करना। नहीं लेट होगा वैसे भी जामा मस्जिद में आजकल भीड़ कहां होती है, पांचों वक्त नमाजियों में आजकल थोड़ी कमी आ गई है, पता नहीं अल्लाह की आवाज लोगों को कम क्यूं सुनाई पड़ने लगी, चलो, मैं निकलता हूं , नमाज पढ़कर सीधा वहीं पहुंच जाउंगा, आ जाना आप भी फटाफट। अतर साहब मोपेड स्टार्ट कर चलते बने । अतर साहब अपनी बोलकर तो निकल लिए अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं था तो मैं बाबूजी की एम्बेसडर कार से लालकिला का एक चक्कर लगाने के लिए निकल पड़ा, अब आधे घंटे के लिए घर तो जा नहीं सकता था। करीम की दुकान के पास पहुंचकर मन किया कि कुछ खा लूं औऱ फिर कार साइड में रोककर दुकान में घुस गया। एक तंदूरी चिकन छोटी सी प्लेट में लेकर गाड़ी की तरफ लपकता आ रहा था कि तभी मेरे और गाड़ी के बीच आकर एक साइकिल बड़ी तेजी में रूकी, एक पल के लिए तो मैं घबरा गया और हाथ से तंदूरी चिकन गिरते-गिरते बचा। सामने साइकिल पर 20 साल का सलीम था जो शमशाद के टेलर में कारीगर का काम करता था । तंदूरी अगर गिर जाती तो, कौन मर गया जो इतना तेज भागा जा रहा है । मैं कार का दरवाजा खोलकर आंदर बैठने ही वाला था कि बीच में सलीम फिर सामने आ गया । वो कोई मरा नहीं है बस एक जरूरी बात थी जो आपसे कहना था, लेकिन मास्टर के सामने मैं बोल नहीं सकता था ना, इसलिए यहां चला आया। क्यों, क्यों नहीं बोल सकता था,ऐसी कौन सी बात है ? वो मैं आपको इत्तला करने आया कि आप गोदाम पर मत जाओ अच्छा नहीं होगा आपके लिए । क्यों ? दुकान में नाप दूं या गोदाम में क्या फर्क पड़ता है । मैं गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठकर तंदूरी खाता जा रहा था । एक पीस लेगा ? सलीम ने ना में सिर हिला दिया। अबे ले ले करीम आज भी अच्छा बनाता है । आप खाओ मैं रोज यहीं खाता हूं , मैं तो बस यही कहने आया था कि, गोदाम पर लोगों ने जाना बंद कर दिया, क्यों पता नहीं इसलिए आपको इत्तला किया कि आप भी गोदाम पर मत जाओ, अगर आपकी मर्जी है तो जाओ मैं कुछ नहीं कह सकता, । अबे सुन .. बता तो क्यूं नहीं जाना… सलीमममम…. बात सुन…. सलीम अपनी बोलकर साइकिल पर बैठकर तेजी में चलता बना । जब तक मैं कोई और सवाल उससे करता तब तक वो कालीनी प्रिंटिग प्रेस पार कर चुका था… लेकिन मेरे ज़ेहन में ये सवाल कौंधने लगा कि सलीम ने शमशाद के गोदाम पर जाने से मना क्यों किया , और बाकी लोग भी जाना क्यों बंद कर दिया, वैसे है तो ये मशहूर टेलर वाला फिर ऐसा क्यूं ? हालांकि थोड़ी देर सोचने के बाद मैंने लालकिला जाने का ख्याल छोड़ गाड़ी बल्लीमरान की तरफ मोड़ लिया। सोचा अगर वक्त से पहले पहुंच गया और गोदाम बंद होगा तो फिर पास ही गालिब के मकान के बाहर गाड़ी रोककर दो फूंक सिगरेट के साथ दो-चार शायरी गालिब की याद में लिख लूंगा। हालांकि चांदनी चौंक में रहने का ये फायदा मुझे मिलता था कि मैं खुद को गालिब के बेहद करीब पाता था। लेखनी में कहीं भी फंसता तो गालिब के घर के आगे दो चार सिगरेट के कश मारकर नए शब्द औऱ नई कहानियां सोच लेता , हालांकि अरसा गुजर गया था उस ओर गए हुए। शूटिंग में ज्यादा व्यस्त होने की वजह से मैं अक्सर फोन पर अपने दोस्तों से गालिब के घर की खबर जरूर लेता था, आखिरी बार मेरे एक दोस्त सूर्यकांत पांडे जो एक अखबार में पत्रकार थे उन्होंने बताया था कि सरकार ने मकान को दुरूस्त करने फैसला किया है , क्या पता अब तक दुरूस्त कर भी दिया हो। छोटी गलियों से एम्बेसडर ले जाना मुश्किल था इसलिए बाहर नुक्कड़ के किनारे गाड़ी पार्क कर मैं पैदल ही निकल लिया। गली में आ-जा रहे कुछ लोग सलाम कर रहे थे , हालांकि वो लोग मुझे मेरे पिताजी के नाम से जानते थे । मेरे पिता अपने जमाने के मशहूर ब्यूरोक्रैट्स ऑफिसर थे जो आजकल रिटायर होकर आराम की जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं, चांदनी चौक में किसी को भी कैसी भी मदद के नाम पर पिताजी पहले पहुंचते है, इसलिए लोग उन्हें इज्जत से सलाम करते हैं, औऱ उनकी वजह से कुछ लोग मेरे सामने भी हाथ जोड़ लेते हैं । अपनी ही उधेड़बुन में मैं गली के दूसरे नुक्कड़ से जैसे ही मुड़ा एक तेज और कड़क आवाज मेरे कानों से टकरायी। ‘’अमां 6 साल बाद इस गली में दस्तक दे रहे हो, इतने दिन कहां नातर्स बनकर थे। पिछली बार जब आए थे तो दाढ़ी भी नहीं आई थी इस बार तो भरी-भरी लग रही है। कभी कभी बल्लीमरान में शक्ल भी दिखा दिया करो’’ । अचानक मैं पीछे पलटा तो 24 नंबर का पजामा पहने अहमद आलम साहब जो कभी उर्दू अकादमी के खिदमतगार हुआ करते थे वो बड़े से टेबल पर पान दुकान के बगल में बैठे हुए थे। हालांकि इस गली में रहने वालों के बात करने का अंदाज ही ऐसा होता है, गालियां भी देते हैं तो शायरी के अंदाज में, कभी गाली,गाली की तरह लगती नहीं। अहमद आलम साहब ऐसे शख्स हैं जो मेरी उर्दू को दुरूस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। “छह साल हो गए गुरू जी फिर भी आपने उलटे नजर में एक बार में पहचान लिया। पैर जैसे छूने को हाथ बढ़ाया तो वो बिजली की भांति पैर पीछे खींच लिया। आदतें और इबादतें कभी नहीं बदलती प्रताप, कितनी बार कहा है कि गुरू मत बोला कर, और पैर भी मत छुआ कर, सलाम वालेक्कुम तो बोल सकते हो ना ?? अहमद साहब का पुराना अंदाज आज भी उसकी दाढ़ी की भांति कड़क और बिखरी हुई । इस्लाम को मानते नहीं बल्कि जीते थे लेकिन दूसरों की ज़ेहनियत का भी खूब ख्याल रखते थे मजाल है कि कोई जाते वक्त अहमद साहब के लिए कोई गिला शिकवा पाल ले, सवाल ही पैदा ही नहीं होता। 

याद है आप बोलते थे कि, आपको मैं गालिब का तीसरा नौकर बोलूं और मैं खुद को आपका यानि गालिब के तीसरे नौकर का पहला नौकर। ये सुनते ही अहमद साहब जोर-जोर से बच्चों की तरह हंसने लगे, ज़बान सतरंगी और दातों का रंग एकदम काला हो चुका था। लगता है डबल कत्थई वाला पान छोड़ा नहीं आज भी । 

अभी भी लिखते हो या फिर बस अलमस्त हो गए सिनेमा की दुनिया में कुंवर साहब। 

लिखता हूं गुरूजी…..सॉरी सॉरी गालिब का नौकर साहब। अहमद साहब की जबान थोड़ी लड़खड़ा रही थी, शायद उम्र का तकाजा हो। 

लिखते रहो… लिखना बगावत और तुम मेरे सबसे बड़े बगावती हो, खैर आज इधर कैसे। 

वो गुडलक टेलर वाला शमशाद अतर की गोदाम की तरफ जाना था लेकिन अभी वक्त आधा घंटा और है तो सोचा कि गालिब के घर के पास कुछ देर गुजारूंगा । 

हां, अच्छा, सुना था किसी से कि चांदनी चौक में अरसे बाद किसी हिंदू बड़े घराने में शादी का माहौल जमने वाला है, लेकिन पता नहीं था कि समर साहब के यहां ही जलसा होगा। अतर से कप़ड़े लेने हैं । 

पूरा पान का गिलौरी बाजू में थूक कर अहमद साहब थोड़ा रूक धीमे अंदाज में पूछ बैठै मानों कोई सुन ना लें।

अमां तुम शमशाद के बारे में कुछ सुने कि नहीं, कुछ दिन पहले ही 4 महीने की सजा काटकर आया है। नजर घुमाकर अहमद साहब ऐसे बतियाने में लगे थे मानों कोई सुन लेगा तो बवाल हो जाएगा। …. तुम्हारे कौम वालों ने तो अतर की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करते बस अब सिर्फ तुम्हारे यहां से कपड़ें आते हैं सिलने अतर के पास। पूरे हिंदुओं ने बहिष्कार कर दिया उसका , कुछ हमारी बिरादरी वालों के भरोसे चल रही है उसकी कैची और ज़ुबान। 

लेकिन जनाब,अतर जेल क्यूं गया आदमी तो बड़ा शराफत वाला है ऐब तो है नहीं , बस हाजिर जवाबी के अलावा। 

उसका पुराना शागिर्द शादिक तो आज भी जेल में हैं, उसने ही इल्जाम सर पर लिया, लाहौल विलाकूवत ऐसे लोगों के नाम ज़बान पर क्यूं चले आते हैं। खैर तुम अपना फैसला अभी भी बदल सकते हो , लौट जाओ, शाहजाद के पास चले जाओ उसकी आजकल जमकर चल रही है।
अहमद साहब तिल का ताड़ तो शायरी में बनाते थे लेकिन आज पहली बार औरत माफिक चटर पटर करने में लग रहे थे। ज्यादा वक्त लेते हुए मैं अपने सवालों का तूफान दाग दिया। 
जनाब, अमा अब पहलियों का जमाना तो रहा नहीं, बस मुझे जेल जाने वाली बात अभी समझ नहीं आई और आप बता भी नहीं रहे , किस मसले में अतर अंदर गया था ?

फिरकी ले रहा था, बच्चियों के साथ, नाप लेने के बहाने गोदाम पर बुलाता था और उसके साथ, वो और शादिक दोनों मिलकर घिनौना खेल खेलता था। अरे वो तो मेरा शुक्र मनाए कि समय रहते मैंने पुलिस को इत्तला कर दिया था, नहीं तो तुम्हारे गली वाले तो उसे मार ही डाल चुके थे। लाहौल विलाकूवत जाओ तुम, पता नहीं क्यूं नाम ले रहा हूं। चलता हूं मौका मिले तो अलीफिया से मिलने आ जाना आजकल वो भी कुछ तुम्हारे वाले कोर्स करने में लगी है, बोल रही थी कि एक बार तुमसे मिलवा दूं, और हां अपने अब्बाजान को मेरा सलाम बोलना। 

अहमद साहब अपनी बात कहकर चेहरा तमतमाते हुए तेजी में निकल तो लिए लेकिन मेरे मन में और सवाल पैदा कर गए। यार मैं मान ही नहीं सकता की अतर ऐसी घटिया हरकत करेगा। जमाने से जानता था उसको । अहमद साहब तो निकल लिए , मैं भी दाएं लेकर गालिब-खाने के दरवाजे पर खड़ा हो गया। घर की मरम्मत तो हुई नहीं, पहले के जैसा ही था, और तो और घर की दीवारों पर ढ़ेर सारी शायरी किसी ने पेंट से लिख दी तो कुछ काली औऱ गुलाबी चॉक से लिखी थी।

वो शमां की महफिल क्या 
जिसमें परवाना जलकर खाक ना हो 
मजा तो तब आता है चाहत का मेरे यार 
जब दिल तो जले मगर राख ना हो ।।

एक शायरी अभी पूरी पढ़ी ही थी कि नजर घड़ी पर गई, शमशाद अतर के गोदाम पर पहुंचने का वक्त हो गया था, उत्सुकताओँ औऱ सवालों के बोझ तले मैं तेजी में पलटा और लपकता हुआ गोदाम की तरफ चल पड़ा। रास्ते में दो बातें दिमाग आ रही थी कि सलीम गोदाम पर जाने से शायद इसलिए मना कर रहा होगा ताकि लोग मुझे बदनाम जगह जाते हुए ना देख लें , क्योंकि जेल के बाद गोदाम पर तो अब महिलाओँ के लिए तो जाना वर्जित ही होगा, और उपर से अहमद साहब ने मेरे दिमाग में सवालों का ऐसा गुच्छा छोड़ा जिसमें मैं उलझ गया, क्या शमशाद अतर जैसी रूहानी शख्सियत का मालिक ऐसी गंदी हरकत कर सकता था, क्या पता कर दिया हो.. नहीं नहीं मैं नहीं मान सकता ऐसा हो ही नहीं सकता। अपने ही सवालों और अपने ही जवाबों की गलियों से गुजरता जा रहा था। गालिब तो जैसे अब दिमाग के कोने में खिसक गया, क्या सोचा था और क्या से क्या दिमाग में आना शुरू हो गया। तेज कदमों के साथ गोदाम के आगे मैं जैसे पहुंचा वहां से दो बच्चियों के बाहर आते देखा, 17 की दोनों लड़कियां ऐसी लग रही थी मानों दोनों की जवानी का सवेरा कल ही हुआ हो। मुस्लिम ल़ड़कियों को मैं पहली बार ऐसे खुले कपड़े पहने हुए बल्लीमरान में देख रहा था, वरना आजतक तो आंखों के अलावा काला कपड़ा ही नजर आता था। डीप नेक वाली सूट और दुपट्टा गले में चिपक कर लिपटा हुआ, उसके जिस्म् का कुछ कोना इस्लामिक रिवाजों को गलियाता नजर आया । खैर मैं सारे सवालों को धो-कर चुपचाप गोदाम के छोटे से दरवाजे में घुस गया। जैसे ही घुसा तभी एकाएक किसी लड़की की कानफाड़ू चीख सुनाई दी,चीख भी ऐसी मानों किसी की गर्दन पर छुरी चला दी गई हो। तभी अंदर के दरवाजे से कपड़ों के ढ़ेर के बीच से भागता हुआ शादिक बाहर की तरफ आता दिखा, मैंने उसे रोकना चाहा लेकिन वो तेजी से हाथ छुड़ाकर ऐसे भागा मानों उसकी कोई मैंने गलती पकड़ ली । एक पल के लिए मन किया कि शादिक को दबोच लूं लेकिन लड़की की चीख अभी भी मेरे कानों में गूंज रही थी, और मैं अंदर की तरफ लपक लिया। कपड़ों के गट्ठर के उपर पैर रखकर भागता हुआ जैसे ही अंदर कमरे के दरवाजे पर पहुंचा तो अंदर का नजारा देखकर मैं भक्क रह गया। 15 साल की लड़की जिसका पेट फूला हुआ था वो खाट पर लेटी हुई थी, मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ लेकिन बुरी तरह छटपटा रही थी , पास ही शमशाद अतर अपने मोबाइल पर जोर-जोर से बातें कर रहा था।

सज्जन भाई आपको अल्लाह का वास्ता, बहुत ही मुश्किल में हूं, अब आप ही बचा सकते हो, मैंने शादिक को भेजा है आप थोड़ा जल्दी आ जाएंगे तो मेरे लिए अच्छा होगा। हां-हां मैं सब बातें समझ रहा हूं, देखो सज्जान भाई डॉक्टर अर्जमंद(महान) होता है किसी की भी जिंदगी बख्श सकता है, आप से गुजारिश है एक बार बचा लो सज्जन भाई आपका एहसान कयामत तक उतारूंगा। हां सज्जन भाई बस इंतजार कर रहा हूं।

तो ये है आपका गुनाह शमशाद अतर साहब जिसके लिए आप पांच वक्त नमाज अता करते हैं ! और किसी को अपने गुनाह को छुपाने के लिए उसे कयामत में भी एहसान उतारने की दुहाई दे रहे हैं। मेरी आवाज सुनकर शमशाद बिजली की करंट की भांति उछल पड़ा, औऱ पास ही पड़ा कंबल से उस लड़की को ढ़क दिया । 

हर गुनाह को ढ़क देते हो अतर साहब आप तो, लोग सही कहते हैं आपके बारे में, कि शमशाद बच्चियों पर हाथ डालने लगा है । अरे पांच वक्त का नमाज पढ़ते हो और बंद कमरे में वहशी बन जाते हो। कयामत में क्या जवाब दोगे शमशाद मियां। 

देखिए कुंवर साहब आप जाइए यहां से ये मेरा जात्ती मुआमला है, ना मै कुच सुनना चाहता हूं और ना ही कुछ बताना चाहता , बस चुपचाप तुम जाओ मियां यहां से, ऐसा ना हो कि …..। शमशाद बौखलाता हुआ मुझे धक्का देने की कोशिश करने ही वाला था कि मैंने उसका हाथ कसकर पक़ड़ लिया। 

जात्ती मामला है तो फिर इस बार भी जेल ही जाओगे, सुना है बच्चियों का बड़ा शौक है तुम्हें। 

मेरे इतना बोलते ही शमशाद अतर मेरा गिरेबान पक़ड़कर खाट के पास ले गया औऱ लड़की के उपर से कंबल हटा दिया। लड़की ऐसे फड़फड़ा रही थी मानों जिस्म से जान अभी फट से अलग होने को तैयार है। कुछ और सोच पाता या मैं बोल पाता तभी अतर चिल्लाता हुआ बोल पड़ा। 

प्रताप ये मेरी बेटी है साजिया 15 साल की है, पेट से है । तुमको क्या लगता है मैंने किया है ये, अरे तुमने सोच भी कैसे लिया, कि एक बाप अपनी बेटी को पेट से कर देगा। 14 साल 2 महीने की थी ये,वहशियत का मतलब भी नहीं जानती थी तब तुम्हारी गली के लोगों ने ये कारनामा कर दिखाया, औऱ उनलोगों ने फंसा मुझे औऱ शादिक को दिया, पता है तुम्हें मैं जेल गया था, वो भी अपनी ही बेटी की रेप के इल्जाम में, पुलिस वालों ने केस बनाया कि हिंदुओं की बेटी का मैंने रेप किया, जबकि कुछ लोंगो ने मेरी ही बेटी का रेप कर फर्जी केस में मुझे ही फंसा दिया, मैं सफाइयां देता रहा, चिल्लाता रहा, पुलिस वालों के सामने गिरगिराता रहा , हजार दुहाई दी, लेकिन कोई नहीं सुना, …एकाएक अतर औऱ भी चीख पड़ा….अल्लाह भी नहीं, इसलिए हर रोज पांच वक्त का नमाज में आज भी उसे सुनाने जाता हूं, सोचता हूं कभी तो वो सुनेगा। जब मैं जेल से बाहर आया तो पता चला कि साजिया पेट से हो गई, अरे इस बच्ची को तो एहसास ही नहीं था कि हुआ क्या है, डॉक्टर ने इसके एबॉर्शन करने से मना कर दिया बोला जान चली जाएगी, क्या करता मैं ,एक बारगी तो सोचा की जान जाती है तो जाए लेकिन जिल्लत से तो बच जाउंगा, लेकिन मैं कयामत के रोज क्या जवाब देता अपनी बेटी को, उस गुनाह को मैं कैसे झेल पाता ? तब मैंने फैसला किया कि मैं अपनी बेटी को मरने नहीं दूंगा। हर रोज अपनी बेटी को जिंदा देखने के लिए मैं हर पल मरता हूं। मेरी ज़ुबान और कैची भले ही तेज है लेकिन ज़ेहन और नीयत का पाक साफ हूं, और कह देना पने कौम वालों से ,कि अतर किसी की अस्मत पर हाथ नहीं डाल सकता। सालों बच्चियों पर हाथ डाला नापाक मुर्दे साले। 
शमशाद अतर साहब रोते हुए गुस्से में पागलों की भांति अपनी सफाइयां दिए जा रहे थे, उन सफाइयों में गुनाहगारों के लिए गालियां भी दी, बद्दुआएं भी… एक बाप करता तो क्या करता , जो उसके बस में था बस वही। एक पल के बाद मुझे सुनाई देना बंद हो गया, पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। तभी शादिक एक झोला छाप डॉक्टर को लेकर भागता हुआ अंदर आया। शमशाद अतर मेरी बांह पक़ड़कर खींचते हुए गोदाम से बाहर कर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया । 

मैं उस बंद दरवाजे के बाहर करीब पांच मिनट खड़ा रहा, उस दौरान ना तो मैं सोच पा रहा था ना ही कुछ समझने की शक्ति जुटा पा रहा था, सिर्फ मेरे ज़ेहन में एक ही सवाल था कि इंसान कितना बेबस हो जाता है औऱ उस बेबसी के बंधन का कोई फायदा उठाता है तो कोई उसकी गिरह से खुद को आजाद नहीं कर पाता है।

बोझिल कदम शमशाद अतर के गोदाम से काफी दूर हो चुका था, बस नजरें उठी तो सामने सलीम साइकिल लिए शांत खड़ा था जो मुझे देखकर एक पल के रूका औऱ फिर वहां से चुपचाप निकल गया, क्योंकि मेरी ज़ुबान नहीं बल्कि मेरे आंखों को पढ़ लिया था उसने। बोझिल बेबस कदम औऱ भीगी आंखे जब सामने की तो फिर गालिब की गलियों की आखिरी दीवार पर लिखी दो लाइन ही पढ़ पाया। 

काबा किस मुंह से जाओगे “गालिब” 
शर्म तुमको मगर आती नहीं ।


क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता 













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