जन्मदिन पर विशेष- साहिर/अमृता की कहानी रजनीश बाबा मेहता की ज़ुबानी
कितनी इत्तफाक की बात है कि 8 मार्च के दिन साहिर लुधायनवी भी पैदा हुए थे औऱ 8 मार्च के दिन मैं भी पैदा हुआ। किस्मत की बात है कि वो भी बंबई की गलियों में अपनी दास्तान लिखने आए थे औऱ लिखकर अमर हो गए और मैं अपनी कामयाबी दास्तान लिखने की राह पर अग्रसर हूं । इत्तफाक इस बात का भी है कि अमृता प्रीतम के करीब वो भी रहे औऱ अमृता प्रीतम के मरने से पहले कुछ महीने करीब मैं भी रहा, बस फर्क इतना था कि अमृता साहिर से बेपनाह मुहब्बत करती थी औऱ मुझसे बेटे जैसा प्यार । 25 अक्टूबर 1980 साहिर के इंतकाल का दिन तो बताया लेकिन कहती थी कि वो वक्त कैसे भूल गई, क्या मेरा इश्क कमजोर पड़ गया । हंसते हुए अपने हाथों की अकड़ी उंगलियों को दिखाती थी । 2004 में मुलाकात हुई अमृता प्रीतम से तो वो दिन भी 8 मार्च था औऱ मैं अपने जन्मदिन का केक लेकर उनके पास गया तो वो हंसती हुई यूं ही बोल पड़ी की मीठा तो कब का खाना छोड़ दिया। काफी ज़िद के बाद केक का एक छोटा टुकड़ा अपने मुंह में लेकर लंबी सी कुर्सी पर अमृता यूं पसर गई मानों वर्षों से प्यासी हो औऱ उसके गले को एक बूंद ने तसल्ली से भिगो दिया।गले से केक उतरने के बाद धीमें अंदाज में बोली , बाबा मेहता उंगलियों में अकड़न गई नहीं तो क्या हुआ, कभी इन उंगलियों में आज के दिन सिर्फ मलाई लगी होती थी, बातों का मतलब तो एकदम समझ में नहीं आया, एक तो जब वो बोलती थी तो मेरे दिमाग में ये चलता था कि इतनी बड़ी राइटर हैं कुछ तो मतलब होगा इसलिए उनके बोलने के 5 मिनट बाद तक सोचता रहता था, औऱ उस वक्त भी सोच की घंटियां टन टन दिमाग में बज रही थी । एकाएक कुर्सी पर पसरे-पसरे अपनी बांहे खोल दी औऱ बोली एक बार गले लग जा, मैं चुपचाप उनके पैर के पास बैठ गया लेकिन उसको मुझे गले लगाना था, बस उस इश्क की किताब के एक शब्द से मैं भी भीगने को तैयार था। अमृता ने बाहों में भरते हुए कान में धीरे से कहा, बेटे पता है आज साहिर का भी जन्मदिन है, औऱ तुम्हारा भी । एक पल के लिए मजाक लगा, लेकिन मैं जानता था कि अमृता की उम्र भले ही कब्र की मोहताज हो रही थी लेकिन उसकी लेखनी, शब्द औऱ उसकी य़ादाश्त से कोई माई का लाल टकरा नहीं सकता था। 85 की उम्र में भी वो अपने साहित्यिक यादाश्त से मजबूत थी । उस दिन मैनें भी अमृता से कहा कि कहीं लिखने की प्रवृति औऱ औरतों के करीब रहने का गुण उनकी तरह मुझमें भी है क्या। हंसते हुए अमृता ने कहा तुम्हारे लेखनी की गारंटी तो ले सकती हूं लेकिन औऱतों के मामले में तुलना ना ही करो तो बेहतर होगा । खैर हमारी क्या मजाल कि हम साहिर से अपनी तुलना करें, साला 16 साल की उम्र में तो एक अमृता से मिलने का मौका मिला औऱ उपर से साहिर और उनके इश्क के किस्से उनकी ज़ुबानी मेरे अलावा बहुत कम ही लोगों ने सुनी होगी । क्या था उस साहिर में जो आप इतनी मुहब्बत करती थीं, बार बार मैं ये सवाल पूछता था और वो हर बार बस एक ही लाइन कहती थी कि वो रूहानी है मेरे शब्द जैसा । साहिर से मेरा कुछ रिश्ता तो नहीं लेकिन बस जब-जब ( 8 मार्च) मेरा जन्मदिन आता है तो साहिर की याद आती है औऱ उससे ज्यादा अमृता की याद आती है, जिसकी ज़ुबां से पहली बार मैने साहिर का नाम सुना था, वो भी रूहानी अंदाज में। आज एक बार फिर अमृता प्रीतम आपने उस कहानी को जिंदा कर दिया जिसे आपने ही कई बार सुनाया था औऱ हंसते हुए आखिर में आप साहिर की शायरी की कुछ पंक्तियां कहती थी जिसे मैं एक बार फिर दोहरा रहा हूं। उम्मीद हैं आप जहां भी होगी वहां साहिर की बाहों में खुश होंगी ।
'औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाजार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में’
साहिर लुधियानवी
क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता

No comments:
Post a Comment