सिनेमा, मटन, उर्दू औऱ तिग्मांशु धूलिया के साथ रजनीश बाबा मेहता की मुलाकात
11 JULY 2018
शाम 7 बजे से सुबह 3 बजे तक
कहानी के भ्रंश और अपभ्रंश की फिक्र में मेरी गति रफ्तार पर थी, हालांकि दोनों शब्दों को लेकर कहानी के व्याकरण औऱ विचार की परिभाषा दिमाग में घूम रही थी। लेकिन रफ्तार की मंजिल आते ही खुशी से बैग को देखा औऱ उसमें रखे हार्ड-ड्राइव को निकाल कर एक बार फिर उसे देखकर तसल्ली कर लिया, कि जिस फिल्म को बनाने की कल्पना मैं कई वर्षों से कर रहा था आज वो मेरे पास है, हालांकि खुश इसलिए भी था, कि जिस बड़े एक्टर ने इस फिल्म को तारीख की वजह से ना कर पाने की मजबूरी जाहिर की थी ,आज मैं अपनी फिल्म उसी को दिखाने जा रहा था। हालांकि बंबई में कुछ कहावत है कि पेपर पर तो काले अक्षर की लकीरें बहुत लोग खींच रखे हैं लेकिन कैमरे से जो लकीर खींच पाता है वो किस्मत वाला होता है। वास्तविकता जो भी हो, आज तो मैं इस बंबईया धरती का शुक्रिया करते हुए तेजी से सीढ़ी पर चढ़ता जा रहा था। एक पल के लिए शऱीर हल्का औऱ वो पत्थर वाली सीढ़ी मुकामी रूह को पाने वाली लगने लगी। खुश होना लाजिमी था, लेकिन लालच एक पल के लिए भी महसूस नहीं हुआ ।
संजय मिश्रा के ऑफिस में जैसे ही प्रवेश किया, सामने दीपराज राणा औऱ कई काबिल लोग पहले से मौजूद थे, मुझे लगा संजय सर आए नहीं लेकिन अंदर कदम रखते ही पता चला कि संजय मिश्रा जी ने आज मटन की दावत रखी है, औऱ बनाने का जिम्मा भी खुद उठाया है। भुने मसाले की खुशबू की से निकल ही रहा था कि संजय जी देखते ही गले से लगा लिया औऱ शाबासी देते हुआ कहा कि, गुरू तुमने आखिरकार बना ही लिया, आज रात मटन के साथ तुम्हारी सिनेमा का संयोग बना है, एक दर्शक की तरह देखूंगा, जहां कोई नुक्ताचीनी नहीं होगी।
लब मुस्कुरा कर रह गया लेकिन ज़ेहन में एक सवाल उभरा कि बड़े-बड़े लोग बड़ी-बड़ी बातें कितनी आसानी से कह देते हैं। फोन की घंटी बजती है औऱ संजय जी फोन पर बातें करते हुए खुश हो जाते हैं, फोन कट करते ही बोल पड़ते हैं, तिशु आ रहा है। एक पल के लिए समझ नहीं आया ,लेकिन दूसरे ही पल में बातों की गरमी से पता चला कि तिग्मांशु धूलिया भी मटन दावत में शामिल होने वाले हैं। फिर क्या था मेरी खुशी तो मानो साला रूहानी हो गई हो, बंबई में इतने बड़े निर्देशक के साथ मटन दावत पर सिनेमा की चर्चा जोरदार जो मिलने वाली थी। मेरी फिल्म का ट्रेलर देखा गया संजय जी खुश हुए फिल्म देखने की तारीख फिक्स हुई. कि सबलोग एकसाथ मिलकर फिल्म देखेंगे अभी तिग्मांशु के साथ समय व्यतीत करते हैं। मैं भी साला उस रामाधीर सिंह को करीब से देखना और जानना चाहता था जिसे फैजल ने बाथरूम के पॉट पर गोलियों से भून डाला, औऱ जिनका कहा गया संवाद तुमसे ना हो पाएगा, सबकी जुंबा पर ज्यों-त्यों सिचुएसन में कभी भी चला आता है। साथ ही उत्सुकता इस बात की भी थी कि एक निर्देशक के तौर पर, मैं अपने शुरूआती दौर में हूं औऱ तिंग्मांशु एक निर्देशक के तौर पर अपनी कस्ती को लेकर बीच मंझधार में हैं , यानि दोनों नांव पर सवार हैं हालांकि नदी का प्रवाह , वेग एक सा है लेकिन नदी हमने अलग चुनी है, यानि कहानी औऱ उसके कहने का जरिया हमदोनों का नदी के दो किनारे की तरह है । हालांकि ये बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हासिल औऱ पान सिंह तोमर के अलावा मैं तिग्मांशु धूलिया के फिल्मों से इत्ताफाक नहीं रखता हूं, लेकिन तिग्मांशु बॉलीवुड के ऐसे निर्देशक है जो कभी भी पासा पलट सकते हैं।
मटन की खुशबू औऱ मेरे सिनेमाई सफर का जिक्र जोरों पर था, संजय जी बार-बार मुझे बधाई दे रहे थे औऱ उन्होंने वादा किया कि वो जल्द ही मेरे साथ काम करेंगे, मैं भी अपने अनुभव को साझा करने में पीछे नहीं रहा, बातों की लफ्फाजी चल ही रही थी कि तिग्मांशु धूलिया कमरे के अंदर आए….तब तक संजय जी अपनी पसंद का रिकॉर्डर ग्रामोफोन पर लगा चुके थे, तिग्मांशु पर नजर पड़ते ही मेरे दिमाग में हासिल, चरस, पान सिंह तोमर, साहब बीबी गैंगस्टर के साथ साथ उनकी सारी फिल्में मेरे दिमाग में एक रील की तरफ घूम गई, हालांकि मुझे तिशु की राइटिंग मणि रत्नम निर्देशित फिल्म दिल से में अच्छी लगी थी तो उन्हें मैं एक एक्सपेरिमेंटल निर्देशक के तौर पर सोचता हूं औऱ रिस्क लेने की क्षमता भी है उनमें, जिसकी झलक एक-दो बार सिनेमाई परदों पर जोरदार तरीके से दिखी ।
गोल-मोल औऱ गोरा चेहरा, छोटे बाल, आंखों पर चश्मा ,मोटा कद, लेकिन करिश्माई व्यक्तित्व का मालिक था तिग्मांशु। संजय जी औऱ दीपराज राणा ने मेरी मुलाकात एक न्यूकमर निर्देशक के तौर पर करवाई, मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए तिग्मांशु ने शुभकामनाएं देते हुए कहा कि शुरूआती दौर में सबका सफर ऐसा ही होता है , बस उनकी प्रतिभा उन्हें मुकाम तक खींचकर लाती है। अपने इस संघर्ष के दिनों का सामना एक योद्धा क तरह करो औऱ मजे लेकर करो। जाहिर है तिशु की ये बातें मेरे हौसलों को आसमान पर पहुंचने के लिए काफी था। लेकिन जब लोग बड़े होते है तो उनका अनुभव ही उनका ज्ञान होता है, उनकी बातों में ऊर्जा थी, एक सोच, एक सपना औऱ एक मार्ग था जो मुझे अपने पथ पर अग्रसर होने की नई ताकत दे दिया ।
बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो तिग्मांशु धूलिया ने पहले तो संगीत औऱ म्जूजिक की बातों का जबरदस्त ज्ञान दिया,और मुझे किताबों के नाम की लंबी फेहरिस्त पकड़ा दी ,फिर पढ़ने की सलाह नहीं बल्कि हिदायत दी । हिदायत इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आज के जमाने में पुराने निर्देशकों की ये राय है कि नए जमाने के निर्देशकों को किताबों में कोई शौक नहीं रहा है, सब कॉपी-पेस्ट करने में लगे हुए हैं। लेकिन मेरा मामला किताबों के बारे में थोड़ा गंभीर है, क्योंकि किताब औऱ यात्राएं मेरी सिनेमा के दो अहम् पहलू हैं, हालांकि मैंने भी बड़े बुजुर्ग का ज्ञान समझकर चुपचाप रख लिया। अब इस देश के संगीत घरानों की बात निकली तो कुदरती रंग बिरंगी सबसे दिलचस्प किताब लगी मुझे । जेद्दन बाई के घरानों की बात निकली जो संजय दत्त की नानी है, तो हमें पहली बार पता चला की तवायफ जेद्दन बाई ने तीन शादी की जिसमें 2 हिंदू पति थे औऱ उन दोनों को जेद्दन बाई से शादी के बाद इस्लाम कबूल करना पड़ा था, इससे पता चलता है कि जेद्दन बाई किस किस्म की सख्त कदर की इंसान होंगी, हालांकि जेद्दन बाई ने फिल्म भी बनाई उनमें से एक नाम तिग्मांशु ने बताया कि अपने उस जमाने में मैडम फैशन नाम की फिल्म बनाई थी । अब सबसे बड़ी बात ये थी कि 1990 से पहले भारतीय सिनेमा में निर्माता-निर्देशक फिल्मों का अंग्रेजी में नाम रखने के लिए सौ बार सोचते थे ,लेकिन जेद्दन बाई ने अपने जमाने में अंग्रेजी में फिल्मों का नाम रखा था वो भी मैडम फैशन । क्या औऱत होगी जेद्दन बाई ? दिमाग की हर कड़ियां खुलने लगी, साला आज के जमाने में कोई बोलेगा कि तवायफ फिल्म बना रही है तो सब उसे गालियां तो देंगे ही साथ ही ना जाने कितने सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल करना शुरू कर देंगे । खैर पुरानी संगीत औऱ घरानों का जिक्र होगा तो जेद्दन बाई का जिक्र भी जरूरी हो जाता है।
समझ आपकी सोच की शक्ति होती है ,और एक निर्देशक के लिए उस शक्ति को हासिल करने में वर्षों बीत जाते हैं, कोई कामयाब होकर काबिल औऱ गुणी संपन्न हो जाता है तो कोई तूफान से लड़ता रहता है, और फिल्म बनाता रहता है, लेकिन कुछ अंधेरों में गुम भी हो जाते हैं। हालांकि छोटे शहर से बंबई में आकर बने निर्देशक के लिए एक फिल्म के बाद दूसरी फिल्म तक पहुंचने के बीच गहरा सन्नाटा होता है, जो तिग्मांशु में उस रोज दिखा। बेहतरीन निर्देशक होने के बावजूद पान सिंह तोमर के बाद एक हिट की तलाश में है । संगीत की चर्चा के बीच हीरोइन सुरैया के दिल के रास्ते देवानंद तक चर्चा पहुंची, तो फिर राजकपूर , सलीम साहब के कुछ किस्से भी अपनी झोली में आ गए। अनुभव के तले ज्ञान की बात होते-होते बात जावेद अख्तर तक पहुंची तो उर्दू का ज़िक्र होना लाजिमी था, अब उर्दू का ज़िक्र हुआ, तो मैं एकदम फ्रंटफुट पर आ गया, औऱ अपना आईपैड इस उम्मीद में निकालकर बैठ गया कि मौका मिला तो दो-चार बातें मैं भी आज इस ज्ञानसागर में उड़ेल दूंगा। लेकिन उर्दू के बारे में पहली लाइन सुनते ही मेरी उत्सुकता उदासी में बदल गई । चेहरा भक्क से ऐसे उड़ गया मानों लफ्ज़ के नीचे से नुक़्ता गायब हो गया हो ।
उर्दू गलीचों की भाषा है ! इतना सुनते ही सबसे पहले तो मेरी फिलॉस्पी मुझसे ही टकरा गई, मेरा व्हाट्सएप स्टेटस हमेशा के लिए ये है कि ज़ुबान उर्दू होनी चाहिए । यानि मेरे कहने का मतलब है कि “ज़ुबान अदब की होनी चाहिए।” मैं भी कोई उर्दू का एक्सपर्ट नहीं था, तो जानने की इच्छा औऱ तीव्र हो गई। हालांकि उर्दू के शुरूआती दिनों के बारे में जानकारी तिग्मांशु से ही पता चला, जश्न-ए-रेख़्ता में जावेद अख्तर के वक्तव्य का हवाला देते हुए तिग्मांशु ने कहा कि, “उर्दू शुरूआत में फौजियों की भाषा थी” फौजियों की भाषा का मतलब मिली जुली भाषा, यानि बहुत सारी भाषाओं से बनी एक भाषा जिसका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है। हिंदुस्तान में पैदा हुई उर्दू आज पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है, कई कठमुल्लों ने उर्दू को अपनी टोपी पहनाकर हथिया लिया, यानि आसान लफ़्ज में कहें तो उर्दू भाषा का मतलब मुसलमान की भाषा । ये मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि आज के संदर्भ में जिसे लोगों ने हकीकत मान लिया है, ये वो सच है । हालांकि भाषा का ज्ञान आज के हिंदुस्तान में बहुत कम लोगों को है, लेकिन इसके ज्ञानी होने का दावा बहुत लोग करते हैं, जिसके चलते लोग भाषा को लेकर चाहे हिंदी हो या उर्दू दोनों मामले में कई बार गलत ज्ञान बांट देते हैं । वैसे सच कहूं तो फिल्म स्कूल के बाद मुझे तिग्मांशु धूलिया ऐसे पहले शख्स मिले जिसने मेरे अंदर चल रहे सिनेमा बनाने के द्वंद को और भी हवा दे दी , हालांकि उन्होंने ये भी समझाया कि सिनेमा सिर्फ परदा नहीं होता है, परदे पर चल रही पूरी दुनिया जो दिखती है ,उसकी कल्पना औऱ उसकी बनावट एकदम हकीकत के पैमाने से अलग है । अब इस अलगाव की कई कहानियां औऱ डाक्यूमेंट पर चर्चा जोरदार हुई। हालांकि ये बात सुन और समझ तो 17 साल की उमर से रहा हूं लेकिन तभी तिग्मांशु एकाएक एक लाइन बोल पड़े कि LANGUAGE जो है REGION का होता है RELIGION का नहीं होता है , औऱ हवाला भी उन्होंने एक बार फिर जावेद अख्तर का दिया । यानि ज़बान इलाकों की होती है मज़हब की नहीं। अब बात उर्दू की निकली तो दूर तलक जाएगी ही, क्योंकि आज की तारीख़ में उर्दू के मामले को कुछ खास वर्ग अपनी विरासत मानते हैं औऱ ये वैसे लोग है जो हकीकत से अंजान है। तिग्मांशु ने अख्तर साहब के हवाले से एक औऱ कहानी हमें सुनाई जो खासकर मैंने जश्न-ए-रेख्ता में सुना था लेकिन उस वक्त मेरे ज़ेहन से गायब थी।
सन् 1798 की बात है ,उस वक्त शाह अब्दुल क़ादिर ने क़ुरान का अनुवाद उर्दू में किया था, ये पहला मौका था जब उर्दू को उसकी मूल भाषा से किसी अलग भाषा में अनुवाद किया गया था, हालांकि धार्मिक खानदान से ताल्लुक रखने वाले शाह अब्दुल क़ादिर को ये कहकर कुफ्र के फतवे दे दिए , कि इतनी गलीच भाषा में इसका अनुवाद किया क्यों, औऱ ताज्ज़ुब इस बात की है सन 1875 के आस-पास उर्दू भाषा को मज़हबी रंग में रंग दिया गया, ये पहला मौका था जब उर्दू को किसी खास वर्ग ने अपनी बपौती कह डाली औऱ पहनने को एक टोपी दे दी । हालांकि ये वाक्या सिर्फ उर्दू के साथ नहीं हुआ बल्कि तुलसीदास ने भी जब अपने तरीके से रामायण की रचना की तो लोगों ने उस वक्त उनका भी हुक्का-पानी बंद कर दिया था। यानि खुले लफ्जों में कहें तो बदलाव का शुरूआती दौर हमेशा मुश्किलों से घिरा होता, रचना भी औऱ रचनाकार भी ।
अब जब भाषा की बात चली ही थी तो हमें इसकी उत्पत्ति जानने की जिज्ञासा हुई। संजय मिश्रा जी के बनाए तीखी वाली मटन के साथ पता चला कि,
'उर्दू' शब्द मूलतः तुर्की भाषा का है तथा इसका अर्थ है- 'शाही शिविर’ । तुर्कों के साथ यह शब्द भारत में आया और इसका यहाँ प्रारम्भिक अर्थ खेमा या सैन्य पड़ाव था। यहां बोली जाने वाली भाषा- ‘ज़बान ए उर्दू ए मुअल्ला’ (श्रेष्ठ शाही पड़ाव की भाषा) कहलाई। भाषा विशेष के अर्थ में ‘उर्दू’ शब्द इस ‘ज़बान ए उर्दू ए मुअल्ला’ का संक्षेप है।
हैरत की बात ये है कि मुहम्मद हुसैन आजाद, उर्दू की उत्पत्ति ब्रजभाषा से मानते हैं। 'आब ए हयात' में वे लिखते हैं कि 'हमारी जबान ब्रजभाषा से निकली है। हालांकि बहुत लोगों की राय कुछ और भी है।
उर्दू के कवि मीर साहब ने एक जगह लिखा है-
दर फ़ने रेख़ता कि शेरस्त बतौर शेर फ़ारसी ब ज़बाने
उर्दू-ए-मोअल्ला शाहजहाँनाबाद देहली।
भाषा तथा लिपि का भेद रहा है क्योंकि राज-महाराजा के सभाओं की भाषा फ़ारसी थी तथा लिपि भी फ़ारसी थी। उन्होंने अपनी रचनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए भाषा तो जनता की अपना ली, लेकिन उन्हें फ़ारसी लिपि में लिखते रहे।औऱ ये सिलसिला लंबे वक्त तक कहें या सदियों तक चला ।
उर्दू की बात शुरू होते ही मेरी कलम में थोड़ी रफ्तार आ जाती है, हालांकि रात गहरा गई खाना खत्म होने की कगार पर था लेकिन मेरा मस्तिष्क ज्ञान को अर्जित किए जा रहा था। इसी बीच तिग्मांशु मटन चलाने वाले हथियार से ही मटन की ग्रेवी खानी शुरू कर दी, अब इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि मटन का जायका कितना जबरदस्त होगा औऱ वो भी संजय मिश्रा के हाथों से बना हुआ । हालांकि फिल्मी दुनिया के दिग्गज राजकपूर, गुरूदत्त, देवानंद , सुरैया, सलीम खान, जावेद अख्तर, अनुराग कश्यप , सेक्रेड गेम्स के गलियारों से होते हुए हम एक बार फिर सुरों की दुनिया में पहुंच गए। जहां तिग्मांशु ने अपनी फिल्म यारा का गाना सुनाया, हालांकि यारा फिल्म का नाम मैं पहली बार सुन रहा था औऱ उस रोज पता चली थी कि ये फिल्म शायद रिलीज ही नहीं हुई। अब दुविधा देख लीजिए, हर निर्देशक की कोई ना कोई एक ऐसी फिल्म होती ही है जो रिलीज नहीं होती औऱ उसे वो सीने से लगाकर रखता है। तिग्मांशु को यारा फिल्म को लेकर बहुत भरोसा था लेकिन फिल्म अपनी किस्मत की कगार पर ही खड़ी रही। लेकिन हमलोग यारा के गाना सुने और साथ ही साहब बीबी गैंगस्टर 3 का गाना भी सुना, हालांकि उस रात तिग्मांशु की दीवानगी देखते ही बन रही थी, लेकिन वो कहीं ना कहीं भीतरी मन से निराश था। शायद वो एक अदद हिट की इंतजार में था । खैर जो भी हो तमाम दलीलें , ज्ञान , जानकारी, औऱ ना जाने क्या-क्या मैं लेकर जाने वाला था। सुबह के तीन बज गए , सब अपने सुरूर में आ गए, सबके जाने का वक्त हो गया, मैं अपनी फिल्म दिखाने आया था सिर्फ ट्रेलर पर मामला थम गया, तारीफें हुई, सिनेमा देखने की तारीख फिक्स हुई और एक फैसला हुआ कि उस दिन मटन फिर से बनेगा।
हालांकि मैं अपने आईपैड पर किताब के नामों की लिस्ट के साथ-साथ ज़ेहन में ढ़ेर सारी सिनेमा से संबंधित बातें लेकर निकल पड़ा। सुबह के तीन बजे आराम नगर के सामने वाली सड़क पर मैं अकेले काफी देर बैठा रहा , अकेलेपन की सोच औऱ समझ की गणित को सुलझाने में लग गया। सवालों की फेरहरिस्त एकाएक दिमाग में जोर मारने लगा , नींद की तरह ।
क्या किस्मत होती है इंसानों की ? अपनी शौक के लिए किस हद तक क्या-क्या कर गुजरते हैं ?
ये इस बबई शहर से बेहतर कौन बता सकता है, हालांकि अब दिमाग के दरवाजे पर नींद की दस्तक होने लगी, लेकिन आज एक बार फिर एक फैसला लेकर घर की तरफ निकल पड़ा । फैसला सिनेमाई है समय-समय पर लोगों को सुनाई जरूर देगा ।
क़ातिब


No comments:
Post a Comment