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| JAGRANI DEVI STORY |
जिस मादरे-वतन की मिट्टी के लिए 25 साल का नौजवान मौत की हसीन वादियों में खो गया, उसी नौजवान की मां को, उसी वतन की मिट्टी पर पांच फुट की जमीन भी नसीब ना हो सका। संवेदनाओं की सहनशीलता कितनी मजबूत होगी उस मां की, जिसने अपने कोख से कलंक नहीं बल्कि महानता की ऐसी मिसाल को पैदा किया, जिसे भारतवर्ष में अनंतकाल तक कोई भूल नहीं पाएगा, और उसकी महानता के तले बैठी उस बूढ़ी कांपती मां ने कभी गुमान करना जरूरी नहीं समझा, बल्कि संघर्ष की दीवारों पर नंगे पांव चलना ही बेहतर समझा । क्या मजाल की एक बार भी उस औऱत की जुबान से उफ तक निकल जाए । चंद्रशेखर आजाद जिसका बेटा होगा उसकी मां तो ममता औऱ महानता की मूरत ही होगी। नाम जगरानी देवी, वक्त के मजबूत थपेड़े भी जगरानी के इरादों को डिगा नहीं सका। हाथ न फैलाने की विरासत आजाद को अपनी मां से मिली और जिसे आजाद ने आखिरी सांस तक बखूबी निभाया।
इस दौर में कुछ ही कहानियां अनसुनी सी है जो कहीं किताबो में पढ़ने को नहीं मिलती और ना ही जल्द कहीं सुनने को मिलती है । ऐसी ही कहानी हम आपको कहानीबाज के पिटारों से निकालकर आपको सुनाने आए हैं। पांच फुट की जमीन के लिए जगरानी देवी को मौत के बाद भी क्यों इंतजार करना पड़ा ? क्या मानवता आजादी के बाद भी कब्र में सो रही थी ? या फिर आजाद की लोकप्रियता कुछ चंद सफेदपोशों को मुसीबत नजर आने लगी थी ? सवालों की फेहरिस्त लिए कहानीबाज खड़ा तो है लेकिन जगरानी के खामोश जबावों का सामना करने की हिम्मत नहीं है।
माँ जगरानी के लिए चंदू और देश के लिए आज़ाद यानि शहीद चंद्रशेखर आज़ाद, , वही आज़ाद जिनके बारे में हम जानते है कि इन्होने देश की खातिर हँसते हुए अपनी जान तक न्योछवर कर दी....हाँ वही आज़ाद जिनकी बन्दूक में आखिरी गोली बचने पर जिन्होंने सोचा कि अंग्रेजो के हाथ गोली खाने से ज्यादा आनंददायी खुद के हाथों शहीद होना बेहतर है,देश आज़ाद को जानता है और जानता है उनकी कुर्बानी को, लेकिन कुछ बातें ऐसी भी है जिन्हे हम नहीं जानते।
जंगल में लकड़ी बिन रही एक मैली सी धोती में लिपटी बुजुर्ग महिला कांपते कदमों के साथ धीरे धीरे लालसा लिए ऐसे चल रही थी मानों वो सामने मौत से मिलने को आतुर हो । सर का पल्लू जब तक संभालती तभी वहां खड़े एक भील ने हंसते हुए कहा - “अरे बुढिया ! तू यहाँ न आया कर, तेरा बेटा तो चोर-डाकू था, इसलिए गोरों(अंग्रेजों) ने उसे गोली मार दिया“। एक पल को उस बुढ़िया में मानो जान आ गई हो, जिस बेटे के इंतजार में वो जिंदगी की सीढ़ीयां चढ़ रही थी उसकी चर्चा सुनकर मानों उसके शरीर में बिजली आ गई, हाथ से सर का पल्लू हटाकर लकड़ी बगल में फेकते हुए बड़े ही गर्व से बोली - “नही चंदू ने देश की आजादी के लिए कुर्बानी दी हैं." । वो कोई चोर नहीं था ना ही डकैत था वो मेरा बेटा था और इस मिट्टी की खातिर इसी मिट्टी में मिल गया । बुढ़िया को तैश में देख वो भील चुपचाप वहां से निकल लिया ।
वो बुजुर्ग औरत का नाम जगरानी देवी था, जिन्होंने अपनी कोख से पांच बेटों को जन्म दिया था। इसी माँ का आखिरी बेटा कुछ दिनों पहले ही शहीद हुआ था। मां जहाँ अपने इस लाडले बेटे को चंदू कहती तो वही दुनिया उसे चंद्रशेखर आजाद के नाम से जानती हैं।
ये वो वक़्त था जब हिंदुस्तान को आज़ादी मिल चुकी थी। आजाद के एक करीबी मित्र सदाशिव राव अचानक आजाद के माता-पिता जी की खोज करते हुए सीधे उनके गाँव पहुँच गए। देश को आजादी मिल चुकी थी लेकिन भवरा में जगरानी से वक्त ने बहुत कुछ छीन लिया था। चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद ही उनके पिता जी सीताराम तिवारी की भी मृत्यु हो गयी थी, जबकि आज़ाद के भाई सुखदेव तिवारी की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी। आज़ाद के पिता की मृत्यु बेहद निर्धनावस्था में हुई जिसके पश्चात् आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माताश्री ने ऐसी अवस्था में भी किसी के आगे हाथ ना फैलाए। औऱ फैलाती भी क्यों आजाद की मां थी वो, मजबूत जगरानी देवी थी वो । हालात औऱ वक्त से लड़ते हुए उन्होंने खुद ही जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बिनना शुरू किया , हाथ फ़ैलाने की बजाय लकड़ी बेचकर अपना पेट पालना जरुरी समझा। लेकिन वृद्धावस्था के चलते औऱ आंखों में मोतियाबिंद के चलते वो इतना भी काम नहीं कर पाती थी कि भरपेट भोजन का इंतजाम कर सके। यहाँ तक कि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं थी ।शर्म की बात तो यह रही कि उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद भी वैसी ही रही । आजाद जल्दी रोता नहीं था लेकिन वो भी मरने के बाद मां की आत्मा का दर्द देखकर सितारों की भीड़ में से कहीं एक बार बिलखता जरूर होगा ।
आजाद का क्रांतिकारी जीवन का केंद्र बिंदु झांसी था जहां क्रांतिकारियों में से 4 या 5 लोग उसके बेहद करीब थे जिनमें सदाशिव मलाकपुरकर एक थे। चंद्रशेखर आजाद अपने जीवन में गोपनीयता रखते थे और यही वजह है कि वो कभी पुलिस से पकड़े नहीं गए , उन्हे इस बात का बखूबी अंदाजा था कि साथियों में कुछ कमजोर कड़ी है जो पुलिस की प्रताड़ना पर विश्वसनीय नहीं रह जाएंगे । लेकिन आजाद सदाशिव जी उन विश्वसनीय लोगो में से थे , जिनको वो अपने साथ भवरा ले गए औऱ अपने पिता सीतराम तिवारी और मां जगरानी देवी से मिलवाया था ।
सदाशिव ने चंद्रशेखर आज़ाद को एक वचन दिया था जिसके चलते वो आज़ाद की माताजी को अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आ गए, उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के वजह से उनका घर भी बहुत छोटा था इसलिए उन्होंने भगवान दास माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा की, मार्च 1951 के दौरान आजाद की माँ जगरानी देवी का झांसी में निधन हो गया । यहाँ सदाशिव ने ही उनका सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार खुद अपने हाथों से ही किया था ।
इसके बाद आज़ाद की माताश्री के देहांत के बाद झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक स्थान पर पीठ का निर्माण किया, लेकिन प्रदेश की तत्कालीन सरकार (इस दौरान यहाँ कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे गोविन्द बल्लभ पन्त) ने इस निर्माण को झाँसी की जनता द्वारा किया हुआ अवैध और गैरकानूनी कार्य घोषित कर दिया गया, परन्तु झाँसी की जनता ने सरकार के उस शासनादेश को महत्व नहीं दिया और आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला कर लिया, साथ ही मूर्ति बनाने का काम चंद्रशेखर आजाद के ख़ास दोस्त कुशल शिल्पकार रूद्र नारायण सिंह को सौपा गया। उन्होंने फोटो को देखकर आज़ाद की मां जगरानी देवी के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी ।
सरकार को जैसे ही यह पता चला कि आजाद की मां की मूर्ति बनकर तैयार की जा चुकी है और सदाशिव राव, रूपनारायण, भगवान दास माहौर समेत कई क्रांतिकारी झांसी की जनता के सहयोग से मूर्ति को स्थापित करने जा रहे हैं, तो उसने अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश, समाज और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगा दिया। हर चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की मां जगरानी देवी की मूर्ति की स्थापना ना की जा सके।
कर्फ्यू के बाद भी जब जनता का काफिला नहीं रुका तो तिलमिलाई सरकार ने तुरंत ही पुलिस को सदाशिव को गोली मार देने का आदेश दे डाला किन्तु आज़ाद की माताश्री की प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर पीठ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में ले लिया था। यह देखते ही पुलिस ने जुलुस पर लाठी चार्ज कर दिया । इस लाठी चार्ज में सैकड़ों लोग घायल हुए तो वही कई लोग अपंग हो गए और कुछ लोगो की मौत भी हुई। और आखिरकार चंद्रशेखर आज़ाद की माताजी की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी ।
इस घटना के बाद आजाद के दोस्त सदाशिव मलकापुरकर ने रोते हुए कहा था ,” चंद्रशेखर आजाद ने तो अपनी जान देकर भारत मां पर शहीद हो गए थे लेकिन हम इतने दुर्भाग्यशाली हैं कि चंद्रशेखर आजाद की मां के लिए वो अपनी जान ना दे सके “।
उस वक्त की दास्ताना आज भी इतनी ताजा लगती है मानों घटना कल ही हुई हो , वीरों की शहादत अपने लहू में ऐसे महसूस होता है मानों चंद्रशेखकर आजाद , भगत सिंह , रामप्रसाद बिस्मिल औऱ अन्य क्रांतिकारियों से नाता पुराना औऱ अपना है । ऐसा लगता है ये बात कल की ही तो है । जो भी बात हो जगरानी देवी तुझ सा मां नहीं देखा । हालांकि मां की तुलना बेमानी है फिर भी तुझ सा मां नहीं देखा ।
एक कहानी थी वो भी सच्ची सो कह दिया ।
बस आजाद के लफ्ज आखिर में गूंज रहे हैं ,
मां मैं आजाद था , आजाद हूं और आजाद ही रहूंगा ।
क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता

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