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| कातिब,कहानीबाज रजनीश बाबा मेहता |
हिंदी हमारी सभ्यता संस्कृति की पहचान है।
हिंदी हमारी गंगा जमुनी तहज़ीब की आन है।
हिंदी , हर हिंदुस्तानी का सम्मान है।
जिसके बिना हिंद थम जाए
ऐसी जीवनरेखा है हिंदी।
हर हिंदुस्तानी का अभिमान है हिंदी
हिन्दी, मादर-ए-हिंद की शान है , हिंदी।
हिन्दी मेरी भाषा है, हिन्दी मेरी आशा है ,हिन्दी का उत्थान करना,
यही हर हिंदुस्तानी की जिज्ञासा है।
14 सितंबर 1949 बुधवार का दिन था। हिंदुस्तान की संसद अभी अपने बालपन के पालनों में खेल रही थी । जवाहरलाल नेहरू संसद के गलियारों में चाय के साथ धूप का मजा ले रहे थे। तभी बाबा साहेब अंबेडकर आते ही नेहरू के कंधे पर हाथ रखते हुए हिंदी को लेकर किए गए फैसले पर खुशी जाहिर की। लेकिन नेहरू ने ये कहकर अपने मन की शंका जाहिर कर दी कि आने वाले दिनों में जो दर्जा हिंदी को देना चाहिए वो उसे पूरी तरह नहीं दिया जा रहा है। अंबेडकर नेहरू की मन की पीड़ा को समझ गए औऱ वो तुरंत ही मजाकिया लहजे में बोल पड़े,”आप कहें राष्ट्रभाषा घोषित कर दें। एक देश एक भाषा, अच्छा रहेगा ना”। हंसते हुए नेहरू ने बाबा साहब को कहा कि , ये वो भी जानते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो फिर एक औऱ गृह युद्ध के लिए तैयार हो जाओ”। दोनों ठहाके मारते हुए संसद के दरवाजों में गुम हो गए।
हिंदी को लेकर नेहरू की मंशा एकदम साफ थी लेकिन वो जानते थे कि अगर हिंदी के वर्चस्व को पूरी तरह से स्थापित किया गया तो फिर दक्षिण के साथ साथ कई औऱ जगहों पर इसको लेकर विद्रोह छिड़ जाएगा। औऱ उस वक्त भारत किसी भी आंतरिक युद्ध के लिए ना तो तैयार था औऱ न ही ऐसी किसी स्थिति का सामना करने के मूड में था। भाषाओं को लेकर नेहरू औऱ अंबेडकर दोनों एकमत नहीं थे। दोनों अंग्रेजी भाषा में पढ़े लिखे विद्वान औऱ फैसला उनको हिंदी के बारे में लेना था। लेकिन अंबेडकर जो बीच का रास्ता निकालने में माहिर माने जाते थे उन्होंने इस बार हिंदी को भी बीच मंझधार में छोड़ दिया। अंबेडकर ने उस वक्त ये कहा था कि आने वाले दिनों में हिंदी को उसके मुकम्मल मकाम तक पहुंचाया जाएगा, लेकिन वो जानते थे कि जो फैसला कर रहे हैं वही आखिरी होगा बाकी भविष्य के वादे सारे खोखले ही साबित होंगे।
हालांकि उस रोज 14 सितंबर, 1949 को भारत की संवैधानिक सभा में हिन्दी को देवनागिरी लिपि में लिखा गया था और हिन्दी को भारत गणराज्य की अधिकारिक भाषा भी घोषित किया गया था। तब से लेकर इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। हालांकि हिन्दी भाषा को भारत की अधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला भारत के संविधान में 26 जनवरी, 1950 से प्रभाव में आया है। भारतीय संविधान के मुताबिक, देवनागिरी लिपि में लिखित हिन्दी भाषा को पहले भारत की अधिकारिक भाषा के रुप में अनुच्छेद 343 के तहत अपनाया गया था। नेहरू के मन में हिंदी को लेकर पशोपेश जो था वो सालों तक उसके मन को सालता रहा। यही वजह है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस दिन के महत्व को समझते हुए इस दिन को हिन्दी दिवस के रुप में मनाने की इच्छा जताई थी। औऱ भारत में पहली बार हिन्दी दिवस, 14 सितंबर साल 1953 में मनाया गया।
हालांकि आजादी के बाद से लेकर आजतक हिंदी के मामले में भले ही सुधार हुआ है लेकिन इतने बरस गुजर जाने के बाद ये सुधार का सफर एकतदम धीमी है। हालांकि हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने से काफी लोग खुश नहीं थे और इसका विरोध करने लगे. इसी विरोध के चलते बाद में अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा दे दिया गया।
इसे हिन्दी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इतनी समृद्ध भाषा कोष होने के बावजूद आज हिन्दी लिखते और बोलते वक्त ज्यादातर अंग्रेजी भाषा के शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है. और तो और हिन्दी के कई शब्द चलन से ही हट गए. ऐसे में हिन्दी दिवस को मनाना जरूरी है ताकि लोगों को यह याद रहे कि हिन्दी उनकी राजभाषा है और उसका सम्मन व प्रचार-प्रसार करना उनका कर्तव्य है. हिन्दी दिवस मनाने के पीछे मंशा यही है कि लोगों को एहसास दिलाया जा सके कि जब तक वे इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे तब तक इस भाषा का विकास नहीं होगा.।
1. वर्तमान में भारत में 43.63 फीसदी लोग हिन्दी भाषा बोलते हैं. जबकि 2001 में यह आंकड़ा 41.3 फीसदी था. तब 42 करोड़ लोग हिन्दी बोलते थे. जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच हिन्दी बोलने वाले 10 करोड़ लोग बढ़ गए. साफ है कि हिन्दी देश की सबसे तेजी से बढ़ती भाषा है.
2. इसे आप हिन्दी की ताकत ही कहेंगे कि अब लगभग सभी विदेशी कंपनियां हिन्दी को बढ़ावा दे रही हैं. यहां तक कि दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल में पहले जहां अंग्रेजी कॉनटेंट को बढ़ावा दिया जाता था वही गूगल अब हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषा वाले कॉन्टेंट को प्रमुखता दे रहा है. हाल ही में ई-कॉमर्स साइट अमेजन इंडिया ने अपना हिन्दी ऐप्प लॉन्च किया है. ओएलएक्स, क्विकर जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही हिन्दी में उपलब्ध हैं. स्नैपडील भी हिन्दी में है.
3. इंटरनेट के प्रसार से किसी को अगर सबसे ज्यादा फायदा हुआ है तो वह हिन्दी है. 2016 में डिजिटल माध्यम में हिन्दी समाचार पढ़ने वालों की संख्या 5.5 करोड़ थी, जो 2021 में बढ़कर 14.4 करोड़ होने का अनुमान है.
4. 2021 में हिन्दी में इंटरनेट उपयोग करने वाले अंग्रेजी में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से अधिक हो जाएंगे. 20.1 करोड़ लोग हिन्दी का उपयोग करने लगेंगे. गूगल के अनुसार हिन्दी में कॉन्टेंट पढ़ने वाले हर साल 94 फीसदी बढ़ रहे हैं, जबकि अंग्रेजी में यह दर सालाना 17 फीसदी है.
5. अभी विश्व के सैंकड़ों विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है और पूरी दुनिया में करोड़ों लोग हिन्दी बोलते हैं. यही नहीं हिन्दी दुनिया भर में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली पांच भाषाओं में से एक है.
6. दक्षिण प्रशान्त महासागर के मेलानेशिया में फिजी नाम का एक द्वीप है. फिजी में हिन्दी को आधाकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है. इसे फिजियन हिन्दी या फिजियन हिन्दुस्तानी भी कहते हैं. यह अवधी, भोजपुरी और अन्य बोलियों का मिलाजुला रूप है.
8. साल 2017 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में पहली बार 'अच्छा', 'बड़ा दिन', 'बच्चा' और 'सूर्य नमस्कार' जैसे हिन्दी शब्दों को शामिल किया गया. 7. पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, युगांडा, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, मॉरिशस और साउथ अफ्रीका समेत कई देशों में हिन्दी बोली जाती है।
हिंदी हमारे हिंद की धड़कन है, हिंदी हमारे हिंदुस्तान की भाषा है ।
कितना मजा आता है जब हिंदी दिवस पर कुछ लोग हिंदी के नाम पर खुद को सबसे बड़ा क्रांतिकारी घोषित कर देते हैं। बतकही की ऐसी पराकाष्ठा पार कर देते हैं जिसे पढ़कर ऐसा लगता है कि साला इससे बड़ा हिदीं का कोई क्रांतिकारी है ही नहीं । लेकिन वो भूल जाते हैैं औऱ खुद अपना सारा काम अंग्रेजी में करते है। नौकरी आवेदन के लिए बोलो तो फटाक से अंग्रेजी में चार-पांच पेज पेल डालेगा। अब जब मौका है हिंदी दिवस का तो हम जैसे हिंदी भाषी को साला आज बड़ा अजीब लग रहा है कि पूरा साल हिंदी में काम करते रहे, सिनेमा हिंदी में बनाते हैं, स्क्रिप्ट हिंदी में लिखते हैं, सारा काम हिंदी के आड़े तिरछे लकीरों से ही करते हैं तो आज ही क्यों इस बतकही में शामिल हुआ जाए ? हमारे लिए तो बंबई में हर पल हिंदी दिवस होता है, नौकरी में, कहानी में, किताबों में, कविताओं में,सनिमा में, सोच में हर जगह। अब जब हिंदी का जन्मदिवस मनाना है तो फिर आंख मूंद कर ही सही ताली तो बजाना ही पड़ेगा औऱ साथी केक भी खाना ही पड़ेगा। लो जी हमने भी हिंदी दिवस मना लिया । लेकिन हम भी कम नहीं कुछ ज्ञान तो पेल ही देंगे।
जरा इधर ध्यान दीजिए कि हिंदी दिवस का शुरूआत कैसे हुई ।
सबसे पहली बार हिंदी के गलियारे में सुगबुगाहट 1918 में एक इस देश का एक बुजुर्ग आदमी ने किया था औऱ उसका नाम था महात्मा गांधी। गांधी ने इसे जनमानस की भाषा कहा था और इसे देश की राष्ट्रभाषा भी बनाने को कहा था। अब देखिए साला इस देश की किस्मत कि हिंदी के जन्मस्थान में आजादी के बाद ऐसा कुछ नहीं हो सका। कुछ अंग्रेजी टाइप के सत्ता में आसीन लोगों ने जाति-भाषा के नाम पर राजनीति कर कभी भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया। तड़प ऐसी कि राजभाषा तो बन गए बस एक कदम पर मोक्ष मिलना था वो आज तक नहीं मिला। यानि दूसरे शब्दों में कहे तो हिंदी की आत्मा आज भी राष्ट्रभाषा बनने के लिए भटक रही है । अगर क्रांति करनी है तो भाई अपनी वन लाइनर वाली हिंदी मैसेज से नहीं कुछ योगदान से किजिए जिससे क्रांति की लौ उठे औऱ हम अपने घर में हिंदी को सही स्थान दिला पाएं। हालांकि इस काम की शुरूआत बहुत पहले चुकी है लेकिन तड़प आज तक बाकी है,आजादी के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास और व्यौहार राजेन्द्र सिंह आदि लोगों ने बहुत से प्रयास किए। जिसके चलते इन्होंने दक्षिण भारत की कई यात्राएँ भी की, लेकिन इन बेचारे हिंदी के सच्चे क्रांतिकारी को क्या मिला, सब किताब की जिल्द(कवर) पर बड़े-बड़े अक्षरों में नाम औऱ फिर ये लोग मर गए। बस घर की अलमारी में वो किताब रखी है जिसे गाहे बगाहे कभी कभार निकालते हैं औऱ आधे पढ़कर सो जाते है अगले दिन काम वाली उस किताब को वहीं अलमारी में ऱख देती है। ठीक हिंदी की राष्ट्रभाषा बनाने की क्रांति भी कुछ निकम्मे कामगारों की वजह से इसे दिल्ली के सरकारी दफ्तरों की अलमारी में बंद कर दिया गया।
हालांकि यूं तो अंग्रेजी भाषा के बढ़ते चलन और हिंदी की अनदेखी को रोकने के लिए हर साल 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है लेकिन एक दिन में क्रांति मिलनी होती तो साला बात ही क्या था ।आजादी मिलने के दो साल बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एक मत से हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया था, उस वक्त भी मुद्दा राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर उठाया गया लेकिन उस वक्त की सरकार अंग्रेजों औऱ अंग्रेजी की सरपरस्ती के दबे इतनी दबी हुई थी कि वो हिंदी को मोक्ष तक पहुंचने नहीं दिया, औऱ बाकी लोग भी हिंदुस्तान के नए मालिक की बात मानकर चुपचाप राजभाषा को कबूल किया और इसके बाद से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। सोचिए गांधी जिस बात को 1918 में उठाया था उस बात की कद्र आजादी के बाद नहीं , ये कौन लोग हैं जो हमारे अधिकार पर हिटलरी फैसला करते हैं, उनकी भाषा दरअसल हिंदी है ही नहीं, अब ऐसे में उदाहरण के तौर पर देखें तो एक मुसलमान आदमी कैसे हिंदी की कद्र कर सकता है, वो तो अपना गाना गाएगा।
अब जरा इस पर ध्यान दीजिए 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ साथ राजभाषा नीति भी लागू हुई। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि भारत की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप है। हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का प्रयोग भी सरकारी कामकाज में किया जा सकता है। अनुच्छेद 343 (2) के अंतर्गत यह भी व्यवस्था की गई है कि संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक, अर्थात वर्ष 1965 तक संघ के सभी सरकारी कार्यों के लिए पहले की भांति अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग होता रहेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी कि इस बीच हिन्दी न जानने वाले हिन्दी सीख जायेंगे और हिन्दी भाषा को प्रशासनिक कार्यों के लिए सभी प्रकार से सक्षम बनाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 344 में यह कहा गया कि संविधान प्रारंभ होने के 5 वर्षों के बाद और फिर उसके 10 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे, जो अन्य बातों के साथ साथ संघ के सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में और संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग पर रोक लगाए जाने के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा। आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए इस अनुच्छेद के खंड 4 के अनुसार 30 संसद सदस्यों की एक समिति के गठन की भी व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 120 में कहा गया है कि संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है।
वर्ष 1965 तक 15 वर्ष हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी अंग्रेजी को हटाया नहीं गया और अनुच्छेद 334 (3) में संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह 1965 के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रखने के बारे में व्यवस्था कर सकती है। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भारत की राजभाषा है।
यानि अंग्रेजी आज भी अपना पिछवाड़ा हिंदी के पीछे बैठकर खुजा रहा है। 26 जनवरी 1965 को संसद में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि "हिन्दी का सभी सरकारी कार्यों में उपयोग किया जाएगा, लेकिन उसके साथ साथ अंग्रेज़ी का भी सह राजभाषा के रूप में उपयोग किया जाएगा।" वर्ष 1967 में संसद में "भाषा संशोधन विधेयक" लाया गया। इसके बाद अंग्रेज़ी को अनिवार्य कर दिया गया। इस विधेयक में धारा 3(1) में हिन्दी की चर्चा तक नहीं की गई। इसके बाद अंग्रेज़ी का विरोध शुरू हुआ। 5 दिसंबर 1967 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राज्यसभा में कहा कि हम इस विधेयक में विचार विमर्श करेंगे। अब बताइए आइरन लेडी ने विचार के नाम पर हिंदी को ऐसा लटकाया कि साला आज तक इनकी पुश्तें विचार ही कर रही है।
वर्ष 1990 में प्रकाशित एक पुस्तक "राष्ट्रभाषा का सवाल" में शैलेश मटियानी जी ने यह सवाल किया था कि हम 14 सितम्बर को ही हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं। इस पर प्रेमनारायण शुक्ला जी ने हिन्दी दिवस के दिन इलाहाबाद में इसके कारण को बताया था कि इस दिन ही हिन्दी भाषा के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। इस कारण इस दिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। लेकिन वे इस जवाब से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि इस दिन को हम राष्ट्रभाषा या राजभाषा दिवस के रूप में क्यों नहीं मनाते हैं। इसके साथ ही शैलेश जी ने इस दिन हिन्दी दिवस मनाने को शर्मनाक पाखंड करार दिया था।
अब हर लोग अपने तरीके से अपनी बात कहने में लगे हैं। विरोध तो नाम भर का रह गया, अधिकार मांगने की बात तो दूर अब तो दुनिया उंगलियों तक सीमित रह गई है ।
जाति औऱ भाषा के नाम पर राजनीति करने वाले चन्द राजनेताओं की वजह से देश का सम्मान बनने वाली भाषा सिर्फ राजभाषा तक सीमित रह गई। बजी-खुची कसर आज के बाजारीकरण ने पूरी कर दी जिस पर अंग्रेजी की बड़ी जबरदस्त पकड़ है । आज हिंदी जानने और बोलने वालों को एक गंवार के रूप में देखा जाता है । कुछ लोग तो इंटरव्यू में जाने से पहले इसलिए डर जाते हैं क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती औऱ इंटरव्यू के बाद वो दूसरे इंटरव्यू की नाकाम तैयारी में लग जाता है। यानि अंग्रेजी की वजह से बेचारे हिंदी भाषी की जबरदस्त पेलाई और बेइज्जती।
हिंदी को लेकर अगर कोई राज्य तारीफ के काबिल है तो वो नार्थ इस्ट के सारे राज्य। नार्थ इस्ट के आठ राज्यों में हिंदी को लेकर जबरदस्त मुहिम चलाई जा रही है। सुनकर आश्चर्य होता है कि अरूणाचल प्रदेश में सैकड़ों कबीलाई समूह होने के बावजूद उनलोगों के बीच हिंदीं गजब अंदाज में प्रचलित है। तो इस हिंदी दिवस पर नार्थ इस्ट के हिंदी के खंगालने के लिए के चक्कर लगाना जरूरी है।
हिंदी को लेकर सिर्फ बातें नहीं उसको लेकर काम किया जाना चाहिए। हिंदी को दिल से अपनाने की जरूरत है ना कि सहानुभूति कि।
हिंदी वाला सिनेमाई साधु
रजनीश बाबा मेहता

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