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| FILM पुण्यतिथि:death Anniversary Writer Director Rajnish BaBa Mehta |
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Writer Director Rajnish BaBa Mehta
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ये एक ऐसा सफ़र हैं जहां चलना अकेला होता है। अगर साथ किसी का होता है, तो फिर वो कहानियों का साथ औऱ सिनेमा के जज़्बात होते हैं। आसान नहीं होता किसी भी कहानी के आकर्षण को सिनेमा के सकल संसार तक पहुंचाना। बरसों बीत जाते हैं, कई राहगीर टकराते हैं। कुछ हौसले तोड़ देने की बात करते हैं, तो कोई हौसला बनकर साथ खड़ा हो जाता है। सिनेमा की समझ है ही ऐसी, जिसे समझाना हर किसी को आता है, लेकिन समझना कोई नहीं चाहता। शब्दों की काली लकीरों के पीछे से झांकते हुए चुपचाप चलते रहने का फैसला कभी-कभी भीष्म प्रतिज्ञा जैसा प्रतीत होता है। कभी-कभी मन अडिग रहने को मना कर देता है, तो कभी फिर से प्रण कर पथरीले रास्तों का राहगीर बन ख़्वाबगीर को कस कर गले लगा लेता है। कितना मुश्किल होता है बेहतर पाने का आकर्षण। पाना सबको बेहतर से बेहतर है, वो भी अभूषणों से जड़ित आकर्षित । इससे पहले कि सोच संकुचित हो, निकल जाता हूं ऐसी दुनिया से। खो जाता हूं कहानीबाजी की गर्भ-गृह में । जहां कुछ लकीरों के जरिए इंसानी जिंदगी को तब तक कुरेदता रहूंगा जब तक वो कोरे पन्नों पर अपनी तस्वीर ना बना ले। कहानी के आकार और प्रकार निश्चित होते ही सिनेमा के संकल संसार में एक बार फिर लौट आउंगा। मायानगरी के कुरूक्षेत्र में हर कोई अपने-अपने चक्रव्यूह की रचना कर अभिमन्यु बनने की फ़िराक में है। लेकिन शायद वो भूल जाते हैं कि चक्रव्यूह तोड़ना तो अर्जुन को भी आता था। और वैसे चक्रव्यूह रोज-रोज भेदे नहीं जाते है। कहानीबाजी के सफर में चक्रव्यूह कुछ इसी अंदाज में टूटता आया है, जब सिनेमाई ताबीर का जिक्र सरेआम होता है। कुछ मिला, कुछ बाकी रहा। कुछ मिला इसलिए क्योंकि बरसों की तपस्या से कुछ निर्माण किया। कुछ बाकी इसलिए रहा क्योंकि सफर ज़ारी है औऱ जारी रहेगा, कहानीबाजी के पैमाने तले सिनेमा के अंदाज को सीखने की, परखने की।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
7th Indian cine film festival Mumbai 8th Sep 2019
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