Thursday, 2 May 2019

अक्खड़ अनुराग, अवॉर्ड औऱ जूता

अक्खड़ अनुराग, अवॉर्ड औऱ जूता
WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA with ANURAG KASHYAP

मैं नास्तिक हूं। सिनेमा ही एकमात्र धर्म है जिसे मैं मानता हूं।” गजब का दृढ़ विश्वास, दृढ़निश्चय वाली इस वक्तव्य को सुनकर एकबारगी मन सवालों से भर जाता है। हालांकि इन बातों को कहता तो मैं भी हूं लेकिन इस पर पहला हक इस वक्त के सबसे बेहतरीन लेखक, एडिटर, प्रोड्यूसर, निर्देशक की उपाधि पहन सिनेमाई जगत पर राज करने वाले अनुराग कश्यप का है। 1993 में जिस साल बंबई में बम ब्लास्ट की घटनाएं घटित हुई उसी साल अनुराग कश्यप ने बंबई की धरती पर पहुंचने का फैसला किया यानि अपना करियर फिल्म में ही बनाने की ठान ली। यही वजह है कि अनुराग पर बंबई बम ब्लास्ट की घटनाओं का इतना गहरा असर पड़ा कि इस विषय पर फिल्म बनाने की ठानी और ब्लैक फ्राइडे के नाम से फिल्म बनाकर पूरी दुनिया में सनसनी भी फैला दिया। 

हालांकि अनुराग कश्यप की बात मैं इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि इत्ताफकन ही सही अनुराग से कई मौकों पर मुलाकत हुई लेकिन एक मौका ऐसा था जिसे मैं कभी भूल नहीं पाता हूं। दरअसल साल 2018 में जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान बाबरी विध्वंस के बैक़ड्रॉप पर बनी मेरी फिल्म पुण्यतिथि:Death Anniversary की स्क्रीनिंग की गई, जहां दुनिया भर के तमाम डायरेक्टर अपनी फिल्म के जरिए अपने आप को बेहतर साबित करने में लगे हुए थे। इसी फिल्म फेस्टिवल के अवॉर्ड समारोह की जब बारी आई तो फिर मुंबई के सबसे मंहगे होटल जे डब्लू मैरियट में इसका आयोजन किया गया। मेरी फिल्म स्क्रीन की गई थी जिसकी वजह से मुझे भी एक लेखक-निर्देशक के तौर पर आमंत्रित किया गया। लेकिन दुर्भाग्य इस बात का था कि मुझे अवॉर्ड तो नहीं मिल पाया लेकिन फिल्म की तारीफ के शब्दों से ही मैं भाव विभोर था। उस साल की बेहतरीन शॉर्ट फिल्म में पुण्यतिथि फिल्म का भी नाम लिया गया। एक छत के नीचे सुधीर मिश्रा, अनुराग कश्यप, इम्तियाज अली, पंकज कपूर, सुप्रिया पाठक, पूजा भट्ट, वरूण धवन, तब्बू जैसे नामचीन लोग भी मौजूद थे।
हालांकि एक पल के लिए लगा कि इन छोटे फेस्टिवल में भी बड़े कलाकार अवॉर्ड को लेकर पता नहीं क्यूं भूखे रहते हैं ? खैर सोच को किनारा किया तब तक स्टेज पर अनाउंस हुआ कि सबसे बेहतरीन निर्देशक का अवॉर्ड अनुराग कश्यप को फिल्म मुक्केबाज के लिए दिया जा रहा है, स्टेज पर अवॉर्ड देने के लिए सुधीर मिश्रा खुद मौजूद थे, ट्रॉफी के साथ करीब 1 लाख का रूपये का चेक अनुराग को पकड़ाया गया। माहौल में सन्नाटा था, हर कोई अनुराग के लफ्जों को सुनने को बेकरार था। अनुराग चेक की राशि को एक पल के लिए देखा औऱ हंसते हुए कहा कि “इतने में तो मेरा जूता जरूर आ जाएगा”। अनुराग कश्यप इन बातों को बोलकर खुद ही हंस रहे थे, लेकिन पूरे हॉल में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। मौके की नजाकत को देखकर एंकर ने माहौल को ये कहते हुए संभाल लिया कि आज स्टेज पर रियल अनुराग कश्यप यानि सुधीर मिश्रा खुद मौजूद है। बातें और बातों का महौल एकदम से बदल गया, एकदम बंबई की बारिश और और किस्मत की तरह , हालांकि एक पल के लिए अनुराग को भी लगा कि वो गलत तो नहीं बोल गया, लेकिन बेबाकपन जिसकी आदत होती है उसे अपने किए का एहसास नहीं होता। अगले ही पल एंकर की बातों को लपकते हुए अनुराग और सुधीर ने कहा कि अगर इंडस्ट्री में कोई रियल अनुराग कश्यप है, तो वो महेश भट्ट साहब है। माहौल हल्की तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। महेश भट्ट ही वो शख्स हैं जिनके तलवे तले बैठकर अनुराग कश्यप औऱ सुधीर मिश्रा ने फिल्म मेकिंग औऱ राइटिंग का ककहरा सीखा। इसलिए इन दोनों महानुभावों ने सारा क्रेडिट द्रोणाचार्य भट्ट साहब को दे दिया। सामने की लाइन में बैठी भट्ट साहब की बेटी पूजा भट्ट जिनकार करियर लगभग खत्म हो चुका है उनकी रीढ़ की हड्डी में एकाएक तनाव आ गया औऱ चारों तरफ देखते हुए उजले कमीज को खींचा और तनकर बैठ गई। अब पूजा अपनी बाकी बची जिंदगी अब्बा के हुनर के तले ही गुजार रही हैं चाहे वो इंस्टाग्राम की लाइफ हो या फिर फिल्म सड़क-2 ही क्यों ना हो। 
जो भी हो जूते वाली बात भले ही मजाक में कही गई हो, लेकिन उस वक्त अनुराग के अक्खड़पन को एक बार फिर सामने ला दिया। हालांकि अनुराग के अक्खड़पन का मैं विरोधी इसलिए नहीं हूं, क्योंकि मैं खुद एक अक्खड़ किस्म का अादमी हूं, जो सिनेमाई सफर को लेकर अपनी अलग औऱ बेबाक राय रखता है। लेकिन फिर भी  मनोभाव को लिखना इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि बगल में बैठे कुछ सिनेमाई दोस्त जो सिनेमा को एक खांटी दर्शक के तौर पर देखता है उनलोगों को अनुराग की बात रास नहीं आई। अब ऐसे में आम आदमी के मनोभाव को मैं दरकिनार कर भी नहीं सकता हालांकि मैंने उनलोगों को समझाने का भरकस प्रयास किया लेकिन जूता वाली लाइन को मैं उसके जेहन से मिटा नहीं पाया। 
अब ऐसे में बात जो भी हो जूते वाली लाइन उस वक्त मेरे दिमाग में भी नस्तर की तरह चुभने लग गई। हालांकि अवॉर्ड खत्म होने के बाद मैं और अनुराग दोनों 10 मिनट के लिए मिले, औऱ उसने मेरा औऱ मेरी फिल्म के साथ साथ  आगे की कहानियां जिसपर मैं फिल्म बनाउंगा उसको लेकर हौसला भी बढ़ाया, औऱ ज्ञान दिया कि सिनेमा के पथ पर चलते रहना। मुश्किलें आएगी सामना करना, लेकिन सफर जारी रखना। 
स्टेज पर जूते वाला बयान औऱ स्टेज के नीचे संवेदनाओँ औऱ प्रगतिशील से भरी बातें। मन अपने ही विचारों में उलझ गया था। थोड़ी बातें करने के बाद अनुराग वहां से निकल लिया, लेकिन मैं कुछ औऱ निर्देशक औऱ अभिनेताओं के साथ घंटों चैट करता रहा। हालांकि सारी सिनेमाई बात होने के बावजूद वो जूते वाली लाईन मेरे जेहन में इस कदर उलझ गई थी जो निकल ही नहीं रही थी। कभी कभी बड़े ओहदे यानि सफलता मिल जाने के बाद हम ये सोचना बंद कर देते हैं कि हमारे द्वारा कही गई बातें लोगों को जे़हन में गलत अवधारणा पैदा कर सकती है। हुआ भी कुछ ऐसा ही था। अवॉर्ड समारोह में जितने भी लोग थे सिर्फ अनुराग के जूते वाली बयान को लेकर आपस में चर्चा कर रहे थे। कुछ लोग उसे घमंडी, अहंकारी, तो कुछ उसे बदतमीज तक कह रहे थे। 
हालांकि मैं अपने आस-पास लोगों के बीच अनुराग के मजाकिया अंदाज को लेकर मजबूती के साथ उसे डिफेंड कर रहा था, लेकिन लोग समझने को कतई तैयार नहीं थे। मुझे भी कुछ का ज्ञान सुनना पड़ा तो कुछ ने लगे हाथों मुझे उसका अंदभक्त तक करार दे दिया। लेकिन मैं जानता था कि अनुराग से मैं जितनी मुहब्बत करता हूं उतना ही नफरत भी करता हूं। इस मुहब्बत औऱ नफरत की वजह मैं किसी को समझाने के मूड में नहीं था। 
खाने की प्लेट लेकर मैं चुपाचप उस गुट से निकलकर लॉबी में बैठ गया। कभी-कभी बेबाकी भारी पड़ जाती है। मन विचार में था कि जो एक डायरेक्टर भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में महज 10 दिनों में 55 फिल्में देख डालता है, औऱ विटोरियो वित्तोरियो दे सिका की फिल्म बायस्किल थीफ उसे सबसे अधिक प्रभावित करता है। अपने बिंदास बोल से उसने ऐसे मौकों पर छोटे फिल्ममेकर के दिल में थोड़ी अपनी जगह भले ही कम कर लिया हो। लेकिन उस फिल्म फेस्टिवल से अनुराग के दिल का परिवर्तन कितना दृढ़ होगा कि उसने पूरी जिंदगी फिल्मी सफर पर चलने का फैसला कर लिया था। फिल्म फेस्टिवल में बायस्किल थीफ फिल्म खत्म होने के बाद ,यही से वो दो आंखें एक सपना देखती है कि एक दिन वो भी ऐसी ही कुछ कहानी कहेगा, जिसकी वजह से वो बड़ा औऱ मशहूर डायरेक्टर भी बनेगा। फैसला देखिए कितना कठिन था, क्योंकि अनुराग के पास फिल्म इंडस्ट्री में विरासत के नाम पर सिर्फ बायस्किल थीफ फिल्म की एक अमिट छाप, और सिनेमाई  समझ वाली पढ़ाई थी, लेकिन पहचान के नाम पर था सिर्फ और सिर्फ शून्य ! 


ANURAG KASHYAP - RAJNISH BABA MEHTA

अनुराग का कई इंटरव्यू देखा जहां वो कहते दिखे कि बंबई आने के बाद उन्होंने पृथ्वी थिएटर में वेटर का काम किया, और फ्री में लेखनी खूब की। फिर भट्ट साहब की छत्रछाया में टीवी सीरियल कभी-कभी में पैसे वाली लेखनी का पहला मौका मिला। हालांकि अनुराग  1997-1998 के दौर में जब फिल्म शूल औऱ सत्या लिखी तो उन्हें समझ आ गया था कि, इस फिल्मी खेल में वो एक मजबूत मोहरा है जिसका सफर बहुत लंबा होने वाला है। फिर क्या था अनुराग ने शुरूआती दौर से ही शॉर्ट फिल्म के लेखन-निर्देशन और संपादन में हाथ आजमाना शुरू कर दिया था। जिसकी बदौलत जल्द उसका इंतजार खत्म हुआ और अपनी पहली फिल्म एक निर्देशक के तौर पर पांच बनाई। हालांकि सेंसर बोर्ड की वजह से ये फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाई।लेकिन अनुराग के पांव यहां थककर रूके नहीं, ना ही वो हार माना। चलते रहने का फैसला किया। रामू कैंप के सबसे मजबूत खिलाड़ी की जेब में अब तक कुछ कुछ प्रोड्यूसर के विजिटिंग कार्ड भी आ चुका था। जिसकी वजह से वो अपने आगे के सपनों को बुनना शुरू किया।  क्योंकि पांच जिन लोगों ने देखी सबने अनुराग कश्यप के सिनेमाई सूझ-बूझ की तारीफ की। 
मैं खुद को भी अनुराग के सिनेमाई सफर के बहुत करीब पाता हूं। एक वाक्या याद आ गया जब 2012 में मैं फिल्म एंड टेलीवजन इंस्टीट्यूट पूणे गया था। फिल्म निर्देशन कोर्स में होने की वजह से वहां के सीनियर ने जमकर रैंगिग की, हालांकि मैं भी बिहारी अक्खड़, कोई हमारी सुलगा दे तो फिर हम भी उसकी  लंका लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। 
एक सीनियर ने अनुराग कश्यप के नाम का जिक्र करते हुए पूछा कि इसे जानते हो । हां, में जवाब दिया तो उसने झट से पूछ बैठा कि अनुराग कश्यप की पहली फिल्म का नाम बताओ ? पता नहीं कहकर टालना चाहा, फिर एक सवाल मेरी तरफ आया कि चलो अनुराग की एक फिल्म का नाम बताओ । दिन भर इंटरव्यू के बाद शाम में भूख लगी थी औऱ उपर से रैंगिग, दिमाग तो सांतवे आसमान पर था। मैंने जवाब दिया फिल्म पांच। फिर क्या था वो सीनियर बातों से हमें खूब पेला। बस हाथ ही नहीं उठाया। गाली देते हुए निकल गया,औऱ जाते जाते  ये बोलते हुए गया कि , कि साला मेरे साथ सयानेबाजी करता है, कभी औऱ हत्थे चढ़ा तो खूब पेलूंगा। तेज भूख लगी होने की वजह से मैं भी चुपचाप वहां से खिसकने में ही भलाई समझी, क्योंकि अगले दिन की तैयारी भी करनी थी। 
साल 2012 इस वक्त तक मैं अनुराग कश्यप से मिल चुका था। 2010 में फिल्म उड़ान के प्रोमशन के दौरान अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवानी न्यूज चैनल के चौखट खटाखटा रहे थे । उसी दौरान मैं भी एक न्यूज चैनल में पत्रकार की हैसियत से नौकरी करता था। उसी इंटरव्यू के दौरान अनुराग ने मुझे पांच औऱ ब्लैक फ्राइडे के बारे में विस्तार से बताया था। अनुराग जब पांच औऱ ब्लैक फ्राइडे के दौरान संघर्ष के बारे में बात कर रहा था तो उस वक्त लगा कि ये इंसान साला सिनेमा का बादशाह बनना डिजर्व करता है। सड़कों की धूल फांक कर सिनेमा बनाना सबके बस की बात नहीं है। शायद यही वजह है कि उस वक्त के संघर्ष की तपिश, आज के अनुराग में अंगार भर दिया जिसकी वजह से वो अब अक्खड़ हो गया है।  

हालांकि अनुराग कश्यप खुद बड़े आलोचक रहे हैं, इसलिए वो आलोचना के हर दांव पेंच को समझते हैं। लेकिन जब जब अनुराग को आलोचना झेलना पड़ा तब तब वो अपनी बात बड़े ही अक्ख़ड़ औऱ बेबाक अंदाज में रखते हैं, तब वो ये नहीं सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे। अनुराग कभी भी डिप्लोमेटिक बात नहीं करते हैं। 
इसका सटीक उदाहरण ये भी है कि  एक बार कुछ इंडिपेडेंट फिल्ममेकर के साथ अनुराग से मिला, उसमें मैं भी था। मैं ये सोचकर गया था कि बॉलीवुड में मॉर्डन, इंडिपेडेंट
फिल्मों पोस्टर ब्वॉय बन बैठे अनुराग कश्यप को डार्क कहानियों से बेहद लगाव है। और मुझे भी डार्क कहानियों के साथ साथ इंटेलिजेंट कॉन्टेट बेहद पसंद है। इसी वजह से एक सोच को समझने के लिए अनुराग से मुलाकात हुई, जहां सिनेमा को लेकर बहुत बातें हुए। लेकिन आखिरी में किसी ने पूछा कि एक अच्छी कहानी है आप प्रोड्यूस करना पसंद करेंगे। अनुराग एक मिनट के लिए रूका औऱ हंसते हुए कहा कि - कोई भी उसके पास अपनी कहानी ये सोचकर ना लाए कि वो उसे डायरेक्ट या प्रोड्यूस कर देगा। जिसे बनाना है खुद बनाए उसके पास ना आए।
अनुराग की इन बातों से कई लोग उसे बड़ी बड़ी बातें बोलने वाला बताकर वहां से निकल गया। सबसे आखिर में मैं निकला, लेकिन सोच में सिर्फ ये बात थी अनुराग के बोलने के पीछे का मकसद क्या था। क्योंकि वो खुद अपनी ज़िंदगी में कई त्रासदियों से गुज़र चुके हैं। एक गिफ़्टेड राइटर और एक प्रयोगधर्मी फ़िल्मकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले अनुराग ने अपने शुरुआती दौर में इंडस्ट्री में लंबा संघर्ष किया। वो इस दौरान डिप्रेशन से गुजरे लेकिन फ़िल्मों को लेकर उनका अथाह प्रेम उन्हें फिर से फ़िल्मों की दुनिया को ओर ले आया। अनुराग को भी इस समंदर जैसे इंडस्ट्री में किसी ने सहारा दिया होगा, सिनेमा बनाने को लेकर किसी ने उसका हाथ पकड़ा होगा, फिर अनुराग ऐसी निराशाजनक बातें क्यों कह गया। ऐसे में दो बात थी, एक तो वो किसी नौसिखिए के प्रोजेक्ट में हाथ डालकर एक्सपेरिमेंट कतई नहीं करना चाहता था क्योंकि ऐसा करके वो कई बार हाथ जला चुका था, दूसरा उसके पास इतना प्रोजेक्ट होगा कि दूसरों पर ध्यान देने का वक्त नहीं होगा। हालांकि यहां पर अनुराग एक बार फिर अपने अक्खड़पन का जबरदस्त परिचय दिया। हालांकि शुरूआती दौर में अनुराग भी बड़े बड़े फिल्मकारों औऱ अभिनेताओँ की आलोचना अपने ब्लॉग के जरिए किया करते थे, ये वो वक्त था जब उसके पास काम की कमी हुआ करती थी। तब वो अपने मन की भड़ास , या कहे गुस्सा अपने ब्लॉग पर लिख कर निकालता था।  

अनुराग कश्यप की पहली फ़िल्म पांच आज तक सिनेमाघरों का मुंह नहीं देख पाई है, वो अलग बात है कि अनुराग मार्का सिनेमाप्रेमियों ने इस फिल्म को टॉरेंट पर इतना देखा कि ये फ़िल्म आज एक कल्ट क्लासिक के तौर पर जानी जाती है। लेकिन इस फ़िल्म के बाद उनकी दूसरी फ़िल्म ब्लैक फ्राइडे की रिलीज़ पर भी प्रतिबंध लगने पर अनुराग बेहद टूट गए थे। इसी सिलसिले में किसी इंटरव्यू के दौरान उसने एक वाक्या सुनाया था जो कि आज के नए नवेले फिल्ममेकर के लिए सोचने का विषय है। इस नए नवेले में मै खुद को भी गिन रहा हूं। 

उन्होंने कहा कि ‘हमने बेहद कम बजट में ब्लैक फ्राइडे की शूटिंग की थी। ये बेहद चुनौतीपूर्ण था लेकिन आखिरकार हम अपना काम कर चुके थे। इस फ़िल्म का प्रीमियर जनवरी में था। मैंने प्रीमियर के लिए पहली बार सूट सिलवाया था। मैं घर से निकला, लिफ़्ट से उतरा और तभी वॉचमैन का फोन आया कि आपको बुला रहे हैं? मुझे लगा कि मैं कुछ भूल गया हूं। मुझे बताया गया कि मेरे लिए एक फोन है। मैंने फोन पिक किया, सामने से बताया गया कि मेरी फ़िल्म पर कोर्ट ने बैन लगा दिया है। प्रीमियर कैन्सिल हो चुका है और हम फ़िल्म रिलीज़ नहीं कर रहे हैं। मुझे समझ नहीं आया कि मैं इस बात पर कैसे प्रतिक्रिया दूं। मेरी फ़िल्म पांच पहले ही बैन हो चुकी थी। गुलाल एक शेड्यूल के बाद उसका शूट रूक गया था। एल्विन कालीचरण बंद हो चुकी थी।  मैं बस अपने कमरे में गया और मैंने पेग बनाना शुरू किया। मैं अगला एक महीना अपने होटल के कमरे में ही रुका रहा। शायद यही कारण था कि मैं जिस भी दौर से गुज़रा, वो फ़िल्म नो स्मोकिंग से लोगों के सामने आया।’
मतलब कुल मिलाकर अनुराग डिप्रेशन में भी एक लेखक औऱ निर्देशक के तौर पर दिमागी रूप से सक्रिय होते हैं। हालांकि इस मुश्किल वक्त में इन दो आंखों के जरिए देखे गए सपनों पर टिके रहना इतना आसान नहीं है जितना की असल जिंदगी में सब कुछ साफ साफ दिखाई पड़ता है। 

कहीं पढ़ा था कि एक दशक पहले अनुराग कश्यप जब बॉलीवुड में संघर्ष कर रहे थे, तब फिल्म उद्योग के एक पुराने खास व्यक्ति ने उन्हें जबरदस्त सफलता मिलने की बात कही थी । उन्होंने भविष्यवाणी की,  ‘‘उनके पास आइडिया की कमी नहीं होगी क्योंकि वे अपनी आसपास की दुनिया में काफी गहराई तक जमे हुए हैं”। जब काम नहीं होता है तो फिर दिमाग में सिर्फ आइडिया होता है, और यही वो क्षण है जब हम औऱ आप अपने आइडिया के साथ गहराई से जीते हैं, औऱ अगर आइडिया संभालने में कामयाब हो गए यानि कहें कि उसे पन्नों पर उतारने में कामयाब हो गए तो फिर बंबई वक्त भी देती है जब वो आइडिया प्रकाश की परिकल्पना से सुनहरे पर्दे पर एक नायाब सिनेमा का रूप लेती है। जिसका उदाहरण भी जीता जागता अनुराग कश्यप ही है। 
जूते, चश्मे, और फिल्म की डीवीडी के शौकीन अनुराग थोड़े कंजूस किस्म के आदमी है, रहन सहन एकदम सादा, कार के नाम पर होगा एक्का दुक्का, अनुराग एक ही टीशर्ट तो बार-बार पहने दिख जाएंगे । 
अपने करियर के शुरुआती दौर में, उन्होंने कुछ महीने मुंबई की सड़कों पर लगे बेंचों पर बिताए हालांकि ये सब कभी कभी सहानुभूति के लिए भी जोरदार तरीके उछाला गया, लेकिन गुरिल्ला-फिल्म बनाने की तकनीक के लिए अनुराग कश्यप इस कदर खासे मशहूर है कि जिसमें वास्तविक स्थानों के दृश्यों को किसी भी चेतावनी के बिना फिल्म में दिखाया जाता है उसी शैली के आधार पर ब्रिटिश निर्देशक पहले तो कश्यप की रचनाओं से काफी प्रेरित हुए, जिसके चलते उन्होंने कश्यप की फिल्म बनाने की शैली को ऑस्कर सम्मानित फिल्म “स्लमडॉग मिलियनेयर” के कुछ दृश्यों में रूपांतरित किया। 

कामयाबी जितनी जल्दी अनुराग के कदमों में आई उतनी ही जल्दी नाकामयाबी का स्वाद भी अनुराग को झेलना पड़ा, हालांकि मौजूदा हालात में अनुराग कई इंटनेशनल प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, उम्मीद है कि इंडीपेन्डेन्डेंट फ़िल्मों के पोस्टर ब्वॉय अनुराग कश्यप एक बार फिर अपनी शैली से वापसी करेंगे। जिसके लिए वो जाने जाते हैं। 

हालांकि अगली बार जब अनुराग से मिलूंगा तो सिर्फ यही कहूंगा कि दुनिया तुम्हारे जूतों से नहीं बल्कि तुम्हारे द्वारा बनाई गई अदभूत सिनेमाओं से याद रखेगी। इसलिए अक्खड़ता के मार्ग पर चलकर पुराने अनुराग को हासिल करने का प्रयास करें, ये सिर्फ सलाह होगी इसलिए क्योंकि मैं आज के अनुराग का प्रशंसक कतई नहीं हूं,  बल्कि मैं पांच और ब्लैक फ्राइडे फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप का प्रशंसक हूं। 

फिर किसी मोड़ पर मुलाकात होगी, तब तक लिए शुक्रिया। 

कातिब, कहानीबाज & सिनेमाई साधु 
रजनीश बाबा मेहता 
WRITER & DIRECTOR -  RAJNISH BABA MEHTA







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