Thursday, 27 June 2019

भगोरिया उत्सव में सजीली की शादी

Bhagoria Festival By Rajnish BaBa Mehta

भगोरिया उत्सव में सजीली की शादी 


जंगल में जब टेसू के फूल खिलने लगते हैंमहुआ अपने पूरे मौज पर महकने लगता हैताड़ से रस टपकने लगता हैलोगों पर फाल्गुन का फाग चढ़ने लगता हैतब मध्यप्रदेश में भगोरिया का उत्सव आता है। यह एक ऐसा अनोखा उत्सव है, जहां अनगिनत कथाएं, क़िस्से और कहानियां प्रथाओं की चादर में आज भी हल्की-हल्की सिमटी हुई सिसकती दिखाई देती हैं। कहीं कोने में हंसी-ठहाकों का कान-फाड़ू शोर होता है, तो कहीं किसी दूसरे कोने में दुबकी इंसानी ज़िंदगी की ख़ुशियों में हल्की बेबसी उबासी लेती हुई अलसाई सी रेंगती रहती है।

दरअसल, भगोरिया उत्सव मध्यप्रदेश के धार, झाबुआ, खारगोन, खरड़ावद और अलीराजपुर के अलावा कई इलाक़ों में होलिका दहन से 7 दिन पूर्व से और ठीक एक दिन पहले तक चलने वाला आदिवासियों का महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। जैसा नाम है, उसके अनुरूप काफ़ी हद तक इसका काम भी वैसा ही है। भगोरिया उत्सव सिर्फ जश्न का नहीं बल्कि अनोखो बंधन का ऐसा उत्सव है, जिसमें आदिवासी लोग जोशीले जश्न के अंदाज़ में ढोल-मांदल, झाल-मजीरा और बाँसुरी के सुर तले गुड़ की जलेबी, भजिये, खारिये, पान, कुल्फ़ी, केले के अलावा ताड़ी के रस के नशे में डूब जाते हैं। आटे की लेप में लपेटकर विशेष रूप से तैयार किए गए बड़े ढोल की थाप पर घुंघरुओं की ध्वनि में सामने दिखता मनमोहक दृश्य, ख्वाब और ख्वाहिश की ऐसी दुनिया में लेकर चला जाता है जहां हर बात रूहानी लगती है, हर सपना सुहाना दिखाई देता है।

भगोरिया उत्सव में एक ऐसी अनोखी रस्म अदायगी के ज़रिए शादी होती है जिसे सुनकर युवा मन के साथ साथ हर उम्र के लोगों का मन भी एकबारगी ज़ोर से गुदगुदा उठता है। शादी के इस अनोखे और निराले अंदाज़ को सुनकर और देखकर हर किसी की ज़ुबान से हैरानी भरे शब्द निकल पड़ते हैं, “अरे वाहक्या बात हैइस तरीके से भी शादी होती है ? जो भी हो शादी का ये तरीक़ा तो सबसे शानदार और हसीन है।


भगोरिया उत्सव में आए युवक-युवती अगर एक दूसरे को पान खिला दे या फिर एक दूसरे के गाल पर गुलाल लगा दें तो मान लिया जाता है कि  दोनों में प्रेम हो गया है। औऱ उसके बाद युवक-युवती भागकर विवाह बंधन में बंध जाते हैं। विवाह के दौरान दस हजार रुपए और चांदी की हंसली वधु वक्ष को वर पक्ष देते है। इस तरह होने वाली शादी को लेकर ना तो परिवार में औऱ ना ही समाज में किसी को आपत्ति होती है। इस उत्सव से भागकर शादी करने के कारण ही इसे भगोरिया उत्सव कहा जाता है। 

कभी कभी बेहतर पाने का आकर्षण कितना खूबसूरत हो जाता कि उत्साह औऱ उमंग के इस उत्सव के जरिए लोग पान औऱ सतरंगे गुलालों के जरिए अपने हमसफर को चुनकर ख़ुद की ज़िंदगी में रंग भर लेते हैं।


आज़ादी के बाद हिंदुस्तान एक देश तो बना लेकिन संस्कृति में विविधताओं के कारण कई मान्यताएं, रिवाजें और महत्वपूर्ण शैलियां एक नहीं हो पाईं। अनोखी और अजीब से लेकर अजूबेदार अंदाज की कहानी हिंदुस्तान के किस कोने से सुनाई देगी, इसका अंदाज़ तो इतिहास के शब्दों को खुरच-खुरच कर पढ़ने से पता चलता है, या फिर इतने बड़े देश की छोटी-छोटी पगड़ीयों से गुज़रते पत्थरीले रास्तों पर चलने से मिलता है। वैसे ही किताबों के बाद सिनेमाई पर्दे पर राजपूतों में तलवार भेजकर शादी की प्रथा तो खूब पढ़ी और सुनी है। इतना ही नहीं, कभी कुत्ते से शादी, कभी पेड़ से शादी और जाने कितने अलग-अलग तरीकों और रिवाजों से हो रही शादियां अब लोगों को चौंकाती नहीं हैं। लेकिन गुलाल वाली प्रथा मेरे लिए एकदम नयी है। ख़ासकर 21वीं सदी में ये सब सुनने में थोड़ा अलग सा लगता है, लेकिन इस त्योहार के दौरान आदिवासी समुदाय के नौजवान सदस्यों को अपने-अपने जीवनसाथी चुनने की पूरी आज़ादी होती है। भील आदिवासियों में शादी के लिए अनिवार्य शर्त है कि वे अपनी पसंद के लड़के या लड़की से ही शादी करें। जिसकी वजह से ये लोग भी इस उत्सव का हिस्सा बनते हैं। काश ऐसा और भी पढ़े-लिखे कौम में होता जहां आज भी लड़कियों को अपनी मर्ज़ी से शादी करने का अधिकार, तो क्या अपनी पसंद के लड़के को चुनने का हक नहीं है। कुरितियों से पार पाना भारतवर्ष में आसान काम नहीं है। विशाल सभ्यता की सीढ़ियों पर लगी ज़ंग को सिर्फ़ बातों से हटाया नहीं जा सकता। इसके लिए हमें और सजगता के साथ-साथ ऐसी प्रथाओं को सहमति देने की आवश्यकता है जहां बात मर्ज़ी की होती है।

भगोरिया उत्सव का जिक्र होता है तो फिर उसके भंवर में और डूबकर हमें एक ऐसी ही कहानी का गवाह बनना है जो इस भागने वाली परंपरा के तह में दबी हुई धूमिल है।


कोस-कोस पर बदले पानी और चार कोस पर वाणी। बड़ी पुरानी कहावत है। सुनी भी उस वक्त जब महज आठ साल का था। हिंदुस्तान के एक कस्बे में मेरी नानी रहती थीं। जिसके साथ छप्पर वाले घर के बरामदे पर गर्मी के दिनों में अक्सर तरबूज़ खाया करते थे और उसका बचा हुआ हिस्सा घर के सामने दूर बाग़ में फेंक दिया करते थे। इसी पतले पगड़डंडी वाले रास्ते से नई नवेली दुल्हन को डोली में बिठाकर गाँव के अंदर लाया जाता था। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि गाँव में घुसने का सबसे सीधा और शॉर्टकट एकलौता रास्ता भी यही था। लगन यानि शादी के दिनों में इस रास्ते पर बैंड बाजे वाले हर रोज़ नज़र जाते थे। कई कई बार तो दिन में दो-दो बार भी क़ाफ़िला गुज़रता था। फिर क्या, हमारे जैसे बच्चों की टोली के लिए खूब मौज उड़ाई होती थी। बैंड-बाजे के पीछे नाचते-नाचते जब थक जाते तो डोली में झांक कर देखने से भी चूकते नहीं थे। लाल लंबी घूंघट तले छिपे चेहरे को देखने की कोशिश तब तक करते रहते जब तक कि हमें भगा नहीं दिया जाता था।"

  

थके-हारे नन्हें-नन्हें कदमों से घर पहुंचते ही नानी से पूछता था, कि वे चार आदमी एक सजी-धजी औरत को उठाकर क्यों ले जाते हैं? वो पैदल भी तो चल सकती है! सवाल पूछने के बाद नानी के जवाब से मुझे कोई मतलब नहीं होता था। कई बार जवाब में समझ में भी नहीं आता था। इसी दौरान अगर दूसरी डोली दिख जाती तो हमारी बच्चों की टोली फिर से शोर मचाती हुई डोली में बैठी दुल्हन को देखने के लिए कहार के पीछे घंटों भागता रहता था। इस दौरान अगर बैंड वालों को मिल रहे शगुन में पैसे खर्च हो जाते तो उसके चक्कर में थोड़ी देर और नाच लिया करते थे। लेकिन वापसी के समय एक लड्डू के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हो पाता था।

वापस आकर फिर नानी के सवालों की झड़ी लगाते हुए पूछने में लग जाता कि डोली के अंदर बैठी हर औरतों का लिबास अजीब-अजीब सा क्यों होता है। कभी भी सवाल एक सा नहीं होता। तो नानी भी हमारे मन को बहलाने के लिए कहावत सुनाते हुए यह कहकर टाल देती कि गांव के लोग एक संस्कृति को मानते तो हैं लेकिन यहां शादी करने आने वाली औरतें अलग-अलग इलाकों की होती हैं, इसलिए सबका लहजा और लिबास उसकी बोली के अलग-अलग तरीके होते हैं। और वैसे भी, भारत ही एकमात्र देश है जहां यह कहावत यथार्थ की सत्यता पर पूरी तरह से उभरती है, कि 'कोस-कोस पर बदले पानी और चार कोस पर वाणी' नानी की आधी बात अगर समझ में जाती, तो पूरी बात समझने की कोशिश में बेकार सवाल बार-बार दोहराते हुए पूछता रहता। नानी भी कहां हार मानने वाली नहीं, वो भी जवाब देती रहतीं। हर रोज के इस सिलसिले के बीच एक दिन बाहर एकदम से शोर मचा, और उसकी गर्जन आवाज़ पूरे गांव में गूंज उठी। बिना सोचे-समझे बेली के फूल वाले पौधे के उपर से छलांग लगाते हुए गली से सीधे पगड़डंडी वाले रास्ते पर पहुंचा। इस बार बच्चों की टोली के साथ पूरे गांव के चेहरे पर हैरानी का भाव दिखाई दे रहा था। हालांकि, यह पहली बार था जब किसी की डोली के सामने पूरा गांव खड़ा था।

"सामने बबलू कहार अपने साथ एक औरत को दुल्हन के भेष में पैदल ही चलाकर ले जा रहा था। बैंड वाले तो थे मगर इस बार दुल्हन के लिए डोली नहीं थी। दुल्हन पैदल ही बबलू कहार के हाथ थामे अकड़ के साथ चली रही थी। गले में माला की वजह से दुल्हन नहीं नेता लग रही थी। साड़ी पहनने के अंदाज से तो वह एकदम गंवार भी लग रही थी। गांव के अवारा लौंडे उसके पीछे-पीछे सीटी मारते हुए चल रहे थे। बबलू कहार रास्ते में मिलने वाले हर बड़े-बुजुर्ग के पैर छूता जा रहा था। साथ ही अपनी दुल्हन को भी जबरदस्ती सबके पैर छूआकर आशीर्वाद दिलाता जा रहा था। पहले किसी को समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है ?  बस चर्चा सिर्फ़ एक बात की ही थी कि साला इस बबलू कहार के हाथ इतनी सुंदर बहुरिया कैसे लग गई ? हालाँकि गाँव में सबसे जुआया हुआ कुंवारा कोई था तो बबलू था। अगर किसी को शादी के लिए लड़की नहीं मिलने का ताना मारा जाता था तो उसमें बबलू के नाम का मुहावरा ज़रूर आता था। मगर बबलू ने सजीली को दुल्हन बनाकर नए नवेले कुंवारे लड़कों के बीच खलबली मचा दी। गाँव के चौक चौराहे पर देर रात तक अलाव तले ताश और बीड़ी के कश में सिर्फ़ और सिर्फ़ बबलू वेड्स सजीली का ज़िक्र और फ़िक्र था। मगर बबलू तो अब अपने सुकूनी बिस्तर पर सजीली के साथ अगले सात जनम का सपना देखते हुए उसकी बांहों में खो चुका था। 

 लेकिन अगली सुबह होते ही गांव में हंगामा मच गया। बात यह फैल गई कि गांव के मुखिया रहने वाले बबलू कहार मध्यप्रदेश से एक औरत को बिना ब्याहे ले आया। फिर क्या था, गांव में बैठी पंचायत, और सामने लाया गया बबलू कहार के साथ-साथ उसकी नई नवेली बहुरानी को। पूरा गांव मजे और तमाशे के चक्कर में इकट्ठा हो गया। मेरे साथ बच्चों की टोली भी बरगद के पेड़ पर लटकी हुई आंखे फाड़े सारा नजारा देख रही थी। मेरे दिमाग में सवाल उठा कि इससे पहले जितनी शादी हुई उसको लेकर पंचायत नहीं हुई फिर अब क्यों हो रही है? सवाल तो था मगर जवाब देने वाली मेरी नानी ने आधी घूंघट में औरतों की टोली के बीच चौधरानी के अंदाज में बैठी हुई मुझे इशारे से पेड़ के नीचे उतरने की सलाह दी। सवाल तो चिल्लाकर पूछ नहीं सकता था, इसलिए मैंने भी नानी से मुंह फेर कर पंचायत के सर्कस का मजा लेने में लग गया।

सामने से बबलू कहार अपने साथ एक औरत को दुल्हन के भेष लेकर पैदल ही चला रहा था। बैंड वाले तो थे मगर इस बार दुल्हन के लिए डोली नहीं थी। दुल्हन पैदल ही बबलू कहार का हाथ थामे अकड़ के साथ चली रही थी। गले में माला की वजह से वह दुल्हन नहीं, नेता लग रही थी। साड़ी पहनने के अंदाज से तो वह एकदम गंवार भी लग रही थी। गांव के आवारा लड़के उसके पीछे-पीछे सीटी मारते हुए चल रहे थे। बबलू कहार रास्ते में मिलने वाले हर बड़े-बुजुर्ग का पैर छूता जा रहा था और अपनी दुल्हन को भी जबरदस्ती सबके पैर छुआकर आशीर्वाद दिलाता जा रहा था। पहले किसी को समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है। लेकिन अगली सुबह होते ही गांव में हंगामा मच गया। बात यह फैल गई कि गांव के मुहाने पर रहने वाला बबलू कहार मध्यप्रदेश से एक औरत को बिना ब्याहे घर ले आया। फिर क्या था, गांव में पंचायत बैठ गई, और सामने लाया गया बबलू कहार और उसकी नई नवेली बहुरिया सजीली को। पूरा गांव मजे और तमाशे के चक्कर में इकट्ठा हो गया। मेरे साथ-साथ बच्चों की टोली भी बरगद के पेड़ पर लटके हुए आंखें फाड़े सारा नजारा देख रहे थे। मेरे दिमाग में सवाल कुलबुला रहा था कि इससे पहले जितनी शादियां हुईं, उन्हें लेकर कभी तो पंचायत नहीं हुई, फिर अब क्यों हो रही थी? सवाल तो था मगर जवाब देने वाली मेरी नानी आधे घूंघट में औरतों की टोली के बीच चौधराईन के अंदाज में बैठी हुई थी जो  मुझे लगातार इशारे से पेड़ के नीचे उतरने की हिदायत दे रही थी। सवाल तो चिल्लाकर पूछ नहीं सकता था, इसलिए मैंने भी नानी से मुंह फेर कर पंचायत के सर्कस का मजा लेने में लग गया।

बबलू कहार की औरत जैसे ही पंचायत में आई, साला कुढ़नी से लेकर करूआ की औरत तक सब उसे छूकर देखने के चक्कर में धक्का-मुक्की करते हुए पंचायत की अगली लाइन में पहुंच गईं। मैं तो उसके कपड़े इस वजह से देखने के फिराक में था ताकि मुझे यह पता चल सके कि यह औरत किस संस्कृति से आई है।

बबलू कहार की औरत हल्के घूंघट में थी, जिसमें शक्ल पूरी दिखती है और माथा थोड़ा सा ढका होता है। नई नवेली दुल्हन इतनी बेबाक! उसका रौब किसी को पसंद नहीं आया। सजीली दिखने में तो सांवली सलोनी थी लेकिन नैन-नक्श तीखे, चेहरे पर ऐसा नमक कि गांव के मर्दों के साथ-साथ औरतें भी हल्की नजरों से सजीली को एकटक निहारे जा रही थीं।

पंचायत में बैठे निकम्मे बूढ़े ने जब अपना ताव दिखाना शुरू किया तो पता चला कि सजीली मध्यप्रदेश के झाबुआ की रहने वाली है। काम-काज के लिए वह और उसका परिवार अलीराजपुरा में रहता है। थोड़ी जानकारी वाली बात यह है कि अलीराजपुरा वही जगह है जहां चंद्रशेखर आजाद ने अपनी जिंदगी के कई महत्वपूर्ण साल गुजारे थे, और आज़ादी के लिए भी अंग्रेजों का विद्रोह यहीं से शुरू किया था। अलीराजपुरा इसलिए भी जेहन में आता है क्योंकि अंग्रेजों के वक्त यहां एक क्रिकेट ग्राउंड हुआ करता था, जहां अंग्रेजों का यह अटपटा खेल उस वक्त देश में चर्चा का विषय बन गया था।

पंचायत के ताव भरे अंदाज को देखकर पहले तो मामला थोड़ा बिगड़ने लगा। सजीली के हाव-भाव से लग रहा था कि वह पंचायत की हर बात से वाकिफ है और पंचायत की बातें उसकी ठेंगे पर हैं। हर सवाल का जवाब बेबाकी से देते हुए सजीली ने साबित कर दिया कि वह एक बेमिसाल आदिवासी औरत है जो किसी से डरने वाली नहीं है।

बबलू कहार और सजीली से तमाम जानकारी लेने के बाद जब पंच परमेश्वर ने पूछा, “जब साथ ही रहना था तो शादी काहे नहीं की? बिन ब्याहे रहना समाज की संस्कृति के खिलाफ है। और अगर रहना ही है तो फिर अभी के अभी पंचायत में शादी करनी पड़ेगी। और शादी के बाद पूरे 16 गांव के लिए भोज-भात की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी।

शादी के नाम से ना तो सजीली को दिक्कत हुई और ना ही बबलू ने कोई सवाल उठाया। मगर 16 गांव को भोज-भात के नाम पर अब तक जो बबलू कहार अपनी सफाई पर सफाई पेश करते-करते पंच के सामने बगलें झांकते हुए दिखाई देने लगा।

खाने का खर्चा का नहीं है, 16 गांव को भोज-भात कैसे खिला पाएंगे, सरपंच साहेब?” बबलू ने कहा।

दूसरों के ब्याह में तो भोज भकोस कर खाया और जब अपनी बारी आई तो कन्नी काटने लगा। ऐसे कैसे चलेगा बबलू? एक तो शादी, ऊपर से सूखे-सूखी?” सरपंच ने ताव में कहा।

पंच और बबलू के बीच जोरदार बहसबाजी शुरू हो गई। सजीली हालात को भांप चुकी थी कि पंच भोज-भात के बिना तो मानेगा नहीं, इसलिए उसने फैसला किया कि वह भोज-भात से पंच का ध्यान भटकाकर किसी और बात पर ले आएगी। इसी मंशा के साथ गठीले बदन वाली आदिवासी औरत सजीली अपना घूंघट कंधे पर टिकाकर खड़ी हो गई और तेज आवाज में पंच के सामने बोल पड़ी, “किसने कहा कि हमारी शादी नहीं हुई है? शादी हुई है। भगोरिया मेले में हम दोनों ने एक दूसरे को पान खिलाकर और गुलाल लगाकर शादी कर ली थी। जब बिन ब्याही हैं ही नहीं, तो काहे की सजा? और जब इंसान में कूवत और औकात नहीं है तो फिर काहे का भोज-भात?”

भगोरिया मेले का मतलब किसी को समझ में नहीं आया, तो पंच ने आपस में चर्चा करके अपने हिसाब से ही अर्थ निकाल लिया कि यह शादी भागकर हुई है। अब भागने के नाम पर पंच ने और भी बड़ी मुश्किल पैदा कर दी। जानने और समझने के लिए पंच परमेश्वर की तरफ से बेमतलब और बेफिजूल के सवाल शुरू हो गए।

अगर भागकर शादी हुई, तो कौन से मंदिर में शादी हुई? पुजारी कौन था? किस धर्म रिवाज के तहत शादी की गई?" हर सवाल के जवाब पर सजीली बार-बार भगोरिया मेले में शादी की बात कबूल कर दोहराती जा रही थी और साथ ही भगोरिया वाली शादी की परंपरा को भी समझाने की कोशिश कर रही थी। मगर पंच में बैठे लोग होठों में खैनी दबाए सजीली की हर बात को हंसी में उड़ा रहे थे। "पान खिलाने और गुलाल लगाने से भला किसी की शादी थोड़े ना होती है," वे कह रहे थे। समझने के लिए कोई तैयार नहीं था, मगर समझाने के लिए हर कोई मजमा बनाकर जुटा था।

करीब 2 घंटे के बाद जब मामला थोड़ा गंभीर हो गया और सजीली झुकने को तैयार नहीं हुई, तो पंचों ने फैसला किया कि एक आदमी को मध्यप्रदेश के उस जिले में भेजा जाएगा जहां वह इस संस्कृति के सच का पता लगाकर पूरी सच्चाई पंच के सामने पेश करेगा। और अगर यह सही साबित हुआ, तो फिर बबलू कहार और सजीली पर कोई दंड नहीं लगेगा, बल्कि सम्मानपूर्वक उन्हें पति-पत्नी के तौर पर गांव में इज्जत के साथ रहने दिया जाएगा। अपराधी की तरह खड़े बबलू और सजीली के शरीर में थोड़ी जान आई।

तभी गाँव के सबसे बुजुर्ग और बतोलबाज़ पंच ने हद पार करते हुए फैसले में यह जोड़ दिया, “जब तक भेजा हुआ आदमी पूरी बात का पता लगाकर वापस गांव नहीं लौट आता, तब तक सजीली और बबलू कहार एक घर में तो रहेंगे, लेकिन अलग-अलग। ताकि समाज की मर्यादा और संस्कार कायम रह सकें।

इस बात पर सजीली के तन-बदन में मानो आग लग गई। पंच की बातों पर गुस्से में पलटकर कुछ बोलना चाहा तो बबलू कहार ने इशारे से चुप रहने को कहा। सजीली कसमसाकर रह गई। तेज नारों भरे अंदाज में शोर के साथ पंचायत खत्म हो गई। जितने मुंह उतनी बातें, लेकिन हर बातचीत में सिर्फ और सिर्फ सजीली और भगोरिया वाली शादी के चर्चे थे।

पूरे गांव को जबरदस्त मनोरंजन मिला। हालांकि भारत में पंचायत के नाम पर अब तक लोग मनोरंजन के लिए ही वहां पधारते हैं। क्योंकि सबको पता होता है कि उल्टे-सीधे मामलों पर पंच परमेश्वर डार्क कॉमेडी वाला ड्रामा सबके सामने रखेंगे। इस कॉमेडी भरे पंचायत के सत्र में सबसे मजेदार बात यह रही कि इस फैसले में पंच ने जिस आदमी को मध्यप्रदेश भेजने का निर्णय किया, वह 40 साल का अविवाहित व्यक्ति जगदीश चौरसिया था, जो गांव के बीच चौराहे पर चौरसिया पान भंडार चलाता था।

सजीली को मेरे घर से थोड़ी दूर पर जो बबलू कहार की कुटिया थी, उसका बाहरी हिस्सा रहने को मिला और पिछला हिस्सा बबलू कहार के इस्तेमाल के लिए तय कर दिया गया। मियां-बीबी के बीच लकीर खींचते हुए पंच प्रधान ने इस बात को सख्ती से लागू किया कि दोनों आपस में किसी भी कीमत पर मिल नहीं सकते हैं, और ना ही किसी सुविधाओं का इस्तेमाल एक साथ कर सकते हैं। यानी कुल मिलाकर बात यह हो गई कि रहना एक घर में ही है, बस घटिया दकियानूसी रिवाजों और बातों की आग पर आंखें नीची कर जिस्म को जिंदा रखना है।

कभी-कभी वक्त रिश्तों के बीच बड़ा बेरहम हो जाता है। कितना मुश्किल था एक पति-पत्नी के लिए ऐसा दंड भुगतना जिसके बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे। वापसी में घर लौटते वक्त नानी का चेहरा गंभीर भाव में सोचविहीन दिखाई दे रहा था। मैंने भी अपने मन में उमड़ते-घुमड़ते सवालों को मन में ही रख लिया। हम दोनों गांव की गलियों से गुजरते हुए घर तो पहुँच गए, मगर नानी उस रात सोई नहीं। बस बिस्तर पर करवटें बदलती हुई किसी सोच में उलझी हुई फैसले पर पहुँचने की कोशिश में लगी थी।


अगले दिन की सुबह हुई तो नानी ने बगावती वाला किरदार अख़्तियार कर लिया। वह सजीली को अपने संरक्षण में लेते हुए उसकी मदद करनी शुरू कर दी। सजीली की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नानी ने एड़ी चोटी का जोड़ लगा दिया, जिसकी वजह से सजीली धीरे-धीरे सिलाई-बुनाई का काम कर अपना गुज़ारा करने लगी। बीतते वक़्त के साथ गांव की छोटी-छोटी बच्चियों को सिलाई-बुनाई-कढ़ाई सिखाने लगी। धीरे-धीरे कुछ लोग सजीली को चाहने लगे और सजीली का गुज़ारा भी चलने लगा। दूसरी तरफ़ बबलू भी खेत में काम करने के बाद हर रोज नानी के पास आकर घटों अपना दुखड़ा रोता और उस जगदीश चौरसिया के लौटने को लेकर इंतज़ार के साथ बातें करता रहता।

पहले तो दिनफिर महीने और अब साल बीत गए, मगर वो जगदीश चौरसिया वापस नहीं आया और ना ही उसकी ख़बर आई। जगदीश चौरसिया की राह देखते-देखते सजीली और बबलू कहार की आंखें पथराने लगी। हिम्मत धीरे-धीरे जवाब देने लगा। अब तो सजीली और बबलू कहार को भी गांव वाले भूलने लगे थे। मगर मेरे और मेरी नानी के दिमाग में पंयाचत वाली घटना एकदम ताज़ा थी। नानी हर रोज चर्चा करती थी। हर रोज एक ही घर में बबलू कहार और सजीली की ज़िंदगी और उनकी जंग को देखा करती थी। मन कचोट कर रह जाता था। बबलू और सजीली घर में कभी-कभी बातें तो करते थे, मगर उन्हें किसी के देखते हुए डर था, इसलिए ज्यादा देर तक बात नहीं कर पाते थे। हां, रात के अंधेरे में कभी-कभार सजीली बबलू को खाना बनाकर दे देती और बबलू भी घर के काम में मदद कर देता था। दोनों छुप-छुपकर घर के छोटे-मोटे कामों में एक दूसरे का हाथ बंटाते थे। लेकिन डर का साया काले साँप के फुंफकार की तरह सुनाई पड़ता रहता था।


साल गुजर जाने के बाद, सोमवार का एक दिन आया। शिव जी की पूजा के बाद सजीली और बबलू कहार एक साथ नानी के पास पहुंचे और बगावती अंदाज में बोले, "काकी, अब बर्दाश्त नहीं होता। मेहरारू हमार है। घर एक ही है, लेकिन रहने का तरीका बंटवारे की तरह हो गया है। ज़िंदगी हिंदुस्तान-पाकिस्तान की तरह हो गयी है। वह साला जगदीश चौरसिया कहीं मर गया होगा तो क्या हम जिंदगी भर ऐसे ही रहेंगे। कृपया पंचायत बुलवाएं और इस मामले को निपटा दें, बस।

इस मुश्किल को समझना और समझाना आसान नहीं था कि पति-पत्नी एक छत के नीचे चाहकर भी एक साथ नहीं रह पा रहे थे। नानी सब समझती थी, मगर बहुत कुछ जानती भी थी। साथ ही  कठोर पंच के इरादे का अंदाज़ा भी था।  इसलिए हालात और मौके को भाँपते हुए, नानी ने बबलू और सजीली को शांत करने के लिए 16 गांव भोज वाले दंड की बात याद दिलाई, तो दोनों के अकल ठिकाने गए। पल भर में ही दोनों बगलियां झांकने लगे। जब कोई सटीक जवाब नहीं सूझा, तो सजीली बोल पड़ी कि वह भोज करवाने के लिए तैयार है। इसके लिए वह कुछ भी कर लेगी।

सजीली की भोज देने वाली बात को लेकर माली हालत से कमजोर बबलू कहार बिदक गया, और सजीली को जमकर सुनाया, "तू पागल हो गई है क्या? कुछ भी कर लेंगे मतलब! वो पंचायत में सुरेश बामन है ना, वो साला औरतबाज है। तू बोलेगी कुछ भी कर लूंगा, बस मौका मिल जाएगा उसको। गांव में उसका कोई भी कुछ उखाड़ नहीं सकता है। मौके का ऐसा फ़ायदा उठाएगा कि हमें ये दंड आसान लगने लगेगा।


सजीली भी भड़क गई और बबलू कहार को पकड़कर झकझोरते हुए बोली, "मरद किस काम का है तू? अच्छा होता किसी अपने समाज के किसी आदिवासी लड़के से शादी कर लेती। अरे कम से कम ज़िंदगी आसान तो होती। तुम्हारे चक्कर में क्या पड़ी, आफत ही गले पड़ गई। किस्मत मेरी ही खोटी थी कि उस दिन मैंने तुझपर गुलाल फेंका। और तूने पान खिलाया, मैंने खा लिया। 

सजीली काफी देर तक बबलू को कोसती रही। ऐसा लगा कि पूरे सालभर का भड़ास एक बार में ही निकल गया। बबलू चुपचाप निगाहें नीची करके जमीन में धंसा जा रहा था। सजीली तब तक बोलती रही जब तक उसको नानी ने टोका नहीं। गुस्से में हांफती-हांफती सजीली सर पकड़कर बैठ गई। नानी के कहने पर उसने पानी लाने के लिए दौड़ा। लोटे का पानी एक घूंट में ही खत्म करने के बाद, सजीली जैसे ही उठकर जाने लगी, नानी ने उसे रोक लिया।

नम आंखों लिए सजीली और बबलू कहार को एक साथ खड़ा करते हुए नानी ने कहा, "तुम दोनों एक बच्चा जन लो। फिर पंचायत भी मजबूरन कुछ नहीं कर पाएगी। दोनों साथ रहोगे तो जल्दी तरक़्क़ी करोगे।" नानी की बात सुनते ही पल भर में ही बबलू और सजीली की आंखों में चमक गई। दोनों नानी के पैरों में गिरते हुए धन्यवाद किया और चुपचाप घर की ओर चले गए।

कितनी अच्छी थी मेरी नानी। समस्या में समाधान ढूँढती नानी, रिश्तों के दरख़्त को भरने की कोशिश करती मेरी नानी। पहली बार नानी मुझे मदर टेरेसा जैसी लग रही थी।

बड़े दिनों बाद नानी से मैंने सवाल किया, "पंचायत में तो बहुत मारते हैं ना नानी। अगर बबलू चाचा और सजीली चाची ने पंचायत की बात का उल्लंघन किया तो फिर वो लोग बबलू चाचा को भी मारेंगे। और जब दोनों को मारेंगे तो तुम बचाओगी नानी?" नानी एक पल के लिए कुछ सोचने लगी, लेकिन दूसरे ही पल मुझे लालटेन हाथ में देकर पढ़ने भेज दिया। पढ़ने का नाटक करता मैं लालटेन की भभकती रोशनी में नानी के चेहरे की परेशानी को साफ़ साफ़ पढ़ पा रहा था।

उस दिन के बाद दूसरा साल भी ख़त्म होने की दहलीज़ पर गया, लेकिन जगदीश चौरसिया अब तक वापस गांव नहीं लौटा। ना ही उसने कोई संदेश भेजा और ना ही उसकी कोई खोज-खबर मिली। नानी की सलाह पर बबलू और सजीली का छुपाने वाला प्यार परवान चढ़ा तो सजीली पेट से हो गई। गुजरते दिन और सजीली के बढ़ते पेट के साथ गांव की औरतों वाली मंडली में खुसूर-फुसूर शुरू हो गई। सजीली ने बबलू के प्यार और पेट की बातें छुपाने की लाख कोशिश की, मगर छुप ना पाई। 9 महीने के करीब आते-आते पंचायत को भी सजीली के पेट वाली बात का पता उस दिन लग ही गया, जिस दिन सजीली ने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया।

नानी की बातों को याद कर बबलू कहार को लगा कि बच्चे की पैदाइश के साथ उसकी क़िस्मत भी खुल ही जाएगी। लेकिन कुदरत को भी मात देने वाले पंचायत का कहर उस पर एक बार फिर टूट पड़ा। बच्चा जनने के 2 घंटे के भीतर ही सजीली को पंचायत के आदमियों ने घसीटते हुए पंच परमेश्वर के सामने लाकर खड़ा कर दिया। दर्द से कराहती सजीली कुछ ही घंटों पहले जने बच्चे को गोद में चिपकाए, काँपते पैरों पर क़ाबू पाने की कोशिश में लगातार खड़ी रहने की जद्दोजहद कर रही थी।

बबलू कहार हाथ जोड़ते हुए अपनी सफाई देने की कोशिश में बार-बार गिरगिराते हुए माफ़ी मांग रहा था। मगर गांव के लोग पहले अंधे और फिर बाद में बहरे हो गए। बिना कुछ सोचे-समझे पंच के लोग बबलू पर बरस पड़े। पहले तो पंचायत के नियमों का उल्लंघन करने की वजह से सज़ा पर बहस शुरू हुई, फिर बात जुर्माने तक भी आया। मगर भीड़ में बैठे गाँव के कुछ निकम्मे बूढ़े ने नया राग छेड़ते हुए इस बात को हवा दे दी कि काले रंग के बबलू कहार का बच्चा गोरा कैसे हो गया? ऐसे सवाल इतने भयावह होते हैं कि सुनने वालों का कलेजा फट जाता है। लेकिन बोलने वाले इसमें भी मज़े ढूँढ लेते हैं। सजीली का सीना तो अब तक पता नहीं कितनी बार छलनी हो चुका था।। क्या पता, अब उसे ऐसे सवालों से फ़र्क़ ही पड़ता हो? क्या पता, उसके एहसास मूर्दा हो चुके हों?

उस रोज भी मैं बरगद पेड़ की टहनियों पर चमगादड़ की भांति लटका हुआ सारा माजरा देखने में लगा था। अब मैं साढ़े 10 साल का हो चला था। आज पता नहीं, नानी नहीं आई थी। अगर आई होती तो मैं सवाल जरूर पूछता कि ये आइडिया उसने दिया तो फिर गुनाहगार की तरह वह क्यों नहीं खड़ी है? मुझे नानी पर जोर का गुस्सा रहा था। सीधे धम्म से जमीन पर कूदा और घर की ओर तेजी से भाग निकला। तभी एकाएक बबलू कहार के ज़ोर से चिल्लाने और कराहने की आवाज़ आई। पीछे पलटकर देखा तो पंचायत के लोग बबलू को बेतहाशा पीटे जा रहे थे। प्रसव का दर्द भूल चुकी सजीली अपने सुहाग को बचाने के लिए मर्द की तरह भीड़ से लड़ रही थी। एक पल लगा कि वापस पलट कर जाऊँ मगर दिमाग़ में कुछ ख़्याल आते ही मैं घर की और दौड़ पड़ा। पीछे बबलू कहार की कराहती आवाज़ धीरे-धीरे मद्धम पड़ने लगी। कई गलियों को पार करने के बाद पंचायत के फ़ैसलों का शोर भी सुनाई पड़ना बंद हो चुका था।

हांफते-हांफते घर की दहलीज पर पहुंचा तो नानी किसी से बात कर रही थी। उस आदमी के साथ एक आदिवासी औरत भी थी, वो भी दुल्हन की लिबास में। एकदम नई-नवेली सजीली की तरह। पहले तो मैं उसके चेहरे को एक नज़र में देख नहीं पाया। लेकिन नजदीक जाने पर पता चला कि वह आदमी जगदीश चौरसिया है, और उसके साथ खड़ी औरत उसकी बियाही हुई दुल्हन है। ढाई साल गुजर जाने के बाद वह गांव में प्रवेश कर रहा था, जहां नानी से उसकी मुलाकात हो गई। मैं भागकर नानी के पास पहुंचा और पंचायत में आँखों देखी घटना को एक साँस में सुना दिया। नानी जगदीश चौरसिया को साथ लेकर पंचायत की तरफ लपक कर तेजी से भागी। मैं भी उसके पीछे हो लिया।बस जल्दी-जल्दी पंचायत पहुँचने की ज़िद। मगर आज वो गलियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी, जिसे मैं दो कदमों में नाप लेता था। सारे रास्ते मीलों लंबे लग रहे थे। तेज़ी से भागते कदमों के साथ भी सब कुछ ठहरा हुआ था, धीरे-धीरे गुजरता दिखाई दे रहा था। उफ़्फ़, दुख में वक़्त काटना कितना मुश्किल हो जाता है। प्रार्थना, गुज़ारिश, सबका असर क्षणभर में क्षीण हो जाता है। खैर, गली के आखिरी पर छोर पर जैसे ही पहुंचा तो सामने का नजारा देखकर सब सन्न रह गए। सबके कदमों पर ऐसा ब्रेक लगा मानों सामने रास्ता ही ख़त्म हो गया हो। शायद अब रास्ता सजीली का भी और बबलू कहार के रिश्ते का भी ख़त्म हो चुका था। 


सामने हाथ गाड़ी पर मरा हुआ बबलू कहार और उसकी छाती से चिपका हुआ कुछ ही घंटे पहले जन्मा, रोता हुआ बच्चा था। बेचारी पागल सजीली हाथ गाड़ी को मुश्किल से खींचती हुई गली के दूसरे मुहाने से सीधे चली रही थी। उसके पैरों से रिसता खून उसके पैरों का नहीं, बल्कि उसके गर्भ का खून था, जो बेइंतहा दर्द की गवाही दे रहा था।

नानी के साथ जगदीश चौरसिया को देखकर सजीली एक पल के लिए रुकी और फिर दूसरे ही पल गुस्से में चीखती हुई उसका कॉलर पकड़कर घसीटने लगी। आधी बेहोशी की हालत में सजीली बार-बार कह रही थी, “कहां था इतने दिन ? जब मेरी दुनिया उजड़ गई तब पंचायत के सामने हाज़िर होने आया है? अब अगर तू सच भी समेट कर लाया होगा तो मेरे किसी काम का नहीं। ये देख तुम्हारे गाँव वालों ने बबलू के साथ क्या कर दिया?”

अपनी दुल्हन के साथ खड़ा जगदीश का मुँह खुला का खुला रह गया। एक शब्द भी तो जगदीश के मुँह से निकला और ही नानी की ज़ुबान से। बेबस जगदीश और बेज़ुबान नानी को देखकर सजीली समझ चुकी थी कि हर बार की तरह इस बार भी कोई उसका साथ देने वाला नहीं है। इसलिए वह आधी बेहोशी की हालत में ही हाथ गाड़ी खींचती हुई अपने घर की तरफ़ निकल पड़ी। हाथ गाड़ी के चक्के की गूंजती आवाज़ आज गाँव के सन्नाटे का सीना चीरते हुए अपनी दुख भरी कहानी बयां कर रही थी, मगर सुनने वाला कोई नहीं था। सबके सब अंधे और बहरे जो हो गए थे।

तभी पंचायत की भीड़ की नज़र जगदीश पर पड़ते ही हो-हंगामा मच गया। किसी ने जगदीश के आने की ख़बर पंचों तक पहुँचा दी। गाँव के सारे पंच फिर से पंचायत में इकट्ठा हो गए। सभी एक साथ जगदीश चौरसिया को सवालिया निगाहों से देख रहे थे, साथ ही उस आदिवासी औरत को घूरे जा रहे थे जो जगदीश के साथ आधे घूँघट में खड़ी थी। पंचों के अलावा गाव वालों ने जगदीश पर सवालों की बौछार कर दी। 

पूरे गाँव के सामने जगदीश ने गरज कर बोलते हुए भगोरिया में सजीली की शादी का सच बताते हुए पूरा हाल बयां कर दिया। लेकिन जब पंचों ने उससे पूछा कि वह इतने साल गायब क्यों रहा, तो जगदीश उस भगोरिया उत्सव में अपनी शादी की बात बताते हुए बोल पड़ा, "सजीली ने पंचायत के सामने जिस विश्वास के साथ बताया था कि भगोरिया उत्सव में गुलाल फेंककर शादी होती है, तो यह सुनकर मैं खुश हो गया था। आप लोगों ने मुझे सच का पता लगाने भेजा। कई महीनों के बाद मुझे भगोरिया उत्सव के बारे में पता चला। पहले तो भगोरिया उत्सव में शादी की प्रथा को सुनकर मैं खुश हो गया कि मेरी शादी भी वहाँ हो ही जाएगी। और जब भगोरिया उत्सव में पहुँचा, तो मेरी शादी बानो नाम की आदिवासी महिला से हो गई। मैं वहीं बस गया। लेकिन कई बरसों बाद, बानो को जब मैंने सजीली की बात बताई, तो फिर उसने मुझे गाँव चलकर सबको सच बताने की सलाह दी। बानो की ज़िद पर ही मैं वापस गाँव आया ताकि सजीली और उसकी शादी का सच सबको सही तरीके से पता चल सके।

जगदीश की बात सुनकर हर कोई सन्न रह गया। कौओं की कांय-कांय की आवाज़ माहौल में गूंज रही थी, मगर मजाल है कि किसी की ज़ुबान से एक शब्द भी निकल जाए! थोड़ी देर की चुप्पी के बाद पंचायत का हर शख़्स सजीली के घर की तरफ़ भागता हुआ दिखाई देने लगा। आज नानी के कदमों में भी तेज़ी नजर रही थी।

सजीली गुस्से में भभकते हुए हाथ गाड़ी को खींचते हुए घर की दहलीज़ पर पहुँचकर हाँफते हुए बैठ गई। आज ये घर उसे किसी मरघट जैसा लग रहा था। मौत इंसान की सोच और जगह को इतना जल्दी बदल देती है जितना कि कोई सोच भी नहीं सकता। घर के दरवाज़े पर माथा टिकाए शांत सजीली सिर्फ़ इतना ही सोच पाई कि यह वही घर है जहां वो और बबलू बरसों तक पंचायती फरमान की वजह से पड़ोसी की तरह रह रहे थे। और जब एक साथ रहने के लिए बगावत की तो फिर सच गांव तक पहुंचने से पहले ही उसकी दुनिया उजड़ गई। थके कदमों और बेजान हाथों से सजीली ने हाथ गाड़ी को खींचते  दरवाज़े के अंदर ले गई, और फिर सामने डूबते सूरज को प्रणाम कर दरवाज़ा बंद कर लिया।

गांव के सभी लोग सजीली के घर के बाहर पहुँच चुके थे। मैं नानी को किसी तरह संभालते हुए नंगे पांव भागता हुआ जब सजीली के घर के बाहर पहुंचा, तो हाथ गाड़ी के साथ-साथ खून के कुछ धब्बे दिखाई दे रहे थे। उसके आसपास कोई नहीं था। हर कोई दरवाजे के करीब कान लगाकर कुछ सुनने की कोशिश कर रहा था। तभी किसी ने बताया कि सजीली किसी से पागलों की तरह बातें कर रही है। सजीली का दर्द सबको सुनाई दे रहा था, लेकिन कोई भी उसके दर्द को कम करने के लिए तैयार नहीं था। बस सभी इधर-उधर की बातों में वक्त बर्बाद कर रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। नानी का हाथ झटकते हुए मैंने दीवारों पर लगे  कदीमे के लत्तर के सहारे छत पर छलांग लगा दी।

छत के मुहाने से लटककर आँगन में भीतर झांककर देखने की कई बार कोशिश की, लेकिन काफी देर तक कुछ भी दिखाई नहीं दिया। कुछ देर इंतजार के बाद, सामने सजीली दिखाई दी, जो नख से शिख तक चाँदी के ज़ेवरों में लदी हुई थी। एकदम नई नवेली दुल्हन की तरह। इस तरह से सजी हुई सजीली इससे पहले एक बार ही दिखाई दी, वो भी तब जब वो पहली बार दुल्हन की लिबास में पैदल गाँव की दहलीज़ को लांघकर बबलू के संघर्ष भरी ज़िंदगी में आई थी। सामने सजीली प्यार से अपने बच्चे को गोद में लिए बबलू कहार की चिता पर मिट्टी का तेल डालते हुए पागलों की भांति बुदबुदाए जा रही थी।  ऐसा लग रहा था सजीली बबलू से बातें कर रही हो।  

चिता किसी लकड़ी से नहीं, बल्कि उसी हाथ गाड़ी को बनाकर उस पर सूखे उपले लादे गए थे। पहले तो मुझे कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन सजीली ने जैसे ही माचिस जलाई, मुझे सारी बात समझ में गई। छत पर "नानी, नानी" चिल्लाते हुए मैंने गाँव वालों की भीड़ की तरफ़ दौड़ लगा दी। नीचे खड़ी भीड़ की नज़र मुझ पर टिक गई। इससे पहले कि नानी और भीड़ को मैं कुछ बता पाता, तभी सजीली की तेज आवाज गूंज उठी, "जय भीलन माई!" पलट कर देखा, तो बबलू कहार की चिता धू-धू कर जल रही थी, और उसी आग में सजीली खुद अपने नवजात बच्चे के साथ कूदती हुई दिखाई दी। उफ़्फ़! भभकती आग के बीचो बीच सजीली और उसका नवजात बच्चा पल भर में ऐसे समा गई, जैसे हम रोज़ पानी में डुबकी लगाकर गंगा माई में समा जाते थे।


 

तेज़ी से भभकती आग से सजीली की चीखों की दर्दनाक आवाज़ बाहर तक पहुँचने लगी। गांव के लोग घर का दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश करने लगे। मैं छत पर खड़ा उस आग की तपिश को सिर्फ महसूस कर पा रहा था। ज़िंदगी और मौत के बीच का फ़ासला इतना कम, कैसे, क्यों? अब तो बहुत देर हो चुकी थी। मुझे पता चल चुका था कि जब तक दरवाजा टूटेगा, तब तक सिर्फ गुलाल जैसी राख होगी। लेकिन उसका रंग लाल नहीं बल्कि काला होगा, ठीक सजीली की क़िस्मत की तरह।

बोझिल कदमों के साथ, मन में सवालों का बांध लिए, दीवारों के सहारे मैं जमीन पर उतर चुका था। मन में नानी के लिए गुस्सा था। मेरे नजर में सबसे बड़ी गुनाहगार नानी ही थी। आज उससे कई सवाल पूछूंगा। यही सोचकर चुपचाप गलियों में चल तो रहा था, मगर मुझे मेरा शरीर उन रास्तों पर रेंगता हुआ महसूस हो रहा था। तभी एक हाथ मेरी गर्दन को ज़ोर से दबोच लिया और फिर मुझे घसीटते हुए घर की तरफ ले जाने लगा। वह हाथ मेरी नानी का था।

प्रथाओं के बीच ना जाने कितनी जानें गई होंगी। लेकिन सजीली को उस वक्त पता भी नहीं होगा कि जिस भगोरिया उत्सव में गुलाल हाथ में लेकर वह अपना पति ढूंढ़ रही थी, उसी गुलाल की प्रथा की वजह से उसकी सारी खुशियाँ खत्म हो जाएंगी। हालांकि, मैं भगोरिया उत्सव को गलत नहीं मानता; इसे समाज की बेहतरी के तौर पर देखा जाए, क्योंकि नवयुवकों के लिए यह एक बेहतर मौका है जब वे अपनी मर्जी से अपना हमसफर चुनते हैं। लेकिन इस तरह के फैसलों को समझने के लिए धरातल पर खड़े समाज के लोग भी सही होने चाहिए। वरना प्रेम तो पागल ही होता है, जिसे सदियों से आज तक लोग समझ ही नहीं पाए हैं। बस उसे सवालों के घेरे में बांधते रहते हैं। सजीली की शादी भी प्रेम की ऐसी निशानी बन गई, जो ढाई अक्षरों में उलझकर दम तोड़ गई।

सजीली के जाने के बाद नानी की बात एक बार फिर से याद रही थी, "कोस-कोस पर बदले पानी और चार कोस पर वाणी।लेकिन शायद नानी ये नहीं बताती है कि उसी चार कोस पर इंसानों की फ़ितरत बदल जाती है, एक देश में समाज के नाम पर ऐसी लकीर खींच दी जाती है जिससे अपना घर ही सरहद लगने लगता है।

 पता नहीं किस बात का मतलब, कहां और कैसे निकाला जाए ? कोई नहीं बता सकता। लेकिन अफ़सोस एक सजग करती प्रथा के नाम समाज के ढ़कोसलेपन की वजह से सजीली का अधूरा प्यार भी लहलहाती आग में अमर हो गया। 


सॉरी, सजीली!  तुम्हारा गुनाहगार इस गाँव का हर शख़्स है।


इस घटना के करीब महीनों बाद, मैंने सजीली और बबलू कहार के बंद घर की बाहरी दीवार पर पेंट से लिख दिया: सॉरी, सजीली! तुम्हारा गुनाहगार इस गाँव का हर शख़्स है।समाज के ठेकेदार को भूलने की आदत होती है, माफ़ी माँगने की नहीं।

इस लाइन को दीवार पर पढ़ते ही गाँव की पूरी भीड़ इकट्ठा हो गई। फैसला लिया जाने लगा कि इस लाइन को जल्दी से जल्दी मिटाया जाए। छत के मुंडेर पर खड़ा मैं उन लम्हों को देख रहा था, जहां पंच की अगुआई में गाँव के लोग एक माफ़ीनामा मिटाने के फिराक में पूरे घर को चूने से पोतने में लगे थे। शायद अपने गुनाह को छिपाने की कोशिश कर रहे थे।







THE END


 कहानीबाज़ 
रजनीश बाबा मेहता
kahanibaaj.blogspot.com
कातिब & कहानीबाज रजनीश बाबा मेहता  

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