| NORTH EAST TRAVLE ARTICLE कहानीबाज रजनीश बाबा मेहता |
जिंदगी तस्वीर भी है औऱ तक़दीर भी है। फर्क तो सिर्फ इन अटपटे रंगों का है, जो खामोश ख़्वाहिश में अपने हिसाब से घुलकर एक नई दास्तान लिखना चाहती है। अगर मनचाहे रंगों ने आकार ले लिया तो फिर उसे तस्वीर कहकर दुनिया के सामने परोस देते हैं। लेकिन वही रंग अगर अनजाने में नई रंगत दिखा जाए तो उसे तक़दीर कहकर किस्सागोई की तरह सबके सामने प्रेरणा की तरह पेश कर देते हैं। बात सिर्फ अपनी कल्पनाओं की है, औऱ कहानी, कल्पनाओं परे उस पेड़ रूपी मंजिल की है जो दिवास्वप्न में हल्की सांस की तरह मद्धम-मद्ध महसूस होती है।
इस तस्वीर से सामना नार्थ इस्ट भ्रमण के दौरान हुआ था। तस्वीर की कलाकृति को लेकर जितनी नज़रें उतनी अलग-अलग सोच खुद के सामर्थ्य को चुनौती देता हुआ प्रतीत होता है। वैसे भी इतिहास में पेंटिग्स को लेकर हमारी नया सीखने-जानने की जिज्ञासा के चरम को छूने से जोड़ा जाए तो आश्चर्य नहीं होनी चाहिए। अरूणाचल प्रदेश की यात्रा के दौरान दीवारों पर ये तस्वीर हर इंसान के लिए एक अलग-अलग नज़रिया है। जो आंखों बसे सपने ज़ुबां के रास्ते बरबस बाहर आ जाती है।
हवा में दिख रहा इंसान को देखकर उसकी मनोस्थिति और हालात का अंदाजा लगाएं तो दिमाग में एक ख्याल तो आ ही जाती है।
कि क्या वो इंसान हम ही है ? जो हवा में उछलता हुआ दिख रहा है। या फिर ज़मीन पर दिखने वाले लोग हम हैं। ये फैसला अपना- अपना है।
ज़िंदगी में कई ऐसे मौके आते हैं, जब इंसान खुद को ज़मीन पर नहीं खुद को हवा में पाता है। लेकिन हवा में सिर्फ सीमित लोग ही रह पाते हैं। बात उंचाई की है, बात सोच की है। जब इस तस्वीर के बारें में अरणाचल प्रदेश के लोगों से पूछा कि , इसका क्या मतलब है ? तो जवाब बड़ा मज़ेदार औऱ गहरी सोच वाली थी, मगर लोगों ने बहुत ही भोले अंदाज में इसका जवाब दिया। उनका कहना था कि , ये तस्वीर यहां के लोगों को ये सीख देती है कि हवा में उड़ने वालों की उम्र कम होती है। अगर नीचे जमीन पर बचाने वाला हो तो उसकी जान बच सकती है । नहीं तो फिर अपनी कम उम्र को लेकर ही संतोष कीजिए। मगर नीचे जो लोग जमीन पर हैं वो दीर्घायु हैं। जमीन से जुड़े लोगों की तादाद भी ज्यादा होती है औऱ उनलोगों को ना तो गिरने का खतरा होता है, औऱ ना ही मौत का भय। डर तो सिर्फ हवा में उड़ने वालों के लिए है।”
छोटी सी बात है, जिसे हम जानते भी हैं समझते हैं, मगर अमल करने में कोसों पीछे छूट जाते हैं। वहीं जब बात गुरूर, घमंड औऱ अभिमान की आती है तो अरूणाचल प्रदेश के लोग इनमें अंतर बहुत ही साफ तरीके से कर पाते हैं औऱ अमल भी करते हैं। मगर हिंदुस्तान में ज्यादातर हिस्से के लोग गुरूर, घमंड औऱ अभिमान तीनों को मिलाकर अलग ही आदत बना लेते हैं। खैर बात तस्वीरों की है तो ये तस्वीर जरूर किसी यात्री ने बनाई होगी। क्योंकि नार्थ इस्ट के हर राज्य में दीवारों पर ज्यादातर पेंटिंग्स राहगीर ही बनाते हैं। इस तस्वीर को लेकर ना जाने कितनी बातें की जा सकती है, कितनी बातें लिखी जा सकती है। मगर बात अपनी अपनी सोच की है। इन तस्वीरों में खुद को आंकते हुए, अपना अपना नज़रिया साफ कर आगे निकलते जाइए। क्योंकि यहां रूकना उचित नहीं है। बात राहगीर की है।
इस लेख के आखिर में बस चलते चलते इतना ही कि आत्ममुग्ध लोग अक्सर इन बारीक़ फ़र्क़ की सीमा पार कर जाते हैं. जो लोग अभिमान और अहंकार के इस फ़ासले को समझते हैं. वो बेहतर इंसान बन पाते हैं. उनके संबंध भी दूसरे लोगों से बेहतर होते हैं। फैसला आपका।
#कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
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