Monday, 20 July 2020

जब लोग गांधी को कहने लगे ,”आप मर क्यों नहीं जाते “।


Article on Gandhi By kahanibaaj Rajnish baba mehta




जब लोग गांधी को कहने लगे ,”आप मर क्यों नहीं जाते
क्यों विचार ही इंसानों को मरने के बाद भी जिंदा रखती है। 
                     -कहानीबाज
गांधी का ज़िक्र होते ही ज़ेहन की जिज्ञासा जाग उठती है। लेकिन उन लफ़्जों को भूल नहीं पाते हैं जो गांधी ने अपने आखिरी दिनों में कही थी। हालांकि ये कहीं किताबों में नहीं बस अपने गांव मोहल्लों के बड़े बुजुर्गों से सुनी-सुनाई कहानी की तरह ही है। गांधी  अपने आखिरी दिनों में इस बात का अक्सर ज़िक्र करने लगे थे कि , एक रोज मैं हर किसी में होऊंगा। हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया में जाना जाउंगा। लेकिन ये पहचान खुशियों से ज्यादा सवालों में घिरी रहेगी मुझे सजाया जाएगा, मैं संवर भी जाउंगा, लोग तारीफ भी करेंगे, कमरे की दीवारों पर टांगा भी जाउंगा लेकिन जब-जब किसी की नज़र मुझपर पड़ेगी,  तो उसकी आंखों में हज़ारों सवाल जरूर होंगे। मैं इस सवाल को बदल या झुठला तो नहीं सकता। क्योंकि कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो ना चाहते हुए भी आपके साथ ताउम्र ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी जिंदा ही रहती है।इंसानी ज़िंदगी उस कर्म को कंठ तक ना सिर्फ याद कर लेतें हैं बल्कि महसूस भी करने लगते हैं। उस सर के बाल की तरह जिसे इंसान होने और ना होने पर भी अक्सर महसूस करता रहता है।गांधी में ऐसी क्या दीवानगी थी जो आज भी बाजा़र में उंचे दामों पर बिकती है। यकीन मानिए मैं गांधी का ना तो प्रशंसक हूं औऱ ना ही उनके विचारों से पूरी तरह प्रभावित रहने वाला इंसान हूं। बस गांधी को लेकर मेरे अंदर सिर्फ औऱ सिर्फ जिज्ञासा के अलावा कुछ औऱ नहीं है। मगर सवाल ये है कि आज भी गांधी की शक्ल हम सबके सामने सजीव क्यों नजर आती है ? क्यों ऐसा लगता है कि हमारी औऱ आपकी मुलाकात गांधी से हो चुकी है ? ऐसी शख़्सियत सदियों में एक-आध ही पैदा होती है जो आने वाली कई सदियों तक इंसानों की नसों में जिंदा खून की तरह दौड़ती रहती है। विचार, जी हां विचार ही एक ऐसी चीज है जो इंसानों को मरने के बाद भी जिंद रखती है। विचार ही है जो गांधी को जिंदा रखा , विचार ही है जो चे ग्वेरा को पूरी दुनिया में आज भी ज़िदा रखा है। ना मरने वाली चीजों पर विजय पाना इतना आसान नहीं होता। और अगर विजय पा लिया तो फिर कोई गांधी, चे ग्वेरा, लिंकन, हिटलर, मंडेला जैसे लोग पैदा होते हैं। भले ही कईयों के विचार खतरनाक होतें हैं औऱ कईयों के सुधारपरक।  
Article on gandhi by कहानीबाज रजनीश बाबा मेहता

अब बात अगर आलोचना की हुई तो फिर गांधी के प्रत्यक्ष प्रमाणों को भी जान लीजिए। इतिहासकार सुधीर चंद्र की किताब गांधी एक असंभव संभावना    गांधी के विचारों की वकालत खुलकर करती है। यह किताब गांधी के बेहद लाचार, बेचारे, विवश हो जाने और उस विवशता में भीअपने सत्य के लिएजूझते रहने की कहानी है तो है ही साथ ही  गांधी की जिंदगी के आखिरी दिनों की कहानी भी बयां करती है। साल 1947 आते-आते महात्मा गांधी अपने उस दाग को धुल चुके थे जो उनपर भगत सिंह की फांसी को लेकर लगा था। मगर करम का खेल एक बार फिर पलटी मार गया। इस बार दाग लगाने वाले उनके अपने थे, और दूसरों से ज्यादा ज़िम्मेदार खुद साबित होने लगे। आजादी के चंद महीनों पहले गांधी के मन और देश में चल रही हलचलों का पर अगर नजर गड़ाएंगे तो बहुत कुछ खुलकर सामने जाता है। मगर दिक्कत ये है कि उस ज़माने को लेकर जो बातें आज की पीढ़ी के मन में छाप दी गई वही सच बनकर आने वाली नस्लों की नसों में पेवस्त किया जाने लगा  
आजादी के चंद दिन पहले से गांधी के मन और देश में चल रही हलचलों का बयान दिखता है। हिंदू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान, कांग्रेस-मुस्लिम लीग की सत्ता राजनीति के बीच अकेले और तन्हा गांधी जो पूरी जिंदगी सामूहिकता को साधते रहे और उनका भरोसा अपने समाज पर बना रहा।मगर आखिरी दिनों में वही समाज गांधी को नकारना औऱ नज़रअंदाज करना शुरू कर दिया। एकाएक ऐसा क्या हो गया कि समाज के कई वर्ग को गांधी पर से भरोसा उठने लगा। इसलिए उन दिनों गांधी कई बार बहुत कातर दिखते हैं, कमजोर दिखते हैं।
 7 मई, 1947 को जब कांग्रेस लगभग बंटवारे का फैसला कर चुकी थी तब गांधी ने शाम को कहा- 'जिन्ना साहब पाकिस्तान चाहते हैं। कांग्रेस ने भी तय कर लिया है कि पाकिस्तान की मांग पूरी की जाए... लेकिन मैं तो पाकिस्तान किसी भी तरह मंजूर नहीं कर सकता। देश के टुकड़े होने की बात बर्दाश्त ही नहीं होती। ऐसी बहुत-सी बातें होती रहती हैं जिन्हें मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता, फिर भी वे रूकती नहीं, होती ही हैं। पर यहां बर्दाश्त नहीं हो सकने का मतलब यह है कि मैं उसमें शरीक नहीं होना चाहता, यानी मैं इस बात में उनके बस में आने वाला नहीं हूं।... मैं किसी एक पक्ष का प्रतिनिधि बनकर बात नहीं कर सकता। मैं सबका प्रतिनिधि हूं।... मैं पाकिस्तान बनने में हाथ नहीं बंटा सकता।गांधी का मनोगत बहुत स्पष्ट है किंतु हालात ने उन्हें विवश कर दिया था। वे तो बंटवारा रोक पाते हैं ही आजादी के जश्न के पहले जगह-जगह हो रही सांप्रदायिक हिंसा को रोक पाते हैं। नोवाखली के दंगों के बाद कोलकाता, बिहार और फिर पंजाब। सांप्रदायिक हिंसा के विरुद्ध सबसे प्रखर आवाज के पास अबउपवासके सिवा क्या था?

दूसरा संकट यह था कि गांधी नोवाखली में हिंदुओं के नरसंहार से दुखी होकर जब वहां पहुंचते तो मुसलमानों को बुरा लगता कि वे कोलकाता में मुसलमानों के लिए क्यों नहीं पहुंचते? जब वे कोलकाता में मुसलमानों की मदद में उतरते तो हिंदू उन्हें कोसते। ऐसे में गांधी चौतरफा आलोचना के शिकार थे। उनके साथी रहे कांग्रेस जन और राजनेता भी उनके इन देश व्यापी प्रवासों और उपवासों में कोईशांति-संभावनादेखने की बजाएसंकटही देखते थे। ऐसे कठिन समय में गांधी को समझना और कठिन हो गया था। गांधी की बेचारगी यही है कि उन्हें आज तक सही अर्थों में समझा नहीं गया। वे अपने प्रति बनी गहरी नामसझी को लेकर ही विदा हुए। उन्हें लोग देवता का दर्जा तो दे बैठे थे किंतु उनके देवत्व से एक सचेतन दूरी बनाए रखना चाहते थे। शायद इसलिए कि तत्कालीन राजनीति की भाषा से गांधी कदमताल करने के तैयार नहीं थे।
वे समाज की शक्ति को जगाना चाहते थे, जिसने उन्हें महात्मा बनाया था। किंतु इस दौर में वह समाज भी कहां बचा था, एक गहरा बंटवारा जो सिर्फ भूगोल का नहीं था, मन का भी था। गांधी कीरूहानी शक्तिइसदुनियावी रोगके सामने बेबस थी। यह वही समय था जब गांधी को मंत्रमुग्ध सुनने वाला देश और समाज उनसे सवाल करने लगा था। लोग उनके मुंह पर कहने लगे थे कि आप मर क्यों नहीं जाते? उनसे पूछा जाने लगा किःआपने चार-पांच दिन इतनी लंबी-लंबी बातें बनाईं कि हम एक इंच भी पाकिस्तान मजबूरी से देना नहीं चाहते, बुद्धि से ह्दय को जाग्रत करके भले ही जो चाहें सो लें, लेकिन वह तो बन गया। अब आप इसके खिलाफ अनशन क्यों नहीं करते?” उनसे यह भी पूछा गया- “आप कांग्रेस के बागी क्यों नहीं बनते और उसके गुलाम क्यों बने हैं? आप उसके खादिम कैसे रह सकते हैं ? अब आप अनशन करके मर क्यों नहीं जाते?” 
महात्मा जी ने ये सारी बातें खुद 5 जून, 1947 को अपने प्रार्थना प्रवचन में बतायीं। खुद पर बरसते सवालों से वे अविचल थे। अपनी आलोचना और निंदा को वे खुद अपने प्रवचनों में बताते और अपने उत्तर भी देते। किंतु उस समय गांधी को सुनने, समझने का धीरज तत्कालीन राजनीति और समाज दोनों खो चुके थे। अपने समय को पहचानने की जो अद्भुत क्षमता गांधी में थी उसी के चलते वे कह पाएःबंटवारे से तो हम आज बच नहीं सकते चाहे वह हमें कितना ही नापंसद हो।सच कहें तो गांधी का सबसे बड़ा दर्द यही है कि उन्हें समझा नहीं गया और आज भी उनकी रेंज को समझने वाला मन हमारे पास कहां है? एक राष्ट्रपिता की इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है जो समाज और राजनीति उनके पीछे चली, उनके इशारों पर चली वही आज उन्हें अप्रासंगिक तथा अनुपयोगी मान रही थी। गांधी अपने आखिरी दिनों में इतने कातर इसलिए भी थे, उनके अपने भी उनका साथ छोड़ चुके थे, या उन्हें अनसुना कर रहे थे। वे इस बात को समझ गए थे। इसीलिए अनेक मौकों पर आजमाए जा चुके अपने अमोध अस्त्र आमरण अनशन का इस्तेमाल भी वे नहीं करते। उनका मानना था इससे बंटवारा रूक भी गया तो मनों में पाकिस्तान बन जाएगा जो ज्यादा खतरनाक होगा। इसलिए भूगोल बंटने के बाद भी रिश्ते बने रहें, मन मिले रहें उसकी कोशिश वे आखिरी सांस तक करते रहे। वे बहुत साफ कहते हैं- “जब मैंने कहा था कि हिंदुस्तान के दो भाग नहीं करने चाहिए तो उस वक्त मुझे विश्वास था कि आम जनता की राय मेरे पक्ष में है; लेकिन जब आम राय मेरे साथ हो तो क्या मुझे अपनी राय जबरदस्ती लोगों के गले मढ़नी चाहिए?”

देश के बंटवारे के बाद गांधी चाहते तो एक निष्क्रिय बुजुर्ग की आदर्श भूमिका निभाते हुए चैन से रह सकते थे। उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य आजादी हासिल हो चुका था। किंतु वे स्वराज के लिए सक्रिय थे। शायद वे देश और उसकी सरकार के कार्य संचालन में कुछ बेहद जमीनी सुधार के सुझाव दे पाते किंतु आजादी मिलते ही उनके सामने हिंदु-मुस्लिम सद्भाव का प्रश्न बहुत विकराल बनकर खड़ा हो गया। दंगे, मारपीट, आगजनी, स्त्रियों से दुर्व्यवहार की खबरों से उनका मन रोज रो पड़ता। वे अकेले और विवश होने के बाद भी इस कठिन समय में अपने हस्तक्षेप से शांति और सद्भाव का संचार करते हैं। सांप्रदायिक तत्वों को विवश करते हैं कि वे राष्ट्र की मुख्यधारा में साथ आएं और अपनी जहरीली राजनीति से बाज आएं। तत्कालीन सरकार को पाकिस्तान के बचे 55 करोड़ रूपए देने के लिए मजबूर कर देते हैं। उनका नैतिक बल अक्सर भारी पड़ता है। किंतु अब उनकी जिद और हठ से उनके अपने लोग भी उनसे बचने लगे थे। गांधी की जिद क्या थी- सद्भावना, एकता, सौहार्द्र, भाईचारा, अहिंसा। शायद वे इसीलिए कहते हैःमैं जानता हूं तो पाकिस्तान नरक है ही हिंदुस्तान नरक है। हम चाहें तो उन्हें स्वर्ग बना सकते हैं और अपने कामों से नरक भी बना सकते हैं और जब दोनों नरक जैसे बन गए तो उसमें फिर आजाद इनसान तो रह ही नहीं सकता। पीछे हमारे नसीब में गुलामी ही लिखी है। यह चीज मुझको खा जाती है। मेरा ह्दय कांप उठता है कि इस हालत में किस हिंदू को समझाऊंगा, किस सिख को समझाऊंगा, किस मुसलमान को समझाऊंगा।

गांधी इस पीड़ा को लिए ही विदा हुए। आप देखें तो इस बात के सात दशक पूरे हो चुके हैं। बंटवारा और गहरा हुआ है। सिर्फ गांधी ही नहीं, भारत-पाक रिश्ते भी अब एक असंभव संभावना दिखने लगे हैं। गांधी की त्रासदी यह है कि वे 32 वर्षों तक जिस हिंदुस्तान के लिए अंग्रेजों से लड़ते रहे, उस आजाद देश में वे मात्र पांच महीने (169 दिन) जिंदा रह सके। गांधी को भूलने का, गांधी को समझने का, भारत को समझने का यही फल है। एक समझे जाने वाले नायक गांधी- जिनकी हमने असंख्य मूर्तियां बनाईं, उनके नाम पर संस्थाएं बनाईं, गांधी रोड बनाए, नगर बनाए, नोटों पर उन्हें छापा, विश्वविद्यालय बनाए किंतु यह सब कुछ हमारी गहरी नासमझी के चलते बेमतलब है। अपनी हत्या से कुछ दिन पहले गांधी ने कहाःमैं तो आज कल का ही मेहमान हूं। कुछ दिनों में यहां से चला जाऊंगा। पीछे आप याद किया करोगे कि बूढ़ा जो कहता था वह सही बात है।

दरअसल इंसानों को अपना कर्म जब गुनाह लगने लगता है तब वो अपनी मौत की बात करने लगता है। ठीक गांधी के साथ भी वही हुआ। आजादी के कुछ दिनों पहले से गांधी को एहसास हो गया था कि उनके कई कर्म गुनाह का रूप अख्तियार लेने लगी है। साथ ही समाज में सवालों के साथ-साथ असंतोष का भाव फैलता जा रहा था। इसलिए गांधी अक्सर मरने की बात करने लगे। शायद आजाद, भगत, ना जाने कितने क्रांतिकारी जिनको गांधी ने अपने आंखों के सामने मरते देखा। उसकी आत्मा उन्हें आखिरी दिनों में डराने लगी थी। औऱ यही डर उसके मन में उसके लिए मौत का घेरा तैयार करने लगी।  इसलिए गांधी आने वाले दिनों के लिए अपनी भूमिका की चर्चा करना शुरू कर दिया था। जिसका परिणाम आज पूरे देश के सामने है। गांधी मरते-मरते भी जीना सीख गए थे। यही वजह है कि गांधी आज भी लोगों के ज़ेहन में जिज्ञासा का रूप लिए ज़िंदा है। तो बस तलाशते रहिए, खोजते रहिए, जानते रहिए, पढ़ते रहिए। बात अमरत्व हासिल करने वाले गांधी की है। 

लेख- रजनीश बाबा मेहता #कहानीबाज

पुस्तक संदर्भः गांधी एक अंसभव संभावनाः सुधीर चंद्र,

गांधी की आलोचना औऱ निंदा करने के मामले पर कई किताबों ने उनके शक्ल को साफ सुथरी रखने की खूब कोशिश करती रहती है। 

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