कहानीबाज हूं मैं किताबों के सहारे जिंदगी कट जाए तो जिंदगी कैसी होगी ? पता नहीं!लेकिन किताबों के सहारे जिंदगी के साथ मैं हर उस कहानी को सुनहरे पर्दे पर प्रकाश की परिकल्पना करते हुए पेश करना चाहता हूं जिसमें मैंने सिनेमा की झलक देखी है। मैने अपनी जिंदगी से शर्त लगा रखी है कि मैं अपने ज़ेहन में बसी हर कहानी को सिनेमा का वो रूप दूंगा, जिसे दुनिया देखती रह जाएगी। फिल्म मेरे लिए नशा है। मैं इसी नशे में जिऊंगा।
Monday, 5 July 2021
बेफिक्र हिंदुस्तान का मीडिल क्लास ।
ये हिंदुस्तान है । वो हिंदुस्तान, जहां बड़ी-बड़ी इमारतें अब आसमान को छूने लगी है। , अरेबियन सागर जिसका हर पल सज़दा करता है।
जिसकी हवाओं और फ़िजाओँ में तिरंगे की लहर ऐसी है, जो संगीत सी सुनाई देती है। बदलते हिंदुस्तान में इंसानी ज़िंदगी अमीरियत की बोरियत में खो गई है।
लेकिन जो बात मिडिल क्लास के मजे में है, वो मर्सीडिज वाले क्लास में कतई नहीं है।,भरोसा नहीं होता, तो एक बार समयचक्र का पहिया पीछे घुमाकर याद कर लीजिए।
कि कैसे अम्मा को पापा स्कूटी पर बिठाकर बाज़ार तक ले जाया करते थे।,रस्ते में भुट्टे वाला दिख जाए , तो पका हुआ भुट्टा नहीं,
बल्कि कच्चे भुट्टे को पकवाकर खाते थे।, प्यास लगती, तो सड़क किनारे सोते गन्नेवाले को उठाकर
ताजा-ताजा जूस बनवाते थे।, नई गाड़ी खरीदने पर तो नींबू मिर्ची लटकाना भूलते ही नहीं थे।,और हां, लंबी यात्रा पर निकलने से पहले गाड़ी में गणपति को प्रणाम जरूर करते थे।
यात्रा शुभ हो। अगर वही गाड़ी अगर पुरानी हो जाए, तो बेचते नहीं थे। बल्कि बरसों-बरसों तक संभाल कर रखते थे। मीडिल क्लास वाली बातें, यादों को मिटाना या बदलना जानते ही नहीं।बस एक रविवार की छुट्टी मिलती थी। उस रोज परिवार के साथ बाहर खाने का मजा दोगुना हो जाता था। तंदूर वाली रोटी के इंतजार में ना जाने क्या-क्या ऑर्डर कर जाते थे।
बड़ी वाली दीदी का तो जवाब ही नहीं था।,भरी दोपहरी में रोड किनारे बैठकर घंटों मेंहदी लगवाती।,औऱ हम सब, उसके इंतजार में बंदर-बकरियों को बचा-खुचा खाना खिलाकर टाइम पास कर रहे होते।, ढ़लते सूरज के साथ जिद होती थी, कि समंदर किनारे फुटबॉल भी खेलेंगे।, जहां लहरों के पागलपन पर , पूरा परिवार एक साथ सपने बुना करते थे।
मैं तो उन स्कूली बच्चों को घूमते देख जल्दी से बड़े होने का सपना देखा करता था।, पापा अगर ज्यादा खुश हुए, तो समंदर किनारे स्कूटी राइड भी मिल ही जाती थी।
अम्मा खुश हुई तो कुछ ना कुछ सस्ता सामान, महंगा खरीद लेती थी।,फिर क्या रस्ते पर हम सब चुप। अम्मा औऱ पापा एक दूसरे की खामियां गिनवाने में चकर-चकर करते रहते।
जो भी हो , ये मिडिल क्लास हर वक्त मजे में डूबी होती है।, सुबह से शाम इन्ही छोटी-छोटी खुशियों तले इंतजारी घड़ियां मुकम्मल होती थी।
छुट्टी वाला पूरा दिन एक सेकेंड की भांति गुज़र जाता था, पता ही नहीं चलता था।,औऱ हां, दुर्गा पूजा में गांव जाना भूलते नहीं थे । साल भर का इंतजार यहीं खत्म होता था।
कच्चे रस्तों और खेतों की पगडंडियों पर बैलगाड़ी में भैंस बंधा देखकर सबकी हंसी निकल जाती थी।,घास का गट्ठर लिए औरतें दिख जाए, तो पापा अम्मा को सलाह देने से चूकते नहीं थे।
मैं तो पोखरे में कागज का नाव डालकर उसके चलने का घंटों इंतजार करता रहता…करता रहता।, कभी बारिश हो जाती , तो पानी के बूंदों को बस महसूस करता और सोचता
कि काश शहर लौटने के दिन नजदीक ना आएं।,बरगद की छांव तले सूरज से आंख मिचोली खेलते खेलते कब सो जाता पता ही नहीं चलता।
अब तो हर गांव में भी शहर जैसी नई सुबह होने लगी है।,लेकिन मिडिल क्लास वाली बातें और यादें , जाती ही नहीं। बस, अफसोस सिर्फ एक ही बात का है।
कि कमबख्त अपर मिडिल क्लास खुद को अमीरियत की बोरियत में डुबोकर, ना इधर के रहे ना उधर के।
बस जहां भी रहे मीडिल क्लास वाली यादों के साथ ही रहें।
क्योंकि
ये हिंदुस्तान है। मीडिल क्लास वालों का हिंदुस्तान।
जहां अमीरियत एक पल के बाद बोरियत हो जाती है।
#कहानीबाज़
I am कहानीबाज़। कहानियां लिखता हूं, औऱ फिर उसे सिनेमाई परदे तक पहुंचा कर कहानियों को मोक्ष की प्राप्ति करवाता हूं।
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