Sunday, 27 January 2013

मोहनदास नाटक की समीक्षा ... रजनीश की कलम से


मोहनदास
निर्देशक राजेंद्रनाथ
श्रीराम सेंटर रंग मंडल

यथार्थ को आप कैसे पकडेंगे ? आप कह सकते हैं कि यथार्थ को पकड़ना क्या है ?     जो हमारे सामने है यथार्थ है । लेकिन क्या यथार्थ इतना ही है ? दर्शनशास्त्र तो हमेशा से ही कहता है कि,  नहीं यह बस उसका आभास है । तालाब के जल की तरह है जिसकी तलहटी में क्या है ये देखना मुश्किल है । हमारी दुनिया का यथार्थ भी वैसा ही है। इसकी कई परते हैं । बिलकुल इस वर्चुअल/आभाषी दुनिया की तरह । दृश्य के परे का जो जाल है उसको देखने के लिये खास दृष्टि और औजार चाहिये। रचनात्मक प्रतिभायें यही करती हैं, वह हमेशा यथार्थ की पड़ताल करती है, और उस यथार्थ को सामने लाती है जो तल में है।
  मोहनदासकी प्रस्तुति भी यही करती है, मोहनदासकी कहानी तो इतनी भर है कि किसी अन्य व्यक्ति जो सामर्थ्यवान है ने जबरन उसके नाम को हथिया लिया है और इस अनाधिकार कब्ज़े से मोहनदास यातना पाता रहता है। लेकिन इस यातना के पीछे सामाजिक सरंचनाओं की पृष्ठभूमि  और उनका इतिहास है । जिसमें सदियों से मोहनदास और उनके जैसे लोग पिस रहें हैं, और उसके हक पर कोई उसके ही नाम से कब्ज़ा जमाये बैठा है। यह कब्ज़ा छिन भी जाये तो भी मोहनदास के लिये जीवन आसान नहीं है। तो संकट अब मोहनदास के पहचान पर ही नहीं   उसके जीने के अधिकार पर भी है क्योंकि उसके सांस लेने की हवा और जगह दोनों सिकुड़ती जा रही है। मोहनदास जाहिर है समाज की हाशिये पर पडी हुई जातियों से संबंध रखता है। जो सरकार कि बनाई किसी लिस्ट में नहीं है। और हां मोहनदास का नाम मोहनदास और मां का नाम पुतलीबाई और पत्नी का नाम कस्तुरीबाई ऐसे ही नहीं है. साथ ही गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे जज महोदय की उपस्थिति भी एक फ़ैंटेसी की उपस्थिति है।
उदय प्रकाश की चर्चित कहानी मोहनदासपर फ़िल्म भी बनी है और इसे साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला है। इस कहानी को बड़ी ही संवेदनशीलता से दिलचस्प शैली में वरिष्ठ निर्देशक राजेंद्रनाथ ने श्रीराम सॆंटर रंगमंडल के साथ प्रस्तुत किया है। यहां यह ध्यान रहे कि राजेन्द्रनाथ ऐसे निर्देशक है जो हमेशा रंगमंच की वास्तविक शक्तियों पर भरोसा करते हैं। उनकी प्रस्तुति का आधार ही अभिनेता है और अभिनेताओं ने बखूबी इस जिम्मेवारी  को निभाया है अगर दूसरे शब्दों में कहें तो हर कुछ किरदार ने नाटक को जीवंत बना दिया।  प्रस्तुति की नैरेटिव शैली प्रयोगात्मक है जो लगभग अंत से शुरु होती है। और हम मोहनदास को देखते हैं जो अपने पहचान से इनकार कर रहा है और इससे पीछा छुड़ाने के लिये कोई भी हलफ़नामा देने को तैयार है. प्रस्तुति में लेखक उदय प्रकाश का चरित्र ही सूत्रधार की भूमिका में है, जो हर पात्रों से दर्शक का परिचय कराता है कहानी का संचालन करता है और जरूरी मुद्दो पर रूककर कहानी को संदर्भों से जोड़ता है। प्रस्तुति शुरू होकर अतीत की यात्रा करती है, और  दर्शक क्रमशः मोहनदास की त्रासदी और उसके कारणों को समझता है देखता है। महत्वपूर्ण यही है कि त्रासदी का जैसे लेखक ने कोरा ब्यौरा नहीं दिया वैसे ही निर्देशक भी कोरा ब्यौरा नहीं देता। वह इस त्रासदी के कारण और कार्य  संबंधों की व्यापक पड़ताल करता है, और पड़ताल करने में दर्शक को सक्षम भी बनाता है, और यकीन मानिये कि नाटक फ़िर स्टेज के साथ साथ दर्शक के मस्तिष्क में भी चलती है। याद कीजिये कि ब्रेख्त ने भी यहीं कहा था कि नाटक की सफ़लता यहीं है कि वह प्रेक्षागृह के बाहर शुरु हो।
उदय प्रकाश की कहानियों की यह खासियत है कि वे अपनी कहानी और पात्रों को वृहतर आख्यानों की शृंखला से जोड़ते हैं। उनकी कहानी का पात्र किसी द्वीप का निवासी नहीं बल्कि वह इसी भूमंडल का प्राणी है। और इस भूमंडल पर घटने वाली हर घटना के परिणाम का वह किसी ना किसी तरह से भागी है। इस कहानी में कहानीकार ने समय संदर्भों को जोड़ा है, और बताया है, कि मोहनदास की नियति किसी एक खास व्यक्ति की नियति नहीं है। प्रस्तुति ने भी इस समय संदर्भों को बखूबी पेश किया है। सूत्रधार रुक कर सारे संदर्भों का ब्यौरा देता है, ‘यह वहीं समय है जब पेट्रोल के दाम बढ़ने पर वामपंथी पार्टियां सरकार के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रही थी। जबकि देश की अधिकांश जनता को पेट्रोल से मतलब नहीं था’, ‘यह वही समय है जब सत्तायें निरंकुश और क्रूर होती जा रही है’, ‘यह वही समय है, जब  एशिया के दो संप्रभु देश नेस्तनाबूत किये जा रहे हैं’, इत्यादि। प्रस्तुति इस पूरे वृतांत को अपने में समेटती है, और उसमें मोहनदास की स्थिति को लोकेट करती है। और उत्पीड़क बिरादरी को कठघरे में लेती है। सत्ता और समाज के उन तमाम ढांचो की पोल खोलती है, जो शक्ति और संसाधन पर कब्जा जमायें हुएं है और उनके वास्तविक हक़दारों को बेद्खल करने की व्यस्थित तैयारी भी कर चुके हैं। इसमें एक और जहां समाज की अंदरूनी व्यवस्था हैं वही व्यापक परिप्रेक्ष्य में बड़े राष्ट्र और उनका लालच। प्रस्तुति समाज में छा रही एकरूपता को भी चिह्नित करती है जहां सभी एक जैसा होने की होड़ में हैं।
जैसा कि उपर बताया गया कि अभिनेता ही प्रस्तुति की जान है, वैसे यह कहना भी अजीब है, क्योंकि नाटक में तो अभिनेता ही प्रस्तुति की जान होने चाहिये लेकिन रंगमंच के क्षेत्र में यह वह समय  जो उन प्रयोगों का है। जिसमें अभिनेता बस एक यंत्र है. इसलिये जिस प्रस्तुति में अभिनेता हाड़ मांस का होता है उसकी अलग से चर्चा करनी पड़ती है। सूत्रधार की भूमिका में श्रीकांत ने बेहतरीन अभिनय किया है। उन्होंने अपने देह और स्पीच में भूमिका को आत्मसात कर लिया है। शांतचित्त होकर स्थिर स्वर में बोले गये उनके संवाद भीतर तक उतर जातें हैं । समीप सिंह ने मोहनदास की भूमिका निभाई है जो वाकई में कमाल और प्रशंसनीय है। क्योंकि मोहनदास नाटक देखते वक्त अभिनेता मोहनदास के किरदार को जीवंत कर दर्शकों के आंखो के सामने ला दिया। अन्य पात्र भी अपनी भूमिकाओं में संजीदगी से उतरे हैं। दृश्य परिकल्पना बिलकुल सादा है और खाली मंच पर बस कुछ प्राप्स और एक चित्र है। लेकिन खाली मंच औऱ सादा परिकल्पना  एक गहराई की ओर ईशारा करता है जो दर्शकों को बार बार कल्पना करने पर मजबूर करता है।  प्रस्तुति में कबीर के कुछ भजनों और एक आध छत्तीसगढी लोकगीत को भी शामिल किया गया है जिनका चयन अच्छा है। और अभिनेता ने संगीत के साथ नृत्य को भी बेहतर ढंग से निभाया है। मैं आखिर में यही कहना चाहूंगा कि जो  संवेदना को और गहराते हैं वो एक परिवेश भी रचते हैं।

15वें भारतीय रंग महोत्सव में मोहनदास नाटक ने अपनी अमिट छाप छोडी जिसे दर्शक कभी नहीं भूल पाएगा। 

लेखक 
रजनीश कुमार
rajnish17kumar@gmail.com

No comments:

Post a Comment