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| Rajnish Kumar Oponion on Dafa 292 Play |
दफा – 292
मंटो
राष्ट्रीय नाट्य विघालय रंगमंडल
हिंदी थिएटर मंटो की प्रगतिशील
बोहेमियन छवि से बार-बार विमोहित होता है। अपनी बौद्धिक सीमा में वह इस छवि के
रूमान पर मुग्ध हुआ रहता है। मोहन राकेश ने मंटो की कहानियों में जिस जुमलेबाजी को
एक खास कमजोरी के तौर पर लक्ष्य किया था, हिंदी थिएटर उसे एक नाटकीय तत्त्व के तौर पर गदगद होकर
इस्तेमाल करता है।
लेकिन 15वें भारतीय रंग महोत्सव के
दौरान अभिमंच प्रेक्षागृह में हुई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की प्रस्तुति 'दफा- 292' की
विशेषता यह है कि मंटो की एक परिहासपूर्ण कहानी के जरिए उसमें इस रूमान से परे
सरकने की कोशिश की गई है। युवा रंगकर्मी अनूप त्रिवेदी द्वारा निर्देशित इस
प्रस्तुति में कथ्य के तीन चरण हैं।
पहला, मंटो और उनकी बीवी का संवाद, दूसरी कहानी 'तीन खामोश औरतें', तीसरा,
मंटो पर मुकदमा और उपसंहार। इस सारे
सिलसिले में मंटो अपने खयालात और हालात को अक्सर एकालाप में भी बयान करते नजर आते
हैं। वो बताते हैं कि 'कम्युनिस्ट
मुझपर फाहशनिगारी का इल्जाम लगाते हैं', कि 'कोई
तकियाई हुई रंडी मेरे अफसाने का मौजूं बन सकती है', कि 'जैसे में
खाना खाता हूं, गुसल करता हूं,
सिगरेट पीता हूं,
वैसे ही अफसाना लिखता हूं'
। अनूप त्रिवेदी ने रोशनी के दो
अलग-अलग वृत्तों में मंच पर दो मंटो पेश किए हैं। दो मंटो और दो ही उनकी बीवियां।
यह चीज देर तक चलने वाले पति-पत्नी के चुहुलनुमा झगड़े की एकरसता को थोड़ा कम करती
है। बगैर किसी शोर-शराबे के साफ-सुथरे दृश्यों में रोशनी के फोकस और छायाएं धीमे
से एक प्रभाव बनाते हैं। इन दृश्यों में कुछ भी अनावश्यक नहीं है। रेलवे
प्लेटफॉर्म पर बैठी तीन औरतों के बातूनीपन की कहानी 'तीन खामोश औरतें' में एक तख्त मंच पर है और उसके किनारे पर एक लैंपपोस्ट खड़ा
है। बाकी दृश्य ट्रेन के गुजरने के स्वर, गार्ड की सीटी वगैरह से बनता है। लेकिन असली चीज है चरित्र
की छवि। अनूप त्रिवेदी में इसकी अच्छी सूझ है। पहली बातूनी औरत धाराप्रवाह बोले जा
रही है। दूसरी उसे औचक सुन रही है। यह
दूसरी वाली बीच-बीच में खों-खों करके थोड़ा विचित्र तरह से हंसती है। बाद में यह
दूसरी वाली बोलना शुरू करती है तो अब तक अलग-थलग बैठी तीसरी वाली का भौंचक्का-सा
उत्सुक चेहरा देखते ही बनता है। कुछ ही देर में तीसरी वाली शुरू हो जाती है,
और इस बीच वहीं प्लेटफॉर्म पर सोने का
उपक्रम कर रहा बंदा पहलू बदलता हुआ निरीह मुद्रा में रह-रह कर उन्हें देख रहा है।
एक मौके पर वह पहली बातूनी औरत की बात सुनता हुआ अपनी बंडी उतार देता है। लेकिन
औरत बोलने में इस कदर मशगूल है कि उसपर उघारे बदन की अशालीनता का असर भी कुछ देर
बाद होता है। तब उसका हल्की सकपकाहट में नजरें फेर लेना जल्दी से घरेलू स्त्री की
अच्छी छवि बनाता है। प्रस्तुति
एक कोलाज की तरह है, जिसमें
बाद में कुछ फुटपाथिये दुकानदार मंटो के मुकदमे की चर्चा करते हैं कि पता नहीं
गिरे इंसानों को उठाने में उसे क्या मजा आता है! कि वो ऐसे अफसाने लिखता है जैसी
बातों के मुतल्लिक सोचना भी अपने में संगीन जुर्म है। अनूप मंच पर वो स्पेस बनाते
हैं, जहां छोटे-मोटे किरदार भी गौर से दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
में इधर के दिनों में जिस तरह चीजों से ठुंसे हुए ऊटपटांग किस्म के नाटक होते रहे
हैं। उनमें यह बिल्कुल अलग तरह की
प्रस्तुति थी। पूरे दृश्य विधान में त्रुटियां या चूकें इसमें नहीं दिखाई देतीं।
अनूप त्रिवेदी की पहचान अब तक मुख्यतः अभिनेता के तौर पर रही है,
पर यह प्रस्तुति उनकी सुलझी हुई
रंग-दृष्टि को सामने लाती है। विशेषत: दृश्य के कैनवास और उसमें चरित्रांकन से
बनती छवियों को लेकर। नाटक में गलतियों की गुंजाईश नहीं थी क्योंकि नाटक में
अभिनेता की परिपक्वता हमें काफी हद तक प्रभावित करती है। साहित्यिक अंदाज में
हकीकत का ये फसाना अपने अंजाम तक जब पहुंचता है तो दर्शक खड़े होकर देर तक तालियां
बजाते रह जाते हैं। नाटक हर तरीके से परिपूर्ण है। अभिनय से लेकर, मंच सज्जा हो या
फिर प्रकाश व्यवस्था हर मोर्चे पर निर्देशक ने बारिकी से काम किया है जो नाटक को
पूरी तरह से सफल बना दिया।
इस नाटक को देखने के बाद मैं मंटो की
जिंदगी और लिखने की शैली से काफी प्रभावित हुआ। हालांकि मंटो पर अश्लीलत के आरोप
लगे और कई तरह से मुकदमे भी चले। सजा भी हुई। नाटक का नाम दफा 292 रखने के पीछे ये
भी सोच है। नाटक का आखिरी हिस्सी इसी पर केंद्रित है औऱ बिना अपनी तरफ से टिप्पणी
किए निर्देशक इस बात को रेखांकित कर देता है। जिन लोगों या सामाजित ताकतों ने
मंटों पर इस तरह के आरोप लगाए थे उनके जेहनियत कैसी थी। उनकी मानसिकता में क्या था
? मंटों क्यों अपने समय के कुछ लोगों को असहज कर देते थे ?
समाज में किस तरह सच्चाईयों से मुंह मोड़ने की प्रवृत्ति भी होती है, ये इस नाटक
के आखिरी दृश्य में बहुत ही बेहतरीन तरीके से उभरता है।
ऐसा नहीं था कि मंटो का विरोध सिर्फ
राजनैतिक, प्रशासनिक या मजहबी ताकतों ने किया। खुद प्रगतिशील कहे जानेवाले खेमें
में भी मंटो का विरोध हुआ। एक बार तो प्रगतिशील लेखक संघ में मंटो के बारें में
निंदा प्रस्ताव भी रख गया। ये दीगर बात है कि ये प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। मगर
इतिहास में ये दर्ज रहेगा कि मंटो को अपनी बिरादरी, यानि लेखकों की बिरादरी में भी
विरोध झेलने पड़े। आजकल कई लोग बार बार बहसों के दौरान लक्ष्मण रेखा की बात करते
हैं। मंटो ने तो अपने लेखन में कई बार लक्ष्मण रेखा तोड़ीं। शायद इसी वजह से एक
बड़े लेखक भी बनें। जो कि नाटक में मौजूद संवादों के संदर्भ से बखूबी झलकता है।
लेखक
रजनीश कुमार
Rajnish17kumar@gmail.com

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