Sunday, 27 January 2013

आत्मकथा नाटक की समीक्षा... रजनीश की कलम से

Rajnish The Director , Writer 


आत्मकथा
निर्देशक-विनय शर्मा
पदातिक ग्रुप
नाटक ने सिनेमा को कई कलाकार दिए हैं और ये कलाकार लगातार बेहतर काम भी कर रहे हैं । समाज को एक नए सिरे से देखने का काम फिल्में भी कर रही हैं और इसके बेहतर परिणाम सामने आ रहे हैं। उक्त बातें प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 15वें भारत रंग महोत्सव के उद्घाटन के अवसर पर कहीं. उन्होंने कहा कि थिएटर समाज के कई रूपों को दिखाता है यह विरोध का भी सशक्त माध्यम हैं। इसका मतलब ये नहीं कि थिएटर को सिर्फ विरोध के लिए इस्तेमाल किया जाए। थिएटर को अपने विचारों के जरिए औऱ भी मजबूत बनाने की जरूरत है। 15वें भारत रंग महोत्सव में श्याम बेनेगल के इस संवाद के साथ शुरू हुआ थिएटर का महाकुंभ। और पहली प्रस्तुति थी आत्मकथा

 एक बार फिर फिल्मों से थिएटर की तरफ़ रुख किया है जाने माने अभिनेता कुलभूषण खरबंदा। अभिनेता कुलभूषण खरबंदा के नाटक आत्मकथासे इस रंगमंचीय कार्यक्रम की शुरूआत हुई। स्त्री-पुरुष के संबंधों, एक लेखक के अंतरंग पहलुओं और एक शोध छात्रा के माध्यम से संबंधों की पड़ताल करता यह नाटक दर्शकों को बांधे रखा। कुलभूषण खरबंदा, अनुभा फतेहपुरिया, चेतना जालान और संचयिता भट्टाचर्जी का अभिनय बेहद सराहनीय है। कोलकाता के पदातिक समूह द्वारा की गई प्रस्तुति का निर्देशक वरिष्ठ निर्देशक विनय शर्मा ने किया।
गौरतलब है कि भारत रंग महोत्सव में इस वर्ष कुल 87 प्रस्तुतियां में पहली प्रस्तुति आत्मकथा अपने आपमें एक जानदार नाटक हैं लेकिन दर्शकों को अंत तक बांधे रख पाने में कामयाब नहीं सके।

उद्घाटन सत्र के बाद पदातिक कोलकाता  की प्रस्तुति आत्मकथा लेखक महेश एलकुंचवार के नाटक से पन्द्रहवें भारंगम की औपचारिक शुरूआत हुई।
प्रस्तुति की शैली यथार्थवादी थी । जिसमें एक ड्राईग रूम का सेट बनाया गया था। जिसके दीवारों का बेहतरीन ढंग से इस्तेमाल कर उसपर वीडियो प्रोजेक्शन भी किया जा रहा था। दोनों तरफ़ की दीवारों को जोड़ता हुआ बीच में एक चल सेट था। जिस पर टेलीफ़ोन लगा था।  उसे पीछे से बीच में ले आ कर कमरे का विभाजन कर लिया जाता था। टेलीफ़ोन पर होने वाली बातचीत एक युक्ति थी जिससे नाटक का कथ्य भी खुलता था, और इसके नैरेशन की एकरैखिकता को भी तोड़ा जाता था। नाटक का बहुत सारा हिस्सा फ़्लैश बैक में होने की जगह कई जगह नाटक देर से समझ में आती है। काली दीवारों पर नेगेटिव्स की तरह चलने वाले प्रोजेक्शन के साथ प्रस्तुति प्रारंभ हुई और रंगमंच के  के जाने माने अभिनेता कुलभूषण खरबंदा अनंतराव के रूप में स्टेज के बीच में आये और आत्मकथाको बोलना शुरू किया तिलक और गांधी जी के समय को जोड़ते हुए उम्मीद बढ़ी की प्रस्तुति यादगार रहेगी लेकिन ऐसा हो ना सका, देखने से प्रभावशाली नजर आने वाला डिजाईन ही प्रस्तुति के लिये आत्मघाती लगने लगा। हर दृश्य के फेड आऊट और फ़ेड इन  के बीच में पीछे के हिस्से को सामने लाकर दीवार बनाना जिससे टेलीफ़ोन लगी हुई है और ऐसा बार बार करनाइससे नाटक में तनाव बिखर गया और बिखरता चला गया और कई जगह प्रस्तुति उबाऊ भी होने लगी। इस प्रक्रिया में अभिनेताओं की उर्जा का अधिकांश तो सेट के समंजन में चला गया और रही सही कसर दो मुख्य अभिनेताओं के अभिनय ने पूरी कर दी जो अधेड़ की भूमिका निभाते कहीं कहीं असरदार तो कहीं कहीं कुछ अधिक ही थके लगे रहे थे।
नाटक में अनंतराव एक शोध छात्रा को अपनी आत्मकथा लिखवा रहें हैं। लेकिन आत्मकथा लिखाते हुए वे सच का सिर्फ़ अपना हिस्सा सुना रहे हैं वह भी कल्पना के कलेवर में लपेट कर। सच का एक हिस्सा उनकी पत्नी के पास है जो अनंतराव से अलग रहती है। क्योंकि अनंतराव का अपनी पत्नी की छोटी बहन से ही अतरंग रिश्ता बन गया था। अन्य दो पात्रों में शोध छात्रा प्रग्या हैं जो आत्मकथा लिखने के क्रम में अनंतराव से संवाद-विवाद करते हुए उनकी तरफ़ आकर्षित होते चली जाती है। और दूसरा चरित्र अनंतराव की पत्नी की बहन वासंती का है जिसका जीवन जीने का अपना विद्रोही दृष्टिकोण है। यथार्थवाद शैली में प्रस्तुति इस प्रस्तुति में कथ्य का उलझाव बना ही रहता है। आत्मकथा लिखने के क्रम में हर पात्र का सत्य के प्रति अपने दृष्टिकोण सत्य की सापेक्षता की ओर इशारा करता है साथ ही यह भी कि आत्मकथा में कल्पना कितनी हावी रहती है। लेखक के अपने चरित्र, पुरस्कारलिप्सा, अहम,  इत्यादि उस पर कितना हावी रहते हैं। नाटक के कथ्य में काफ़ी कुछ था, लेकिन नाटक में यह सब पीछे छूट गया। पति पत्नी की अलगाव की कहानी मुख्य  कहानी भी ठीक से संप्रेषित नहीं हुई। समय के लिहाज से भी यह एक अप्रासंगिक नाटक लगा और आभास हुआ कि यथार्थवादी रंग मुहावरा अब कितना नीरस और ऊबाउ हो गया है, और वीडियो या अन्य युक्तियों को जोड़ देने के बाद भी कुछ हासिल नहीं होता। प्रस्तुति में गति का निर्वाह ही नहीं था। फलस्वरूप यह लंबा खीच गया और मध्यांतर के बाद ही कई दर्शक बाहर निकल गए। सब मिलाकर अगर नाटक की बात की जाए तो फिर ये उद्घाटन नाटक और फिल्म जगत के चर्चित हस्ती कुलभूषण खरबंदा के अभिनय की वजह से दर्शक अंत तक बैठे रहते हैं नहीं तो अगर ऐसा कर पाना संभव नहीं था। संभावनों से परे इस नाटक में सीखने को तो बहुत कुछ मिलता है लेकिन ये निराशा की ओर भी ले जाता है।

निर्देशक विनय शर्मा ने सेट बेहतरीन डिजाइन किया औऱ प्रकाश की परिकल्पना भी तारीफ के काबिल थी लेकिन अभिनेता कई बार सेट को समझने में उलझने लगते हैं।

खैर पूरी तरह से पूरी तरह से मेरी उम्मीदों पर नहीं उतर पाया लेकिन खुशी इस बात की थी कि मैं कुलभूषण खरबंदा जैसे महान अभिनेता को अभिनय करते देख पाया जिनकी वजह से यह नाटक काफी हद तक अच्छी थी।
                                        लेखक    
रजनीश कुमार
rajnish17kumar@gmail.com



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