Friday, 1 May 2020

बात तो बंटवारे की है। सन् 1947 की बातें ज़ेहन से जाती नहीं।

Writer Director Rajnish BaBa Mehta 
बंटवारा, विभाजन या तक़सीम... चार अक्षरों के ये छोटे से शब्द ...  इन शब्दों का भाव बड़ा गंभीर और इनसे होने वाला घाव काफी गहरा होता है... बंटवारा चीज़ों का होता है, बंटवारा घरों का होता है, कभी-कभी तो औलादों के बीच माँ-बाप का भी बंटवारा होते देखा और सुना है... ये बंटवारे कितने ही ज़ख़्म दे जाते हैं, और जब दो मुल्क ही बंट जाते हैं तो ख़ता किसी की भी हो लम्हें ख़ुद सदियों तक सज़ा पाते हैं....

सन 47 में जब अंग्रेजों ने रातों-रात खाई जैसी ना मिटने वाली एक मनचाही लकीर खींच दी... वो मानो ऐसा वाकया था कि एक तीसरे आदमी ने दो लोगों की साझा तस्वीर फाड़कर उन दोनों के बीच अपने हिसाब से ही बांट दी हो....उस फटी और बंटी हुई तस्वीर ने दोनों तरफ इतने बदमिज़ाज मंज़र दिखाए कि आंसुओं के सैलाब के बाद आंखें ही बंजर हो गईं... क्या कभी सोचा है कि अगर ये तस्वीर यूं तक़सीम ना कर दी गई होती... तो वो तस्वीर कितनी ख़ूबसूरत होती...

हम लाहौर के उस नेशनल कॉलेज के क्लासरूम में पढ़ रहे होते जहां कभी शहीद भगत सिंह के दिल मेंइंक़लाब ज़िंदाबादकी लौ बुलंद हुई थी...

शायर अल्लामा इक़बाल यहीं रहकर बड़ी शान सेसारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारागा रहे होते
और रामधारी दिनकर की कविताओं के साथ किसी मंच पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपनी नज़्में गुनगुना रहे होते....

पूजा के बाद तुलसीदल के साथ झेलम, चिनाब, रावी, सतलुज, ब्यास का पंचामृत... गंगा के पावन जल सा ही निश्छल होता

दुनिया का स्वर्ग कश्मीर नर्क की आग में जल ना रहा होता, बल्कि इस स्वर्ग में आने के लिए पूरी दुनिया मचल रही होती


ना वाघा होता, ना अटारी होता, बस किसानों के लहलहाते खेत होते और कोई सरबजीत खेतों के उस पार जाने की सज़ा ना पा रहा होता


हर सिख अपने बूढ़े माँ-बाप की लाठी बन उन्हें ननकाना साहिब तो ज़रूर ले जाता.. 

जन-गण-मनकी धुन पर सीना तानने के बाद जनरल मुशर्रफ गर्व से जय हिंद का उद्घोष कर रहे होते

गिल्लियां किसी तीसरे की उड़ाकर शोएब अपने चिरपरिचित अंदाज़ में सचिन के साथ जश्न मनाते 
और गंभीर-अफ़रीदी भी मैदान में एक-दूसरे को गालियां नहीं बल्कि एक-दूसरे से गलबहियां डाल रहे होते

और तो और... 
कसाब 26/11 को अंजाम देने फ़रीदकोट से मुंबई ना आता...बल्कि वो तो मुंबई दर्शन के पैकेज में गेटवे ऑफ़ इंडिया के बाहर खड़ा होकर ताज को निहार रहा होता....

अगर देश ना बंटा होता तो, क्या वाकई ऐसा होता...
या फिर वो आने वाला कल जो कभी आया ही नहीं 
हमारे आज से भी बुरा होता.....
बात तो बंटवारे की है…. अच्छा, बुरा , भला, सब अतीत औऱ भविष्य के गर्भ में छुपा है। 
वर्तमान में कुछ भी नहीं। 
हमारी सोच औऱ समझ भी नहीं। 
बात बंटवारे की है।
गालिब की बातें याद रही है, हकीकत जैसी लगती है- था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ होता तो ख़ुदा होता.... डुबोया मुझको होने ने, होता मैं तो क्या होता!


कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 
पुनीत भारद्वाज

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