| Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta |
जब आप किताबें नहीं पढ़ते हैं, यात्राएं नहीं करते हैं, सिनेमा नहीं देखते हैं, तो फिर आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं। औऱ मौत की किस्म भी बड़ी अजीब होती है । दिमाग में ऐसी हलचल पैदा करता है जो आदमी को निकम्मा होने का एहसास दिलाता है। भागते वक्त के साथ हालात इंसानों को हवा के थपेड़ों से पीछे धकेल देता है । जिसके बाद इंसानी फितरत , शांति की बात करने औऱ तलाशने की अधूरी कोशिश में जीन जान से जुट जाता है। हर पल सुधार औऱ ध्यान वाली सोच को लेकर सिर्फ बतकही में वक्त गुजारना ही आत्मसंतुष्टि समझने की भूल कर बैठता है। एक क्षेत्रीय कहावत है – “करने की सौ शिकायत, ना करने की एक शिकायत”। मगर हम के तौर पर मौजूद इंसान सौ शिकायत करने के बाद भी, उस अकेले एक शिकायत को भी करने से पीछे नहीं हटता है। खैर खुद पर काबू पाना आसान भी कहां होता है। बस बोलने के लिए बोलना भी तो जरूरी होता है। तो बस बोलते रहिए सिर्फ।
लेकिन इस बतोलबाजी के बीच, बातों की अधूरी साजिश औऱ आजमाईश के तले कुछ ऐसे क्रांतिकारी लोग भी होते हैं, जो अनजान सफर पर भी मीलों पैदल चलकर आत्मसंतुष्टि के सागर से सिर्फ एक बूंद हलक के नीचे उतारकर अगली मंजिल की तरफ निकल पड़ते हैं। मजा तो तब है, जब आइनों सी चमकती बनावटी दुनिया में, ना तो कहीं से आना है, ना तो कहीं जाना है, बस एक अंतहीन इंतज़ार, वो भी बिना बेसब्री वाली। मगर ऐसा तभी मुमकिन है जब सुनसान और अनाजने सफर की तलाश अधूरी बची हो। अब जब सफर ही नहीं तो फिर पैरों के छालों की बातें सिर्फ बेमानी ही होगी। एहसासों की लकीरों को उकरेने के लिए कभी-कभी हमें खुद के साथ रहने की या वक्त गुजारने की जरूरत क्यों महसूस होने लगती है ? इसी जरूरत वाली एहसास को समझने औऱ सुलझाने के लिए किताबों का सहारा लेना चाहिए, अगर वहां भी बात बनी तो फिर यात्राएं करके सामाधान निकालने की जुगत या नहीं तो फिर सिनेमा के माध्यम से सवाल को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। यकीन मानिए ये एक जश्न की तरह है। वैसे भी ज़िंदगी का एक उसूल है, कि एक बार की मिली ज़िदगी अधूरी क्यों रहे ? क्यों ना अपनी शर्तों पर जी लिया जाए !
खामोशी से कोरे कागज पर उकेरी लकीरें ना जाने कितनी वेदना और संवेदना प्रकट कर देते हैं, जो शायद कभी कभी पूरी सिनेमा में भी देखने को नहीं मिलती है। कभी कभी तो यात्राओं का एक कदम ज़िदगी का नया फ़लसफा सिखा जाता है। कभी-कभी सिनेमा का एक डॉयलॉग ज़िंदगी जीने का नजरिया बदल देता है।
ये सब एक पल की आत्म संतुष्टि के लिए खुद की ख्वाहिश मात्र भर है। बस, हम औऱ आप पूरा करना चाहते हैं। बस पूरा करना। क्योंकि अधूरा कोई नहीं रहना चाहता।
मैं भी नहीं। इस मैं में पूरा ब्रम्हांड हैं।
कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
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