![]() |
| कोरोना त्रासदी पर राय - Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta |
हिज़रत हो रही है हुज़ूर
फिर भी आप मौन हो ।
कभी बकबक बोलने वाले
पूछ रहे हैं तुम कौन हो ?
आजाद हिंदुस्तान की खुली आंखों के सामने हो रही ये पलायन, सबसे बड़ी त्रासदी के तौर पर काले अक्षरों में नहीं बल्कि सुनहरे अक्षरों में लिखी जाएगी। सुनहरे अक्षरों में इसलिए क्योंकि आने वाले दिनों, महीनों ,बरसों नहीं, ताकि सदियों तक इसके सच को साफ-साफ देखा,सुना औऱ महसूस किया जा सके। ना जाने कितनी कहानियां, कविताएं, औऱ सिनेमा की लकीर खींची जा रही है या फिर भविष्य में औऱ भी गाढ़ी लकीर खींची जाएगी। दर्द की बात है, दूर तक तो की जाएगी ।
ये भी सच है कि हिज़रत (पलायन) के दर्द को सन् 1947 के बाद हिंदुस्तान ने पहली बार महसूस किया।
दरअसल आज के माहौल को देखकर मुझे सन् 2012 की एक घटना याद आ जाती है जब सीरिया बुरी तरह से गृहयुद्ध में प्रवेश कर चुका था। सैकड़ों विद्रोही गुटों ने एक समानांतर व्यवस्था स्थापित कर ली थी , ताकि सीरिया पर उनका नियंत्रण कायम हो सके। जिसका नतीजा यह हुआ कि लड़ाई असद और उनके विरोधियों से आगे निकल गई। सीरिया की लड़ाई में क्षेत्रीय और दुनिया की ताक़तों की एंट्री हुई, इसमें ईरान, रूस, सऊदी अरब और अमरीकी का सीधा हस्तक्षेप सामने आया।
बाहरी देशों पर सीरिया में सांप्रदायिक दरार पैदा करने का भी आरोप लगा। सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. इसी संघर्ष में शिया बनाम सुन्नी की भी स्थिति पैदा हुई।शिया बनाम सुन्नी की दरार के कारण अत्याचार और बढ़ा. इस मतभेद से न केवल लोग मारे जा गए बल्कि सभी समुदायों में राजनीतिक तब्दीली की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया। उन दिनों सीरिया के क़रीब 10 लाख लोगों ने तुर्की में शरण ली । वहीं करीब 70 लाख लोगों को सीरिया के अंदर ही विस्थापित होना पड़ा था। लेबनान में क़रीब 10.20 लाख और जॉर्डन में साढ़े छह लाख सीरियाई नागरिकों ने शरण ली । सीरिया से बड़ी संख्या में लोग यूरोप का भी रुख़ कर रहे थे और वो भी समुद्र के रास्ते। भूमध्य सागर को पार करने वाले 1.37 लाख शरणार्थियों में दो तिहाई सीरिया से थे। कुल मिलाकर करीब 2.7 लाख सीरियाई नागरिकों ने यूरोपीय देशों से शरण मांगी थी।
2012 में सीरियाई लोगों के पलायन को देखकर अनुराग कश्यप की फिल्म ब्लैक फ्राइडे के एक गाने पर वीडियो बनाया था। जिसमें सीरिया के हालात का जिक्र औऱ कुछ सिनेमा की फुटेज का इस्तेमाल किया था। हिज़रत का मतलब यूं तो काफी पहले से जानता था, लेकिन पहली बार नजदीक से महसूस करने का मौका 2012 में मिला। उन दिनों मैं अपने दोस्त अनुराग शर्मा के साथ न्यूज चैनल में बैठकर घंटों पलायन पर औऱ युद्ध के बीच सीरियाई लोगों की जिंदगी पर बहस किया करता था। अपने अपने तर्कों के जरिए घंटों बहस में लगे तो रहते लेकिन आखिर में इंसानी जिंदगी की मुश्किलों पर हमारी बहस खत्म हो जाती। उस दौरान ये भी अंदाजा लगाया करते थे कि सन् 47 में बंटवारे के वक्त लोगों को कितनी तकलीफ हुई होगी। सिर्फ बातों में महसूस कर अपने अपने रास्ते निकल जाया करते थे। उन दिनों कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पलायन की सच्ची तस्वीर औऱ उसके दर्द को इतने नजदीक से महसूस कर पाएंगे। यकीन मानिए इस लॉकडाउन में आज हर हिंदुस्तानी को अपनी मुश्किलों से ज्यादा उन मजबूर मजदूरों का दर्द ज्यादा लग रहा है। ज़ुबान भले ही सिली हो , लेकिन दिल में दर्द की चुभन तो महसूस हो ही रही होगी।
ये एक ऐसा ना भूलने वाला पल है, जो आइनों की तरह हर इंसान के सामने उसका असली अक्स दिखाता रहेगा। सीरिया की घटना पर कांप जाया करते थे, लेकिन आज के मौजूदा हिंदुस्तान में हो रहे पलायन की त्रासदी, उन सूखी आंखों में भी सैलाब ले आया। भूल सको तो भूल जाओ, लेकिन कैसे भूलोगे ? वैसे, जैसे अपनी मौत को भूलाने औऱ झुठलाने की हर पल कोशिश करते हो।
हुज़ूर हिज़रत समझ पाए या ना पाए,
हम तो उन सूनी सड़कों पर बेज़ान ही नजर आए।।
#कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता

No comments:
Post a Comment